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पट्टिनपक्कम में नए सचिवालय पर मछुआरों का विरोध, 1200 करोड़ की परियोजना को लेकर महापंचायत का ऐलान
Wasi Siddiqui
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2026-09-15 13:24:48
चेन्नई के पट्टिनपक्कम में प्रस्तावित 1200 करोड़ रुपये के नए सचिवालय और विधानसभा परिसर के खिलाफ मछुआरा समुदाय लामबंद है। समुदाय ने आजीविका, समुद्र तक पहुंच और स्थानीय बस्तियों पर असर की आशंका जताई है।
📍 चेन्नई, तमिलनाडु
🗓️ 15 सितंबर 2026
✍️ Wasi Siddiqui
पट्टिनपक्कम में सचिवालय परियोजना पर बढ़ा विवाद
तमिलनाडु की सीएम विजय के नेतृत्व वाली सरकार का नया सचिवालय और विधानसभा परिसर बनाने का प्रस्ताव चेन्नई के पट्टिनपक्कम में विरोध का सामना कर रहा है। करीब 1200 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत वाली इस परियोजना को लेकर मछुआरा समुदाय ने अपनी आपत्तियां तेज कर दी हैं।
मछुआरा प्रतिनिधियों का कहना है कि प्रस्तावित परिसर से उनकी पारंपरिक आजीविका और समुद्र तक पहुंच प्रभावित होने का खतरा है। इसी वजह से स्थानीय स्तर पर बड़ी पंचायत और विरोध प्रदर्शन की तैयारी की बात सामने आई है।
1200 करोड़ रुपये की परियोजना क्या है
राज्य सरकार ने पट्टिनपक्कम के फोरशोर एस्टेट क्षेत्र में नया सचिवालय और विधानसभा परिसर विकसित करने की योजना बनाई है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार परियोजना की अनुमानित लागत करीब 1200 करोड़ रुपये है और प्रस्तावित परिसर में लगभग 20 लाख वर्ग फुट निर्मित क्षेत्र होगा।
परियोजना के लिए अलग-अलग प्रशासनिक गणनाओं में 25.55 एकड़ और लगभग 26.36 एकड़ जमीन का उल्लेख सामने आया है। एक विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार 25.16 एकड़ जमीन के मुख्य हिस्से के साथ करीब 1.2 एकड़ अतिरिक्त भूमि का भी उल्लेख किया गया है, जिसके राजस्व रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होने की बात कही गई है।
प्रस्तावित परिसर करीब 15 मंजिल का होने की जानकारी भी सामने आई है। सरकार की योजना मौजूदा प्रशासनिक ढांचे को एक आधुनिक और केंद्रीकृत परिसर में समेटने की बताई गई है।
मछुआरा समुदाय की मुख्य आपत्ति क्या है
पट्टिनपक्कम और आसपास के मछुआरा समुदाय का मुख्य सवाल जमीन और आजीविका से जुड़ा है। स्थानीय प्रतिनिधियों के अनुसार प्रस्तावित क्षेत्र का इस्तेमाल लंबे समय से मछुआरा समुदाय की सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों से जुड़ा रहा है।
समुदाय को आशंका है कि बड़े प्रशासनिक परिसर के निर्माण से समुद्र तक पहुंच, मछली पकड़ने से जुड़ी गतिविधियों और स्थानीय आवागमन पर असर पड़ेगा। लूप रोड और समुद्र के बीच आने-जाने को लेकर भी स्थानीय स्तर पर चिंता जताई गई है।
कुछ रिपोर्टों में 9 मछुआरा गांवों के प्रभावित होने की आशंका का उल्लेख है। दूसरी तरफ कुछ रिपोर्टें 12 मछुआरा बस्तियों या हमलेट्स की बात करती हैं। इसलिए फिलहाल यह कहना सही नहीं होगा कि परियोजना से निश्चित तौर पर 9 गांव उजड़ेंगे। यह संख्या विरोध कर रहे समुदाय की आशंकाओं और अलग-अलग रिपोर्टों में दिए गए स्थानीय दायरे से जुड़ी है।
1500 से अधिक परिवारों की चिंता का दावा
मछुआरा समुदाय से जुड़े एक स्थानीय प्रतिनिधि ने दावा किया है कि परियोजना आगे बढ़ने की स्थिति में 1500 से अधिक मछुआरा परिवार प्रभावित हो सकते हैं। समुदाय की ओर से यह भी कहा गया है कि प्रस्तावित जमीन को लेकर उनकी लंबे समय से अलग मांग रही है।
यह आंकड़ा समुदाय के प्रतिनिधि का दावा है। इसे सरकारी स्तर पर अंतिम प्रभावित परिवारों की संख्या के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। परियोजना की विस्तृत भूमि सीमा, पुनर्वास और प्रभावित परिवारों को लेकर अंतिम प्रशासनिक प्रक्रिया की तस्वीर अभी अलग चरणों में है।
सिर्फ मछुआरे ही नहीं, यातायात भी बड़ा सवाल
परियोजना को लेकर विवाद केवल मछुआरा आजीविका तक सीमित नहीं है। पट्टिनपक्कम में यातायात और जगह की उपलब्धता को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
प्रस्तावित परिसर के आसपास कई स्कूल, कॉलेज और धार्मिक संस्थान मौजूद हैं। स्थानीय लोगों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने आशंका जताई है कि सचिवालय और विधानसभा परिसर के कारण सरकारी अधिकारियों, कर्मचारियों, जनप्रतिनिधियों और आम लोगों की आवाजाही बढ़ेगी, जिससे पहले से दबाव झेल रहे मार्गों पर यातायात संकट गहरा सकता है।
इसी दबाव को देखते हुए सरकार ने लाइटहाउस से तिरु वी का पुल तक करीब 3.5 किलोमीटर लंबे एलिवेटेड कॉरिडोर की योजना पर भी काम शुरू करने की दिशा में कदम उठाए हैं। इसका अंतिम मार्ग विस्तृत अध्ययन के बाद तय होना है।
तटीय पर्यावरण को लेकर भी सवाल
पट्टिनपक्कम का प्रस्तावित क्षेत्र समुद्र और अड्यार मुहाने के करीब स्थित है। इसलिए परियोजना को लेकर तटीय पर्यावरण और सार्वजनिक समुद्री पहुंच का सवाल भी उठाया गया है।
पर्यावरण कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों ने परियोजना के आकार तथा समुद्र से इसकी निकटता को देखते हुए पर्यावरणीय प्रभाव, तटीय नियमन और भविष्य में जलवायु संबंधी जोखिमों पर सवाल उठाए हैं।
इन आपत्तियों का अंतिम आकलन संबंधित वैधानिक मंजूरियों और विस्तृत परियोजना दस्तावेजों की प्रक्रिया से जुड़ा होगा। अभी उपलब्ध रिपोर्टों के आधार पर यह कहना जल्दबाजी होगी कि परियोजना निश्चित रूप से किसी पर्यावरणीय नियम का उल्लंघन करती है।
सरकार की ओर से परियोजना के पीछे क्या तर्क है
सरकार की तरफ से नए सचिवालय की जरूरत को प्रशासनिक बुनियादी ढांचे से जोड़ा गया है। प्रस्तावित परिसर में सचिवालय और विधानसभा से जुड़े कामकाज को आधुनिक सुविधाओं के साथ एकीकृत करने की योजना बताई गई है।
उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार सरकार ने पट्टिनपक्कम को सरकारी भूमि की उपलब्धता और परियोजना को आगे बढ़ाने की प्रशासनिक सुविधा जैसे कारणों से उपयुक्त माना है। संबंधित विभागों और संस्थाओं से भूमि के इस्तेमाल को लेकर मंजूरी की प्रक्रिया भी आगे बढ़ी है।
सरकार के लिए चुनौती यह होगी कि प्रशासनिक जरूरत और स्थानीय समुदाय के अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाता है।
राजनीतिक विरोध भी तेज
परियोजना पर राजनीतिक विरोध भी सामने आया है। भारतीय जनता पार्टी, अन्नाद्रमुक और कुछ अन्य राजनीतिक नेताओं ने परियोजना के स्थान और लागत पर सवाल उठाए हैं।
विरोध करने वाले नेताओं ने मछुआरा आजीविका, यातायात, तटीय पर्यावरण और राज्य की वित्तीय स्थिति से जुड़े मुद्दे उठाए हैं। कुछ नेताओं ने वैकल्पिक स्थान पर परियोजना विकसित करने की मांग की है।
नाम तमिलर काची के नेता सीमान ने भी परियोजना का विरोध किया है और मछुआरा समुदाय के समर्थन में बड़े आंदोलन की चेतावनी दी है।
क्या 9 गांवों का विस्थापन तय है
फिलहाल इसका जवाब नहीं है।
यह दावा विरोध कर रहे मछुआरा समुदाय की चिंता के रूप में सामने आया है। उपलब्ध आधिकारिक परियोजना विवरणों में 9 गांवों को विस्थापित करने का कोई अंतिम आदेश स्थापित नहीं होता।
यही वजह है कि इस मामले में विस्थापन और पुनर्वास को लेकर अंतिम स्थिति तभी स्पष्ट होगी, जब परियोजना की भूमि सीमा, निर्माण योजना, पहुंच मार्ग और प्रभावित आबादी का आधिकारिक आकलन सामने आएगा।
पहले भी सामने आ चुका है वैकल्पिक इस्तेमाल का प्रस्ताव
पट्टिनपक्कम की इसी भूमि को लेकर पहले भी सरकारी योजना सामने आ चुकी है। वर्ष 2021 में तत्कालीन सरकार ने करीब 25 एकड़ क्षेत्र में मरीना बिजनेस सेंटर विकसित करने का प्रस्ताव रखा था।
वह योजना आगे नहीं बढ़ सकी। जमीन से जुड़े निवासियों के निष्कासन और अदालत में लंबित मामलों के कारण परियोजना अटक गई थी। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार इस वर्ष मई में मद्रास उच्च न्यायालय से जुड़े कई मामले निपटाए गए और प्रभावित किरायेदारों के लिए वैकल्पिक आवास से जुड़ी व्यवस्था का उल्लेख सामने आया।
अब उसी क्षेत्र में सचिवालय और विधानसभा परिसर की योजना ने भूमि और स्थानीय अधिकारों से जुड़ी बहस को फिर सामने ला दिया है।
आगे क्या होगा
परियोजना अभी विरोध, प्रशासनिक तैयारी और विस्तृत योजना के बीच के चरण में है। सरकार ने वास्तु सलाहकार के चयन और भवन की प्रारंभिक तथा अंतिम डिजाइन से जुड़ी समितियों के गठन की दिशा में कदम उठाए हैं।
आने वाले चरण में विस्तृत परियोजना रिपोर्ट, यातायात व्यवस्था, तटीय पर्यावरण से जुड़े आकलन और निर्माण की प्रशासनिक प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी।
मछुआरा समुदाय की मांग है कि किसी भी अंतिम फैसले से पहले उनके साथ प्रभावी संवाद किया जाए और उनके पारंपरिक आजीविका अधिकारों को ध्यान में रखा जाए।
असली चुनौती संवाद की है
पट्टिनपक्कम विवाद को केवल एक निर्माण परियोजना बनाम विरोध के तौर पर देखना पर्याप्त नहीं होगा। मामला सरकारी बुनियादी ढांचे, सार्वजनिक भूमि, तटीय पर्यावरण, शहरी यातायात और मछुआरा समुदाय की आजीविका से जुड़ा है।
सरकार के सामने प्रशासनिक परिसर बनाने की जरूरत का तर्क है। दूसरी तरफ स्थानीय समुदाय अपने रोजमर्रा के आर्थिक जीवन और समुद्र तक पहुंच को लेकर आशंकित है।
इस विवाद का टिकाऊ रास्ता पारदर्शी भूमि रिकॉर्ड, स्वतंत्र प्रभाव आकलन, स्पष्ट पुनर्वास नीति और प्रभावित समुदाय के साथ वास्तविक परामर्श से निकलेगा। जब तक ये पहलू सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं होते, 9 गांवों के निश्चित विस्थापन जैसे दावे को स्थापित तथ्य मानना उचित नहीं होगा।
पट्टिनपक्कम में अब नजर इस बात पर रहेगी कि सरकार परियोजना को मौजूदा स्थल पर आगे बढ़ाती है, वैकल्पिक स्थान पर विचार करती है या स्थानीय आपत्तियों के बाद योजना में बदलाव करती है। आने वाले प्रशासनिक फैसले ही यह तय करेंगे कि 1200 करोड़ रुपये की यह परियोजना किस दिशा में जाती है और इसके सामाजिक तथा पर्यावरणीय असर को किस तरह संबोधित किया जाता है।
Wasi Siddiqui
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक,
अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।