सोशल मीडिया पर ज्यादा समय? ऐसे बदलें अपनी आदत
मोबाइल स्क्रॉलिंग की आदत कम करने के आसान तरीके
सोशल मीडिया से दूरी बनाने के लिए अपनाएं ये तरीके
सोशल मीडिया रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा है, लेकिन जरूरत से ज्यादा या अनियंत्रित इस्तेमाल नींद और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानियों से संबद्ध पाया गया है। समय घटाने के लिए नोटिफिकेशन सीमित करना, उपयोग का लक्ष्य तय करना, स्क्रीन ब्रेक लेना और ऑफलाइन गतिविधियां बढ़ाना उपयोगी हो सकता है। बदलाव धीरे-धीरे करें।
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भारत | 13 अगस्त 2026 | शाह टाइम्स डिजिटल डेस्क
सोशल मीडिया का इस्तेमाल कब बन जाता है समस्या?
सोशल मीडिया आज बातचीत, जानकारी, मनोरंजन और कामकाज का अहम हिस्सा बन चुका है। समस्या केवल सोशल मीडिया इस्तेमाल करने में नहीं, बल्कि तब पैदा हो सकती है जब व्यक्ति बिना किसी स्पष्ट उद्देश्य के बार-बार ऐप खोलने लगे, समय का अंदाज़ा खो दे या इसके कारण नींद, काम, पढ़ाई और वास्तविक रिश्तों के लिए समय कम पड़ने लगे।
वैज्ञानिक शोध में भी सामान्य सोशल मीडिया इस्तेमाल और समस्याग्रस्त इस्तेमाल के बीच फर्क किया गया है। 2024 में प्रकाशित एक व्यवस्थित समीक्षा और मेटा-विश्लेषण में युवा आबादी से जुड़े 182 अध्ययनों की समीक्षा की गई। इसमें सोशल मीडिया इस्तेमाल और डिप्रेशन, एंग्जायटी तथा नींद से जुड़ी समस्याओं के बीच छोटे लेकिन महत्वपूर्ण संबंध पाए गए, हालांकि शोधकर्ताओं ने यह भी कहा कि इन संबंधों की दिशा और कारणों को समझने के लिए आगे लंबे समय वाले अध्ययन जरूरी हैं।
इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि सोशल मीडिया इस्तेमाल करने वाला हर व्यक्ति मानसिक स्वास्थ्य समस्या का शिकार हो जाएगा। असल मुद्दा इस्तेमाल का पैटर्न, उसकी अवधि, कंटेंट की प्रकृति और उसका व्यक्ति की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ने वाला असर है।
सोशल मीडिया पर ज्यादा समय क्यों बीत जाता है?
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इस तरह डिजाइन किए गए हैं कि यूजर लगातार नए कंटेंट तक पहुंच सके। एक पोस्ट देखने के बाद दूसरा वीडियो, फिर अगली रील और उसके बाद नया अपडेट सामने आता रहता है। इस लगातार बदलते कंटेंट के कारण व्यक्ति कई बार बिना किसी तय मकसद के भी स्क्रॉल करता रहता है।दूसरी वजह नोटिफिकेशन हैं। हर मैसेज, लाइक, कमेंट या अपडेट फोन की तरफ ध्यान खींच सकता है। यदि व्यक्ति हर नोटिफिकेशन पर तुरंत प्रतिक्रिया देने का आदी हो जाए तो दिन में कई छोटे-छोटे स्क्रीन सेशन मिलकर काफी समय ले सकते हैं। तीसरी वजह आदत है। अगर सुबह उठते ही फोन देखना, खाना खाते समय सोशल मीडिया चलाना या सोने से पहले लंबे समय तक रील्स देखना रोज की दिनचर्या बन जाए, तो व्यक्ति को यह सामान्य व्यवहार लगने लगता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन भी डिजिटल वातावरण को मानसिक स्वास्थ्य के लिए सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रभावों वाला मानता है। उसके मुताबिक डिजिटल प्लेटफॉर्म कनेक्शन, सीखने और सेवाओं तक पहुंच में मदद कर सकते हैं, लेकिन अत्यधिक इस्तेमाल और कुछ ऑनलाइन व्यवहार मानसिक स्वास्थ्य के जोखिमों से भी जुड़े हो सकते हैं।
सोशल मीडिया का ज्यादा इस्तेमाल नींद पर डाल सकता है असर
सोशल मीडिया कम करने की सबसे व्यावहारिक वजहों में से एक नींद की गुणवत्ता है। रात में लंबे समय तक फोन देखने से सोने का समय आगे खिसक सकता है और व्यक्ति के पास पर्याप्त आराम के लिए कम समय बच सकता है। 2024 में प्रकाशित एक व्यवस्थित समीक्षा और मेटा-विश्लेषण में 20 से अधिक देशों के 41,716 प्रतिभागियों से जुड़े 55 अध्ययनों का विश्लेषण किया गया। शोध में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के इस्तेमाल और नींद की खराब गुणवत्ता के बीच महत्वपूर्ण संबंध पाया गया। समस्याग्रस्त इस्तेमाल में नींद से जुड़ी दिक्कतों का संबंध और मजबूत पाया गया।
हालांकि शोध में संबंध मिलने का अर्थ हमेशा सीधा कारण साबित होना नहीं है। खराब नींद वाला व्यक्ति भी अधिक समय फोन या सोशल मीडिया पर बिता सकता है। इसलिए दोनों दिशाओं में संभावित संबंध को ध्यान में रखना जरूरी है।
सोशल मीडिया पर समय कम करने का पहला कदम क्या है?
सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि रोजाना वास्तव में कितना समय सोशल मीडिया पर जा रहा है। इसके लिए फोन में मौजूद स्क्रीन टाइम या डिजिटल वेलबीइंग फीचर देखा जा सकता है।कई लोग अपने सोशल मीडिया इस्तेमाल को केवल कुछ मिनट मानते हैं, लेकिन अलग-अलग ऐप पर बिताया गया समय जोड़ने पर तस्वीर बदल सकती है। इसलिए बिना अनुमान लगाए एक सप्ताह तक अपने वास्तविक उपयोग का जायज़ा लेना बेहतर शुरुआत हो सकती है।
इसके बाद अचानक सभी प्लेटफॉर्म छोड़ने के बजाय एक व्यावहारिक लक्ष्य तय किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति दिन में बार-बार सोशल मीडिया खोलता है तो सबसे पहले अनावश्यक चेकिंग कम करने पर ध्यान दिया जा सकता है।अमेरिकी सर्जन जनरल कार्यालय की स्क्रीन-यूज़ सलाह में भी स्क्रीन टाइम ट्रैक करने, सीमाएं तय करने, नोटिफिकेशन बंद करने और ऐसे अकाउंट को म्यूट, अनफॉलो या ब्लॉक करने की सलाह दी गई है जो उपयोगकर्ता के लिए नकारात्मक अनुभव पैदा करते हैं।
नोटिफिकेशन बंद करना क्यों मददगार हो सकता है?
हर नोटिफिकेशन जरूरी नहीं होता। मैसेजिंग या काम से जुड़े जरूरी अलर्ट अलग रखे जा सकते हैं, जबकि लाइक, प्रमोशनल अपडेट और दूसरे गैर-जरूरी नोटिफिकेशन बंद किए जा सकते हैं।इसका मकसद फोन को पूरी तरह छोड़ना नहीं, बल्कि फोन को बार-बार आपका ध्यान खींचने से रोकना है। जब उपयोगकर्ता खुद तय करता है कि कब ऐप देखना है, तो डिजिटल इस्तेमाल अधिक नियंत्रित हो सकता है।इसी तरह सोशल मीडिया ऐप को होम स्क्रीन से हटाना भी एक छोटा व्यवहारिक बदलाव हो सकता है। इससे ऐप खोलने की प्रक्रिया में एक अतिरिक्त कदम जुड़ता है और बिना सोचे ऐप खोलने की आदत पर विराम लगाया जा सकता है।
सुबह और रात के लिए बनाएं स्क्रीन नियम
दिन की शुरुआत सोशल मीडिया से करने के बजाय कुछ समय बिना फोन के बिताना उपयोगी हो सकता है। सुबह उठने के बाद सीधे रील्स या पोस्ट देखने के बजाय नहाना, नाश्ता, हल्की शारीरिक गतिविधि या परिवार के साथ बातचीत जैसी ऑफलाइन गतिविधियां दिन की शुरुआत को अलग दिशा दे सकती हैं।इसी तरह सोने से पहले सोशल मीडिया इस्तेमाल सीमित करना महत्वपूर्ण है। विश्व स्वास्थ्य संगठन नियमित स्क्रीन ब्रेक लेने और स्क्रीन आधारित गतिविधियों तथा ऑफलाइन गतिविधियों के बीच संतुलन बनाए रखने की सलाह देता है। रात में फोन को बिस्तर से थोड़ी दूरी पर रखना भी व्यवहारिक उपाय हो सकता है। इससे सोने के बाद बार-बार स्क्रीन देखने का अवसर कम होता है और फोन को अलार्म के लिए इस्तेमाल करने वालों के लिए भी अलग अलार्म घड़ी एक विकल्प हो सकती है।
सोशल मीडिया की जगह क्या करें?
केवल यह तय करना कि सोशल मीडिया कम करना है, काफी नहीं होता। खाली समय के लिए विकल्प नहीं होगा तो व्यक्ति फिर से उसी ऐप की तरफ लौट सकता है।पढ़ना, टहलना, व्यायाम, संगीत सुनना, खाना बनाना, परिवार के साथ बातचीत, किसी शौक पर काम करना या बाहर समय बिताना बेहतर ऑफलाइन विकल्प हो सकते हैं। अमेरिकी सर्जन जनरल की सलाह भी स्क्रीन से दूरी बनाकर वास्तविक जीवन की गतिविधियों में शामिल होने और डिजिटल डिटॉक्स को अपनी स्क्रीन आदतों का जायज़ा लेने के एक तरीके के रूप में देखने पर जोर देती है। यहां लक्ष्य सोशल मीडिया को जिंदगी से पूरी तरह हटाना नहीं होना चाहिए। काम, नेटवर्किंग, खबरों और सामाजिक संपर्क के लिए सोशल मीडिया कई लोगों के लिए उपयोगी है। उद्देश्य यह है कि प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल व्यक्ति की जरूरत के मुताबिक हो, न कि आदत व्यक्ति के समय को नियंत्रित करे।
क्या केवल स्क्रीन टाइम कम करना ही पर्याप्त है?
यह एक महत्वपूर्ण सवाल है। सोशल मीडिया इस्तेमाल को केवल घंटों में मापना हमेशा पर्याप्त नहीं होता। 2023 की एक व्यवस्थित समीक्षा में शोधकर्ताओं ने बताया कि अलग-अलग अध्ययन सोशल मीडिया इस्तेमाल को अलग-अलग तरीके से मापते हैं और केवल समय को आधार बनाना उपयोगकर्ता के अनुभव की पूरी तस्वीर नहीं देता। उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति रोज एक घंटे सोशल मीडिया का इस्तेमाल काम या पढ़ाई के लिए कर सकता है, जबकि दूसरा व्यक्ति उतने ही समय में लगातार नकारात्मक कंटेंट देख सकता है और उसके बाद तनाव महसूस कर सकता है। दोनों का कुल स्क्रीन टाइम समान है, लेकिन अनुभव अलग है।इसलिए अपने आप से यह सवाल पूछना ज्यादा उपयोगी हो सकता है कि सोशल मीडिया देखने के बाद आप कैसा महसूस करते हैं, क्या इससे जरूरी काम टलते हैं, क्या नींद प्रभावित होती है और क्या आप चाहकर भी ऐप बंद नहीं कर पाते।
आदत बदलने में धीरे-धीरे अपनाएं रणनीति
सोशल मीडिया की आदत कम करने के लिए एकदम से कठोर फैसला लेने के बजाय छोटे बदलाव अधिक व्यावहारिक हो सकते हैं। सबसे पहले उन समयों की पहचान करें जब आप बिना जरूरत फोन खोलते हैं।इसके बाद उन समयों में वैकल्पिक गतिविधि तय करें। मसलन, खाली पांच मिनट में रील देखने के बजाय पानी पीना, थोड़ा चलना या किसी जरूरी काम की सूची देखना शुरू किया जा सकता है।एक और तरीका ऐप के लिए निर्धारित समय तय करना है। जरूरी डिजिटल काम पूरा होने के बाद सोशल मीडिया बंद करने का नियम बनाया जा सकता है। यदि तय सीमा बार-बार टूट रही है तो ऐप टाइमर या डिजिटल वेलबीइंग टूल का इस्तेमाल किया जा सकता है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि एक दिन ज्यादा इस्तेमाल हो जाने को असफलता न माना जाए। आदत बदलना एक प्रक्रिया है और इसका मकसद रोजमर्रा की जिंदगी में संतुलन बनाना है।
क्या सोशल मीडिया पूरी तरह छोड़ देना चाहिए?
हर व्यक्ति के लिए सोशल मीडिया छोड़ना जरूरी नहीं है। डिजिटल प्लेटफॉर्म शिक्षा, कारोबार, रोजगार, समाचार, मनोरंजन और सामाजिक संपर्क के महत्वपूर्ण माध्यम बन चुके हैं।विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक डिजिटल वातावरण सकारात्मक अवसर भी उपलब्ध कराता है। इसलिए बेहतर नज़रिया पूर्ण प्रतिबंध के बजाय सुरक्षित और संतुलित डिजिटल व्यवहार विकसित करना है। अगर सोशल मीडिया का इस्तेमाल इतना बढ़ गया है कि व्यक्ति काम, पढ़ाई, नींद या रिश्तों को लगातार प्रभावित होते देख रहा है, तो इसे गंभीरता से लेना चाहिए। लंबे समय तक बनी रहने वाली मानसिक परेशानी, नींद की समस्या या व्यवहार में बड़ा बदलाव महसूस हो तो स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना उचित है।
विशेषज्ञों के लिए अभी भी कौन से सवाल बाकी हैं?
सोशल मीडिया और मानसिक स्वास्थ्य के बीच संबंध पर शोध तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन कई सवाल अभी पूरी तरह हल नहीं हुए हैं। अलग-अलग प्लेटफॉर्म, कंटेंट, उपयोग की अवधि और उपयोगकर्ता की उम्र के अनुसार प्रभाव अलग हो सकते हैं।2024 के मेटा-विश्लेषण में शोध के नतीजों में काफी विविधता पाई गई और शोधकर्ताओं ने भविष्य में लंबे समय तक लोगों का अध्ययन करने की जरूरत बताई। यही वजह है कि सोशल मीडिया को मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का अकेला कारण बताना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा। ज्यादा सटीक नज़रिया यह है कि कुछ प्रकार का अत्यधिक या समस्याग्रस्त इस्तेमाल कुछ लोगों में प्रतिकूल परिणामों से जुड़ा हो सकता है, जबकि डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग कई सकारात्मक उद्देश्यों के लिए भी किया जाता है।
आगे क्या करना चाहिए?
सोशल मीडिया की आदत कम करने का सबसे व्यावहारिक रास्ता है—पहले वास्तविक उपयोग को समझना, फिर अनावश्यक नोटिफिकेशन और ऐप चेकिंग घटाना, रात और सुबह के लिए स्क्रीन नियम बनाना तथा ऑफलाइन गतिविधियों को दिनचर्या में जगह देना।इस पूरी प्रक्रिया में लक्ष्य केवल फोन से दूरी बनाना नहीं, बल्कि समय और ध्यान पर अपना नियंत्रण वापस हासिल करना है। उपलब्ध शोध सोशल मीडिया और कुछ स्वास्थ्य परिणामों के बीच संबंध की ओर इशारा करता है, लेकिन हर व्यक्ति पर इसका असर एक जैसा नहीं होता।
पांच जरूरी सवालों के सीधे जवाब
क्या सोशल मीडिया का ज्यादा इस्तेमाल नुकसानदायक है?
जरूरत से ज्यादा या समस्याग्रस्त इस्तेमाल कुछ मानसिक स्वास्थ्य और नींद से जुड़े प्रतिकूल परिणामों से संबद्ध पाया गया है, लेकिन हर उपयोगकर्ता पर इसका असर समान नहीं होता।
सोशल मीडिया कम करने की शुरुआत कैसे करें?
पहले फोन के स्क्रीन टाइम डेटा से अपना वास्तविक इस्तेमाल देखें और फिर अनावश्यक नोटिफिकेशन तथा बार-बार ऐप चेक करने की आदत कम करें।
क्या रात में सोशल मीडिया इस्तेमाल करना कम करना चाहिए?
नींद से जुड़े शोध सोशल मीडिया और डिजिटल मीडिया इस्तेमाल तथा खराब नींद के बीच संबंध दिखाते हैं, इसलिए सोने के समय स्क्रीन कम करना एक व्यावहारिक कदम हो सकता है।
क्या सोशल मीडिया पूरी तरह छोड़ना जरूरी है?
नहीं। काम, शिक्षा और सामाजिक संपर्क के लिए इसका उपयोग उपयोगी हो सकता है। लक्ष्य संतुलित और उद्देश्यपूर्ण इस्तेमाल होना चाहिए।
कब विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए?
अगर सोशल मीडिया इस्तेमाल के कारण रोजमर्रा के काम, नींद, रिश्ते या मानसिक स्थिति लगातार प्रभावित हो रहे हों और व्यक्ति खुद आदत नियंत्रित न कर पा रहा हो, तो स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना उचित है।
निष्कर्ष
सोशल मीडिया पर ज्यादा समय बिताना केवल समय की बर्बादी का मामला नहीं है; कुछ लोगों में अनियंत्रित इस्तेमाल नींद और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े प्रतिकूल परिणामों से संबद्ध हो सकता है। साथ ही, उपलब्ध शोध यह भी बताता है कि सोशल मीडिया और स्वास्थ्य के संबंध को केवल स्क्रीन टाइम के आधार पर समझना पर्याप्त नहीं है। इसलिए बेहतर रास्ता पूरी तरह डिजिटल दुनिया से कटना नहीं, बल्कि अपने इस्तेमाल का जायज़ा लेकर स्पष्ट सीमाएं तय करना है। नोटिफिकेशन कम करना, स्क्रीन ब्रेक लेना, रात में फोन से दूरी बनाना और ऑफलाइन गतिविधियों के लिए समय निकालना इस दिशा में व्यावहारिक कदम हो सकते हैं।