मेटा ने किशोरों के फेसबुक और इंस्टाग्राम इस्तेमाल पर नई पाबंदियां स्वीकार की हैं। 18 साल से कम उम्र के यूज़र्स के लिए 2 घंटे की दैनिक सीमा और रात में एक्सेस बंद रहेगा।
लोकेशन
ओकलैंड, कैलिफोर्निया, अमेरिका
27 अगस्त 2026
सोशल मीडिया के बढ़ते इस्तेमाल और बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर अमेरिका में बड़ा नीतिगत बदलाव सामने आया है। मेटा ने अमेरिकी राज्यों के साथ हुए समझौते के तहत किशोर यूज़र्स के लिए फेसबुक और इंस्टाग्राम के इस्तेमाल पर कड़ी सीमाएं स्वीकार की हैं। नए प्रावधानों के तहत 18 साल से कम उम्र के यूज़र्स के लिए दोनों प्लेटफॉर्म पर कुल दैनिक इस्तेमाल की डिफॉल्ट सीमा 2 घंटे होगी। इसके अलावा रात 12 बजे से सुबह 6 बजे तक इन ऐप्स का इस्तेमाल डिफॉल्ट तौर पर बंद रहेगा।
यह समझौता उन मुकदमों के बाद हुआ है जिनमें मेटा पर आरोप लगाया गया था कि उसके सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ऐसे डिज़ाइन और फीचर्स अपनाते हैं, जो बच्चों और किशोरों को लंबे समय तक प्लेटफॉर्म पर बनाए रखते हैं। मेटा ने इन आरोपों में किसी गलत काम को स्वीकार नहीं किया है। अमेरिकी अदालत ने मुख्य समझौते को मंजूरी दे दी है।
समझौते के तहत 18 साल से कम उम्र के किशोरों के लिए फेसबुक और इंस्टाग्राम का संयुक्त इस्तेमाल रोज़ाना 2 घंटे तक सीमित रहेगा। इसका मतलब यह है कि दोनों प्लेटफॉर्म पर बिताया गया समय एक ही सीमा में गिना जाएगा।
मेटा के मुताबिक यह सीमा डिफॉल्ट तौर पर लागू होगी और इसे हटाने या बदलने के लिए अभिभावक की अनुमति जरूरी होगी। कंपनी ने यह भी कहा है कि एक ही किशोर के कई अकाउंट होने की स्थिति में समय की गणना को ध्यान में रखने के लिए सिस्टम को मजबूत किया जाएगा।
इस व्यवस्था का मकसद किशोरों के स्क्रीन टाइम को नियंत्रित करना और लगातार सोशल मीडिया इस्तेमाल को कम करना है। हालांकि, इसकी वास्तविक प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करेगी कि उम्र की पुष्टि, अभिभावकीय अनुमति और अलग-अलग अकाउंट की पहचान कितनी प्रभावी तरीके से होती है।
नए नियमों का दूसरा अहम हिस्सा रात के इस्तेमाल से जुड़ा है। किशोर यूज़र्स के लिए रात 12 बजे से सुबह 6 बजे तक फेसबुक और इंस्टाग्राम का एक्सेस डिफॉल्ट तौर पर ब्लॉक रहेगा।
इस दौरान किशोर फीड, स्टोरीज, एक्सप्लोर और रील्स जैसे प्रमुख हिस्सों को देखने या उन पर पोस्ट करने में सक्षम नहीं होंगे। अभिभावकीय अनुमति के जरिए इस व्यवस्था में बदलाव की गुंजाइश रखी गई है।
यह प्रावधान खास तौर पर देर रात सोशल मीडिया इस्तेमाल को कम करने की दिशा में अहम माना जा रहा है। अमेरिकी राज्यों की दलील रही है कि बच्चों की डिजिटल सुरक्षा के लिए प्लेटफॉर्म डिजाइन और इस्तेमाल की आदतों, दोनों पर ध्यान देना जरूरी है।
समझौते में स्कूल के समय को लेकर भी अलग प्रावधान रखा गया है। सुबह 8 बजे से दोपहर 3 बजे तक किशोरों के लिए अधिकांश पुश नोटिफिकेशन डिफॉल्ट तौर पर बंद रहेंगे।
हालांकि, सीधे संदेश और अकाउंट की सुरक्षा से जुड़े जरूरी अलर्ट इससे अलग रहेंगे।
मेटा के मुताबिक किशोरों को लगातार स्क्रीन टाइम के दौरान नियमित रिमाइंडर भी दिए जाएंगे। हर 15 मिनट के लगातार इस्तेमाल के बाद एक प्रॉम्प्ट दिखाया जाएगा। इसके अलावा कुल दैनिक इस्तेमाल 60 मिनट और 90 मिनट तक पहुंचने पर भी यूज़र को चेतावनी दी जाएगी।
मेटा के खिलाफ अमेरिका में कई राज्यों और अन्य पक्षों ने मुकदमे दायर किए थे। आरोपों में कहा गया था कि फेसबुक और इंस्टाग्राम के कुछ फीचर्स बच्चों और किशोरों को लगातार इस्तेमाल के लिए प्रेरित करते हैं और कंपनी ने प्लेटफॉर्म से जुड़े संभावित नुकसान के बारे में पर्याप्त कदम नहीं उठाए।
मुकदमों में बच्चों की मानसिक सेहत, ऑनलाइन सुरक्षा और निजी डेटा से जुड़े मुद्दे भी उठाए गए। रॉयटर्स के मुताबिक 29 राज्यों ने बच्चों के निजी डेटा और अभिभावकीय सहमति से जुड़े संघीय कानून के उल्लंघन के आरोप भी लगाए थे।
मेटा ने इन आरोपों से असहमति जताई थी। कंपनी ने समझौते के दौरान किसी गलत काम को स्वीकार नहीं किया। फिर भी समझौते के तहत उसे अपने प्लेटफॉर्म पर किशोरों के अनुभव में बड़े बदलाव लागू करने होंगे।
समझौते के तहत मेटा अगले 10 साल में 18 अरब डॉलर तक का भुगतान करेगी। रॉयटर्स के अनुसार 47 अमेरिकी राज्यों और कुछ अन्य अमेरिकी क्षेत्रों के लिए भुगतान करीब 16.7 अरब डॉलर तक हो सकता है। इसमें करीब 12.7 अरब डॉलर की राशि सुनिश्चित है, जबकि लगभग 5 अरब डॉलर अतिरिक्त भुगतान दूसरी बड़ी सोशल मीडिया कंपनियों द्वारा समान सुरक्षा उपाय अपनाने से जुड़ा है।
कैलिफोर्निया को करीब 2.2 अरब डॉलर और न्यूयॉर्क को करीब 1.1 अरब डॉलर मिलने की बात सामने आई है। कुछ राज्यों ने संकेत दिया है कि रकम का एक हिस्सा बच्चों की मानसिक सेहत से जुड़े कार्यक्रमों में इस्तेमाल किया जा सकता है।
इसके अलावा मेटा ने कैम्ब्रिज एनालिटिका मामले से जुड़े गोपनीयता दावों के निपटारे के लिए 459 मिलियन डॉलर देने पर भी सहमति जताई है।
समझौता व्यापक है, लेकिन इससे मेटा के पूरे बिजनेस मॉडल में बुनियादी बदलाव नहीं होगा। रॉयटर्स के मुताबिक समझौते में व्यक्तिगत पसंद के आधार पर दिखाए जाने वाले कंटेंट और लक्षित विज्ञापन को खत्म करने की शर्त नहीं है।
इसका मतलब यह है कि किशोरों के इस्तेमाल का समय और कुछ डिजिटल फीचर्स नियंत्रित किए जाएंगे, लेकिन प्लेटफॉर्म के मुख्य कारोबारी ढांचे में व्यापक परिवर्तन जरूरी नहीं होगा।
यही बिंदु इस समझौते को लेकर जारी बहस में अहम है। सुरक्षा उपाय बढ़ाए जा रहे हैं, लेकिन आलोचकों का सवाल है कि क्या केवल समय सीमा और पैरेंटल कंट्रोल से सोशल मीडिया के संभावित नुकसान की समस्या का पूरा समाधान होगा।
मेटा ने यह भी कहा है कि किशोरों की डिजिटल सुरक्षा केवल एक कंपनी के स्तर पर प्रभावी नहीं होगी। कंपनी ने टिकटॉक और यूट्यूब से समान सुरक्षा उपाय अपनाने की अपील की है।
मेटा का तर्क है कि अगर किसी एक प्लेटफॉर्म पर किशोरों के इस्तेमाल को सीमित किया जाता है, तो वे दूसरे प्लेटफॉर्म पर अपना समय बढ़ा सकते हैं। इसलिए कंपनी व्यापक इंडस्ट्री स्टैंडर्ड की पैरवी कर रही है।
समझौते में अतिरिक्त भुगतान का एक हिस्सा भी दूसरी कंपनियों द्वारा समान सुरक्षा उपाय अपनाने से जुड़ा है। इससे इस मामले का असर केवल मेटा तक सीमित रहने के बजाय पूरे सोशल मीडिया सेक्टर पर पड़ने की संभावना बढ़ गई है।
अमेरिका में हुए इस समझौते पर भारत में भी नज़र रखी जा रही है। भारत में बच्चों और किशोरों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को लेकर उम्र के आधार पर अलग-अलग प्रतिबंध, समय सीमा और अभिभावकीय सहमति जैसे विकल्पों पर नीति स्तर पर चर्चा होती रही है।
भारतीय संदर्भ में अमेरिकी मॉडल की अहमियत इसलिए बढ़ जाती है क्योंकि यहां भी सवाल केवल बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल का नहीं है। उम्र की पुष्टि, पैरेंटल कंट्रोल, निजी डेटा की सुरक्षा, कंटेंट मॉडरेशन और प्लेटफॉर्म की जवाबदेही जैसे मुद्दे साथ जुड़े हुए हैं।
हालांकि, अमेरिका में हुए समझौते को भारत में सीधे लागू व्यवस्था के तौर पर देखना सही नहीं होगा। दोनों देशों के कानून, नियामकीय ढांचे और डिजिटल बाजार की परिस्थितियां अलग हैं। भारत में किसी भी नई व्यवस्था के लिए अलग कानूनी और नीतिगत प्रक्रिया जरूरी होगी।
मेटा के लिए अब सबसे बड़ा सवाल इन नियमों को व्यवहार में लागू करने का है। उम्र की सही पहचान, पैरेंटल अनुमति की विश्वसनीयता, कई अकाउंट की निगरानी और किशोरों द्वारा नियमों से बचने की कोशिश जैसी चुनौतियां सामने रहेंगी।
अमेरिकी समझौते का व्यापक असर इस बात पर भी निर्भर करेगा कि टिकटॉक, यूट्यूब और दूसरी सोशल मीडिया कंपनियां समान सुरक्षा उपाय अपनाती हैं या नहीं। अगर ऐसा होता है तो किशोरों के लिए सोशल मीडिया के इस्तेमाल का नियमन एक व्यापक इंडस्ट्री स्टैंडर्ड की दिशा ले सकता है।
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि बच्चों और किशोरों की डिजिटल सुरक्षा को लेकर टेक कंपनियों पर नियामकीय दबाव बढ़ रहा है। मेटा का यह समझौता सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही, किशोरों के स्क्रीन टाइम और ऑनलाइन सुरक्षा की बहस में एक महत्वपूर्ण मोड़ है। आने वाले समय में इसकी असली परीक्षा नियमों की घोषणा से नहीं, बल्कि उनके अमल और वास्तविक असर से होगी।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।