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बदल गए मोबाइल नेटवर्क के नियम, बढ़ सकती है टावरों की सिग्नल पहुंच; क्या अब बेसमेंट तक आसानी से पहुंचेगा 5जी?

Neelam Saini 2026-08-30 22:33:34
बदल गए मोबाइल नेटवर्क के नियम, बढ़ सकती है टावरों की सिग्नल पहुंच; क्या अब बेसमेंट तक आसानी से पहुंचेगा 5जी?
भारत में मोबाइल नेटवर्क की ईएमएफ सीमा को वैश्विक मानकों के अनुरूप करने की तैयारी है। इससे टावर की कवरेज बढ़ सकती है, लेकिन बेसमेंट और हर कोने में 5जी मिलना तय नहीं है।

मोबाइल यूजर्स के लिए क्या बदला?

नई दिल्ली। मोबाइल नेटवर्क से जुड़ी एक अहम नियामकीय खबर सामने आई है। रिपोर्टों के मुताबिक भारत सरकार ने मोबाइल नेटवर्क के लिए निर्धारित इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड यानी ईएमएफ सीमा को वैश्विक मानकों के अनुरूप करने का फैसला किया है। इससे दूरसंचार कंपनियों को मौजूदा टावरों से अपेक्षाकृत बड़े क्षेत्र में कवरेज उपलब्ध कराने में मदद मिल सकती है। इकोनॉमिक टाइम्स की 29 अगस्त 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, संशोधित नियम अगले महीने से प्रभावी होने की बात कही गई है और 5जी बेस स्टेशन के लिए अनुमत पावर डेंसिटी को मौजूदा 5 वाट प्रति वर्ग मीटर से बढ़ाकर 10 वाट प्रति वर्ग मीटर करने की जानकारी दी गई है। रिपोर्ट में इसे वैश्विक मानकों के अनुरूप बदलाव बताया गया है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि देश के हर बेसमेंट, कमरे या इमारत के हर कोने में तुरंत 5जी सिग्नल मिलने लगेगा। वास्तविक कवरेज कई तकनीकी और भौगोलिक परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।

ईएमएफ सीमा बढ़ने का मतलब क्या है?

मोबाइल टावर रेडियो फ्रीक्वेंसी के जरिए मोबाइल फोन तक सिग्नल पहुंचाते हैं। ईएमएफ सीमा उन रेडियो फ्रीक्वेंसी उत्सर्जनों से संबंधित नियामकीय सीमाओं का हिस्सा है, जिनके भीतर मोबाइल नेटवर्क उपकरणों को संचालित किया जाता है। सरल भाषा में समझें तो संशोधित सीमा टेलीकॉम कंपनियों को नेटवर्क योजना और रेडियो कवरेज में ज्यादा गुंजाइश दे सकती है। इकोनॉमिक टाइम्स के मुताबिक इससे एक साइट से कवरेज क्षेत्र बढ़ाने और नेटवर्क विस्तार की लागत को कम करने में मदद मिलने की उम्मीद है। लेकिन इसे सीधे-सीधे “टावर की ताकत दोगुनी हो गई और अब हर जगह 5जी मिलेगा” कहना तकनीकी रूप से सही नहीं होगा।

क्या अब बेसमेंट में भी मिलेगा 5जी?

यही सवाल सबसे ज्यादा लोगों के मन में है। बेसमेंट में मोबाइल नेटवर्क अक्सर कमजोर होने का कारण केवल टावर से दूरी नहीं होती। जमीन के नीचे की संरचना, मोटी कंक्रीट की दीवारें, धातु की संरचनाएं, भवन का डिजाइन और इस्तेमाल किया गया स्पेक्ट्रम भी सिग्नल की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए नई ईएमएफ सीमा से कुछ क्षेत्रों में कवरेज बेहतर होने की संभावना हो सकती है, लेकिन हर बेसमेंट में 5जी उपलब्ध होने की गारंटी नहीं दी जा सकती। इनडोर कवरेज के लिए कई बार अलग नेटवर्क समाधान, छोटे सेल, इन-बिल्डिंग सिस्टम या अन्य तकनीकी व्यवस्थाओं की जरूरत पड़ सकती है।

घर के अंदर नेटवर्क बेहतर होने की उम्मीद

मोबाइल यूजर्स के लिए इस बदलाव का संभावित फायदा इनडोर कवरेज के रूप में भी देखा जा रहा है। खासकर ऐसी जगहों पर जहां टावर से सिग्नल पहुंचने में इमारत की संरचना बाधा बनती है, नेटवर्क कंपनियां उपलब्ध तकनीकी क्षमता का इस्तेमाल करके कवरेज सुधारने की कोशिश कर सकती हैं।लेकिन इसका असर हर स्थान पर एक जैसा नहीं होगा। किसी शहर के खुले इलाके, घनी आबादी वाले बाजार, ऊंची इमारतों और बेसमेंट में नेटवर्क व्यवहार अलग-अलग हो सकता है। इसलिए नए नियम को कवरेज सुधारने का एक नियामकीय अवसर समझना अधिक सटीक है, न कि हर जगह 5जी की गारंटी।

5जी ट्रैफिक बढ़ने के बीच क्यों लिया गया फैसला?

देश में मोबाइल डेटा की खपत और 5जी उपयोग लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में नेटवर्क पर क्षमता और गुणवत्ता बनाए रखना दूरसंचार कंपनियों के लिए बड़ी चुनौती है। दूरसंचार नियामक के आंकड़ों में भी भारत में 5जी बुनियादी ढांचे के विस्तार का संकेत मिलता है। ट्राई की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार फरवरी 2025 के अंत तक देश में करीब 4.69 लाख 5जी बेस ट्रांसीवर स्टेशन स्थापित किए जा चुके थे। बढ़ते उपयोग के साथ केवल नए टावर लगाना ही एकमात्र रास्ता नहीं है। मौजूदा नेटवर्क का बेहतर इस्तेमाल, स्पेक्ट्रम की दक्षता, छोटे सेल और कवरेज योजना जैसे उपाय भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

क्या कंपनियों को अब कम टावर लगाने पड़ेंगे?

नई व्यवस्था का एक संभावित फायदा यह हो सकता है कि कुछ परिस्थितियों में एक नेटवर्क साइट से अधिक क्षेत्र कवर किया जा सके। इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट में भी बताया गया है कि इससे कंपनियों को बड़े क्षेत्र में कवरेज उपलब्ध कराने और कम साइटों के साथ नेटवर्क विस्तार करने में मदद मिल सकती है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि देश में टावरों की जरूरत खत्म हो जाएगी। घनी आबादी वाले इलाकों में नेटवर्क क्षमता की मांग बहुत ज्यादा होती है। वहां केवल कवरेज नहीं, बल्कि एक साथ बड़ी संख्या में यूजर्स को पर्याप्त डेटा क्षमता उपलब्ध कराना भी जरूरी होता है।

यानी कवरेज और नेटवर्क क्षमता दो अलग-अलग चीजें हैं।

पहले भारत में ईएमएफ नियम कितने सख्त थे?

यहां एक महत्वपूर्ण संदर्भ समझना जरूरी है। केंद्र सरकार ने पहले कहा था कि भारत में मोबाइल टावरों से संबंधित ईएमएफ उत्सर्जन मानक इंटरनेशनल कमीशन ऑन नॉन-आयोनाइजिंग रेडिएशन प्रोटेक्शन यानी आईसीएनआईआरपी द्वारा निर्धारित सीमाओं की तुलना में 10 गुना अधिक सख्त थे। यह बात संचार मंत्रालय ने 2022 में भी कही थी। सरकार ने 2023 में भी बताया था कि दूरसंचार विभाग ने आईसीएनआईआरपी की अनुशंसित सीमाओं की तुलना में 10 गुना अधिक सख्त ईएमएफ मानक अपनाए हैं और टावरों के अनुपालन की निगरानी की जाती है। अब 2026 की ताजा रिपोर्टों में सीमा को वैश्विक मानकों के अनुरूप करने की बात सामने आई है। इसलिए इसे भारत के पहले के अधिक सख्त मानकों से अंतरराष्ट्रीय सीमा की ओर बदलाव के रूप में समझना चाहिए। 

क्या मोबाइल टावरों से स्वास्थ्य को खतरा बढ़ेगा?

ईएमएफ सीमा बढ़ने की खबर के बाद स्वास्थ्य सुरक्षा को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। सरकार ने पहले अपने आधिकारिक स्पष्टीकरणों में कहा है कि मोबाइल टावरों से निकलने वाले ईएमएफ को लेकर उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाणों में निर्धारित सुरक्षित सीमाओं के भीतर स्वास्थ्य पर नुकसान का निर्णायक प्रमाण नहीं मिला है। दूरसंचार विभाग ने आईसीएनआईआरपी और विश्व स्वास्थ्य संगठन से संबंधित मानकों और वैज्ञानिक आकलनों का भी उल्लेख किया है। हालांकि, नई सीमा का अर्थ यह नहीं है कि किसी भी स्तर का रेडिएशन स्वतः सुरक्षित मान लिया जाए। टेलीकॉम नेटवर्क को निर्धारित नियामकीय सीमाओं और अनुपालन प्रक्रियाओं के भीतर ही संचालित करना होता है। सरकार ने यह भी बताया है कि मोबाइल टावरों की ईएमएफ अनुपालन जांच की जाती है और नागरिक टावरों के आसपास की जानकारी तथा अनुपालन स्थिति देखने के लिए टारंग संचार पोर्टल का इस्तेमाल कर सकते हैं। 

यूजर्स को कब दिखेगा वास्तविक फायदा?

नियम में बदलाव और यूजर के फोन पर नेटवर्क सुधार के बीच कुछ समय का अंतर हो सकता है। टेलीकॉम कंपनियों को नेटवर्क योजना, उपकरणों की सेटिंग, स्पेक्ट्रम प्रबंधन और क्षेत्रवार अनुकूलन करना होगा। किसी इलाके में सुधार तभी स्पष्ट दिखाई देगा जब ऑपरेटर वहां उपलब्ध नेटवर्क संसाधनों का इस्तेमाल करके कवरेज को वास्तव में अनुकूलित करे। इसलिए नियम बदलने के तुरंत बाद हर फोन पर 5जी सिग्नल बढ़ जाना जरूरी नहीं है।

फोन में 5जी होने से ही हर जगह 5जी क्यों नहीं मिलता?

किसी स्मार्टफोन का 5जी समर्थित होना जरूरी है, लेकिन यह अकेली शर्त नहीं है। यूजर के स्थान पर संबंधित ऑपरेटर का 5जी नेटवर्क उपलब्ध होना, फोन का समर्थित बैंड के साथ अनुकूल होना और उस क्षेत्र की रेडियो परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण हैं। इसी तरह इमारत की दीवारें, तहखाना, लिफ्ट, पार्किंग और भूमिगत संरचनाएं रेडियो सिग्नल को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए भविष्य में बेहतर टावर कवरेज के बावजूद कुछ विशेष स्थानों पर नेटवर्क कमजोर रह सकता है।

क्या इसका मतलब 5जी अब हर कोने में पहुंचेगा?

नहीं, फिलहाल ऐसा दावा करना जल्दबाजी होगी।

नई व्यवस्था से टेलीकॉम कंपनियों को व्यापक कवरेज देने में मदद मिलने की संभावना है और कुछ कमजोर सिग्नल वाले क्षेत्रों में सुधार हो सकता है। लेकिन बेसमेंट, मोटी दीवारों वाले भवनों और भूमिगत स्थानों में बेहतर 5जी के लिए स्थानीय नेटवर्क ढांचा भी महत्वपूर्ण रहेगा।
इस बदलाव का वास्तविक असर तब ज्यादा स्पष्ट होगा जब संशोधित नियम लागू होने के बाद ऑपरेटर अपने नेटवर्क में इसका इस्तेमाल शुरू करेंगे और क्षेत्रवार कवरेज में बदलाव दिखाई देगा।

निष्कर्ष

मोबाइल नेटवर्क के ईएमएफ मानकों में प्रस्तावित बदलाव भारत के 5जी विस्तार के लिहाज से महत्वपूर्ण है। रिपोर्टों के अनुसार अनुमत पावर डेंसिटी में बढ़ोतरी से टेलीकॉम कंपनियों को मौजूदा साइटों से व्यापक कवरेज देने में मदद मिल सकती है और बढ़ते 5जी ट्रैफिक के बीच नेटवर्क गुणवत्ता सुधारने का अवसर मिल सकता है। लेकिन इसे “अब हर कमरे और हर बेसमेंट में 5जी मिलेगा” के रूप में देखना सही नहीं होगा। नेटवर्क की वास्तविक गुणवत्ता स्थान, भवन की बनावट, स्पेक्ट्रम, ऑपरेटर की नेटवर्क योजना और स्थानीय ट्रैफिक पर निर्भर करेगी। आने वाले महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संशोधित नियमों के लागू होने के बाद टेलीकॉम कंपनियां अपनी मौजूदा साइटों से कवरेज और सेवा गुणवत्ता को किस हद तक बेहतर कर पाती हैं।
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Neelam Saini

Neelam Saini

Shah Times Reporter

शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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