भारत में क्या कोई राज्य अपनी अलग पहचान के लिए आधिकारिक झंडा अपना सकता है? क्या उस झंडे को राष्ट्रीय तिरंगे के साथ फहराने की इजाज़त है? केंद्र सरकार के संसदीय जवाब और भारतीय ध्वज संहिता इन सवालों पर अहम कानूनी स्थिति स्पष्ट करते हैं।
📍 नई दिल्ली, भारत
🗓️ 2 नवंबर 2026
✍️ Wasi Siddiqui
भारत की संघीय व्यवस्था में राज्यों की अपनी निर्वाचित सरकारें, विधानसभाएं, सांस्कृतिक पहचान और प्रशासनिक संस्थाएं हैं। लेकिन जब बात किसी राज्य के अलग आधिकारिक झंडे की होती है, तो संवैधानिक अधिकार और राष्ट्रीय प्रतीकों की मर्यादा का सवाल सामने आता है।
सबसे अहम तथ्य यह है कि भारतीय संविधान में किसी राज्य के लिए अलग झंडे का स्पष्ट प्रावधान नहीं है। साथ ही, संविधान में ऐसा कोई सामान्य प्रावधान भी नहीं मिलता जो हर तरह के राज्य ध्वज को सीधे प्रतिबंधित करता हो।
इसका अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक राज्य को बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के अलग आधिकारिक झंडा अपनाने का निर्विवाद संवैधानिक अधिकार मिल गया है।
राज्य ध्वज को आधिकारिक मान्यता देने, सरकारी संस्थानों पर इस्तेमाल करने और राष्ट्रीय ध्वज के साथ प्रदर्शित करने के सवाल अलग-अलग कानूनी परीक्षण की मांग करते हैं।
2 जनवरी 2018 को लोकसभा में दिए गए लिखित जवाब में तत्कालीन केंद्रीय गृह राज्य मंत्री किरेन रिजिजू ने स्पष्ट किया था कि संविधान के अनुच्छेद 51ए(ए) के तहत प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान करना है।
सरकार ने यह भी कहा था कि संविधान में राज्यों के अलग झंडे का कोई उल्लेख नहीं है।
इसके बाद 10 दिसंबर 2019 को लोकसभा में अलग राज्य ध्वज से जुड़े सवालों के जवाब में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने भी यही संवैधानिक स्थिति दोहराई।
इन जवाबों से स्पष्ट होता है कि केंद्र सरकार ने राज्य ध्वज को लेकर संविधान में किसी विशिष्ट व्यवस्था का हवाला नहीं दिया था। हालांकि, इन संसदीय जवाबों को सभी परिस्थितियों में राज्य ध्वज की वैधता या अवैधता पर अंतिम न्यायिक फ़ैसला नहीं माना जाना चाहिए।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 51ए(ए) नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों से संबंधित है।
इसके मुताबिक प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह संविधान का पालन करे तथा उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगान का सम्मान करे।
यह प्रावधान राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान को संवैधानिक महत्व देता है। लेकिन राज्य के अलग झंडे की स्थापना के लिए कोई स्वतंत्र प्रक्रिया निर्धारित नहीं करता।
इसलिए किसी राज्य के अलग ध्वज पर बहस करते समय केवल मौलिक कर्तव्यों का हवाला देना पर्याप्त नहीं है। ध्वज संहिता, संबंधित क़ानून और राज्य की प्रशासनिक शक्तियों को भी देखना ज़रूरी है।
इस सवाल का जवाब भारतीय ध्वज संहिता 2002 में मिलता है।
ध्वज संहिता के अनुसार राष्ट्रीय तिरंगे को सम्मानजनक और विशिष्ट स्थान दिया जाना चाहिए।
राष्ट्रीय ध्वज के प्रदर्शन से जुड़े प्रमुख नियम इस प्रकार हैं:
राष्ट्रीय ध्वज के साथ उसी ध्वजदंड के शीर्ष से दूसरा झंडा नहीं फहराया जाना चाहिए।
किसी दूसरे झंडे को राष्ट्रीय ध्वज से ऊपर नहीं रखा जा सकता।
राष्ट्रीय ध्वज के बराबर या उसके साथ प्रदर्शन के मामले में ध्वज संहिता के विशिष्ट नियमों का पालन ज़रूरी है।
क्षतिग्रस्त या अस्त-व्यस्त राष्ट्रीय ध्वज का प्रदर्शन नहीं होना चाहिए।
तिरंगे को उल्टा फहराना या ज़मीन से छूने देना नियमों के ख़िलाफ़ है।
यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर समझना ज़रूरी है। अलग ध्वजदंड होने भर से किसी भी राज्य ध्वज को तिरंगे के बराबर आधिकारिक दर्जा नहीं मिल जाता।
ध्वज संहिता में दूसरे देशों और संयुक्त राष्ट्र के ध्वजों के साथ राष्ट्रीय ध्वज के प्रदर्शन के लिए विशेष व्यवस्थाएं भी हैं। इसलिए दूसरे झंडे के साथ तिरंगे को फहराने की वैधता का आकलन संबंधित परिस्थितियों और लागू प्रावधानों के आधार पर किया जाना चाहिए।
कर्नाटक में अलग राज्य ध्वज की मांग लंबे समय से क्षेत्रीय पहचान और कन्नड़ अस्मिता से जुड़ी रही है।
राज्य में लाल और पीले रंग का ध्वज कन्नड़ सांस्कृतिक पहचान के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल होता रहा है।
2017 में तत्कालीन राज्य सरकार ने अलग आधिकारिक ध्वज के प्रस्ताव पर विचार के लिए एक समिति गठित करने की पहल की थी।
2018 में प्रस्तावित राज्य ध्वज को लेकर राजनीतिक और संवैधानिक बहस तेज़ हुई।
हालांकि, किसी सांस्कृतिक झंडे का व्यापक इस्तेमाल और उसे आधिकारिक राज्य ध्वज के रूप में कानूनी मान्यता मिलना दो अलग विषय हैं।
कर्नाटक के उदाहरण से यह भी स्पष्ट होता है कि राज्य की क्षेत्रीय पहचान के प्रतीक को सरकारी ध्वज का दर्जा देने का सवाल केवल रंग या डिज़ाइन तक सीमित नहीं है।
जम्मू-कश्मीर का मामला ऐतिहासिक और संवैधानिक रूप से अलग रहा है।
पूर्ववर्ती जम्मू-कश्मीर राज्य का अपना संविधान और आधिकारिक राज्य ध्वज था। उस ध्वज में लाल पृष्ठभूमि, हल का प्रतीक और 3 सफेद धारियां शामिल थीं।
जम्मू-कश्मीर के संविधान के अनुच्छेद 144 में राज्य ध्वज का प्रावधान किया गया था।
2015 में जम्मू-कश्मीर के सामान्य प्रशासन विभाग ने राज्य ध्वज को सरकारी संस्थानों पर फहराने के संबंध में निर्देश भी जारी किए थे।
लेकिन 2019 में जम्मू-कश्मीर की संवैधानिक और प्रशासनिक व्यवस्था में बड़ा बदलाव हुआ।
5 अगस्त 2019 को केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 से संबंधित संवैधानिक बदलावों की प्रक्रिया शुरू की। इसके बाद जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 के तहत 31 अक्टूबर 2019 से पूर्ववर्ती राज्य का पुनर्गठन जम्मू-कश्मीर और लद्दाख नामक 2 केंद्रशासित प्रदेशों में हुआ।
इन बदलावों के बाद पूर्ववर्ती जम्मू-कश्मीर संविधान के तहत राज्य ध्वज की आधिकारिक व्यवस्था समाप्त हो गई।
इसलिए जम्मू-कश्मीर के पुराने ध्वज का उदाहरण आज के दूसरे राज्यों के लिए अपने आप समान संवैधानिक अधिकार स्थापित नहीं करता।
भारत का राष्ट्रीय तिरंगा संपूर्ण देश का राष्ट्रीय प्रतीक है।
किसी राज्य का प्रस्तावित या सांस्कृतिक ध्वज उसकी क्षेत्रीय पहचान का प्रतीक हो सकता है, लेकिन उससे राष्ट्रीय ध्वज जैसी संवैधानिक और कानूनी स्थिति स्वतः हासिल नहीं होती।
भारत की संघीय व्यवस्था में राज्यों को प्रशासनिक और विधायी शक्तियां प्राप्त हैं। हालांकि, इन शक्तियों का इस्तेमाल संविधान और लागू केंद्रीय क़ानूनों के अनुरूप होना चाहिए।
राज्य ध्वज के पक्ष में क्षेत्रीय अस्मिता और सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व की दलील दी जाती है। दूसरी ओर, राष्ट्रीय प्रतीकों की एकरूपता और संवैधानिक व्यवस्था को लेकर सवाल उठते हैं।
इन दोनों पहलुओं पर बहस संभव है, लेकिन किसी राज्य ध्वज की कानूनी स्थिति तय करने के लिए स्पष्ट विधिक आधार आवश्यक है।
राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम 1971 के तहत राष्ट्रीय ध्वज के प्रति कुछ प्रकार के जानबूझकर किए गए सार्वजनिक अपमान को दंडनीय अपराध बनाया गया है।
अधिनियम की धारा 2 के अंतर्गत निर्धारित अपराध के लिए 3 वर्ष तक की कैद, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है।
हालांकि, ध्वज संहिता के किसी निर्देश का उल्लंघन और अधिनियम के तहत आपराधिक अपराध एक ही बात नहीं हैं।
हर तकनीकी त्रुटि को अपने आप आपराधिक अपमान नहीं माना जा सकता। आपराधिक जवाबदेही संबंधित अधिनियम के तत्वों और मामले के तथ्यों पर निर्भर करेगी।
राज्य सरकार किसी प्रस्तावित ध्वज के डिज़ाइन या उसके इस्तेमाल को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर पहल कर सकती है।
लेकिन विधानसभा में प्रस्ताव पारित होना और किसी झंडे को निर्विवाद संवैधानिक मान्यता मिलना अलग-अलग बातें हैं।
ऐसी पहल की वैधता इस बात पर निर्भर करेगी कि राज्य ने किस कानूनी शक्ति का इस्तेमाल किया है, प्रस्ताव का उद्देश्य क्या है और उसका राष्ट्रीय ध्वज से संबंधित केंद्रीय नियमों पर क्या प्रभाव पड़ता है।
इस विषय में सभी राज्यों पर समान रूप से लागू होने वाली स्पष्ट संवैधानिक अनुमति का दावा करना उचित नहीं होगा।
भारतीय ध्वज संहिता के मुताबिक आम नागरिक, निजी संस्थाएं और शैक्षणिक संस्थान राष्ट्रीय ध्वज की गरिमा का सम्मान करते हुए उसे प्रदर्शित कर सकते हैं।
2022 में किए गए संशोधन के बाद घरों और खुले स्थानों पर राष्ट्रीय ध्वज को दिन और रात फहराने की अनुमति दी गई।
लेकिन राष्ट्रीय ध्वज को सम्मानजनक स्थान देना, उसे क्षतिग्रस्त अवस्था में प्रदर्शित न करना और उसके अनुचित इस्तेमाल से बचना अब भी आवश्यक है।
भारत में अलग राज्य ध्वज का सवाल पूरी तरह निषिद्ध या बिना शर्त अनुमत जैसी 2 श्रेणियों में नहीं समेटा जा सकता।
संविधान में राज्य ध्वज का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। केंद्र सरकार भी संसद में यह स्थिति बता चुकी है।
दूसरी ओर, राष्ट्रीय ध्वज की गरिमा और उसके प्रदर्शन के लिए स्पष्ट कानूनी प्रावधान मौजूद हैं।
इसलिए किसी राज्य की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक और कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त आधिकारिक राज्य ध्वज, दोनों में अंतर समझना ज़रूरी है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी भी राज्य का ध्वज राष्ट्रीय तिरंगे की कानूनी और संवैधानिक गरिमा को कम नहीं कर सकता।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।