पीएम मोदी से RSS क्या चाहता है ?

Bhagavat Modi shahtimesnews
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यह बात अभी तक रहस्य बनी हुई है कि संघ परिवार के कार्यकर्ता भारतीय जनता पार्टी के चुनाव अभियान से अलग क्यों रहे क्या नरेंद्र मोदी और मोहन भागवत की आपसी तनातनी के कारण ऐसा हुआ या फिर संघ मोदी सरकार से कुछ और चाहता था जो मोदी सरकार ने पूरा नहीं किया ?

~ वाहिद नसीम

पहली बात:- सभी इस देश के नागरिक हैं यही जन्मे और मिलकर रहना मगर उन्हें एक बात छोड़नी होगी ?

दूसरी बात:- 1 साल से मणिपुर जल रहा है उसे कौन देखेगा, वहां जो हुआ वह खुद हुआ है या करवाया गया है,का अर्थ क्या है ?

तीसरी बात:- संघ के स्वयंसेवक देश के हर क्षेत्र में अपना कार्य कर रहा है कोई क्षेत्र खाली नहीं है, इसका अर्थ भी समझना होगा!

मोहन भागवत की पहली बात के सभी देश के नागरिक हैं विचारधारा भिन्न और पूजा पद्धति भिन्न होने के बावजूद सबको मिलकर ही आगे बढ़ना होगा भारतीय संस्कृति को आगे ले जाना होगा किसी के पूजा पद्धति अलग होने से वह अलग नहीं हो जाता यानी किसी की विचारधारा अलग होने से उसे विरोधी विचारधारा कहना गलत है! उसे प्रतिपक्ष कहा जा सकता है और कहना चाहिए,यह बात उन्होंने धार्मिक विचार के बारे में भी कही,और सदन के भीतर जो जीत कर आते हैं यानि विपक्षी पार्टियों को विरोधी पार्टियां ना कह कर प्रतिपक्ष कहना होगा! मोहन भागवत के इस कथन में पहले के मुकाबले थोड़ा विनम्र संदेश दिखाई दिया !यही बात मोहन भागवत या संघ के विचारक पहले से ही कहते रहे हैं, मगर वह आखिरी जुमले में हिंदू शब्द जोड़ते रहे हैं !यानी हम सब की संस्कृति एक है पूजा पद्धति अलग हो सकती है, मगर हम सब हिंदू हैं! संघ इस विचार को मानने पर पूरा ज़ोर देता रहा है!पिछले 10 वर्षों में लगातार भारतीय जनता पार्टी मुस्लिम कम्युनिटी को विदेशी पाकिस्तान भारत विरोधी कहकर निशाना बनाती रही है संघ और संघ कार्य लगातार करता है भारतीय जनता पार्टी के साथ सीना ताने खड़े रहे हैं और अपना एजेंडा भारतीय जनता पार्टी को जितना शिद्दत के साथ पूरा करते रहे हैं !


मगर 2024 के चुनाव में पहले दिन से ही मगर 2024 के चुनाव में पहले दिन से ही यह बात उजागर होने लगी थी के संघ परिवार के कार्यकर्ता इस बार भारतीय जनता पार्टी के चुनाव अभियान में शामिल नहीं है!


यह बात अभी तक रहस्य बनी हुई है कि संघ परिवार के कार्यकर्ता भारतीय जनता पार्टी के चुनाव अभियान से अलग क्यों रहे क्या नरेंद्र मोदी और मोहन भागवत की आपसी तनातनी के कारण ऐसा हुआ या फिर संघ मोदी सरकार से कुछ और चाहता था जो मोदी सरकार ने पूरा नहीं किया ? 10 साल तक नरेंद्र मोदी सरकार और राज्य सरकारों के खुलकर मुस्लिम विरोधी बयानात का खामोशी से समर्थन करते रहे फिर ऐसा आज अचानक क्या हो गया की मोहन भागवत ने कहा की जो विदेशी आए थे वह विदेश चले गए और जो यहां पर हैं वह सब भारतीय हैं !
मोहन भागवत के इस बयान को क्या संघ के विचार परिवर्तन का घटक समझा जाए या फिर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय डायस्पोरा के साथ घटने वाली घटनाओं के कारण थोड़ा ठहरों माना जाए यह तो अभी भविष्य के गर्भ में है!

मोहन भागवत की दूसरी बड़ी बात

उन्होंने मणिपुर के दंगों का हवाला देते हुए कहा के 1 साल से मणिपुर जल रहा है जल रहा है या जलाया गया है इसे देखना होगा!
सवाल यह उठता है कि मोहन भागवत साहब 1 साल से मणिपुर को जलते हुए देख रहे हैं मगर खामोश फिर अचानक उन्हें मणिपुर की याद कैसे आ गई क्या चुनाव खत्म होने का इंतजार कर रहे थे या फिर जिस तरह बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने कहा कि मुझे अमेरिका के एक अधिकारी द्वारा प्रस्ताव दिया गया था कि आप बांग्लादेश का एक छोटा टुकड़ा जिसके साथ बर्मा का एक छोटा टुकड़ा और शायद जिस बात को वह साफ तौर पर ना कह सखी के भारत का एक छोटा टुकड़ा मिलकर एक क्रिश्चियन देश स्थापित करने का प्रस्ताव मिला था, और इस सौदे के बदले शेख हसीना की भारी बहुमत से जीत का वादा किया गया था, जिसे शेख हसीना ने ठुकरा दिया था,!

मणिपुर में कुकी जनजाति का रिश्ता इसराइल से बहुत गहरा है और मणिपुर से बड़ी तादाद में कुकी जनजाति के लोग इसराइल गए हुए हैं कुकी जनजाति में से हज़ारों को इसराइल मिशनरी ने जूडीजिम यानी यहूदि होने का यकीन दिया हुआ है, और वह कुकी जनजाति को अपना 12वां कबीला बताते रहे हैं, क्या उन्हें इसराइल भेजना या ना भेजना के मुद्दे को दिमाग में रखकर जलाया गया या जल गया शब्द का इस्तेमाल मोहन भागवत ने किया है ! या फिर मोहन भागवत का इशारा खुद भारतीय जनता पार्टी की तरफ था यह तो अभी भविष्य के गर्भ मे छुपा है!

मोहन भागवत की तीसरी बड़ी बात

संघ के स्वयंसेवक देश के हर क्षेत्र में अपना कार्य कर रहा है कोई क्षेत्र खाली नहीं है ! इस कथन का एक अर्थ यह भी निकलता है कि आरएसएस ने अपनी मेहनत और संगठन के जरिए देश के हर विभाग हर कार्य क्षेत्र में अपने लोगों को एस्टेब्लिश करवाया है या फिर जो एस्टेब्लिश थे उन्हें संघ का सदस्य बनाया है अर्थात देश के हर क्षेत्र हर विभाग में संघ की बड़ी पकड़ मौजूद है !
मोहन भागवत के कथन का अर्थ अगर यही है तो फिर इसे क्या मोदी के लिए एक धमकी भरा संदेश माना जाना चाहिए कि अगर आप आज भी चुनाव जीत रहे हैं तो उसमें संघ की मूक सहमति है, यदि संघ चाहे तो जो अधिकारी बिना किसी चीज के परवाह किए भारतीय जनता पार्टी की 10 सालों वाली सरकारों का सहयोग करते हुए नजर आए हैं वह अपना सहयोग बंद कर सकते हैं!और अगर ऐसा कर दिया तो इस बार की सत्ता पिछले सत्ताओं की तरह चलाना नरेंद्र मोदी को कठिन हो सकता है, अर्थात जेपी नड्डा द्वारा जैसे चुनाव के दौरान कहा था कि भारतीय जनता पार्टी इतनी बड़ी हो चुकी है कि उसे संघ की जरूरत नहीं है,और मोदी जी ने भी धमकी दी थी कि अगर कोई बाज़ ना आया तो मैं सब की पोल खोल दूंगा और फिर तुम सहन नहीं कर पाओगे ! वैसे यह बात क्लियर तो नहीं है कि यह धमकी उन्होंने किसे दी थी, मगर मोहन भागवत का यह संदेश कि देश के हर विभाग में आरएसएस के कार्यकर्ता मौजूद है हर सीट पर मौजूद है और वह संघ के विचार को आगे ले जाने में तत्पर है! तो फिर इस कथन को बीजेपी के लिए धमकी का जवाब ही माना जाना चाहिए!

और विपक्षी पार्टियों को भी इस संदेश से एक सबक लेना चाहिए कि जब देश में ऐसी स्थिति हो और मोहन भागवत यह दावा करते हो कि हर क्षेत्र में संघ के समर्पित कार्य करता मौजूद हैं तो संघ की विपरीत विचारधारा वाली परियां भारतीय परिवेश में चुनाव जीतने के लिए क्या उपाय कर सकती है और उन्हें क्या करना चाहिए!

अपने तीसरे टर्म के लिए नरेंद्र मोदी जी ने जीत एनडीए के सहयोग से प्राप्त कर ली है मगर उनका जो कार्य करने का अंदाज रहा है क्या वह इस बार भी वैसा ही रहेगा या फिर घटक दलों के दबाव में कुछ बदलाव नजर आ सकता है!इस सवाल का जवाब नरेंद्र मोदी जी ने अपनी कैबिनेट में मंत्रालयों के बंटवारे से साफ कर दिया है कि उन पर किसी किस्म का घटक दलों का कोई दबाव मौजूद नहीं है!

और मंत्रालय के बंटवारे का दूसरा पहलू यह भी हो सकता है कि जिस तरह कांग्रेस नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू से बारगेनिंग करके सत्ता में प्रवेश कर सकती थी यानी गठबंधन की सरकार बन सकती थी उन्होंने नहीं बनाई यह कहे कि जानबूझकर सत्ता छोड़ दे इस प्रकार मोदी जी भी घटक दलों को जानबूझकर नाराज करने की कवायत इसी लिए तो नहीं कर रहे हैं कि वह भी सत्ता से पीछा छुड़ाना चाहते हैं और सिर्फ फेस सेविंग लेकर सत्ता के गिरने का इल्ज़ाम सहयोगी पार्टियों पर धरना चाहते हैं!
इनमें से कारण कोई भी हो मगर इस बार 2024 में को बनने वाली सरकार किसी के लिए भी आसान नहीं होगी शायद इस ट्रम में बहुत से रहस्य छुपे हुए हैं।

(वाहिद नसीम लेखक जाने माने वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक है।)

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