विजय की डीलिमिटेशन बैठक से DMK-AIADMK ने बनाई दूरी
तमिलनाडु में डीलिमिटेशन पर सियासी टकराव, बैठक का बहिष्कार
विजय की सर्वदलीय बैठक को बड़ा झटका, प्रमुख दलों ने किया बॉयकॉट
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय की लोकसभा डीलिमिटेशन पर बुलाई गई बैठक से DMK और AIADMK समेत कई दलों ने दूरी बनाई। विपक्षी दलों की चिंता संभावित सीट पुनर्विन्यास और दक्षिणी राज्यों के प्रतिनिधित्व पर है। बैठक का उद्देश्य तमिलनाडु की साझा रणनीति तैयार करना था।
📍 Location: चेन्नई, तमिलनाडु
📰 Date: 8 अगस्त 2026
✍️ By Mohd Haris
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय की ओर से लोकसभा डीलिमिटेशन के मुद्दे पर बुलाई गई सर्वदलीय बैठक को राज्य की प्रमुख Dravidian पार्टियों का समर्थन नहीं मिला। DMK और AIADMK ने बैठक से दूरी बनाने का फैसला किया है। कुछ सहयोगी दलों ने भी इसमें शामिल नहीं होने की घोषणा की।
बैठक का मकसद प्रस्तावित delimitation exercise पर तमिलनाडु का साझा रुख तैयार करना था। लेकिन राजनीतिक दलों के बीच यह सवाल उभर गया कि बैठक किसके नेतृत्व में होनी चाहिए और इसका वास्तविक राजनीतिक उद्देश्य क्या है।
DMK और AIADMK दोनों ने बैठक से दूरी बनाई। यह फैसला तमिलनाडु की राजनीति में खास महत्व रखता है क्योंकि दोनों दल राज्य की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक ताकतों में शामिल हैं।
बैठक से प्रमुख दलों की अनुपस्थिति का मतलब है कि मुख्यमंत्री विजय की proposed consultation व्यापक all-party consensus में बदलने में कठिनाई का सामना कर रही है।
लोकसभा delimitation का मतलब चुनावी क्षेत्रों की सीमाओं और प्रतिनिधित्व का पुनर्निर्धारण है। इसके तहत आबादी और संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्विन्यास किया जाता है।
दक्षिणी राज्यों की मुख्य चिंता यह रही है कि population control में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों को भविष्य के परिसीमन में प्रतिनिधित्व के स्तर पर नुकसान हो सकता है। इसी वजह से तमिलनाडु इस मुद्दे पर लंबे समय से अधिक स्पष्ट राजनीतिक सुरक्षा की मांग करता रहा है।
विजय की Tamilaga Vettri Kazhagam सरकार ने इस मुद्दे पर व्यापक राजनीतिक संवाद की कोशिश की है। मुख्यमंत्री की तरफ से MPs और राजनीतिक दलों को बैठक में शामिल होने का निमंत्रण दिया गया था।
लेकिन DMK और AIADMK के बहिष्कार ने इस पहल को राजनीतिक रूप से कमजोर किया है।
अब सरकार के सामने चुनौती है कि वह consultation process को व्यापक कैसे बनाए।
DMK ने delimitation के मुद्दे पर केंद्र की संभावित प्रक्रिया को लेकर पहले भी कड़ा रुख अपनाया है। पार्टी का तर्क रहा है कि population-based representation में दक्षिणी राज्यों की राजनीतिक ताकत कम नहीं होनी चाहिए।
DMK के लिए यह केवल parliamentary seats का मसला नहीं है। यह fiscal transfers, federal representation और केंद्र-राज्य संबंधों से भी जुड़ा हुआ है।
AIADMK का boycott भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के साथ गठबंधन में रही है। इसके बावजूद delimitation जैसे मुद्दे पर Tamil Nadu-specific political concerns अलग प्राथमिकता ले सकते हैं।
यह दिखाता है कि राज्य की राजनीति में regional interests कई बार alliance politics से ऊपर आ जाते हैं।
बैठक में कुछ दलों और प्रतिनिधियों की मौजूदगी के बावजूद DMK और AIADMK की अनुपस्थिति बड़ा राजनीतिक संदेश देती है। लेकिन इसे पूरी तरह विफल कहना भी सही नहीं होगा।
सरकार बैठक में शामिल दलों के साथ consultation आगे बढ़ा सकती है। इसके बाद दूसरे चरण में absent parties से बातचीत का रास्ता भी खुल सकता है।
Delimitation debate में दक्षिणी राज्यों का मूल सवाल demographic performance से जुड़ा है। जिन राज्यों ने population growth को नियंत्रित किया, वे नहीं चाहते कि future representation में उन्हें इसका राजनीतिक नुकसान उठाना पड़े।
दूसरी तरफ, भारत का constitutional framework parliamentary representation को population principle से जोड़ता है। इसलिए debate में regional equity और constitutional representation दोनों पहलू शामिल हैं।
अगर delimitation पर राज्यों के बीच consensus नहीं बनता तो यह federal politics को प्रभावित कर सकता है। दक्षिणी राज्यों की साझा आवाज केंद्र पर राजनीतिक दबाव बढ़ा सकती है।
तमिलनाडु इस debate में नेतृत्वकारी भूमिका लेने की कोशिश कर रहा है। लेकिन राज्य के भीतर प्रमुख पार्टियों के बीच मतभेद इस रणनीति को कमजोर कर सकते हैं।
विजय की पार्टी के लिए delimitation ऐसा मुद्दा है जिससे वह governance और Tamil identity दोनों को राजनीतिक narrative से जोड़ सकती है।
DMK और AIADMK के लिए भी यह मुद्दा महत्वपूर्ण है, लेकिन दोनों दल नहीं चाहते कि consultation का राजनीतिक credit मुख्यमंत्री विजय को मिले। यही कारण बैठक के बहिष्कार की रणनीति के पीछे एक factor हो सकता है।
हालांकि यह राजनीतिक interpretation है, आधिकारिक तौर पर दलों की घोषित वजहों को प्राथमिकता देना जरूरी है।
अब नजर इस बात पर रहेगी कि विजय सरकार आगे किस तरह consultation process बढ़ाती है। क्या दूसरी बैठक बुलाई जाएगी या अलग-अलग दलों से bilateral talks होंगी, यह आगे की रणनीति तय करेगा।
Delimitation की राष्ट्रीय प्रक्रिया में भी कई संवैधानिक और राजनीतिक चरण होंगे। इसलिए राज्य स्तर की बैठक का फैसला अंतिम parliamentary delimitation तय नहीं करता।
तमिलनाडु में delimitation का मुद्दा अब केवल constitutional debate नहीं रहा। यह राज्य की electoral representation और federal politics का बड़ा राजनीतिक सवाल बन चुका है।
विजय सरकार ने सर्वदलीय संवाद की कोशिश की, लेकिन DMK और AIADMK के boycott ने consensus की राह मुश्किल कर दी।
अब असली चुनौती तमिलनाडु के लिए साझा रुख तैयार करने की है। इसके लिए राजनीतिक दलों को leadership और electoral calculation से आगे बढ़कर substantive constitutional मुद्दे पर सहमति तलाशनी होगी।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।