बिहार में छात्र प्रदर्शन पर पुलिस कार्रवाई को लेकर कांग्रेस के सवाल
सीवान फायरिंग से उठे सवाल, कांग्रेस ने मांगी पुलिस जवाबदेही
बिहार छात्र प्रदर्शन: छह जिलों की रिपोर्ट में बल प्रयोग पर आरोप
बिहार के छात्र प्रदर्शनों पर पुलिस कार्रवाई को लेकर कांग्रेस ने छह जिलों की फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट पेश की। पार्टी ने बल प्रयोग, फायरिंग, हिरासत और छात्रों के कथित उत्पीड़न के आरोप उठाए। सीवान में पुलिसकर्मी के निलंबन से मामला गंभीर हुआ। हालांकि सभी आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी बाकी है और जांच जारी है।
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📍 नई दिल्ली, बिहार | 📰 11 अगस्त 2026 | ✍️ Mond Naved
बिहार छात्र प्रदर्शन पर कांग्रेस की फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट
बिहार छात्र प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई को लेकर कांग्रेस ने गंभीर सवाल उठाए हैं। पार्टी की छह फैक्ट-फाइंडिंग टीमों ने पटना, जहानाबाद, भागलपुर, दरभंगा, पूर्णिया और सीवान का दौरा कर छात्रों, युवाओं, मीडिया प्रतिनिधियों और सरकारी अधिकारियों से बातचीत की। कांग्रेस के मुताबिक, इन टीमों का मकसद पुलिस कार्रवाई, हिरासत और कथित बल प्रयोग से जुड़े तथ्यों को दर्ज करना था।
यह मामला इसलिए अहम है क्योंकि जुलाई के अंत में बिहार के कई हिस्सों में NEET पेपर लीक और परीक्षा व्यवस्था से जुड़े विवाद को लेकर प्रदर्शन हुए थे। 25 जुलाई को राज्यव्यापी बंद के दौरान पटना, सीवान और अन्य इलाकों में प्रदर्शनकारियों तथा पुलिस के बीच झड़पें हुईं। पुलिस ने आंसू गैस और बल प्रयोग की बात कही, जबकि प्रदर्शनकारियों ने पुलिस कार्रवाई को अत्यधिक बताया।
कांग्रेस ने 1 और 2 अगस्त को छह जिलों में अलग-अलग टीमें भेजीं। पार्टी के मुताबिक, टीमों ने जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक से मुलाकात की तथा छात्रों और युवाओं से उनके अनुभव दर्ज किए। कांग्रेस ने कहा था कि वह एफआईआर, मेडिकल रिपोर्ट, वीडियो, फोटो, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और कानूनी दस्तावेज जैसे रिकॉर्ड जुटाने की कोशिश करेगी।
10 अगस्त को नई दिल्ली में पार्टी ने इन दौरों के आधार पर अपने निष्कर्ष सार्वजनिक किए। कांग्रेस का आरोप है कि कई स्थानों पर छात्रों और युवा प्रदर्शनकारियों के खिलाफ जरूरत से ज्यादा पुलिस बल का इस्तेमाल हुआ। पार्टी ने उन अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग की है, जिन्होंने कथित कार्रवाई का आदेश दिया या उसे लागू किया।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि कांग्रेस की फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट एक राजनीतिक दल की जांच है। इसके निष्कर्षों को स्वतंत्र न्यायिक या सरकारी जांच का अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। यही वजह है कि आरोपों और स्थापित तथ्यों के बीच फर्क बनाए रखना इस मामले में अहम है।
सीवान की घटना ने पूरे विवाद को ज्यादा गंभीर बना दिया। 25 जुलाई के प्रदर्शन के दौरान एक पुलिसकर्मी को AK-47 से हवा में फायरिंग करते हुए दिखाने वाला वीडियो सामने आया। इसके बाद संबंधित पुलिसकर्मी को निलंबित किया गया और विभागीय कार्रवाई शुरू की गई। जिला प्रशासन ने कहा कि उसे फायरिंग का आदेश नहीं दिया गया था।
सीवान के पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, पुलिस की तरफ से कई राउंड फायरिंग हुई। पुलिस अधीक्षक ने बताया था कि लंबी दूरी के हथियारों और पिस्तौल से गोलियां चलीं तथा कुल फायरिंग की संख्या लगभग आठ से दस राउंड के बीच थी। पुलिस ने यह भी कहा कि प्रदर्शनकारियों की तरफ से पुलिस पर हमला और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया था।
तीन लोगों के गोली लगने की जानकारी भी सामने आई। इनमें मोहम्मद आरिफ, आकाश कुमार और बुलेट कुमार गौर के नाम सामने आए। पुलिस ने कहा कि तीनों अलग-अलग स्थानों पर घायल हुए थे और यह जांच का विषय है कि उन्हें लगी गोलियां पुलिस की फायरिंग से चली थीं या किसी अन्य स्रोत से।
यही बिंदु पूरे मामले की सबसे महत्वपूर्ण अनिश्चितता है। एक पुलिसकर्मी द्वारा हवा में फायरिंग का वीडियो सामने आना स्थापित तथ्य है और उसके बाद निलंबन भी हुआ। लेकिन तीनों नागरिकों को लगी गोलियों का स्रोत अभी जांच का विषय है। इसलिए कांग्रेस के इस दावे को कि सभी घायलों को पुलिस की गोली लगी, स्वतंत्र रूप से प्रमाणित तथ्य के तौर पर पेश करना उचित नहीं होगा।
पुलिस का कहना है कि सीवान में स्थिति बिगड़ने के बाद कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कार्रवाई की गई। पुलिस अधिकारियों ने दावा किया कि प्रदर्शनकारियों ने पुलिसकर्मियों पर हमला किया और सरकारी तथा सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया। इसी संदर्भ में आंसू गैस और सीमित बल प्रयोग की बात सामने आई।
सीवान पुलिस के अनुसार, हिंसा के बाद बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी घायल हुए और सैकड़ों लोगों को हिरासत में लिया गया। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, पुलिस के आंकड़ों में 58 पुलिसकर्मियों के घायल होने और 423 लोगों को हिरासत में लिए जाने की बात सामने आई थी।
इससे तस्वीर एकतरफा नहीं रहती। अगर प्रदर्शन के दौरान पुलिस पर हमला, पथराव या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान हुआ, तो प्रशासन के सामने कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी थी। लेकिन इसी के साथ पुलिस बल का इस्तेमाल आवश्यकता, अनुपात और प्रक्रिया के मुताबिक हुआ या नहीं, यह भी स्वतंत्र जांच का हिस्सा होना चाहिए।
भारत का संविधान नागरिकों को शांतिपूर्वक और बिना हथियार एकत्र होने का अधिकार देता है। संविधान के अनुच्छेद 19 में यह अधिकार दर्ज है, हालांकि सार्वजनिक व्यवस्था और अन्य वैध हितों के लिए उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने भी कई फैसलों में शांतिपूर्ण प्रदर्शन को संवैधानिक अधिकार के दायरे में माना है। साथ ही अदालत ने यह स्पष्ट किया है कि यह अधिकार पूर्ण नहीं है और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़ी उचित पाबंदियां लागू हो सकती हैं।
इसलिए विवाद का मूल सवाल केवल यह नहीं है कि प्रदर्शनकारी सड़क पर क्यों उतरे। असली सवाल यह भी है कि जहां प्रदर्शन शांतिपूर्ण था, वहां पुलिस ने कौन-सा बल इस्तेमाल किया, किस आदेश के तहत किया और क्या उससे कम बल में स्थिति नियंत्रित की जा सकती थी।
कांग्रेस की फैक्ट-फाइंडिंग टीम ने सीवान समेत कई जिलों में छात्रों और युवाओं की हिरासत का मुद्दा उठाया। पार्टी के नेताओं ने दावा किया कि कई प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की गई और कुछ मामलों में जरूरत से ज्यादा बल इस्तेमाल किया गया।
राज्यसभा सांसद इमरान प्रतापगढ़ी ने सीवान में तीन युवाओं के घायल होने का जिक्र करते हुए पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि गोली लगने के बाद भी एक युवक को पीटा गया। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध रिकॉर्ड में नहीं हुई है, इसलिए इन्हें कांग्रेस के दावे के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
कांग्रेस ने यह भी सवाल उठाया कि अगर पुलिस ने शुरुआत में फायरिंग से इनकार किया था तो बाद में फायरिंग करते दिखे पुलिसकर्मी के खिलाफ निलंबन और विभागीय कार्रवाई क्यों करनी पड़ी। प्रशासन का पक्ष यह है कि संबंधित पुलिसकर्मी ने बिना आदेश हवा में गोली चलाई थी।
पूर्णिया के सांसद पप्पू यादव ने प्रदर्शन के दौरान लड़कियों के कथित उत्पीड़न का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद से जुड़े कुछ लोगों और सादे कपड़ों में मौजूद अज्ञात व्यक्तियों ने लड़कियों से माफी मांगने के लिए दबाव डाला।
यह आरोप गंभीर है, लेकिन उपलब्ध स्वतंत्र स्रोतों में इसकी पर्याप्त पुष्टि नहीं मिली है। इसलिए इस दावे को स्थापित घटना के रूप में प्रकाशित करने के बजाय कांग्रेस नेता द्वारा लगाए गए आरोप के तौर पर ही दर्ज किया जाना चाहिए।
इस विवाद का दूसरा पहलू परीक्षा प्रणाली है। छात्रों के प्रदर्शन केवल पुलिस कार्रवाई से जुड़े नहीं थे। परीक्षा में कथित अनियमितता, पेपर लीक, भर्ती परीक्षाओं की विश्वसनीयता और प्रतियोगी परीक्षाओं के आर्थिक खर्च ने युवाओं में असंतोष को बढ़ाया है।
कांग्रेस ने परीक्षा केंद्रों को संभागीय और जिला स्तर तक बढ़ाने, आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों के लिए बेहतर ऑनलाइन शिक्षा और परीक्षा कैलेंडर को व्यवस्थित तरीके से जारी करने की मांग रखी है। पार्टी ने यह भी दावा किया कि कुछ छात्रों ने परीक्षा शुल्क घटाकर एक रुपये करने की मांग रखी।
इन मांगों पर अलग-अलग नीति स्तर की बहस जरूरी है। परीक्षा शुल्क कम करना, केंद्रों की संख्या बढ़ाना या ऑनलाइन शिक्षा को मजबूत करना प्रशासनिक और वित्तीय फैसलों से जुड़ा विषय है। इन प्रस्तावों की व्यवहारिकता पर सरकार, परीक्षा संस्थानों और शिक्षा विशेषज्ञों की राय भी महत्वपूर्ण होगी।
उपलब्ध जानकारी से यह कहना जल्दबाजी होगी कि बिहार में हर प्रदर्शन स्थल पर पुलिस ने अत्यधिक बल प्रयोग किया। अलग-अलग जिलों में हालात अलग थे और कुछ जगहों पर प्रदर्शन अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण भी रहे। सीवान में हिंसा, पुलिसकर्मियों की चोट और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचने की रिपोर्ट भी सामने आई है।
दूसरी तरफ, सीवान में पुलिसकर्मी की AK-47 फायरिंग का वीडियो और उसके बाद हुआ निलंबन यह सवाल जरूर खड़ा करता है कि भीड़ नियंत्रण के लिए हथियारों के इस्तेमाल की निगरानी कितनी प्रभावी थी। जिला प्रशासन का यह कहना कि संबंधित पुलिसकर्मी के पास फायरिंग का आदेश नहीं था, जवाबदेही के एक हिस्से को स्पष्ट करता है, लेकिन पूरे घटनाक्रम की जांच का विकल्प नहीं है।
यही वजह है कि इस मामले में स्वतंत्र जांच का महत्व बढ़ जाता है। एफआईआर, मेडिकल रिपोर्ट, वीडियो फुटेज, बैलिस्टिक जांच, पुलिस वायरलेस रिकॉर्ड और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान मिलाकर ही यह स्पष्ट हो सकता है कि किस परिस्थिति में कौन-सा बल इस्तेमाल हुआ।
बिहार में छात्र आंदोलनों का मुद्दा अब सियासी बहस का हिस्सा बन चुका है। विपक्ष पुलिस कार्रवाई को सरकार की जवाबदेही से जोड़ रहा है, जबकि प्रशासन कानून-व्यवस्था और हिंसा की घटनाओं को अपने पक्ष की मुख्य वजह बता रहा है।
इस राजनीतिक टकराव के बीच मूल मुद्दा पीछे नहीं छूटना चाहिए। छात्रों की परीक्षा संबंधी शिकायतों की निष्पक्ष जांच, पुलिस कार्रवाई की स्वतंत्र समीक्षा और दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों या प्रदर्शनकारियों पर समान रूप से कानून लागू करना लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता के लिए जरूरी है।
सीवान की फायरिंग और अन्य जिलों में पुलिस कार्रवाई से जुड़े मामलों में जांच के निष्कर्ष अहम होंगे। विभागीय जांच से यह पता चलना चाहिए कि निलंबित पुलिसकर्मी ने किस परिस्थिति में हथियार चलाया और क्या उसने निर्धारित प्रक्रिया का उल्लंघन किया।
इसके साथ ही गोली लगने वाले तीन लोगों के मामलों में मेडिकल और फोरेंसिक साक्ष्य महत्वपूर्ण होंगे। अगर जांच यह स्थापित करती है कि किसी व्यक्ति को पुलिस की गोली लगी, तो जवाबदेही का सवाल अलग स्तर पर पहुंचेगा। अगर ऐसा प्रमाणित नहीं होता, तो आरोपों की तस्वीर भी बदल सकती है।
कांग्रेस की फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट राजनीतिक निगरानी और विपक्षी जांच के रूप में महत्वपूर्ण है, लेकिन अंतिम निष्कर्ष के लिए स्वतंत्र संस्थागत जांच जरूरी रहेगी। इसी तरह प्रदर्शनकारियों की ओर से हिंसा या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान के मामलों में भी प्रमाण के आधार पर कार्रवाई होनी चाहिए।
प्रदर्शन NEET पेपर लीक और परीक्षा व्यवस्था से जुड़ी कथित अनियमितताओं तथा छात्रों पर हुई पिछली पुलिस कार्रवाई के विरोध में हुए। 25 जुलाई को राज्य के कई हिस्सों में बंद और प्रदर्शन के दौरान झड़पें भी हुईं।
सीवान में एक पुलिसकर्मी को AK-47 से हवा में फायरिंग करते हुए दिखाने वाला वीडियो सामने आया था। संबंधित पुलिसकर्मी को निलंबित किया गया और विभागीय जांच शुरू हुई। प्रशासन ने कहा कि उसे फायरिंग का आदेश नहीं दिया गया था।
तीन लोगों के गोली लगने की पुष्टि हुई थी, लेकिन पुलिस के मुताबिक यह अभी जांच का विषय है कि तीनों को लगी गोलियां पुलिस की फायरिंग से चली थीं या किसी अन्य स्रोत से।
छह टीमों ने पटना, जहानाबाद, भागलपुर, दरभंगा, पूर्णिया और सीवान का दौरा किया। टीमों ने छात्रों, युवाओं, अधिकारियों और अन्य संबंधित लोगों से बातचीत की तथा पुलिस कार्रवाई से जुड़े दस्तावेज और बयान जुटाने की प्रक्रिया अपनाई।
फायरिंग की परिस्थितियों, गोली लगने के स्रोत, पुलिस आदेश, विभागीय प्रक्रिया, मेडिकल रिकॉर्ड, वीडियो फुटेज और दर्ज एफआईआर की स्वतंत्र जांच सबसे अहम होगी। इन्हीं साक्ष्यों से आरोप और स्थापित तथ्य अलग किए जा सकेंगे।
बिहार छात्र प्रदर्शन पर पुलिस बल प्रयोग का विवाद अब केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रहना चाहिए। सीवान में पुलिसकर्मी का निलंबन एक स्थापित घटनाक्रम है, जबकि तीन नागरिकों को लगी गोलियों का स्रोत और कांग्रेस द्वारा लगाए गए कई अन्य आरोप अभी जांच के दायरे में हैं।
लोकतंत्र में शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार संवैधानिक संरक्षण रखता है, लेकिन प्रदर्शन के दौरान हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान भी कानून के दायरे में आते हैं। असली कसौटी यह होगी कि राज्य और जांच एजेंसियां दोनों पक्षों के दावों की निष्पक्ष तहकीकात कितनी पारदर्शिता से करती हैं।
बिहार में छात्रों की शिकायतों और पुलिस कार्रवाई, दोनों की विश्वसनीय जांच जरूरी है। यही प्रक्रिया तय करेगी कि कहां प्रशासनिक चूक हुई, कहां कानून-व्यवस्था की मजबूरी थी और कहां किसी व्यक्ति या संस्था की जवाबदेही बनती है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।