उमर अब्दुल्ला ने 5 अगस्त 2019 के फैसलों को पलटने का संकल्प दोहराया। उन्होंने कहा कि पार्टी हालात को स्वीकार नहीं करती। सियासी बहस फिर तेज हो गई है।
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📍 श्रीनगर
📰 05 अगस्त 2026
✍️ By Asif Khan
जम्मू-कश्मीर की सियासत में 5 अगस्त 2019 का मसला एक बार फिर केंद्र में आ गया है। नेशनल कॉन्फ्रेंस के उपाध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने साफ कहा है कि उनकी पार्टी उस दिन लिए गए फैसलों को पलटने के लिए प्रतिबद्ध है। उनका यह बयान ऐसे वक्त आया है जब इस फैसले की सातवीं बरसी पर सियासी बहस फिर तेज हो रही है।
उमर अब्दुल्ला ने सोशल मीडिया पर अपने बयान में कहा कि उनकी पार्टी ने न तो इन घटनाओं को भुलाया है और न ही मौजूदा हालात को कबूल किया है। उन्होंने इसे अधिकारों और पहचान से जुड़ा बुनियादी मसला बताया।
5 अगस्त 2019 को केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 को प्रभावहीन बना दिया था। इसके साथ ही आर्टिकल 35ए भी खत्म कर दिया गया। संसद ने जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम पारित कर राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांट दिया।
सरकार का तर्क था कि यह कदम विकास, सुरक्षा और बेहतर प्रशासन के लिए जरूरी था। लेकिन विपक्षी दलों और कई क्षेत्रीय पार्टियों ने इसे संवैधानिक और राजनीतिक अधिकारों पर हमला बताया।
उमर अब्दुल्ला ने अपने बयान में साफ किया कि उनकी पार्टी इस फैसले को स्वीकार नहीं करती। उन्होंने कहा कि सात साल बाद भी पार्टी अपने रुख पर कायम है।
उन्होंने रॉबर्ट फ्रॉस्ट की कविता का जिक्र करते हुए संकेत दिया कि संघर्ष लंबा है लेकिन लक्ष्य स्पष्ट है। यह बयान एक सियासी संदेश भी माना जा रहा है कि नेशनल कॉन्फ्रेंस इस मुद्दे को भविष्य की राजनीति में केंद्रीय एजेंडा बनाए रखेगी।
पीपल्स कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष सज्जाद लोन ने भी 5 अगस्त 2019 को कड़ी भाषा में याद किया। उन्होंने इसे जम्मू-कश्मीर के लोगों के खिलाफ कार्रवाई बताया।
लोन ने कहा कि इस फैसले ने लोगों की सियासी ताकत को कम किया और राज्य की पहचान को नुकसान पहुंचाया। उन्होंने उम्मीद जताई कि भविष्य में लोगों को अधिकार के तौर पर सशक्त बनाया जाएगा, न कि किसी रियायत के रूप में।
इस मसले पर देश में दो स्पष्ट नैरेटिव मौजूद हैं। केंद्र सरकार और उसके समर्थक इसे राष्ट्रीय एकीकरण और विकास की दिशा में बड़ा कदम मानते हैं। उनका दावा है कि इससे आतंकवाद पर काबू पाने और निवेश बढ़ाने में मदद मिली।
दूसरी तरफ, नेशनल कॉन्फ्रेंस, पीडीपी और कुछ अन्य दल इसे संवैधानिक ढांचे के खिलाफ बताते हैं। उनका कहना है कि बिना राज्य की सहमति के लिए गए फैसले लोकतांत्रिक सिद्धांतों के खिलाफ हैं।
सात साल बाद जमीनी हालात का जायजा लिया जाए तो तस्वीर मिली-जुली नजर आती है। सुरक्षा हालात में कुछ सुधार के दावे किए जाते हैं। इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स और निवेश प्रस्तावों की बात भी सामने आती है।
लेकिन सियासी प्रतिनिधित्व, राज्य का दर्जा और स्थानीय पहचान जैसे मुद्दे अब भी बहस के केंद्र में हैं। कई स्थानीय संगठनों का कहना है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया पूरी तरह बहाल नहीं हुई है।
अनुच्छेद 370 हटाने का मामला सुप्रीम कोर्ट में भी चुनौती के रूप में गया। अदालत ने इस पर लंबी सुनवाई की। यह मसला केवल सियासत नहीं, बल्कि संवैधानिक व्याख्या का भी विषय बना रहा।
कानूनी विशेषज्ञों के बीच भी मतभेद रहे हैं। कुछ इसे वैध बताते हैं तो कुछ इसे संघीय ढांचे के खिलाफ मानते हैं।
सरकार का दावा है कि फैसले के बाद जम्मू-कश्मीर में निवेश और विकास के नए अवसर खुले। पर्यटन में वृद्धि और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को प्रमुख उपलब्धि बताया गया।
हालांकि आलोचकों का कहना है कि आर्थिक डेटा का स्वतंत्र ऑडिट जरूरी है। बेरोजगारी और स्थानीय कारोबार पर असर जैसे मुद्दे भी उठाए जाते हैं।
यह मसला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा में रहा। कई देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने इसे भारत का आंतरिक मामला बताया, जबकि कुछ ने मानवाधिकार के नजरिए से चिंता जताई।
भारत सरकार ने लगातार यह रुख रखा कि यह उसका संप्रभु निर्णय है और इसमें बाहरी दखल की गुंजाइश नहीं है।
उमर अब्दुल्ला का बयान इस बात का संकेत देता है कि अनुच्छेद 370 का मसला आने वाले चुनावों और सियासी एजेंडा में बना रहेगा।
राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग भी तेज हो रही है। केंद्र सरकार ने समय-समय पर संकेत दिए हैं कि सही वक्त पर इस पर फैसला लिया जाएगा।
अनुच्छेद 370 का मुद्दा अभी भी खत्म नहीं हुआ है। सात साल बाद भी यह सियासत, संविधान और पहचान के बीच एक बड़ा सवाल बना हुआ है।
उमर अब्दुल्ला और अन्य नेताओं के ताजा बयान दिखाते हैं कि यह बहस आने वाले समय में और तेज होगी। असली चुनौती यह है कि राजनीतिक दावे और जमीनी हकीकत के बीच संतुलन कैसे बने।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।