भारत और चीन के बीच WMCC बैठक में सीमा-पार नदियों पर वार्ता तेज करने की जरूरत पर सहमति बनी। भारत ने ऊपरी धारा परियोजनाओं का तकनीकी डेटा साझा करने की मांग की। यह मुद्दा जल सुरक्षा और सीमा स्थिरता से जुड़ा है।
📍 नई दिल्ली
📰 07 अगस्त 2026
✍️ By Asif Khan
भारत और चीन के बीच जारी जियोपॉलिटिकल तनाव के बीच अब जल कूटनीति एक अहम मुद्दा बनकर उभर रही है। नई दिल्ली में हुई WMCC बैठक में भारत ने साफ कहा कि सीमा-पार नदियों पर विशेषज्ञ स्तर की बातचीत जल्द शुरू होनी चाहिए।
विदेश मंत्रालय के मुताबिक, भारत ने खास तौर पर ऊपरी धारा में चल रही परियोजनाओं का तकनीकी डेटा साझा करने की मांग उठाई। यह मांग सीधे तौर पर ब्रह्मपुत्र जैसी अहम नदियों से जुड़ी है, जिनका असर करोड़ों लोगों की जल सुरक्षा पर पड़ता है।
भारत-चीन सीमा मामलों पर परामर्श एवं समन्वय तंत्र यानी WMCC की 36वीं बैठक नई दिल्ली में आयोजित हुई। भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व संयुक्त सचिव सुजीत घोष ने किया, जबकि चीनी पक्ष का नेतृत्व होउ यानछी ने संभाला।
दोनों पक्षों ने LAC की स्थिति का जायज़ा लिया। बातचीत में यह माना गया कि सीमा क्षेत्रों में अमन और स्थिरता बनाए रखना द्विपक्षीय रिश्तों के लिए जरूरी है।
भारत ने बैठक में स्पष्ट किया कि सीमा-पार नदियों पर पारदर्शिता जरूरी है। खासकर उन परियोजनाओं पर, जो चीन ऊपरी हिस्से में बना रहा है।
ब्रह्मपुत्र नदी इस पूरे मसले का केंद्र है। यह नदी तिब्बत से निकलकर भारत में प्रवेश करती है। अगर चीन वहां बड़े बांध या डायवर्जन प्रोजेक्ट्स बनाता है, तो भारत के पूर्वोत्तर राज्यों पर सीधा असर पड़ सकता है।
यही वजह है कि भारत लगातार तकनीकी डेटा साझा करने की मांग कर रहा है।
भारत और चीन के बीच सीमा-पार नदियों का मसला नया नहीं है। पिछले कई सालों से भारत को शिकायत रही है कि चीन समय पर हाइड्रोलॉजिकल डेटा साझा नहीं करता।
2017 के डोकलाम संकट के दौरान चीन ने डेटा साझा करना बंद कर दिया था। इससे असम और अरुणाचल प्रदेश में बाढ़ प्रबंधन पर असर पड़ा था।
हालांकि बाद में डेटा शेयरिंग बहाल हुई, लेकिन भरोसे का संकट बना रहा।
2013: डेटा शेयरिंग समझौता
2017: डोकलाम के बाद डेटा रोक दिया गया
2018: आंशिक बहाली
2020: LAC तनाव के बाद रिश्ते फिर बिगड़े
2026: WMCC बैठक में मुद्दा फिर प्रमुख एजेंडा बना
यह सिर्फ जल प्रबंधन का मुद्दा नहीं है। यह सीधे तौर पर सिक्योरिटी और स्ट्रैटेजी से जुड़ा मामला है।
अगर अपस्ट्रीम कंट्रोल किसी एक देश के पास हो, तो डाउनस्ट्रीम देश पर दबाव बनाया जा सकता है। यही कारण है कि भारत इस मुद्दे को डिप्लोमैटिक स्तर पर लगातार उठा रहा है।
भारत का रुख साफ है। वह पारदर्शिता और डेटा शेयरिंग चाहता है।
चीन का आधिकारिक स्टैंड यह रहा है कि उसके प्रोजेक्ट्स रन-ऑफ-द-रिवर हैं और इससे डाउनस्ट्रीम पर बड़ा असर नहीं पड़ता।
लेकिन कई एक्सपर्ट्स इस दावे पर सवाल उठाते हैं। उनका कहना है कि बड़े पैमाने पर इंफ्रास्ट्रक्चर बदलाव का असर पूरी तरह से नकारा नहीं जा सकता।
पूर्वोत्तर भारत में हर साल बाढ़ एक बड़ा संकट है। अगर समय पर डेटा मिले, तो नुकसान कम किया जा सकता है।
स्थानीय प्रशासन और डिजास्टर मैनेजमेंट एजेंसियां इस डेटा पर निर्भर रहती हैं। इसलिए यह सिर्फ कूटनीतिक बहस नहीं, बल्कि जमीनी जरूरत भी है।
भारत-चीन रिश्ते पहले से ही LAC तनाव की वजह से संवेदनशील हैं। ऐसे में जल मुद्दा एक नया दबाव बिंदु बन सकता है।
सरकार के लिए यह जरूरी है कि वह राष्ट्रीय हितों की रक्षा करे, लेकिन साथ ही संवाद भी जारी रखे।
नदियों पर नियंत्रण का असर कृषि, बिजली उत्पादन और जल आपूर्ति पर पड़ता है।
अगर अपस्ट्रीम प्रोजेक्ट्स बिना समन्वय के बनते हैं, तो इससे डाउनस्ट्रीम इकोनॉमी पर असर पड़ सकता है।
इसलिए यह मुद्दा सिर्फ पर्यावरण नहीं, बल्कि इकोनॉमिक सिक्योरिटी से भी जुड़ा है।
दुनिया भर में ट्रांसबाउंड्री रिवर मैनेजमेंट एक संवेदनशील विषय है। नील नदी, मेकांग नदी जैसे उदाहरण पहले से मौजूद हैं।
भारत-चीन नदी वार्ता भी इसी ग्लोबल ट्रेंड का हिस्सा बनती जा रही है, जहां जल कूटनीति जियोपॉलिटिक्स का अहम हिस्सा बन चुकी है।
दोनों देशों ने सहमति जताई है कि संवाद जारी रहेगा। WMCC, सैन्य और डिप्लोमैटिक चैनल्स के जरिए बातचीत आगे बढ़ेगी।
अब नजर इस बात पर होगी कि क्या चीन तकनीकी डेटा साझा करने को तैयार होता है या नहीं।
भारत-चीन नदी वार्ता अब सिर्फ एक तकनीकी मुद्दा नहीं रही। यह राष्ट्रीय सुरक्षा, पर्यावरण और कूटनीति के संगम पर खड़ा मसला है।
आने वाले महीनों में यह तय होगा कि दोनों देश सहयोग का रास्ता चुनते हैं या यह मुद्दा नए तनाव की वजह बनता है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।