जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस के 25 विधायकों की कथित नाराज़गी से सियासी हलचल है। 14 दिन के अल्टीमेटम का दावा सामने आया है।
श्रीनगर | 2 नवंबर 2026
By Mohd Haris
जम्मू-कश्मीर में उमर अब्दुल्ला सरकार के सामने नई सियासी चुनौती
जम्मू-कश्मीर की सियासत में एक बार फिर हलचल तेज़ हो गई है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की अगुवाई वाली सरकार के भीतर असंतोष की ख़बरों ने नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेतृत्व को लेकर नई बहस छेड़ दी है। 1 और 2 नवंबर को सामने आई रिपोर्टों में दावा किया गया है कि सत्तारूढ़ नेशनल कॉन्फ्रेंस के लगभग 25 विधायक सरकार के कामकाज और हालिया कैबिनेट विस्तार से नाराज़ हैं। सूत्रों के हवाले से प्रकाशित ख़बरों के मुताबिक, असंतुष्ट विधायकों ने पार्टी नेतृत्व को अपनी मांगें पूरी करने के लिए 14 दिन का वक़्त दिया है। ऐसा नहीं होने पर राजभवन जाकर सरकार से समर्थन वापस लेने की चेतावनी देने का दावा किया गया है।
कैबिनेट विस्तार के बाद क्यों बढ़ी नाराज़गी?
रिपोर्टों के मुताबिक, हालिया मंत्रिमंडल विस्तार ने पार्टी के भीतर असंतोष को हवा दी है।
27 अक्टूबर को हुए कैबिनेट विस्तार में अली मोहम्मद सागर, मीर सैफुल्लाह, शमीमा फिरदौस और अल्ताफ अहमद वानी को मंत्रिपरिषद में शामिल किया गया था।
इसके बाद कुछ विधायकों की नाराज़गी की ख़बरें सामने आईं। कथित असंतुष्ट समूह मौजूदा मंत्रियों के विभागों में व्यापक बदलाव और मुख्यमंत्री के सलाहकार को हटाने की मांग कर रहा है। रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि विधायकों का एक वर्ग सरकार के अहम फ़ैसलों में अधिक मशविरा और पारदर्शिता चाहता है। हालांकि, इन मांगों को लेकर संबंधित विधायकों के हस्ताक्षर वाला प्रमाणित दस्तावेज़ सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है।
अनुच्छेद 370 और 35ए भी विवाद के केंद्र में
नेशनल कॉन्फ्रेंस के भीतर कथित असंतोष केवल मंत्री पदों तक सीमित नहीं बताया जा रहा है।
रिपोर्टों के मुताबिक, नाराज़ विधायकों का एक प्रमुख मुद्दा जम्मू-कश्मीर की संवैधानिक स्थिति और पार्टी के चुनावी वादों से जुड़ा है।
कथित असंतुष्ट समूह चाहता है कि पार्टी अनुच्छेद 370, अनुच्छेद 35ए और राज्य के पूर्ण दर्जे की बहाली से मुताल्लिक़ अपने राजनीतिक रुख़ को अधिक स्पष्टता और मज़बूती के साथ सामने रखे। यह मुद्दा इसलिए भी अहम है क्योंकि जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे में अगस्त 2019 में हुए बदलाव के बाद से संवैधानिक अधिकारों और पूर्ण राज्य के दर्जे की बहाली पर राजनीतिक बहस जारी है।
आगा सैयद रुहुल्लाह मेहदी के रुख़ से भी बढ़ा दबाव
इसी सियासी माहौल में श्रीनगर से लोकसभा सांसद आगा सैयद रुहुल्लाह मेहदी का रुख़ भी चर्चा में है।
प्रकाशित रिपोर्टों के मुताबिक, रुहुल्लाह मेहदी ने पार्टी की नीतियों और संवैधानिक मुद्दों पर उसके रुख़ को लेकर असहमति जताई है।
रिपोर्टों में उनके 3 नवंबर को पार्टी और लोकसभा सदस्यता से इस्तीफ़ा देने की चेतावनी का भी ज़िक्र है।
फिलहाल यह भविष्य की संभावित कार्रवाई है। इसे वास्तविक इस्तीफ़े या स्वीकार हो चुके त्यागपत्र के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।
जम्मू-कश्मीर विधानसभा की 90 निर्वाचित सीटों में सामान्य परिस्थितियों में सरकार बनाने के लिए 46 विधायकों का समर्थन ज़रूरी होता है।
2024 के विधानसभा चुनाव में नेशनल कॉन्फ्रेंस ने 42 सीटें जीती थीं। मौजूदा सदन की सदस्य संख्या और सरकार को प्राप्त समर्थन की स्थिति का आकलन अलग से ज़रूरी है।
अगर बड़ी संख्या में सत्तारूढ़ दल के विधायक नेतृत्व से अलग होते हैं, तो सरकार के सामने गंभीर राजनीतिक चुनौती खड़ी हो सकती है।
लेकिन यहां एक अहम संवैधानिक पहलू भी है।
पार्टी के विधायकों का केवल असहमति जताना या समर्थन वापस लेने की चेतावनी देना अपने आप सरकार गिरने के बराबर नहीं है।
दलबदल विरोधी प्रावधान, विधानसभा में मतदान, पार्टी व्हिप और बहुमत परीक्षण जैसी प्रक्रियाएं भी निर्णायक भूमिका निभाती हैं।
इसलिए 25 विधायकों की कथित नाराज़गी के आधार पर सरकार के अल्पमत में आने या तत्काल गिरने का निष्कर्ष निकालना जल्दबाज़ी होगी।
बगावत की ख़बरों पर पार्टी के भीतर अलग-अलग रुख़
इस पूरे मामले का दूसरा पहलू भी सामने आया है।
2 नवंबर की रिपोर्टों के मुताबिक, नेशनल कॉन्फ्रेंस के विधायक हिलाल अकबर लोन ने बगावत की ख़बरों को ग़लत बताया है।
उनके हवाले से कहा गया है कि विधायकों की बैठक को कुछ लोग अलग सियासी रंग देने की कोशिश कर रहे हैं। बैठक में शामिल होने का मतलब पार्टी या नेतृत्व से अलग होना नहीं है। यह प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे स्पष्ट होता है कि कथित बगावत को लेकर पार्टी के भीतर सभी नेताओं का एक जैसा सार्वजनिक रुख़ सामने नहीं आया है।
अगले 14 दिन क्यों अहम बताए जा रहे हैं?
सूत्रों पर आधारित रिपोर्टों के मुताबिक, कथित असंतुष्ट समूह पार्टी नेतृत्व से अपनी मांगों पर जवाब चाहता है।
आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि क्या नेशनल कॉन्फ्रेंस का नेतृत्व विधायकों के साथ औपचारिक बातचीत करता है और क्या कैबिनेट से जुड़े फ़ैसलों पर पुनर्विचार होता है।
इसके अलावा, अनुच्छेद 370, पूर्ण राज्य के दर्जे और पार्टी के चुनावी वादों को लेकर नेतृत्व का सार्वजनिक रुख़ भी सियासी चर्चा के केंद्र में रहेगा।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।