जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने स्टेटहुड बहाली तक आंदोलन जारी रखने की बात कही। आर्टिकल 370 हटने के बाद यह मुद्दा फिर से सियासी केंद्र में है।
📍 श्रीनगर
📰 6 अगस्त 2026
✍️ By Mohd Haris
जम्मू-कश्मीर में स्टेटहुड बहाली का मसला एक बार फिर सियासी बहस के केंद्र में आ गया है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने साफ कहा है कि जब तक राज्य का दर्जा बहाल नहीं होता, उनका सियासी संघर्ष जारी रहेगा। यह बयान ऐसे समय आया है जब आर्टिकल 370 हटने के सात साल पूरे हो चुके हैं और क्षेत्र में राजनीतिक ध्रुवीकरण फिर तेज दिख रहा है।
उमर अब्दुल्ला का कहना है कि स्टेटहुड कोई सियासी रियायत नहीं, बल्कि जनता का हक है। उनका दावा है कि केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट और संसद के सामने स्टेटहुड बहाली का वादा किया था, जिसे अब तक पूरा नहीं किया गया।
अगस्त 2019 में केंद्र सरकार ने आर्टिकल 370 और 35A को खत्म कर जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त कर दिया था। इसके साथ ही राज्य को दो यूनियन टेरिटरी में विभाजित किया गया। इस फैसले को केंद्र ने राष्ट्रीय एकीकरण और विकास की दिशा में कदम बताया, जबकि क्षेत्रीय दलों ने इसे लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन कहा।
उमर अब्दुल्ला और उनकी पार्टी ने लगातार इस फैसले का विरोध किया है। उनका तर्क है कि स्टेटहुड के बिना लोकतांत्रिक ढांचा अधूरा है और प्रशासनिक फैसलों में स्थानीय भागीदारी सीमित हो जाती है।
2019 में आर्टिकल 370 हटने के बाद से स्टेटहुड बहाली की मांग लगातार उठती रही। पहले चरण में राजनीतिक गतिविधियां सीमित रहीं। बाद में चुनाव हुए और क्षेत्र में चुनी हुई सरकार बनी।
इसके बावजूद स्टेटहुड बहाली पर कोई स्पष्ट टाइमलाइन सामने नहीं आई। उमर अब्दुल्ला ने कई बार कहा कि “उचित समय” जैसी शब्दावली अस्पष्ट है और इससे अनिश्चितता बढ़ती है।
हाल के महीनों में नेशनल कॉन्फ्रेंस ने दिल्ली तक विरोध प्रदर्शन किए। पार्टी ने कहा कि अब इंतजार की सीमा खत्म हो चुकी है और केंद्र को स्पष्ट निर्णय लेना होगा।
स्टेटहुड बहाली का सवाल सिर्फ प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और संवैधानिक है। राज्य का दर्जा मिलने पर कानून व्यवस्था, भूमि और प्रशासनिक अधिकारों पर स्थानीय सरकार का नियंत्रण बढ़ेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि इससे लोकतांत्रिक जवाबदेही मजबूत हो सकती है। वहीं आलोचकों का तर्क है कि सुरक्षा हालात को देखते हुए केंद्र का नियंत्रण जरूरी है।
नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी जैसे क्षेत्रीय दल स्टेटहुड बहाली की मांग को लोकतांत्रिक अधिकार से जोड़ते हैं। उनका कहना है कि बिना राज्य का दर्जा दिए राजनीतिक प्रक्रिया अधूरी है।
दूसरी तरफ भाजपा इस फैसले को ऐतिहासिक सुधार बताती है। पार्टी का दावा है कि इससे विकास और सुरक्षा बेहतर हुई है।
कुछ विश्लेषकों का कहना है कि स्टेटहुड बहाली का फैसला पूरी तरह राजनीतिक समय और सुरक्षा स्थिति पर निर्भर करेगा।
जम्मू-कश्मीर में आम नागरिकों के लिए यह मुद्दा प्रशासनिक दक्षता और रोजमर्रा के फैसलों से जुड़ा है। कई स्थानीय आवाजें कहती हैं कि यूनियन टेरिटरी मॉडल में निर्णय प्रक्रिया धीमी हो गई है।
हालांकि सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि केंद्र के सीधे नियंत्रण से आतंकवाद पर बेहतर निगरानी संभव हुई है।
यह मुद्दा आने वाले चुनावों में बड़ा फैक्टर बन सकता है। नेशनल कॉन्फ्रेंस इसे मुख्य चुनावी एजेंडा बना रही है।
उमर अब्दुल्ला ने केंद्र पर आरोप लगाया है कि देरी सियासी कारणों से हो रही है। उनका कहना है कि जनता को सजा दी जा रही है क्योंकि उसने अलग राजनीतिक विकल्प चुना।
स्टेटहुड का सीधा असर निवेश, रोजगार और प्रशासनिक फैसलों पर पड़ सकता है। राज्य सरकार के पास अधिक अधिकार होने से स्थानीय परियोजनाओं को तेजी मिल सकती है।
वहीं केंद्र का तर्क है कि मौजूदा ढांचे में भी इंफ्रास्ट्रक्चर और निवेश में सुधार हुआ है।
जम्मू-कश्मीर का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी संवेदनशील रहा है। भारत इसे आंतरिक मामला बताता है, जबकि कुछ अंतरराष्ट्रीय संगठन लोकतांत्रिक अधिकारों और प्रशासनिक ढांचे पर सवाल उठाते रहे हैं।
विश्लेषकों के अनुसार स्टेटहुड बहाली का फैसला जल्दबाजी में नहीं होगा। केंद्र सरकार “उचित समय” की नीति पर कायम है।
उमर अब्दुल्ला और उनकी पार्टी आंदोलन को तेज करने के संकेत दे चुके हैं। इससे आने वाले महीनों में सियासी टकराव और बढ़ सकता है।
जम्मू-कश्मीर स्टेटहुड विवाद अब सिर्फ एक प्रशासनिक बहस नहीं रहा। यह लोकतंत्र, संवैधानिक अधिकार और सियासी भरोसे का मुद्दा बन चुका है।
जब तक केंद्र स्पष्ट रोडमैप नहीं देता, यह विवाद भारतीय सियासत में बना रहेगा और क्षेत्रीय राजनीति को प्रभावित करता रहेगा।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।