डिजिटल गिरफ्तारी” नाम का साइबर फ्रॉड तेजी से बढ़ रहा है। एडिटोरियल में इसे गैरकानूनी और खतरनाक बताया गया है, जिसमें लोग डर और फर्जी अधिकार के जरिए ठगे जा रहे हैं।
📍 Location: India
📰 Date: 07 August 2026
✍️ By Mohd Haris
“डिजिटल गिरफ्तारी” कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं है। यह एक संगठित साइबर ठगी है।
एडिटोरियल में साफ कहा गया है कि इस तरह के मामलों में अपराधी खुद को पुलिस, सीबीआई या सरकारी अफसर बताकर लोगों को डराते हैं।
फिर उनसे पैसे या निजी जानकारी निकलवाते हैं।
इस स्कैम का पैटर्न साफ है।
कई मामलों में पीड़ित को घंटों या दिनों तक वीडियो कॉल पर “नजरबंद” रखा जाता है।
भारत में “डिजिटल गिरफ्तारी” जैसा कोई कानूनी कॉन्सेप्ट नहीं है।
फिर भी लोग डर और दबाव में आकर पैसे ट्रांसफर कर देते हैं।
यह समस्या अब बड़े स्तर पर फैल चुकी है।
सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे “गंभीर चिंता” का मुद्दा बताया है।
एडिटोरियल में कहा गया है कि यह सिर्फ साइबर क्राइम नहीं है, बल्कि सिस्टम की खामी भी है।
इन्हीं वजहों से अपराधी आसानी से लोगों को फंसा लेते हैं।
एडिटोरियल साफ दिशा देता है।
सुप्रीम कोर्ट ने भी इस तरह के मामलों में बेहतर सिस्टम बनाने की बात कही है।
असल खतरा मनोवैज्ञानिक है।
लोग “सरकारी कार्रवाई” के डर से सोच नहीं पाते।
यही डर इस पूरे फ्रॉड का सबसे बड़ा हथियार है।
“डिजिटल गिरफ्तारी” कानून नहीं, ठगी है।
एडिटोरियल का साफ संदेश है, सिस्टम को तेजी से अपडेट करना होगा और लोगों को सतर्क बनाना होगा।
वरना यह साइबर खतरा और बड़ा हो सकता है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।