अमेरिका के मुताबिक चीन से जुड़े क्यूटीएफवाई साइबर नेटवर्क ने 2018 से सरकारी और संवेदनशील संस्थानों को निशाना बनाया। एफबीआई ने इसके दो प्रमुख प्लेटफॉर्म बंद कराए।
वॉशिंगटन | 27 अगस्त 2026 | शाह टाइम्स
By Mohd Haris
अमेरिकी न्याय विभाग और संघीय जांच ब्यूरो ने चीन से जुड़े एक बड़े साइबर अभियान को बाधित करने का दावा किया है। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक इस अभियान में नासा, अमेरिकी सीनेट, फेडरल रिजर्व और कई दूसरे संवेदनशील सरकारी नेटवर्क को निशाना बनाया गया। जांच से जुड़े अदालती दस्तावेजों में इस गतिविधि को कम से कम 2018 से जारी बताया गया है। अमेरिकी अधिकारियों ने कार्रवाई के तहत दो साइबर प्लेटफॉर्म से जुड़े इंटरनेट डोमेन जब्त किए हैं। इन प्लेटफॉर्मों को क्यू-स्कैन और क्यू-राउटर के नाम से पहचाना गया है। अमेरिकी न्याय विभाग के मुताबिक इनका इस्तेमाल कंप्यूटर नेटवर्क की कमजोरियों की तलाश करने, इंटरनेट से जुड़े उपकरणों को संक्रमित करने और हमलों के वास्तविक स्रोत को छिपाने के लिए किया जाता था।
अमेरिकी जांच एजेंसियों के अनुसार क्यूटीएफवाई नाम से पहचाने गए साइबर समूह की गतिविधियों से नासा, फेडरल रिजर्व, ऊर्जा विभाग, न्याय विभाग, स्वास्थ्य एवं मानव सेवा विभाग, राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान और अमेरिकी सीनेट से जुड़े नेटवर्क प्रभावित या निशाना बनाए गए। अदालती दस्तावेजों के मुताबिक नासा से जुड़ा एक प्रयास 2019 में सामने आया था। 2026 में अमेरिकी सीनेट को भी निशाना बनाए जाने की बात दस्तावेजों में दर्ज है। हालांकि उपलब्ध दस्तावेज यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं करते कि सीनेट के किस विशेष सदस्य, समिति या नेटवर्क से कितना डेटा हासिल हुआ। इसलिए इसे व्यापक तौर पर “सीनेट पर हमला” बताने के बजाय सीनेट से जुड़े नेटवर्क को निशाना बनाए जाने के रूप में देखना अधिक सटीक है।
यह अंतर महत्वपूर्ण है। साइबर सुरक्षा मामलों में किसी संस्था को निशाना बनाना, नेटवर्क में घुसने की कोशिश करना और संवेदनशील डेटा चुराने में सफलता मिलना अलग-अलग घटनाएं होती हैं। अमेरिकी अधिकारियों ने कई मामलों में घुसपैठ या प्रयास की पुष्टि की है, लेकिन हर मामले में चोरी हुए डेटा की मात्रा सार्वजनिक नहीं की गई है।
अमेरिकी न्याय विभाग के अनुसार क्यू-स्कैन एक ऐसा प्लेटफॉर्म था जो इंटरनेट से जुड़े उपकरणों में कमजोरियों की तलाश करता था। इनमें इंटरनेट ऑफ थिंग्स से जुड़े उपकरण शामिल थे। संक्रमित उपकरणों को बाद में क्यू-राउटर से जुड़े नेटवर्क में शामिल किया जाता था। इस व्यवस्था का एक अहम मकसद हमले का वास्तविक स्रोत छिपाना था। जांच एजेंसियों के मुताबिक संक्रमित राउटर, दूसरे इंटरनेट उपकरण, व्यावसायिक प्रॉक्सी सेवाएं और किराये के वर्चुअल सर्वर हमलावरों के लिए एक परत की तरह काम करते थे। इससे किसी अमेरिकी नेटवर्क पर आने वाला दुर्भावनापूर्ण ट्रैफिक चीन से सीधे आता हुआ दिखाई नहीं देता था। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक क्यू-राउटर इस नेटवर्क को एक तरह के छिपाव तंत्र में बदल देता था। किसी हमले का डिजिटल निशान दूसरे देश या कभी-कभी लक्ष्य के आसपास मौजूद किसी संक्रमित उपकरण से आता हुआ दिखाई दे सकता था। इससे साइबर जांच में हमले के वास्तविक स्रोत की पहचान मुश्किल हो जाती है।
अमेरिकी न्याय विभाग ने क्यूटीएफवाई को चीन आधारित कंपनी नानजिंग शिनजिउवेई नेटवर्क टेक्नोलॉजी कंपनी से जुड़ा बताया है। अमेरिकी अदालत में दाखिल दस्तावेजों में आरोप है कि इस नेटवर्क की सेवाओं का इस्तेमाल चीन के नागरिक खुफिया तंत्र और पीपुल्स लिबरेशन आर्मी से जुड़े ग्राहकों ने किया। अमेरिकी जांचकर्ताओं का दावा है कि समूह के सदस्यों में चीन की सेना से जुड़े पूर्व लोग भी शामिल रहे हैं। दस्तावेजों में यह भी कहा गया है कि कंपनी ने साइबर घुसपैठ से जुड़ी सेवाएं उपलब्ध कराईं। हालांकि चीन ने अमेरिकी आरोपों को स्वीकार नहीं किया है। वॉशिंगटन स्थित चीनी दूतावास ने कहा कि चीन सभी तरह के साइबर हमलों का विरोध करता है। चीनी पक्ष ने अमेरिका पर साइबर सुरक्षा के मुद्दे का इस्तेमाल चीन को बदनाम करने के लिए करने का आरोप भी लगाया है। इसलिए फिलहाल इस मामले में चीन की कथित भूमिका को अमेरिकी जांच एजेंसियों के आरोप और अदालती दस्तावेजों के संदर्भ में ही रिपोर्ट करना उचित है। अंतिम न्यायिक निष्कर्ष और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध अतिरिक्त सबूत आने तक इसे स्थापित तथ्य के रूप में पेश करना पत्रकारिता की दृष्टि से उचित नहीं होगा।
अमेरिकी न्याय विभाग और एफबीआई ने अदालत की अनुमति के बाद क्यू-स्कैन और क्यू-राउटर से जुड़े डोमेन जब्त किए। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक इन डोमेन का इस्तेमाल दोनों प्लेटफॉर्म के संचार और प्रमाणीकरण जैसे जरूरी कामों में होता था। डोमेन जब्त होने के बाद दोनों प्लेटफॉर्म को निष्क्रिय करने में मदद मिली। अमेरिकी अधिकारियों ने इसे व्यापक साइबर नेटवर्क को बाधित करने की कार्रवाई बताया है। एफबीआई के अनुसार यह कार्रवाई अकेली घटना नहीं है। अमेरिकी एजेंसियां पहले भी चीन से जुड़े साइबर नेटवर्क और बॉटनेट के खिलाफ तकनीकी कार्रवाई कर चुकी हैं। 2025 में एफबीआई ने अमेरिका के 4,000 से अधिक कंप्यूटरों से प्लगएक्स निगरानी मालवेयर हटाया था। 2024 में चीन से जुड़े फ्लैक्स टाइफून नेटवर्क से जुड़े बड़े बॉटनेट के खिलाफ भी कार्रवाई की गई थी।
मामला केवल वॉशिंगटन की सरकारी संस्थाओं तक सीमित नहीं बताया गया है। अमेरिकी जांच दस्तावेजों में अस्पतालों, दूरसंचार कंपनियों, बिजली कंपनियों, वित्तीय संस्थानों और रक्षा ठेकेदारों से जुड़े नेटवर्क को भी निशाना बनाए जाने की बात सामने आई है। इसका अर्थ यह है कि साइबर अभियान का दायरा सरकारी जासूसी तक सीमित नहीं था। महत्वपूर्ण नागरिक ढांचे से जुड़े नेटवर्क भी इसकी जद में बताए गए हैं। ऐसे नेटवर्क पर सफल हमला होने की स्थिति में डेटा चोरी के अलावा सेवाओं में बाधा और परिचालन संबंधी जोखिम पैदा हो सकते हैं। हालांकि मौजूदा मामले में व्यापक भौतिक नुकसान या किसी खास सेवा को बंद किए जाने का कोई पुष्ट विवरण अमेरिकी दस्तावेजों में सामने नहीं आया है।
अमेरिकी जांच एजेंसियों के अनुसार क्यूटीएफवाई से जुड़ी गतिविधियों की जांच 2018 से चल रही थी। समय के साथ समूह ने अलग-अलग तकनीकी तरीकों और समझौताग्रस्त इंटरनेट उपकरणों का इस्तेमाल किया। जांच में सामने आया कि साइबर हमलावर पहले कमजोर उपकरणों की पहचान करते थे और फिर उन्हें अपने नेटवर्क का हिस्सा बनाकर हमले की पहचान छिपाने की कोशिश करते थे। इस तरह की रणनीति साइबर सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती पैदा करती है क्योंकि जांचकर्ताओं को केवल हमले के अंतिम डिजिटल स्रोत के आधार पर वास्तविक संचालक तक पहुंचना कठिन होता है।
यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब अमेरिका और चीन के बीच तकनीक, राष्ट्रीय सुरक्षा, व्यापार और साइबर जासूसी को लेकर तनाव लगातार बना हुआ है। दोनों देश एक-दूसरे पर साइबर गतिविधियों से जुड़े आरोप लगाते रहे हैं। अमेरिका के लिए नासा, फेडरल रिजर्व और सीनेट जैसी संस्थाओं से जुड़े नेटवर्क का निशाना बनना राष्ट्रीय सुरक्षा का गंभीर मुद्दा है। दूसरी ओर चीन ऐसे आरोपों को राजनीतिक दबाव और चीन विरोधी अभियान का हिस्सा बताता रहा है। इस विवाद का असर आगे साइबर नीति, तकनीकी कंपनियों की निगरानी और महत्वपूर्ण डिजिटल ढांचे की सुरक्षा से जुड़े अमेरिकी फैसलों पर पड़ सकता है।
अमेरिकी एजेंसियों ने क्यू-स्कैन और क्यू-राउटर से जुड़ी तकनीकी जानकारी और संभावित खतरे के संकेत जारी किए हैं ताकि दूसरी संस्थाएं अपने नेटवर्क की जांच कर सकें। इससे प्रभावित संस्थानों को पुराने हमलों के डिजिटल निशान तलाशने में मदद मिल सकती है। फिलहाल सबसे अहम सवाल यह है कि इस अभियान के दौरान वास्तव में कितना डेटा हासिल किया गया और किन संस्थाओं के नेटवर्क में सफल घुसपैठ हुई। सार्वजनिक दस्तावेजों में सभी मामलों का पूरा नुकसान या चोरी हुए डेटा का विवरण उपलब्ध नहीं है। अमेरिकी कार्रवाई ने एक बड़े साइबर ढांचे को बाधित किया है, लेकिन इससे खतरा पूरी तरह समाप्त हो गया है, ऐसा निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगा। साइबर समूह अक्सर नए डोमेन, नए सर्वर और दूसरे संक्रमित उपकरणों के जरिये अपना बुनियादी ढांचा दोबारा खड़ा करने की कोशिश करते हैं।
नासा, सीनेट, फेडरल रिजर्व और अमेरिकी सरकारी नेटवर्क को निशाना बनाए जाने का यह मामला दिखाता है कि आधुनिक साइबर संघर्ष में किसी देश की सुरक्षा केवल सैन्य ठिकानों तक सीमित नहीं रहती। सरकारी संस्थान, वित्तीय व्यवस्था, स्वास्थ्य सेवाएं, ऊर्जा नेटवर्क और दूरसंचार ढांचा भी रणनीतिक निशाने बन सकते हैं। अमेरिकी एजेंसियों की कार्रवाई ने कथित चीन-समर्थित साइबर नेटवर्क के एक महत्वपूर्ण हिस्से को बाधित किया है। लेकिन इस पूरे मामले की वास्तविक तस्वीर आगे की जांच, तकनीकी फोरेंसिक और सार्वजनिक होने वाले अदालती दस्तावेजों से और साफ होगी। अभी तक उपलब्ध जानकारी में अमेरिकी आरोप और चीनी पक्ष का खंडन दोनों शामिल हैं, इसलिए इस प्रकरण की रिपोर्टिंग में तथ्य, आरोप और प्रमाण के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।