
Palm Bay City Council censures Councilman Chandler Langevin for anti-Indian remarks, sparking global debate on free speech and accountability - Shah Times
जब अमेरिकी सियासत में ‘भारतीय कार्ड’ बना विवाद का मुद्दा
भारत-अमेरिका रिश्तों पर नफ़रत की सियासत का साया: चैंडलर लैंगविन विवाद का गहराई से विश्लेषण
📍नई दिल्ली🗓️ 19 अक्टूबर 2025✍️ आसिफ़ ख़ान
अमेरिकी राजनेता चैंडलर लैंगविन के भारतीयों पर विवादित बयान ने न केवल अमेरिकी राजनीति में हलचल मचा दी, बल्कि भारत-अमेरिका रिश्तों की गहराई और भविष्य पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। यह विवाद उस समय उठा है जब दोनों देशों के बीच रणनीतिक, आर्थिक और टेक्नोलॉजिकल साझेदारी अपने चरम पर है।
अमेरिकी राजनीति में एक बार फिर नफ़रत भरे अल्फ़ाज़ ने इंसानियत की सीमाएं तोड़ दी हैं। फ़्लोरिडा के स्थानीय राजनेता चैंडलर लैंगविन ने हाल ही में भारतीयों के ख़िलाफ़ जो टिप्पणियां कीं, उन्होंने न केवल अमरीका की लोकतांत्रिक रूह पर सवाल उठाए बल्कि यह सोचने पर भी मजबूर किया कि क्या आज भी अमेरिका अपने बहुरंगी समाज को पूरी तरह स्वीकार नहीं कर पाया?
“अमेरिका अमेरिकियों के लिए” — या नफ़रत के लिए?
लैंगविन ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा कि “एक भी भारतीय ऐसा नहीं है जो अमेरिका की परवाह करता हो, वे यहां केवल आर्थिक फ़ायदा उठाने आए हैं।”
यह बयान सुनने में भले ही एक ग़ुस्सैल राजनेता का पागलपन लगे, लेकिन यह अमेरिका के उस तबक़े की सोच को दर्शाता है जो अब भी नस्लीय श्रेष्ठता के भ्रम में जी रहा है।
उनका यह कहना कि “अमेरिका, अमेरिकियों के लिए है” – दरअसल उस पुरानी सोच का पुनर्जन्म है जो यह मानती है कि प्रवासी सिर्फ़ दूसरों की नौकरियां छीनते हैं। लेकिन सच्चाई इसके बिलकुल उलट है। भारत से आए प्रोफेशनल्स, डॉक्टर, इंजीनियर, आईटी एक्सपर्ट्स और छोटे-बड़े कारोबारी, अमेरिका की इकोनॉमी में रीढ़ की हड्डी बन चुके हैं।
भारतीय प्रवासियों की भूमिका: ‘Burden’ नहीं, Backbone हैं
2024 की रिपोर्ट के मुताबिक़, भारतीय-अमेरिकी औसतन सबसे ज़्यादा टैक्स देने वाले समुदायों में से एक हैं। सिलिकॉन वैली की हर बड़ी कंपनी — Google से लेकर Microsoft तक — भारतीय दिमागों से चल रही है।
अगर यह समुदाय “अमेरिका की परवाह नहीं करता”, तो फिर ये देश आज जिस टेक्नोलॉजिकल ऊंचाई पर है, वहां कैसे पहुंचा?
लैंगविन के पीछे की सियासी मानसिकता
लैंगविन रिपब्लिकन पार्टी से जुड़े हैं और यह बयान ऐसे समय में आया है जब अमेरिका में चुनावी माहौल गर्म हो रहा है। ‘इमिग्रेशन’ हर बार की तरह इस बार भी एक सियासी हथियार बन चुका है।
वो जानते हैं कि वोटबैंक को आकर्षित करने के लिए कुछ कट्टरपंथी नारों से सुर्खियां बटोरी जा सकती हैं। पर यही राजनीति अमेरिका की ‘सॉफ्ट पावर’ को धीरे-धीरे खोखला कर रही है।
अमेरिका की आत्मा प्रवासियों से बनी है
अमेरिकी संविधान की रूह में लिखा है — “We the People”, न कि “We the Americans Only.”
मेयर रॉब मेडिना ने बिल्कुल सही कहा कि “यह देश अप्रवासियों के दम पर खड़ा हुआ है।”
यह बात हर अमेरिकी को याद रखनी चाहिए कि जब यूरोपीय बसने वाले इस धरती पर आए थे, तब वे भी अप्रवासी ही थे। फिर आज के भारतीयों को बाहरी कहने का क्या औचित्य रह जाता है?
मीडिया की भूमिका और ‘वॉशिंगटन पोस्ट’ का खुलासा
वॉशिंगटन पोस्ट ने इस पूरे प्रकरण को सामने लाकर दिखाया कि किस तरह एक छोटे से शहर का नेता, सोशल मीडिया के ज़रिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विवाद का कारण बन गया।
इस घटना ने यह भी उजागर किया कि डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म आज कितने शक्तिशाली हैं — एक ट्वीट, और पूरी दुनिया में नफ़रत या एकता दोनों फैल सकती हैं।
भारत की प्रतिक्रिया और जनता की नाराज़गी
भारत में सोशल मीडिया पर लैंगविन के बयान की कड़ी आलोचना हुई। ट्विटर (अब X) और इंस्टाग्राम पर हैशटैग #ApologizeLangvin ट्रेंड करने लगा। भारतीय-अमेरिकी समुदाय ने भी सामूहिक रूप से पाम बे सिटी काउंसिल को चिट्ठी लिखी, जिसमें ऐसी बयानबाज़ी के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई की मांग की गई।
भारत-अमेरिका रिश्तों पर असर?
राजनैतिक स्तर पर यह विवाद शायद बहुत बड़ा संकट न बने, लेकिन यह उस ‘विश्वास’ पर चोट ज़रूर करता है, जो पिछले दो दशकों में धीरे-धीरे बना है।
मोदी-बाइडन युग में दोनों देशों के बीच रक्षा, व्यापार, और रणनीतिक साझेदारी मज़बूत हुई है। पर ऐसे बयानों से भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिकों की सुरक्षा और मानसिक स्थिति पर असर पड़ना तय है।
क्या इसे सिर्फ़ ‘Freedom of Speech’ कहा जा सकता है?
लैंगविन ने सफाई में कहा कि उन्होंने “सिर्फ़ डिबेट शुरू करने की कोशिश की थी।”
लेकिन सवाल यह है — क्या किसी समुदाय को अपमानित करके बहस शुरू करना लोकतंत्र कहलाता है?
अभिव्यक्ति की आज़ादी का मतलब यह नहीं कि आप नफ़रत को जायज़ ठहराएं।
यह वही रेखा है, जिसे अमेरिका की सियासत बार-बार पार करती नज़र आ रही है।
अमेरिका का डबल स्टैंडर्ड
दिलचस्प बात यह है कि जब किसी अमेरिकी नागरिक पर विदेश में हमला होता है, तो अमेरिका तुरंत “राइट्स और ह्यूमैनिटी” की बातें करने लगता है।
लेकिन जब बात अपने देश में रह रहे प्रवासियों की आती है, तो वही आवाज़ें खामोश हो जाती हैं।
यह डबल स्टैंडर्ड अमेरिका की नैतिक विश्वसनीयता को कम करता है, और यही भारत जैसे साझेदार देशों के लिए चिंता का विषय है।
भारतीयों के लिए पैग़ाम
इस विवाद से भारतीय समुदाय को एक बार फिर यह सीख मिलती है कि विदेशों में सफलता के बावजूद पहचान की लड़ाई कभी खत्म नहीं होती।
हमें अपनी मेहनत, ईमानदारी और एकता से इस सोच का जवाब देना होगा।
क्योंकि आखिरकार, जो नफ़रत शब्दों से फैलती है, उसे केवल कर्म से हराया जा सकता है।
आखिर में – रिश्तों का इम्तिहान
भारत-अमेरिका रिश्ते सिर्फ़ सरकारों के बीच नहीं, बल्कि लोगों के दिलों के बीच भी हैं।
ऐसे विवाद दोनों देशों को यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि “साझेदारी” का असली मतलब क्या है — सिर्फ़ व्यापारिक हित या आपसी सम्मान?
सच्ची साझेदारी तभी टिकेगी जब दोनों समाज एक-दूसरे को समझेंगे, न कि एक-दूसरे पर शक करेंगे।






