राम मंदिर ट्रस्ट ने रिटायर्ड एयर मार्शल जितेंद्र मिश्र को पहला पूर्णकालिक CEO बनाया है। नए न्यासियों और जिम्मेदारियों के फेरबदल से प्रशासन, वित्तीय निगरानी और संचालन को मजबूत करने की कोशिश हुई है।
📍 अयोध्या, उत्तर प्रदेश
🗓️ 3 सितंबर 2026
✍️ By Mohd Naved
राम मंदिर ट्रस्ट में प्रशासनिक बदलाव
अयोध्या स्थित श्रीराम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र ट्रस्ट ने अपने प्रशासनिक ढांचे में महत्वपूर्ण बदलाव किया है। 2 सितंबर 2026 को हुई बैठक में रिटायर्ड एयर मार्शल जितेंद्र मिश्र को ट्रस्ट का पहला पूर्णकालिक मुख्य कार्यपालक अधिकारी यानी सीईओ नियुक्त किया गया। इसके साथ तीन नए न्यासियों की नियुक्ति और प्रमुख पदों की जिम्मेदारियों में बदलाव भी किया गया।
यह फैसला ऐसे समय हुआ है जब राम मंदिर परिसर का निर्माण और उससे जुड़ी व्यवस्थाएं लगातार विस्तार ले रही हैं। मंदिर में श्रद्धालुओं की बढ़ती आवाजाही, सुरक्षा, भीड़ प्रबंधन, सुविधाओं, तकनीकी व्यवस्था, वित्तीय निगरानी और अलग-अलग सरकारी एजेंसियों के साथ समन्वय जैसी जिम्मेदारियां अब पहले से अधिक व्यापक हो चुकी हैं।
जितेंद्र मिश्र की नियुक्ति का महत्व
जितेंद्र मिश्र का चयन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उनका लगभग 4 दशक लंबा सैन्य प्रशासनिक अनुभव रहा है। उन्होंने 6 दिसंबर 1986 को भारतीय वायुसेना में फाइटर पायलट के तौर पर सेवा शुरू की थी। अपने करियर में उन्होंने फाइटर कॉम्बैट लीडर, एक्सपेरिमेंटल टेस्ट पायलट और कई वरिष्ठ कमांड पदों पर जिम्मेदारी निभाई।
वे 18 से अधिक प्रकार के विमानों पर उड़ान भर चुके हैं और उनके पास 3,000 घंटे से अधिक की उड़ान का अनुभव बताया गया है। उन्होंने एयरक्राफ्ट एंड सिस्टम्स टेस्टिंग एस्टेब्लिशमेंट में चीफ टेस्ट पायलट और बाद में कमांडेंट की जिम्मेदारी भी संभाली।
एयर हेडक्वार्टर और एकीकृत रक्षा स्टाफ में भी उन्होंने रणनीतिक योजना, ऑपरेशनल असेसमेंट, संगठन और प्रशिक्षण से जुड़े पदों पर काम किया। जनवरी 2025 में उन्होंने पश्चिमी वायु कमान के एयर ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ का पद संभाला। 30 अप्रैल 2026 को वे एयर मार्शल के पद से सेवानिवृत्त हुए।
ऑपरेशन सिंदूर का अनुभव
जितेंद्र मिश्र के सैन्य करियर का एक अहम चरण ऑपरेशन सिंदूर रहा। मई 2025 में इस अभियान के दौरान वे पश्चिमी वायु कमान की कमान संभाल रहे थे। इस वजह से उनका नाम भारत की पश्चिमी वायु सुरक्षा और ऑपरेशनल कमान से जुड़े प्रमुख अधिकारियों में रहा।
ऑपरेशन के बाद उनके कुछ सार्वजनिक बयानों में भारतीय वायुसेना की तैयारी और एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम से जुड़े अभियानों का उल्लेख सामने आया था। इन बयानों को सैन्य अभियान के संदर्भ में देखा गया था।
हालांकि मंदिर प्रशासन और सैन्य कमान दो अलग-अलग क्षेत्र हैं। इसलिए सैन्य अनुभव को सीधे मंदिर प्रशासन की सफलता का प्रमाण मानना जल्दबाजी होगी। असली कसौटी यह होगी कि मिश्र प्रशासनिक अनुशासन को धार्मिक परंपराओं, ट्रस्ट की कार्यप्रणाली और श्रद्धालुओं की जरूरतों के साथ किस तरह संतुलित करते हैं।
सीईओ के सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारियां
राम मंदिर का संचालन एक सामान्य धार्मिक संस्थान के प्रशासन से कहीं अधिक जटिल है। मंदिर परिसर के साथ व्यापक तीर्थ क्षेत्र और श्रद्धालु सुविधाओं का विस्तार भी जुड़ा है।
सीईओ के सामने दर्शन व्यवस्था को सुचारु रखना, भीड़ प्रबंधन, सुरक्षा एजेंसियों के साथ तालमेल, साफ-सफाई, कर्मचारियों की जिम्मेदारियां, तकनीकी प्रणालियां और आपात स्थिति से निपटने जैसे कई मोर्चे होंगे।
इसके अलावा निर्माण परियोजनाओं, ठेकेदारों, वित्तीय प्रक्रियाओं और प्रशासनिक इकाइयों के बीच समन्वय भी अहम रहेगा। एक बड़े धार्मिक परिसर में रोजाना आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या और विशेष पर्वों पर बढ़ने वाली भीड़ प्रशासनिक क्षमता की लगातार परीक्षा लेगी।
नई टीम का ढांचा
2 सितंबर की बैठक में तीन नए न्यासियों को शामिल किया गया। इनमें महेश भागचंदका, मदन मोहन पांडे और डॉ. निर्मला यादव शामिल हैं।
महेश भागचंदका कारोबारी और समाजसेवी हैं। ट्रस्ट की नई व्यवस्था में उन्हें कोषाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई है। इससे वित्तीय मामलों में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
मदन मोहन पांडे पेशे से वकील हैं। उन्होंने लंबे समय तक श्रीराम जन्मभूमि से जुड़े मुकदमों में कानूनी पैरवी की। उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त महाधिवक्ता के रूप में भी उन्होंने जिम्मेदारी निभाई है। उनकी नियुक्ति से ट्रस्ट को कानूनी और प्रशासनिक मामलों में अनुभव मिलता है।
डॉ. निर्मला यादव शिक्षा और अकादमिक प्रशासन से जुड़ा अनुभव लेकर आई हैं। वे करीब 19 वर्षों तक महाविद्यालय की प्रिंसिपल रहीं और विश्वविद्यालय की कार्य परिषद की सदस्य भी रही हैं। वे ट्रस्ट की नई व्यवस्था में शामिल होने वाली पहली महिला न्यासी हैं।
महामंत्री की जिम्मेदारी में बदलाव
बैठक में स्वामी गोविंददेव गिरि को ट्रस्ट का नया महामंत्री बनाया गया। इससे पहले वे कोषाध्यक्ष की भूमिका में थे।
चंपत राय के इस्तीफे के बाद कृष्ण मोहन को अंतरिम महामंत्री की जिम्मेदारी दी गई थी। ट्रस्ट ने चुनौतीपूर्ण अवधि में उनकी भूमिका के लिए आभार जताया।
इस बदलाव का अर्थ यह है कि ट्रस्ट ने प्रशासनिक जिम्मेदारियों को अलग-अलग स्तर पर व्यवस्थित करने की कोशिश की है। सीईओ को कार्यकारी प्रशासन की भूमिका मिलने के साथ महामंत्री और कोषाध्यक्ष की जिम्मेदारियां भी स्पष्ट की गई हैं।
वित्तीय प्रबंधन क्यों महत्वपूर्ण है
ट्रस्ट की 2025-26 की वित्तीय स्थिति भी इस बदलाव को समझने में अहम है। बैठक में पेश किए गए खातों के मुताबिक वित्त वर्ष के दौरान ट्रस्ट की कुल आय 237 करोड़ रुपये रही, जबकि कुल व्यय 91 करोड़ रुपये रहा।
इसी अवधि में निर्माण आदि कार्यों पर 425 करोड़ रुपये का पूंजीगत व्यय दर्ज किया गया। 31 मार्च 2026 को वित्त वर्ष की समाप्ति पर ट्रस्ट के पास कुल उपलब्ध राशि 1,882 करोड़ रुपये बताई गई।
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि ट्रस्ट के सामने बड़े पैमाने पर वित्तीय प्रबंधन की जिम्मेदारी है। ऐसे में पारदर्शी लेखा व्यवस्था, खर्च की निगरानी, ऑडिट, खरीद प्रक्रिया और परियोजनाओं की वित्तीय जवाबदेही आगे महत्वपूर्ण मुद्दे रहेंगे।
हालिया विवादों के बाद जवाबदेही की परीक्षा
पूर्णकालिक सीईओ की नियुक्ति ऐसे समय हुई है जब ट्रस्ट के कामकाज और वित्तीय व्यवस्था को लेकर सवाल उठ चुके हैं। हाल में सामने आए दान से जुड़े चोरी विवाद के बाद प्रशासनिक निगरानी और जवाबदेही को लेकर चर्चा तेज हुई थी। इस मामले में कई गिरफ्तारियां भी हुई थीं।
ऐसे माहौल में नई व्यवस्था के सामने सबसे अहम चुनौती भरोसा कायम करने की होगी। केवल पदों में बदलाव से प्रशासनिक पारदर्शिता स्थापित नहीं होती। इसके लिए स्पष्ट प्रक्रियाएं, नियमित ऑडिट, जिम्मेदारियों का निर्धारण और निर्णयों की जवाबदेही जरूरी होगी।
क्या सैन्य मॉडल मंदिर प्रशासन में काम करेगा?
जितेंद्र मिश्र के पक्ष में सबसे मजबूत तर्क उनका बड़े संगठनों को संचालित करने का अनुभव है। सैन्य सेवा में उन्होंने रणनीतिक योजना, मानव संसाधन, तकनीकी प्रणालियों और अलग-अलग इकाइयों के बीच समन्वय से जुड़े काम किए हैं।
लेकिन मंदिर प्रशासन का चरित्र अलग है। सेना में कमांड स्ट्रक्चर स्पष्ट होता है। मंदिर ट्रस्ट में धार्मिक परंपराएं, संत समाज, न्यासी, सरकारी संस्थान, स्थानीय प्रशासन, श्रद्धालु और सामाजिक हितधारक अलग-अलग स्तर पर जुड़े हैं।
इसलिए नई व्यवस्था की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सीईओ निर्णय लेने की गति और प्रशासनिक अनुशासन के साथ संवेदनशील धार्मिक और सामाजिक पहलुओं को कैसे संभालते हैं।
नई टीम कितनी कारगर होगी?
अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि नई टीम कितनी कारगर साबित होगी। नियुक्तियां और जिम्मेदारियों का पुनर्गठन केवल शुरुआती कदम हैं।
पहली बड़ी परीक्षा संचालन व्यवस्था में दिखाई देगी। श्रद्धालुओं की आवाजाही, सुरक्षा, पार्किंग, स्वच्छता, कतार व्यवस्था और आपातकालीन प्रतिक्रिया में अगर स्पष्ट सुधार आता है तो नई प्रशासनिक संरचना की उपयोगिता सामने आएगी।
दूसरी परीक्षा वित्तीय प्रबंधन की होगी। बड़े बजट और लगातार चल रहे निर्माण कार्यों के बीच खर्च की निगरानी, पारदर्शिता और ऑडिट व्यवस्था मजबूत रखना जरूरी होगा।
तीसरी कसौटी संस्थागत समन्वय होगी। अयोध्या में मंदिर प्रशासन अकेले काम नहीं करता। स्थानीय प्रशासन, पुलिस, नगर निकाय और अन्य सरकारी एजेंसियों के साथ लगातार तालमेल जरूरी है।
चौथी चुनौती दीर्घकालिक योजना की होगी। राम मंदिर परियोजना का अगला चरण केवल निर्माण पूरा करने तक सीमित नहीं रहेगा। तीर्थ क्षेत्र के संचालन, श्रद्धालु सुविधाओं और धार्मिक पर्यटन से जुड़े प्रशासनिक ढांचे को भी स्थायी रूप देना होगा।
आगे क्या होगा
ट्रस्ट के नए सीईओ की भूमिका और अधिकारों से जुड़ी मानक संचालन प्रक्रिया अभी पूरी तरह अंतिम रूप में नहीं आई है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक ट्रस्ट प्रशासन को आगे सीईओ की सहायता के लिए अलग टीम तैयार करने की प्रक्रिया में भी है। इसके लिए 15 शॉर्टलिस्ट किए गए उम्मीदवारों पर विचार किया जा रहा है।
यही टीम भविष्य में नई व्यवस्था की वास्तविक क्षमता तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। केवल एक वरिष्ठ अधिकारी की नियुक्ति से बड़ा प्रशासनिक ढांचा नहीं चलता। उसके लिए सक्षम अधिकारी, स्पष्ट अधिकार, जवाबदेही और संसाधनों का संतुलित इस्तेमाल जरूरी है।
राम मंदिर अब निर्माण परियोजना से आगे बढ़कर एक बड़े धार्मिक और सार्वजनिक संस्थान के रूप में विकसित हो रहा है। इसलिए प्रशासनिक व्यवस्था को भी उसी अनुपात में पेशेवर, पारदर्शी और जवाबदेह बनाना होगा।
निष्कर्ष
जितेंद्र मिश्र की नियुक्ति ट्रस्ट के प्रशासन में एक अहम संस्थागत बदलाव है। उनका सैन्य अनुभव रणनीतिक योजना, अनुशासन और बड़े संगठनों के संचालन में उपयोगी साबित हो सकता है, लेकिन मंदिर प्रशासन की सफलता केवल सैन्य अनुभव से तय नहीं होगी।
नई टीम के सामने असली चुनौती व्यवस्था को जमीन पर बेहतर बनाना, वित्तीय पारदर्शिता कायम रखना और करोड़ों श्रद्धालुओं की अपेक्षाओं के अनुरूप एक टिकाऊ प्रशासनिक मॉडल तैयार करना है।
आने वाले महीनों में दर्शन व्यवस्था, वित्तीय निगरानी, निर्माण प्रबंधन, सुरक्षा और संस्थागत समन्वय के स्तर पर होने वाले बदलाव ही बताएंगे कि यह पुनर्गठन कितना प्रभावी साबित हुआ।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।