शिक्षक दिवस पर सपा ने ‘पाठशाला पुकारे’ अभियान शुरू किया। अखिलेश यादव ने स्कूलों की संख्या घटने का मुद्दा उठाया, जबकि योगी सरकार इसे स्कूलों के विलय की प्रक्रिया बताती है।
लखनऊ, उत्तर प्रदेश
उत्तर प्रदेश में सरकारी स्कूलों को लेकर सियासी बहस एक बार फिर तेज हो गई है। शिक्षक दिवस के मौके पर समाजवादी पार्टी ने प्रदेशभर में ‘पाठशाला पुकारे’ अभियान शुरू किया है। पार्टी का कहना है कि इस अभियान के जरिए उन प्राथमिक और जूनियर हाईस्कूलों का मुद्दा उठाया जाएगा, जिन्हें वह पिछले वर्षों में बंद किए जाने का दावा करती है।
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इस मुद्दे पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार को निशाने पर लिया है। उन्होंने कहा कि जिन स्कूलों को बंद किया गया है, उन्हें दोबारा खोला जाना चाहिए। सपा ने अपने अभियान को शिक्षा, सामाजिक न्याय और युवाओं से जुड़े सवालों के साथ जोड़ा है।
समाजवादी छात्र सभा की ओर से शुरू किया गया यह अभियान 5 सितंबर से 11 सितंबर तक चलेगा। पार्टी के मुताबिक अभियान के दौरान प्रदेश के उन स्कूलों के बाहर शिक्षकों का सम्मान किया जाएगा, जिन्हें सपा बंद किए गए विद्यालयों के रूप में देखती है।
अभियान का राजनीतिक संदेश भी स्पष्ट है। सपा ने इसे ‘बंद स्कूल खुलेगा, तो पीडीए पढ़ेगा’ के नारे से जोड़ा है। पार्टी का कहना है कि शिक्षा की पहुंच कमजोर और वंचित तबकों तक बनाए रखना जरूरी है।
अभियान के दौरान छात्र, नौजवान और पीडीए से जुड़े जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाने हैं। सपा के मुताबिक ग्रामीण इलाकों तक पहुंच बनाकर छात्रों की समस्याएं और सुझाव भी सुने जाएंगे।
अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश में पिछले वर्षों के दौरान 26,386 प्राथमिक विद्यालयों के बंद होने का दावा किया है। उनके मुताबिक स्कूलों की संख्या में इस तरह की कमी का सीधा असर सरकारी शिक्षा व्यवस्था और विद्यार्थियों पर पड़ा है।
अखिलेश यादव ने यह मुद्दा विधानसभा के मानसून सत्र से पहले भी उठाया था। उस वक्त उन्होंने स्कूलों की संख्या घटने के साथ सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों के नामांकन में कमी और शिक्षकों से जुड़े आंकड़ों का भी हवाला दिया था।
सपा का तर्क है कि सरकारी स्कूलों का नेटवर्क कमजोर होने से ग्रामीण, गरीब और सामाजिक रूप से पिछड़े परिवारों के बच्चों की शिक्षा प्रभावित हो सकती है। पार्टी ने इसी वजह से स्कूलों को दोबारा खोलने की मांग को अपने राजनीतिक एजेंडे में प्रमुखता दी है।
26,386 का आंकड़ा इस राजनीतिक विवाद का सबसे अहम हिस्सा है। सपा ने पिछले वर्षों के सरकारी शिक्षा आंकड़ों की तुलना के आधार पर प्राथमिक विद्यालयों की संख्या में इतनी कमी का दावा किया है। एक प्रकाशित विश्लेषण के मुताबिक सपा के दस्तावेज में 2016-17 के 1,13,938 सरकारी प्राथमिक विद्यालयों और 2025-26 के 87,552 विद्यालयों के आंकड़ों की तुलना की गई है। दोनों आंकड़ों के बीच अंतर 26,386 का है।
यहां एक महत्वपूर्ण पत्रकारिता संबंधी फर्क समझना जरूरी है। स्कूलों की संख्या में कमी और इतने स्कूलों को प्रशासनिक तौर पर “बंद” किए जाने की बात एक ही अर्थ नहीं रखती। इसी बिंदु पर विपक्ष और सरकार की व्याख्या अलग है।
सपा इस कमी को स्कूल बंद किए जाने के रूप में पेश कर रही है। दूसरी ओर राज्य सरकार ने कहा है कि उसने सरकारी स्कूलों को बंद करने का फैसला नहीं किया, बल्कि कम छात्र संख्या वाले या एक ही परिसर में संचालित विद्यालयों के विलय की प्रक्रिया अपनाई है।
योगी सरकार की ओर से पहले दिए गए जवाब में कहा गया था कि लगभग 19 हजार ऐसे विद्यालय थे, जो एक ही परिसर में अलग-अलग तरीके से संचालित हो रहे थे। सरकार के मुताबिक इन्हें प्रशासनिक सुविधा और संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल के लिए मर्ज किया गया।
सरकार ने यह भी कहा था कि 5,913 ऐसे विद्यालयों के विलय का फैसला लिया गया, जहां विद्यार्थियों की संख्या 50 से कम थी और आसपास एक किलोमीटर से कम दूरी पर दूसरा विद्यालय मौजूद था। सरकार का तर्क है कि इस प्रक्रिया को स्कूल बंद करना नहीं कहा जाना चाहिए।
बेसिक शिक्षा मंत्री संदीप सिंह ने भी कहा था कि किसी परिषदीय सरकारी विद्यालय को बंद करने का फैसला नहीं लिया गया। उनके मुताबिक कम छात्र संख्या वाले विद्यालयों को नजदीकी विद्यालयों में मर्ज किया गया और खाली होने वाले परिसरों में प्री-प्राइमरी कक्षाओं तथा बालवाटिका जैसी व्यवस्थाएं शुरू की गईं।
यानी विवाद का मूल सवाल केवल यह नहीं है कि कितने स्कूलों की संख्या घट गई। असल सवाल यह भी है कि उन विद्यालयों का प्रशासनिक दर्जा क्या बदला, विद्यार्थियों को कहां स्थानांतरित किया गया और इससे उनके आवागमन तथा पढ़ाई पर क्या असर पड़ा।
‘पाठशाला पुकारे’ अभियान को सपा ने केवल स्कूलों तक सीमित नहीं रखा है। पार्टी के कार्यक्रम में पेपर लीक, फीस में बढ़ोतरी, रोजगार, आरक्षण और कॉलेज तथा विश्वविद्यालयों में नियुक्तियों में पारदर्शिता जैसे मुद्दे भी शामिल किए गए हैं।
सपा छात्र सभा के कार्यक्रमों में युवाओं की राजनीति में भूमिका पर संगोष्ठियों का भी प्रस्ताव है। पार्टी का कहना है कि छात्रों और नौजवानों से जुड़े सवालों को स्थानीय स्तर पर सुना जाएगा।
इससे साफ है कि अभियान का दायरा शिक्षा व्यवस्था से आगे बढ़ाकर युवा राजनीति और सामाजिक न्याय तक ले जाने की कोशिश की जा रही है।
सरकारी स्कूलों की संख्या कम होना अपने आप में शिक्षा व्यवस्था के कमजोर होने का अंतिम प्रमाण नहीं है। स्कूलों का विलय कई परिस्थितियों में प्रशासनिक और शैक्षणिक वजहों से भी किया जाता है। कम छात्र संख्या वाले छोटे विद्यालयों को पास के बड़े विद्यालय से जोड़ना सरकारों की शिक्षा नीति का हिस्सा रहा है।
लेकिन दूसरी तरफ केवल विलय का प्रशासनिक तर्क पर्याप्त नहीं है। यह देखना भी जरूरी है कि नए विद्यालय तक बच्चों की दूरी कितनी बढ़ी, परिवहन की सुविधा कैसी है, कक्षाओं में विद्यार्थियों की संख्या कितनी हुई और शिक्षकों की उपलब्धता में क्या बदलाव आया।
इसी वजह से इस पूरे विवाद का मूल्यांकन केवल राजनीतिक आरोपों से नहीं, बल्कि विद्यालयवार आंकड़ों से होना चाहिए।
अखिलेश यादव ने सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में विद्यार्थियों की संख्या घटने का भी मुद्दा उठाया है। उन्होंने करीब 28 लाख विद्यार्थियों के नामांकन में कमी का दावा किया था। उनके मुताबिक इनमें बड़ी संख्या पिछड़े, दलित और अन्य वंचित वर्गों के बच्चों की है।
इन दावों की राजनीतिक व्याख्या अलग-अलग हो सकती है, लेकिन नामांकन में बदलाव को समझने के लिए जनसंख्या, निजी स्कूलों की ओर रुझान, स्कूल विलय, प्रवासन और सरकारी शिक्षा नीतियों जैसे कई कारकों को साथ देखना जरूरी होगा।
इसलिए किसी एक आंकड़े को पूरी शिक्षा व्यवस्था की स्थिति का अकेला पैमाना मानना उचित नहीं होगा।
उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में सरकारी स्कूल शिक्षा और सामाजिक गतिशीलता का अहम माध्यम हैं। इसलिए स्कूलों की संख्या, नामांकन और शिक्षक उपलब्धता का मुद्दा सीधे सार्वजनिक हित से जुड़ता है।
समाजवादी पार्टी इस विषय को अपने पीडीए नैरेटिव से जोड़ रही है। पार्टी का कहना है कि गरीब, पिछड़े, दलित और अन्य वंचित परिवारों के बच्चों के लिए सरकारी स्कूलों की पहुंच बनी रहनी चाहिए।
शिक्षा से जुड़ा यह मुद्दा आगामी राजनीतिक बहस में इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि स्कूलों का सवाल रोजगार, आरक्षण, सामाजिक प्रतिनिधित्व और ग्रामीण विकास से भी जुड़ता है।
राज्य सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपने विलय संबंधी फैसलों को स्पष्ट आंकड़ों के साथ सामने रखना होगी। किन स्कूलों का विलय हुआ, क्यों हुआ, कितने विद्यार्थी प्रभावित हुए और विलय के बाद उनके लिए क्या व्यवस्था की गई, इन सवालों पर विस्तृत सार्वजनिक जानकारी राजनीतिक विवाद को कम कर सकती है।
इसी तरह विपक्ष के 26,386 स्कूल बंद होने के दावे की भी विद्यालयवार जांच जरूरी है। यदि यह संख्या प्रशासनिक रिकॉर्ड में विलय, पुनर्गठन या अन्य श्रेणियों से बनी है, तो उसकी स्पष्ट व्याख्या जरूरी है।
5 से 11 सितंबर तक चलने वाले सपा अभियान के दौरान यह मुद्दा प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में उठाया जाएगा। पार्टी शिक्षकों के सम्मान के साथ छात्रों और युवाओं की समस्याओं को भी राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाने की तैयारी में है।
सरकार की ओर से पहले ही स्कूल बंद करने के आरोप को खारिज करते हुए विलय की नीति का पक्ष रखा जा चुका है। ऐसे में आने वाले दिनों में सियासी बहस मुख्य रूप से इस बात पर केंद्रित रह सकती है कि विद्यालयों की संख्या में आई कमी को किस प्रशासनिक श्रेणी में रखा जाए और उसका जमीनी असर क्या रहा है।
इस विवाद में राजनीतिक बयानबाजी से अलग सबसे महत्वपूर्ण सवाल बच्चों की शिक्षा का है। किसी विद्यालय का विलय हुआ हो या प्रशासनिक रिकॉर्ड में उसकी स्थिति बदली हो, अंतिम कसौटी यह होनी चाहिए कि बच्चों को पहले की तुलना में बेहतर या कम से कम समान स्तर की शिक्षा मिल रही है या नहीं।
सरकारी स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक, सुरक्षित भवन, शौचालय, बिजली, डिजिटल सुविधाएं और बच्चों तक आसान पहुंच जैसी बुनियादी जरूरतें पूरी होना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
उत्तर प्रदेश में स्कूलों को लेकर शुरू हुई नई सियासी बहस अब आंकड़ों और आरोपों से आगे बढ़कर जमीनी पड़ताल की मांग करती है। 26,386 का आंकड़ा विपक्ष के लिए बड़ा राजनीतिक मुद्दा है, जबकि सरकार इसे स्कूल बंद होने के बजाय विलय और पुनर्गठन की प्रक्रिया बताती है।
आगे की तस्वीर इस बात से साफ होगी कि सरकारी रिकॉर्ड, स्कूलवार स्थिति और विद्यार्थियों की वास्तविक पहुंच क्या बताती है। फिलहाल शिक्षक दिवस पर शुरू हुआ ‘पाठशाला पुकारे’ अभियान उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को एक बार फिर राज्य की सियासी बहस के केंद्र में ले आया है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।