कांग्रेस और क्षेत्रीय सहयोगियों के बीच तमिलनाडु, बिहार, जम्मू-कश्मीर और पश्चिम बंगाल में मतभेद सामने आए हैं। घटनाएं विपक्षी गठबंधन की रणनीति पर नए सवाल खड़े करती हैं।
📍 नई दिल्ली
🗓️ 18 सितंबर 2026
✍️ मोहम्मद नावेद
कांग्रेस लंबे समय से राज्यों में अपनी राजनीतिक ताकत बढ़ाने के लिए क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन करती रही है। लेकिन 2026 में कई अहम राज्यों में पार्टी और उसके सहयोगियों के बीच मतभेद सार्वजनिक हुए हैं। तमिलनाडु में डीएमके से अलग होकर विजय की टीवीके सरकार का समर्थन, बिहार में आरजेडी के साथ विधान परिषद चुनाव को लेकर विवाद, जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस के साथ वंदे मातरम पर टकराव और पश्चिम बंगाल में टीएमसी के साथ उपचुनाव तालमेल न बनना इस बदलते समीकरण की ओर इशारा करता है।
इन घटनाओं को एक साथ देखने पर कांग्रेस की गठबंधन रणनीति को लेकर बहस तेज होती है। हालांकि, इन सभी विवादों को एक ही राजनीतिक कारण से जोड़ना जल्दबाजी होगी। हर राज्य का चुनावी गणित, स्थानीय नेतृत्व और राजनीतिक संदर्भ अलग है।
तमिलनाडु का घटनाक्रम इस पूरी बहस में सबसे अहम है। मई 2026 में विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस ने डीएमके के नेतृत्व वाले पुराने गठबंधन से अलग होकर अभिनेता से नेता बने विजय की तमिलगा वेत्री कझगम यानी टीवीके को सरकार बनाने में समर्थन दिया।
कांग्रेस ने उस समय साफ किया था कि टीवीके के साथ उसका समझौता केवल सरकार बनाने तक सीमित नहीं है। पार्टी ने स्थानीय निकाय, लोकसभा और राज्यसभा चुनावों तक सहयोग की बात कही थी।
सितंबर में टीवीके, कांग्रेस, वीसीके, एमडीएमके और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के गठबंधन को औपचारिक नाम भी दिया गया। इसे सेक्युलर सोशल जस्टिस विक्ट्री अलायंस कहा गया।
इस घटनाक्रम ने कांग्रेस और डीएमके के पुराने रिश्ते को बदल दिया। दूसरी तरफ, टीवीके के भीतर कुछ नेताओं की ओर से विजय को 2029 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद के संभावित चेहरे के तौर पर पेश करने की कोशिश ने कांग्रेस के साथ नया मतभेद पैदा किया।
कांग्रेस नेताओं ने राहुल गांधी को विपक्ष का राष्ट्रीय चेहरा बनाए रखने की बात कही है। टीवीके के कुछ नेताओं की विजय को लेकर दावेदारी पर कांग्रेस ने सार्वजनिक आपत्ति दर्ज की।
इसलिए तमिलनाडु का मामला केवल एक गठबंधन बदलने तक सीमित नहीं है। यहां राज्य सरकार में दोनों दल सहयोगी हैं, लेकिन राष्ट्रीय नेतृत्व के सवाल पर उनके बीच अलग-अलग राजनीतिक दृष्टिकोण सामने आ रहे हैं।
बिहार में कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल के बीच विधान परिषद की 8 सीटों को लेकर मतभेद खुलकर सामने आए हैं।
आरजेडी ने 6 सीटों के लिए अपने उम्मीदवारों की घोषणा की। इसके बाद कांग्रेस ने कहा कि उसे उम्मीदवारों के चयन से पहले विश्वास में नहीं लिया गया। कांग्रेस ने सभी 8 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की बात कही।
यह विवाद इसलिए अहम है क्योंकि कांग्रेस और आरजेडी बिहार में विपक्षी गठबंधन के प्रमुख घटक रहे हैं। तेजस्वी यादव और राहुल गांधी के बीच राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी राजनीति में सहयोग की तस्वीर कई मौकों पर दिखाई देती रही है, लेकिन राज्य चुनावों में सीट बंटवारे का गणित अलग दबाव पैदा करता है।
इस विवाद से यह संकेत जरूर मिलता है कि गठबंधन की एकता और स्थानीय चुनावी हित हमेशा एक दिशा में नहीं चलते।
इसे राहुल गांधी और तेजस्वी यादव के व्यक्तिगत रिश्ते का निर्णायक टूटना कहना अभी तथ्यों से आगे जाना होगा। फिलहाल उपलब्ध घटनाक्रम सीट बंटवारे और उम्मीदवार चयन को लेकर राजनीतिक मतभेद की पुष्टि करता है।
जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस के बीच विवाद का मुद्दा चुनावी सीट नहीं, बल्कि वंदे मातरम के पूर्ण गायन से जुड़ा है।
जम्मू-कश्मीर के अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के उद्घाटन कार्यक्रम में वंदे मातरम का पूर्ण संस्करण बजाए जाने पर कांग्रेस ने आपत्ति जताई। कांग्रेस नेताओं ने इसे लेकर कहा कि ऐतिहासिक और संवैधानिक संदर्भों को ध्यान में रखते हुए केवल शुरुआती दो अंतरों के इस्तेमाल की परंपरा पर विचार होना चाहिए।
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कांग्रेस की आपत्ति का जवाब देते हुए कहा कि आधिकारिक कार्यक्रमों में पूरे राष्ट्रगीत को लेकर कानूनी प्रावधान लागू होते हैं। उन्होंने कांग्रेस से कहा कि यदि पार्टी इस प्रावधान से असहमत है तो संसद में कानून बदलने का रास्ता मौजूद है।
इसके बाद जम्मू-कश्मीर कांग्रेस और उमर अब्दुल्ला के बीच बयानबाजी और तेज हुई। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष तारिक कर्रा ने भी उमर की टिप्पणी पर पलटवार किया।
यह विवाद बताता है कि गठबंधन में शामिल दलों के बीच साझा राजनीतिक मंच होने के बावजूद संवेदनशील राष्ट्रीय और क्षेत्रीय मुद्दों पर अलग-अलग रुख बने रह सकते हैं।
पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के बीच उपचुनाव को लेकर सीट तालमेल की कोशिश भी सफल नहीं हुई।
रिपोर्टों के मुताबिक टीएमसी की ओर से नंदीग्राम और रेजीनगर सीटों पर आपसी समन्वय का प्रस्ताव सामने आया था। कांग्रेस ने इस व्यवस्था को स्वीकार नहीं किया और दोनों सीटों पर अपनी राजनीतिक स्थिति बनाए रखने का फैसला किया।
इस घटनाक्रम का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि दोनों दल राष्ट्रीय विपक्षी राजनीति में कई मुद्दों पर साथ दिखाई देते हैं, लेकिन पश्चिम बंगाल की राज्य राजनीति में उनके हित अलग हैं।
इस बीच 17 सितंबर को चुनाव आयोग ने टीएमसी के दो प्रतिद्वंद्वी गुटों को लेकर पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह के इस्तेमाल पर अंतरिम रोक लगाई। यह फैसला कांग्रेस और टीएमसी के बीच सीट तालमेल के विवाद से अलग घटनाक्रम है, इसलिए दोनों मामलों को एक ही विवाद के रूप में देखना उचित नहीं होगा।
राहुल गांधी ने चुनाव आयोग के फैसले पर ममता बनर्जी और टीएमसी के समर्थन में तीखी राजनीतिक प्रतिक्रिया दी है।
चार राज्यों के घटनाक्रम को जोड़ने पर कांग्रेस की रणनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई देता है। पार्टी कुछ राज्यों में क्षेत्रीय सहयोगियों पर निर्भर रहने के बजाय अपनी संगठनात्मक और चुनावी जगह बढ़ाने की कोशिश करती नजर आ रही है।
तमिलनाडु में पार्टी ने डीएमके का साथ छोड़कर टीवीके सरकार का समर्थन किया। बिहार में कांग्रेस ने आरजेडी के साथ सीटों के बंटवारे पर समझौता करने के बजाय अपने उम्मीदवार उतारने का संकेत दिया। पश्चिम बंगाल में भी पार्टी ने टीएमसी के साथ उपचुनाव तालमेल स्वीकार नहीं किया।
लेकिन जम्मू-कश्मीर का मामला अलग है। वहां कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस अभी भी सहयोगी हैं। विवाद के बावजूद गठबंधन समाप्त होने की कोई पुष्ट घोषणा सामने नहीं आई है।
इसलिए मौजूदा घटनाओं को सीधे तौर पर कांग्रेस के पूरी तरह गठबंधन छोड़ने की नीति कहना उचित नहीं होगा।
राहुल गांधी की राजनीतिक रणनीति पर बहस का केंद्र यही सवाल है कि कांग्रेस क्षेत्रीय दलों के साथ बराबरी की शर्तों पर गठबंधन करना चाहती है या धीरे-धीरे अपनी स्वतंत्र राजनीतिक जमीन मजबूत करना चाहती है।
तमिलनाडु में डीएमके से अलग होने का फैसला कांग्रेस को नई राजनीतिक साझेदारी में ले गया। बिहार और बंगाल में पार्टी अपने संगठनात्मक हितों को लेकर अधिक स्वतंत्र रुख अपना रही है। जम्मू-कश्मीर में भी पार्टी ने अपने वैचारिक दृष्टिकोण को सहयोगी दल की स्थिति से अलग रखा।
इसे आत्मविश्वास या अतिआत्मविश्वास कहना राजनीतिक मूल्यांकन होगा। उपलब्ध घटनाओं से इतना जरूर स्पष्ट है कि कांग्रेस कई राज्यों में सीट बंटवारे और राजनीतिक नैरेटिव पर पहले की तुलना में अधिक स्वतंत्र रुख दिखा रही है।
इस रणनीति का परिणाम राज्यवार चुनावी प्रदर्शन, संगठन की क्षमता और स्थानीय नेतृत्व की स्वीकार्यता जैसे कारकों पर निर्भर करेगा। इन कारकों पर अभी अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।
इंडिया गठबंधन की सबसे बड़ी चुनौती केवल राष्ट्रीय स्तर पर साझा विपक्षी मंच बनाना नहीं है। असली चुनौती यह है कि अलग-अलग राज्यों में सहयोगी दल अपने स्थानीय राजनीतिक हितों को राष्ट्रीय रणनीति के साथ कैसे संतुलित करते हैं।
बंगाल में कांग्रेस और टीएमसी एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी हैं। तमिलनाडु में कांग्रेस अब डीएमके के बजाय टीवीके सरकार की साझेदार है। बिहार में आरजेडी और कांग्रेस के बीच सीटों को लेकर तनाव है। जम्मू-कश्मीर में दोनों सहयोगी दल संवेदनशील राजनीतिक मुद्दे पर अलग राय रखते हैं।
इसलिए विपक्षी एकजुटता को केवल दिल्ली की राजनीति से समझना पर्याप्त नहीं होगा। राज्यों की राजनीति में सीट, संगठन, नेतृत्व और वोट आधार की प्रतिस्पर्धा लगातार प्रभाव डालती है।
आने वाले चुनावी फैसले कांग्रेस की रणनीति को समझने के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण होंगे। खासकर बिहार में सीटों पर अंतिम तालमेल, पश्चिम बंगाल में उपचुनाव का मुकाबला और तमिलनाडु में टीवीके-कांग्रेस सरकार की स्थिरता यह बताएगी कि मौजूदा मतभेद कितने गहरे हैं।
जम्मू-कश्मीर में भी कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस के बीच संवेदनशील मुद्दों पर समन्वय की परीक्षा जारी रहेगी।
फिलहाल उपलब्ध तथ्यों से दो तस्वीरें एक साथ सामने आती हैं। कांग्रेस क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन की राजनीति से बाहर नहीं हुई है, लेकिन कई राज्यों में वह पुराने सहयोगियों के साथ सीट और राजनीतिक एजेंडा तय करने में अधिक स्वतंत्र रुख अपना रही है।
यही बदलाव राहुल गांधी की मौजूदा राजनीतिक रणनीति पर बहस का केंद्र है। इसे आत्मविश्वास कहना है या अतिआत्मविश्वास, इसका फैसला राजनीतिक घटनाक्रम और चुनावी नतीजे करेंगे, न कि केवल मौजूदा बयानबाजी।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।