एस्टोनिया के रक्षा मंत्री हन्नो पेवकुर ने €70 मिलियन की विवादित गोला-बारूद खरीद के बाद इस्तीफा दिया। डील में भारतीय स्वामित्व वाली Datasel शामिल थी।
तालिन | 4 सितंबर 2026 | शाह टाइम्स
By Mohd Haris
एस्टोनिया के रक्षा मंत्री हन्नो पेवकुर ने पद से इस्तीफा दे दिया है। उनका इस्तीफा यूक्रेन के लिए गोला-बारूद खरीद से जुड़ी करीब 70 मिलियन यूरो यानी लगभग ₹768 करोड़ की विवादित डील के बीच आया है। भारतीय स्वामित्व वाली कंपनी से जुड़े इस कॉन्ट्रैक्ट में भुगतान, डिलीवरी और गोला-बारूद की गुणवत्ता को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं।
पेवकुर ने अपने इस्तीफे के पीछे राजनीतिक जिम्मेदारी स्वीकार करने की बात कही। वह जुलाई 2022 से एस्टोनिया के रक्षा मंत्री थे। उन्होंने कहा कि देश की सुरक्षा किसी एक व्यक्ति की जिम्मेदारी नहीं है।
मामले के केंद्र में Datasel S.R.L. नाम की इटली में रजिस्टर्ड कंपनी है। रिपोर्टों के अनुसार इसे मार्च 2024 में भारत की Neco Defence Munitions ने अधिग्रहित किया था। Neco Group का संबंध नागपुर स्थित Jayaswal Group से बताया गया है।
एस्टोनिया के Centre for Defence Investments यानी RKIK ने अगस्त 2024 में Datasel के साथ पहला कॉन्ट्रैक्ट किया। इसका मकसद यूक्रेन के लिए आर्टिलरी एम्युनिशन की व्यवस्था करना था। शुरुआती चरण में करीब €15 मिलियन का अग्रिम भुगतान किया गया। बाद में कुल अग्रिम भुगतान लगभग €70 मिलियन तक पहुंचने की रिपोर्ट सामने आई।
एस्टोनिया में विवाद इसलिए बढ़ा क्योंकि उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक Datasel और उसके भारतीय मालिक के पास पहले आर्टिलरी शेल बनाने या बेचने का स्थापित रिकॉर्ड नहीं था। इसके बावजूद युद्धकालीन जरूरतों के बीच कंपनी को बड़ा कॉन्ट्रैक्ट दिया गया।
यहीं से एस्टोनिया की रक्षा खरीद प्रक्रिया पर सवाल उठने लगे। National Audit Office ने रक्षा मंत्रालय के अधीन संस्थानों में कॉन्ट्रैक्ट मैनेजमेंट, माल की प्राप्ति की निगरानी और वित्तीय रिकॉर्डिंग से जुड़ी गंभीर कमियां पहले भी दर्ज की थीं।
इस बिंदु पर अलग-अलग दावों को अलग रखना जरूरी है।
एस्टोनियाई अधिकारियों के अनुसार सप्लाई से जुड़ी सामग्री पहुंची थी, लेकिन वह अपेक्षित गुणवत्ता और पूर्णता के मानकों पर खरी नहीं उतरी। रक्षा मंत्री पेवकुर ने भी कहा कि इसे पूरी तरह “बेकार” कहना सही नहीं होगा, बल्कि सामग्री में गुणवत्ता और कंप्लीटनेस की समस्या थी।
ERR की रिपोर्ट के अनुसार एस्टोनियाई पक्ष का कहना है कि कुछ सामग्री एक यूरोपीय वेयरहाउस तक पहुंची थी, लेकिन उसमें जरूरी कंपोनेंट्स की कमी थी। इसलिए उसे स्वीकार नहीं किया गया।
इसका मतलब यह नहीं है कि पूरी रकम को सीधे “धोखाधड़ी” साबित कर दिया गया है। यही वजह है कि इस मामले में आरोप, सरकारी निष्कर्ष और कानूनी विवाद को अलग-अलग समझना जरूरी है।
Datasel और उसके भारतीय मालिकों ने एस्टोनियाई पक्ष के आरोपों को स्वीकार नहीं किया है।
Economic Times के अनुसार कंपनी ने कॉन्ट्रैक्ट के उल्लंघन के आरोपों से इनकार किया और एस्टोनिया के खिलाफ काउंटरक्लेम दाखिल करने की बात कही है। कंपनी का पक्ष है कि उसके पास तैयार इन्वेंट्री और वर्क-इन-प्रोग्रेस मौजूद था और कॉन्ट्रैक्ट को एस्टोनिया की ओर से खत्म किया गया।
इसलिए फिलहाल कानूनी स्थिति अंतिम रूप से तय नहीं हुई है।
विवाद केवल एक कंपनी या एक कॉन्ट्रैक्ट तक सीमित नहीं है।
एस्टोनिया के National Audit Office ने रक्षा मंत्रालय के अधीन संस्थानों में कॉन्ट्रैक्ट मैनेजमेंट और रक्षा सामग्री की अकाउंटिंग से जुड़ी गंभीर कमियां दर्ज की थीं। ऑडिट में कुछ जरूरी दस्तावेज और कॉन्ट्रैक्ट उपलब्ध नहीं कराए जाने पर भी सवाल उठाया गया था।
ऑडिट संस्था के अनुसार मंत्रालय की रक्षा खरीद व्यवस्था में माल की डिलीवरी, निरीक्षण और वित्तीय रिकॉर्डिंग की प्रक्रियाओं में सुधार की तत्काल जरूरत थी। उसने यह भी कहा था कि कुछ मामलों में राज्य के बजट पर जोखिम का आकलन करने के लिए जरूरी कॉन्ट्रैक्ट उपलब्ध नहीं कराए गए।
इस मामले का एक अलग प्रशासनिक पहलू भी सामने आया।
RKIK के मौजूदा प्रमुख Elmar Vaher ने स्वीकार किया कि €70 मिलियन के आर्टिलरी शेल कॉन्ट्रैक्ट को National Audit Office तक पहुंचाने में संस्था से गलती हुई। उन्होंने कहा कि कर्मचारियों को लगा था कि दस्तावेज भेज दिए गए हैं, लेकिन बाद में पता चला कि कॉन्ट्रैक्ट पहुंचा ही नहीं था।
इससे रक्षा खरीद में दस्तावेजी पारदर्शिता और आंतरिक नियंत्रण को लेकर सवाल और गहरे हुए।
एस्टोनिया ने Datasel के साथ हुए विवाद को कानूनी प्रक्रिया में ले जाने का फैसला किया है। रिपोर्टों के अनुसार कॉन्ट्रैक्ट की वैधता, भुगतान, डिलीवरी और गुणवत्ता से जुड़े मुद्दों पर दोनों पक्षों के दावे अलग हैं।
ERR ने यह भी रिपोर्ट किया है कि अभियोजन पक्ष ने रक्षा क्षेत्र से जुड़ी परिस्थितियों पर आपराधिक जांच शुरू की थी। जांच का होना अपने आप में किसी व्यक्ति या कंपनी को दोषी साबित नहीं करता। अंतिम जिम्मेदारी जांच और न्यायिक प्रक्रिया के निष्कर्षों से तय होगी।
पेवकुर ने सीधे तौर पर राजनीतिक जिम्मेदारी लेने का फैसला किया। यह इस्तीफा ऐसे समय आया जब रक्षा मंत्रालय और उससे जुड़े संस्थानों की
खरीद प्रक्रिया पर संसद और ऑडिट संस्थाओं की निगरानी बढ़ गई थी।
मामले में केवल मंत्री की भूमिका पर सवाल नहीं हैं। RKIK की निर्णय प्रक्रिया, कॉन्ट्रैक्ट की जांच, अग्रिम भुगतान और डिलीवरी की निगरानी भी जांच
के दायरे में हैं।
ERR के अनुसार RKIK के मौजूदा प्रमुख ने असफल €70 मिलियन शेल डील की जिम्मेदारी पूर्व RKIK प्रमुख Magnus-Valdemar Saar पर डाली है।
यह मामला यूरोपीय रक्षा खरीद में तेज फैसलों और संस्थागत निगरानी के बीच तनाव को सामने लाता है।
यूक्रेन युद्ध के दौरान यूरोपीय देशों को बड़ी मात्रा में गोला-बारूद जुटाने की जरूरत है। ऐसे माहौल में तेज खरीद जरूरी है, लेकिन बड़े अग्रिम
भुगतान, नए सप्लायर और युद्ध सामग्री की गुणवत्ता की जांच में जोखिम भी बढ़ता है।
एस्टोनिया के मामले में सवाल केवल यह नहीं है कि गोला-बारूद मिला या नहीं। बड़ा सवाल यह है कि युद्धकालीन खरीद में सप्लायर की क्षमता का
आकलन कैसे हुआ, भुगतान की शर्तें क्या थीं और जोखिम की जिम्मेदारी किस स्तर पर तय की गई।
फिलहाल उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर इसे भारतीय कंपनी द्वारा साबित “हथियार घोटाला” कहना जल्दबाजी होगी। स्थापित तथ्य यह है कि एस्टोनिया
की एक बड़ी रक्षा खरीद विवाद में फंसी, भारतीय स्वामित्व वाली Datasel इसमें प्रमुख पक्ष है, कानूनी विवाद चल रहा है और इसी व्यापक रक्षा खरीद संकट के बीच हन्नो पेवकुर ने राजनीतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दिया है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।