बांग्लादेश ने सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान के बीच बने मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट में शामिल होने की संभावना को लेकर अपना रुख साफ किया है। विदेश मंत्री खलीलुर रहमान ने संसद में कहा कि अगर मौजूदा सदस्य देश बांग्लादेश को शामिल होने का औपचारिक प्रस्ताव देते हैं, तो ढाका इस पर सकारात्मक तरीके से विचार करेगा। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अभी बांग्लादेश को सदस्यता का औपचारिक प्रस्ताव नहीं मिला है। बांग्लादेश सरकार के इस रुख को विपक्ष की ओर से भी समर्थन मिला है। विपक्षी नेता और जमात-ए-इस्लामी के अमीर शफीकुर रहमान ने कहा कि मक्का पैक्ट में शामिल होना बांग्लादेश का अपना संप्रभु फैसला है और दूसरे देशों को इस पर चिंतित होने की जरूरत नहीं है।
ढाका, बांग्लादेश | 28 अगस्त 2026 | शाह टाइम्स
By Mohd Haris
विदेश मंत्री खलीलुर रहमान ने 27 अगस्त को संसद में कहा कि बांग्लादेश मक्का पैक्ट को सकारात्मक नजरिए से देख रहा है। हालांकि, उन्होंने सदस्यता को लेकर तत्काल कोई फैसला होने से इनकार किया। उनके मुताबिक, सदस्यता का सवाल तभी आगे बढ़ेगा जब पैक्ट के मौजूदा सदस्य बांग्लादेश को इसमें शामिल होने का न्योता देंगे। ऐसा प्रस्ताव आने पर सरकार इसके फायदे और नुकसान का जायजा लेकर फैसला करेगी।
इससे पहले विदेश मामलों के राज्य मंत्री हुमायुन कबीर ने भी कहा था कि बांग्लादेश ने मक्का डिफेंस पैक्ट में दिलचस्पी दिखाई है और इस संभावना को सकारात्मक तरीके से देखा जा रहा है।
सरकार के रुख के सामने आने के बाद विपक्षी नेता शफीकुर रहमान ने भी संभावित सदस्यता का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि अगर बांग्लादेश अपने देश और जनता के हित में कोई फैसला करता है, तो किसी दूसरे देश को इससे परेशान होने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। उन्होंने मक्का पैक्ट में शामिल होने के फैसले को बांग्लादेश का संप्रभु और आंतरिक मामला बताया। सरकार और विपक्ष के इस समान रुख ने इस मुद्दे को बांग्लादेश की घरेलू राजनीति में भी अहम बना दिया है।
सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान ने 7 अगस्त 2026 को मक्का में संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इस समझौते की सबसे अहम शर्त सामूहिक सुरक्षा से जुड़ी है। इसके तहत किसी एक सदस्य पर सशस्त्र हमला होने की स्थिति को सभी सदस्यों पर हमला माना जाएगा। समझौते का उद्देश्य रक्षा सहयोग बढ़ाना, सामूहिक सुरक्षा मजबूत करना और क्षेत्रीय शांति एवं स्थिरता को बढ़ावा देना बताया गया है। पाकिस्तान ने इसे रक्षात्मक समझौता बताया है और भविष्य में अन्य देशों के लिए इसके विस्तार की संभावना का संकेत दिया है।
मक्का पैक्ट की सामूहिक रक्षा वाली व्यवस्था के कारण इसकी तुलना नाटो के सामूहिक रक्षा सिद्धांत से की जा रही है। हालांकि इसे सीधे ‘इस्लामिक नाटो’ कहना अभी जल्दबाजी होगी। मौजूदा समझौते में नाटो जैसी व्यापक संस्थागत संरचना या संयुक्त सैन्य कमान मौजूद नहीं है। फिर भी सऊदी अरब की आर्थिक और ऊर्जा ताकत, तुर्किये की सैन्य क्षमता और पाकिस्तान की परमाणु क्षमता इस समझौते को रणनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण बनाती है। अगर आगे इसमें बांग्लादेश जैसे दूसरे देश शामिल होते हैं, तो इसकी क्षेत्रीय हैसियत बढ़ सकती है।
बांग्लादेश के संभावित फैसले का सबसे संवेदनशील पहलू पाकिस्तान की मौजूदगी है। भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से रणनीतिक और सैन्य तनाव रहा है। बांग्लादेश की स्वतंत्रता का इतिहास भी पाकिस्तान से जुड़ा है। ऐसे में ढाका का किसी ऐसे रक्षा समूह में शामिल होना जिसमें पाकिस्तान संस्थापक सदस्य है, दक्षिण एशिया की कूटनीति पर असर डाल सकता है। रॉयटर्स के अनुसार विश्लेषकों का मानना है कि मक्का पैक्ट में शामिल होना बांग्लादेश की लंबे समय से चली आ रही संतुलित विदेश नीति की परीक्षा बन सकता है।
बांग्लादेश की संभावित सदस्यता को भारत भी करीब से देख रहा है। भारत के विदेश मंत्रालय ने पहले कहा था कि वह पश्चिम एशिया में हो रहे घटनाक्रम और मक्का समझौते के प्रभावों पर नजर रख रहा है। नई दिल्ली ने राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय शांति एवं स्थिरता के नजरिए से इसके असर का जायजा लेने की बात कही है। बांग्लादेश के लिए भारत एक महत्वपूर्ण पड़ोसी और आर्थिक साझेदार है। दोनों देशों के बीच व्यापार, सीमा प्रबंधन, जल बंटवारा और सुरक्षा से जुड़े कई अहम मुद्दे हैं। ऐसे में पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये के साथ किसी औपचारिक रक्षा व्यवस्था में शामिल होने से ढाका की क्षेत्रीय कूटनीति में नया समीकरण बन सकता है।
बांग्लादेश लंबे समय से भारत, चीन, अमेरिका, जापान और पश्चिम एशियाई देशों के साथ रिश्तों में संतुलन बनाए रखने की कोशिश करता रहा है।
मक्का पैक्ट में शामिल होने से उसे सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान के साथ रक्षा सहयोग मजबूत करने का अवसर मिल सकता है। लेकिन इसके साथ कुछ कूटनीतिक जोखिम भी जुड़ सकते हैं। विश्लेषकों के मुताबिक सदस्यता से बांग्लादेश पर यह सवाल उठ सकता है कि वह क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन में किस खेमे के करीब जा रहा है। रॉयटर्स ने भी इसे ढाका की पारंपरिक गैर-पक्षधर विदेश नीति के लिए संभावित परीक्षा बताया है।
मक्का पैक्ट का सवाल केवल रक्षा नीति तक सीमित नहीं है। सऊदी अरब बांग्लादेश के लिए रोजगार, रेमिटेंस, निवेश और ऊर्जा के लिहाज से महत्वपूर्ण साझेदार है। लाखों बांग्लादेशी नागरिक पश्चिम एशिया में काम करते हैं। ढाका सऊदी निवेश और व्यापारिक संबंधों को भी मजबूत करना चाहता है। बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय के मुताबिक हाल में दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय संपर्क बढ़ा है और सऊदी कंपनियों की बांग्लादेश में निवेश को लेकर दिलचस्पी भी बढ़ी है। इसलिए मक्का पैक्ट पर बांग्लादेश का रुख व्यापक आर्थिक और रणनीतिक हितों से भी जुड़ा हुआ है।
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि बांग्लादेश ने अभी मक्का पैक्ट में शामिल होने का अंतिम फैसला नहीं किया है। विदेश मंत्री ने संसद में साफ कहा कि फिलहाल कोई औपचारिक प्रस्ताव नहीं आया है। इसलिए सदस्यता के फायदे और नुकसान पर विस्तृत चर्चा को उन्होंने अभी जल्दबाजी बताया। इसका मतलब है कि वर्तमान स्थिति को ‘बांग्लादेश मक्का पैक्ट में शामिल हो गया’ कहना गलत होगा। अभी ढाका की स्थिति केवल सकारात्मक विचार की है।
अगर सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान औपचारिक तौर पर बांग्लादेश को सदस्यता का प्रस्ताव देते हैं, तो ढाका को कई पहलुओं का मूल्यांकन करना होगा। पहला सवाल राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा सहयोग का होगा। दूसरा भारत और चीन के साथ रिश्तों पर असर का। तीसरा पश्चिम एशिया में संभावित संघर्षों में किसी सामूहिक सुरक्षा प्रतिबद्धता के कारण बांग्लादेश पर पड़ने वाले दबाव का। इसके साथ सऊदी निवेश, रेमिटेंस, ऊर्जा सुरक्षा और रक्षा तकनीक जैसे संभावित लाभ भी सामने होंगे।
बांग्लादेश का सकारात्मक रुख मक्का पैक्ट के विस्तार की दिशा में अहम संकेत है। अभी यह समझौता केवल 3 देशों के बीच है, लेकिन तुर्किये और पाकिस्तान पहले ही इसके व्यापक विस्तार की संभावना जता चुके हैं। अगर बांग्लादेश इसमें शामिल होता है, तो दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया की सुरक्षा राजनीति के बीच संबंध और मजबूत होंगे। हालांकि, अभी अंतिम फैसला बाकी है। बांग्लादेश को पहले औपचारिक न्योते का इंतजार है और उसके बाद ही सदस्यता पर वास्तविक प्रक्रिया शुरू होगी।
बांग्लादेश ने मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट में शामिल होने की संभावना को पहली बार इतने स्पष्ट तरीके से सकारात्मक बताया है। विदेश मंत्री खलीलुर रहमान ने कहा है कि अगर मौजूदा सदस्य देश न्योता देते हैं, तो ढाका इस पर सकारात्मक विचार करेगा। विपक्षी नेता शफीकुर रहमान ने भी संभावित सदस्यता का समर्थन करते हुए इसे बांग्लादेश का संप्रभु फैसला बताया है। लेकिन अभी सदस्यता तय नहीं हुई है। असली फैसला तब सामने आएगा जब सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान की ओर से औपचारिक प्रस्ताव आएगा। इसके बाद बांग्लादेश को सुरक्षा हितों के साथ भारत, चीन, अमेरिका और पश्चिम एशिया के साथ अपने व्यापक कूटनीतिक और आर्थिक रिश्तों का भी संतुलन साधना होगा।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।