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“डिजिटल अरेस्ट” कानून नहीं, धोखाधड़ी

Shah Times 2026-08-07 15:04:27
“डिजिटल अरेस्ट” कानून नहीं, धोखाधड़ी
  • डिजिटल गिरफ्तारी का खतरा, कानून से बाहर चल रहा खेल
  • डर और तकनीक से चल रहा नया साइबर जाल
  • डिजिटल गिरफ्तारी पर सख्त सिस्टम की जरूरत

  • डिजिटल गिरफ्तारी” नाम का साइबर फ्रॉड तेजी से बढ़ रहा है। एडिटोरियल में इसे गैरकानूनी और खतरनाक बताया गया है, जिसमें लोग डर और फर्जी अधिकार के जरिए ठगे जा रहे हैं।



     📍 Location: India
    📰 Date: 07 August 2026
    ✍️ By Mohd Haris



    डिजिटल गिरफ्तारी, डर का कारोबार

    “डिजिटल गिरफ्तारी” कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं है। यह एक संगठित साइबर ठगी है।

    एडिटोरियल में साफ कहा गया है कि इस तरह के मामलों में अपराधी खुद को पुलिस, सीबीआई या सरकारी अफसर बताकर लोगों को डराते हैं।

    फिर उनसे पैसे या निजी जानकारी निकलवाते हैं।


    कैसे काम करता है यह फ्रॉड

    इस स्कैम का पैटर्न साफ है।

    • कॉल या वीडियो कॉल आती है
    • खुद को अधिकारी बताया जाता है
    • कहा जाता है कि आप किसी केस में फंसे हैं
    • फिर “डिजिटल अरेस्ट” का डर दिखाया जाता है

    कई मामलों में पीड़ित को घंटों या दिनों तक वीडियो कॉल पर “नजरबंद” रखा जाता है।


    कानून क्या कहता है

    भारत में “डिजिटल गिरफ्तारी” जैसा कोई कानूनी कॉन्सेप्ट नहीं है।

    • कोई भी एजेंसी वीडियो कॉल पर गिरफ्तारी नहीं करती
    • पैसे देकर केस खत्म करने का कोई प्रावधान नहीं

    फिर भी लोग डर और दबाव में आकर पैसे ट्रांसफर कर देते हैं।


    बढ़ता खतरा, बड़े नुकसान

    यह समस्या अब बड़े स्तर पर फैल चुकी है।

    • 2025 के शुरुआती दो महीनों में 17,000 से ज्यादा केस सामने आए
    • कई लोग अपनी पूरी बचत गंवा चुके हैं
    • एक केस में करोड़ों रुपये तक का नुकसान हुआ

    सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे “गंभीर चिंता” का मुद्दा बताया है।


    सिस्टम की कमजोरी

    एडिटोरियल में कहा गया है कि यह सिर्फ साइबर क्राइम नहीं है, बल्कि सिस्टम की खामी भी है।

    • कानून और टेक्नोलॉजी के बीच गैप
    • जांच एजेंसियों की सीमित क्षमता
    • लोगों में जागरूकता की कमी

    इन्हीं वजहों से अपराधी आसानी से लोगों को फंसा लेते हैं।


    क्या करना जरूरी है

    एडिटोरियल साफ दिशा देता है।

    • सख्त SOP और जांच तंत्र
    • बैंकिंग और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर निगरानी
    • जनता में जागरूकता अभियान
    • तेज कानूनी कार्रवाई

    सुप्रीम कोर्ट ने भी इस तरह के मामलों में बेहतर सिस्टम बनाने की बात कही है।


    जमीनी सच

    असल खतरा मनोवैज्ञानिक है।

    लोग “सरकारी कार्रवाई” के डर से सोच नहीं पाते।

    यही डर इस पूरे फ्रॉड का सबसे बड़ा हथियार है।


    निष्कर्ष

    “डिजिटल गिरफ्तारी” कानून नहीं, ठगी है।

    एडिटोरियल का साफ संदेश है, सिस्टम को तेजी से अपडेट करना होगा और लोगों को सतर्क बनाना होगा।

    वरना यह साइबर खतरा और बड़ा हो सकता है।

    वीडियो देखें

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    Shah Times Reporter

    शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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