स्मार्टफोन अब रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा है, लेकिन घंटों स्क्रीन देखने और फोन को लगातार एक ही मुद्रा में इस्तेमाल करने की आदत शरीर पर असर डाल रही है। गर्दन में अकड़न, कंधों में दर्द, अंगूठे और कलाई में परेशानी, हाथों की पकड़ कमजोर महसूस होना और आंखों में थकान जैसी शिकायतें इसी बदलती डिजिटल दिनचर्या से जुड़ी हो सकती हैं। इसी तरह के शारीरिक बदलावों के लिए हाल के वर्षों में “फोन बॉडी” शब्द इस्तेमाल हो रहा है। लेकिन इसे बीमारी या आधिकारिक मेडिकल निदान समझना सही नहीं होगा। यह एक अनौपचारिक शब्द है, जो लंबे समय तक फोन और डिजिटल स्क्रीन इस्तेमाल करने से जुड़े शारीरिक असर को बयान करता है।
नई दिल्ली | 28 अगस्त 2026 | शाह टाइम्स
By Mohd Haris
“फोन बॉडी” किसी एक बीमारी का नाम नहीं है। यह उन शारीरिक समस्याओं का सामूहिक वर्णन है, जो लंबे समय तक स्क्रीन देखने और खराब मुद्रा में रहने से पैदा हो सकती हैं। दिल्ली के सीके बिड़ला अस्पताल के ऑर्थोपेडिक विशेषज्ञ डॉ. अश्वनी मैचान्ड ने बताया है कि लंबे समय तक स्मार्टफोन और स्क्रीन इस्तेमाल से जुड़ी मस्कुलोस्केलेटल परेशानियां बढ़ती दिखाई दे रही हैं। इनमें गर्दन की जकड़न, कंधों का आगे की ओर झुकना, ऊपरी पीठ में अकड़न, कमर दर्द और अंगूठे-कलाई पर बार-बार होने वाली गतिविधियों से जुड़ी चोट शामिल हैं। समस्या फोन के अस्तित्व से ज्यादा उसके इस्तेमाल के तरीके से जुड़ी है। अगर कोई व्यक्ति लंबे समय तक गर्दन झुकाकर स्क्रीन देखता है, लगातार अंगूठे से स्क्रॉल करता है और बीच में शरीर को आराम नहीं देता, तो मांसपेशियों और जोड़ों पर दोहराव वाला दबाव बढ़ता है।
फोन देखते समय सिर आगे की ओर झुक जाता है। इसे “टेक नेक” कहा जाता है। लंबे समय तक इसी मुद्रा में रहने से गर्दन और कंधों की मांसपेशियों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। इससे गर्दन में दर्द, सिरदर्द, कंधों में थकान और ऊपरी पीठ में जकड़न जैसी शिकायतें हो सकती हैं।
यह समझना भी जरूरी है कि फोन इस्तेमाल करने से रीढ़ की हड्डी अचानक टेढ़ी नहीं हो जाती। समस्या लंबे समय तक दोहराई जाने वाली खराब मुद्रा की है। शुरुआती स्तर पर मुद्रा सुधारने, नियमित गतिविधि और मांसपेशियों को मजबूत करने से ऐसे लक्षणों में सुधार संभव है। लेकिन लंबे समय तक समस्या को नजरअंदाज करने पर दर्द और नसों से जुड़ी परेशानियां गंभीर हो सकती हैं।
फोन चलाते समय अंगूठे और उंगलियों की एक जैसी गतिविधियां बार-बार दोहराई जाती हैं। लंबे समय में इससे अंगूठे, कलाई और हाथ में दर्द या थकान महसूस हो सकती है। फोन को एक ही तरीके से पकड़ने पर छोटी उंगली पर दबाव पड़ने की शिकायत भी सामने आती है। डिजिटल उपकरणों के इस्तेमाल से जुड़ी ऐसी आदतें हाथ की पकड़ और मोटर स्किल पर असर डालने की संभावना को लेकर वैज्ञानिकों का ध्यान खींच रही हैं।
हालांकि कमजोर हाथ को केवल फोन इस्तेमाल का नतीजा मानना सही नहीं होगा। नसों की समस्या, चोट, गठिया, मांसपेशियों की कमजोरी या दूसरी चिकित्सकीय स्थितियां भी इसकी वजह हो सकती हैं। इसलिए लगातार या बढ़ती हुई कमजोरी को केवल “फोन बॉडी” कहकर नजरअंदाज करना उचित नहीं है।
लंबे समय तक स्क्रीन देखने के बाद आंखों में थकान, सूखापन और कुछ समय के लिए धुंधला दिखाई देना डिजिटल आई स्ट्रेन से जुड़ा हो सकता है। लंबे समय तक पास की वस्तु पर नजर टिकाए रखना और कम पलक झपकाना इसमें भूमिका निभा सकता है। लेकिन यहां भी एक अहम फर्क समझना जरूरी है। हर धुंधली नजर का कारण स्मार्टफोन नहीं होता। एक व्यवस्थित समीक्षा और मेटा-विश्लेषण में स्मार्टफोन के अधिक इस्तेमाल और दृश्य संबंधी लक्षणों के बीच संभावित संबंध मिला, खासकर बच्चों में। हालांकि उपलब्ध अध्ययनों में लंबे समय के प्रभावों को पूरी तरह समझने के लिए और शोध की जरूरत बताई गई। ओहायो स्टेट यूनिवर्सिटी के ऑप्टोमेट्री विशेषज्ञ डोनाल्ड मुट्टी के मुताबिक बच्चों में मायोपिया के जोखिम को समझने के लिए केवल फोन या स्क्रीन को जिम्मेदार मानना पर्याप्त नहीं है। बाहर बिताया गया समय भी आंखों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
सोने से पहले अंधेरे कमरे में फोन देखने की आदत को लेकर एक अलग तरह की चिंता सामने आई है। अमेरिकन एकेडमी ऑफ ऑप्थैल्मोलॉजी से जुड़े आईविकी के अनुसार “ट्रांजिएंट स्मार्टफोन ब्लाइंडनेस” नाम से एक दुर्लभ और अस्थायी घटना का वर्णन किया गया है। इसमें अंधेरे में लेटकर फोन देखने के बाद थोड़े समय के लिए अचानक और बिना दर्द के नजर कम होने की शिकायत हो सकती है। यह आमतौर पर एक आंख में होती है।
यह स्थिति सामान्य स्क्रीन थकान से अलग है। इसलिए अचानक नजर कम होने या बार-बार धुंधलापन होने पर इसे केवल फोन की थकान मानना सुरक्षित नहीं है।
यह दावा सीधे तौर पर करना जल्दबाजी होगी कि स्मार्टफोन शरीर की मांसपेशियों को कमजोर कर रहा है। असल चिंता एक बड़े व्यवहारिक बदलाव की है। अगर स्क्रीन पर बिताया गया समय चलने, व्यायाम और दूसरी शारीरिक गतिविधियों की जगह ले रहा है, तो कुल शारीरिक सक्रियता घट सकती है। लंबे समय तक बैठे रहना और शरीर को एक ही मुद्रा में रखना मांसपेशियों की सक्रियता और फिटनेस पर असर डाल सकता है। यही वजह है कि विशेषज्ञ केवल स्क्रीन टाइम घटाने के बजाय नियमित मूवमेंट पर जोर देते हैं।
फोन छोड़ना व्यावहारिक समाधान नहीं है। इस्तेमाल का तरीका बदलना ज्यादा जरूरी है। फोन को बहुत नीचे रखकर देखने के बजाय उसे आंखों के करीब ऊंचाई पर रखें। लंबे समय तक एक ही मुद्रा में न बैठें। हर 30 से 45 मिनट में उठकर गर्दन, कंधे और शरीर को हल्का मूवमेंट दें।
काम के दौरान लैपटॉप या मॉनिटर को आंखों के स्तर के करीब रखना भी मददगार है। आंखों की थकान के लिए 20-20-20 नियम अपनाया जाता है, यानी हर 20 मिनट में करीब 20 फीट दूर किसी चीज को 20 सेकंड तक देखना। बच्चों और किशोरों के लिए स्क्रीन के साथ बाहर की गतिविधियों का संतुलन खास तौर पर जरूरी है। आंखों के विकास और समग्र शारीरिक स्वास्थ्य के लिए नियमित आउटडोर गतिविधि महत्वपूर्ण मानी जाती है।
अगर हाथ में लगातार कमजोरी, सुन्नपन या झनझनाहट हो रही है, तो इसे केवल फोन इस्तेमाल से जोड़ना ठीक नहीं है। इसी तरह अचानक नजर कम होना, एक आंख से धुंधला दिखाई देना, आंख में तेज दर्द, लगातार सिरदर्द या दृष्टि में नया बदलाव होने पर चिकित्सकीय जांच जरूरी है। “फोन बॉडी” शब्द किसी गंभीर बीमारी का विकल्प नहीं है। इसका इस्तेमाल किसी वास्तविक मेडिकल समस्या की जांच में देरी का कारण नहीं बनना चाहिए।
स्मार्टफोन ने हमारी दिनचर्या बदल दी है। अब चुनौती यह है कि शरीर लगातार बैठे रहने, गर्दन झुकाने और आंखों को पास की स्क्रीन पर टिकाए रखने की आदत के साथ तालमेल कैसे बिठाए। मौजूदा जानकारी यह बताती है कि “फोन बॉडी” कोई आधिकारिक बीमारी नहीं है, लेकिन इसके पीछे जिन शारीरिक परेशानियों की चर्चा हो रही है, वे वास्तविक हो सकती हैं। गर्दन और कंधे की समस्या, हाथों की दोहराव वाली चोट और डिजिटल आई स्ट्रेन को नजरअंदाज करने के बजाय शुरुआती स्तर पर आदतों में बदलाव ज्यादा व्यावहारिक रास्ता है। आपका फोन खुद आपकी रीढ़, हाथ या आंखों को बदल नहीं रहा है। लेकिन फोन इस्तेमाल करने का तरीका आपके शरीर पर लगातार दबाव जरूर डाल सकता है। इसलिए स्क्रीन टाइम के साथ स्क्रीन पोस्चर, ब्रेक और शारीरिक गतिविधि पर भी उतना ही ध्यान देना जरूरी है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।