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यूक्रेन के पूर्व रक्षा मंत्री ने राष्ट्रपति चुनाव की मांग की

Shah Times • 2026-08-19 15:08:45
यूक्रेन के पूर्व रक्षा मंत्री ने राष्ट्रपति चुनाव की मांग की

यूक्रेन में चुनाव की मांग, पूर्व रक्षा मंत्री ने जेलेंस्की को घेरा

युद्ध के बीच यूक्रेन में चुनाव की मांग, फेदोरोव का बड़ा बयान

बर्खास्त रक्षा मंत्री फेदोरोव ने क्यों उठाया चुनाव का मुद्दा?


यूक्रेन के पूर्व रक्षा मंत्री मिखाइलो फेदोरोव ने युद्ध के बीच राष्ट्रपति चुनाव कराने की मांग की है। उन्होंने शासन संकट और भ्रष्टाचार पर सवाल उठाए। यूक्रेन में मार्शल लॉ जारी है, जिसके तहत चुनाव पर कानूनी रोक है। फेदोरोव की मांग जेलेंस्की सरकार के लिए नया राजनीतिक दबाव पैदा करती है।


कीव, यूक्रेन |19 अगस्त 2026 | शाह टाइम्स

By Mohd Haris


युद्ध के बीच चुनाव की मांग से यूक्रेन की सियासत में नया मोड़

यूक्रेन के बर्खास्त रक्षा मंत्री मिखाइलो फेदोरोव ने रूस के साथ जारी युद्ध के बीच राष्ट्रपति चुनाव कराने की मांग उठाई है। फेदोरोव ने एक वीडियो संदेश में कहा कि देश को लंबे युद्ध के बावजूद लोकतांत्रिक प्रक्रिया बहाल करने के लिए कानूनी और सुरक्षित रास्ता तलाशना चाहिए। उनका बयान राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की के नेतृत्व वाली सरकार के सामने एक नया सियासी मुआमला खड़ा करता है। फेदोरोव की मांग इसलिए अहम है क्योंकि रूस के पूर्ण पैमाने के हमले के बाद किसी प्रमुख यूक्रेनी राजनीतिक चेहरे की ओर से युद्ध के दौरान चुनाव कराने की यह पहली प्रमुख सार्वजनिक अपील बताई जा रही है। उन्होंने अपने बयान में शासन व्यवस्था में संकट और भ्रष्टाचार को लेकर भी गंभीर चिंता जताई।

फेदोरोव ने क्या कहा

फेदोरोव ने चुनाव को युद्ध खत्म होने तक टालने के बजाय ऐसी व्यवस्था तैयार करने की पैरवी की, जिसमें युद्धकालीन परिस्थितियों के बावजूद लोकतांत्रिक प्रक्रिया जारी रह सके। उन्होंने माना कि चुनाव कराना कठिन होगा, खासकर सैनिकों, अग्रिम मोर्चे के नजदीक रहने वाले नागरिकों और विदेशों में मौजूद यूक्रेनियों की मतदान प्रक्रिया को लेकर। उनका तर्क है कि प्रशासनिक और सुरक्षा संबंधी मुश्किलों को चुनाव रोकने का स्थायी आधार नहीं बनाया जाना चाहिए। हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि चुनाव के लिए सुरक्षित और कानूनी व्यवस्था तैयार करना एक जटिल चुनौती है।

फेदोरोव ने राष्ट्रपति जेलेंस्की का नाम सीधे तौर पर नहीं लिया, लेकिन उनके बयान का राजनीतिक संदर्भ स्पष्ट रूप से मौजूदा शासन व्यवस्था से जुड़ा है। उन्होंने संस्थागत जड़ता, भ्रष्टाचार और शासन संकट को युद्ध की क्षमता तथा सार्वजनिक भरोसे के लिए नुकसानदेह बताया।

फेदोरोव की बर्खास्तगी के बाद बढ़ा राजनीतिक तनाव

मिखाइलो फेदोरोव को जुलाई 2026 में रक्षा मंत्री पद से हटाया गया था। वह लगभग छह महीने ही इस पद पर रहे। राष्ट्रपति जेलेंस्की की सरकार में इससे पहले भी वह एक महत्वपूर्ण राजनीतिक और प्रशासनिक भूमिका निभा चुके थे तथा डिजिटल सुधारों से जुड़े काम के लिए पहचाने जाते थे।

उनकी बर्खास्तगी के बाद यूक्रेन में विरोध प्रदर्शन भी हुए। फेदोरोव के समर्थकों ने उनकी वापसी की मांग की, जबकि सत्ता पक्ष ने उनके हटाए जाने को सरकार और सैन्य नेतृत्व के बीच कामकाजी मतभेदों के संदर्भ में देखा। रिपोर्ट के मुताबिक फेदोरोव और सेना प्रमुख ओलेक्सांद्र सिरस्की के बीच तनाव उनके पद से हटाए जाने की पृष्ठभूमि का हिस्सा था। फेदोरोव ने रक्षा मंत्रालय में सैन्य खरीद व्यवस्था में बदलाव की कोशिशों और भ्रष्टाचार रोकने से जुड़े अपने प्रयासों का भी हवाला दिया है। इन दावों का राजनीतिक महत्व जरूर है, लेकिन इनके हर पहलू की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध रिपोर्टों से नहीं होती। इसलिए इन्हें फेदोरोव के राजनीतिक दृष्टिकोण और दावे के तौर पर देखना उचित होगा।

चुनाव पर कानूनी अड़चन सबसे बड़ी चुनौती

यूक्रेन में राष्ट्रपति चुनाव की मांग और चुनाव कराने की वास्तविक संभावना दो अलग मुद्दे हैं। फिलहाल देश में मार्शल लॉ लागू है। यूक्रेन की संसद ने जुलाई में इसे 2 अगस्त से 31 अक्टूबर 2026 तक 90 दिनों के लिए बढ़ाया था।

यूक्रेन की संसद के एक विशेष कार्य समूह ने मई 2026 में कहा था कि मौजूदा मार्शल लॉ के तहत चुनाव कराना संभव नहीं है। इस समूह में संसद, राष्ट्रपति कार्यालय, केंद्रीय चुनाव आयोग, कानून प्रवर्तन एजेंसियों और नागरिक समाज के प्रतिनिधि शामिल थे।

इसका मतलब यह है कि फेदोरोव की मांग को तत्काल चुनाव की घोषणा के रूप में नहीं देखा जा सकता। इसके लिए कानूनी ढांचे, सुरक्षा व्यवस्था और मतदान की प्रक्रिया में बड़े बदलाव की जरूरत होगी।

जेलेंस्की का रुख क्या रहा है

राष्ट्रपति जेलेंस्की लंबे समय से इस सवाल पर सुरक्षा और युद्ध की स्थिति को प्रमुख आधार बताते रहे हैं। फरवरी 2026 में उन्होंने कहा था कि चुनाव के लिए सुरक्षा गारंटी और रूस के साथ युद्धविराम जैसी परिस्थितियां जरूरी होंगी।

जेलेंस्की ने पहले भी युद्ध के दौरान चुनाव के सवाल पर सैनिकों और विदेशों में रह रहे यूक्रेनी नागरिकों के मतदान अधिकार को अहम मुद्दा बताया था। उनके अनुसार यदि देश के बड़े हिस्से को समान रूप से मतदान का अवसर नहीं मिलता, तो चुनाव की लोकतांत्रिक वैधता पर सवाल खड़े होंगे।

यही वह बिंदु है जहां फेदोरोव और मौजूदा सत्ता के दृष्टिकोण में बुनियादी फर्क दिखाई देता है। फेदोरोव चुनाव के लिए रास्ता बनाने की मांग कर रहे हैं, जबकि सरकार की प्राथमिकता सुरक्षित और वैध चुनावी प्रक्रिया के लिए जरूरी परिस्थितियां तैयार करना रही है।

क्या युद्ध के दौरान निष्पक्ष चुनाव संभव है

यह सवाल केवल कानूनी नहीं, बल्कि व्यावहारिक और सुरक्षा से भी जुड़ा है। यूक्रेन के बड़े हिस्से पर रूसी मिसाइल और ड्रोन हमलों का खतरा बना हुआ है। अग्रिम मोर्चे के इलाके में मतदान केंद्रों और चुनावी अधिकारियों की सुरक्षा एक गंभीर चुनौती होगी।

इसके अलावा हजारों सैनिक सक्रिय ड्यूटी पर हैं। बड़ी संख्या में यूक्रेनी नागरिक देश के दूसरे हिस्सों या विदेशों में विस्थापित हैं। रूस के कब्जे वाले क्षेत्रों में रहने वाले नागरिकों के मतदान अधिकार और सुरक्षित भागीदारी का सवाल भी चुनावी प्रक्रिया की वैधता से सीधे जुड़ा है।

इसलिए केवल मतदान की तारीख घोषित करना पर्याप्त नहीं होगा। चुनाव आयोग को मतदाता सूची, सैन्य मतदान, विदेशों में मतदान, विस्थापित नागरिकों की भागीदारी, साइबर सिक्योरिटी, चुनावी निगरानी और मतदान केंद्रों की सुरक्षा जैसे मुद्दों का समाधान करना होगा।

फेदोरोव की मांग के पीछे सियासी मकसद भी सवालों में

फेदोरोव की अपील को केवल लोकतांत्रिक चिंता के नजरिए से देखना अधूरा होगा। वह हाल ही में रक्षा मंत्री पद से हटाए गए हैं और उनकी बर्खास्तगी के बाद उनका राजनीतिक प्रभाव चर्चा में रहा है। उनका बयान ऐसे समय आया जब राष्ट्रपति जेलेंस्की ने नए रक्षा मंत्री के रूप में येवहेन खमारा के नाम को आगे बढ़ाया। इसलिए कुछ यूक्रेनी सांसदों ने फेदोरोव की चुनाव संबंधी अपील को उनकी राजनीतिक स्थिति से जोड़कर देखा है। यह एक राजनीतिक व्याख्या है, स्थापित तथ्य नहीं। फेदोरोव ने अभी राष्ट्रपति पद के लिए अपनी उम्मीदवारी की औपचारिक घोषणा नहीं की है। लिहाजा चुनाव की मांग को सीधे तौर पर उनकी चुनावी महत्वाकांक्षा का प्रमाण मानना जल्दबाजी होगी।

भ्रष्टाचार का मुद्दा क्यों महत्वपूर्ण है

फेदोरोव ने शासन संकट के साथ भ्रष्टाचार को भी अपने बयान का प्रमुख हिस्सा बनाया। यह मुद्दा इसलिए संवेदनशील है क्योंकि यूक्रेन युद्ध के दौरान बड़े पैमाने पर विदेशी सैन्य और आर्थिक सहायता हासिल कर रहा है। 19 अगस्त को यूक्रेन की भ्रष्टाचार-रोधी एजेंसियों ने मौजूदा और पूर्व सांसदों तथा राष्ट्रपति कार्यालय से जुड़े वरिष्ठ अधिकारियों से संबंधित एक कथित आपराधिक संगठन की जांच की घोषणा भी की। जांच की पूरी जानकारी तत्काल सार्वजनिक नहीं की गई थी। इन घटनाओं को जोड़कर यूक्रेन की राजनीति में संस्थागत जवाबदेही का सवाल फिर सामने आया है। हालांकि किसी जांच में नाम आने या आरोप लगने को दोष सिद्धि के बराबर नहीं माना जा सकता।

जेलेंस्की के लिए चुनौती कितनी बड़ी है

फेदोरोव की अपील तत्काल सत्ता परिवर्तन का संकेत नहीं है। लेकिन यह युद्ध के बीच यूक्रेन के भीतर लोकतंत्र, जवाबदेही और सत्ता की वैधता पर चल रही बहस को सार्वजनिक राजनीतिक एजेंडे के केंद्र में ला सकती है। जेलेंस्की सरकार के सामने एक तरफ युद्ध संचालन और राष्ट्रीय सुरक्षा की प्राथमिकता है। दूसरी तरफ लंबे समय तक चुनाव न होने से लोकतांत्रिक वैधता और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को लेकर सवाल उठते रहेंगे। यही संतुलन आने वाले महीनों में यूक्रेन की घरेलू सियासत का अहम मुद्दा बन सकता है।

चुनाव कराने के पक्ष और विरोध में तर्क

चुनाव के पक्ष में सबसे मजबूत तर्क लोकतांत्रिक जवाबदेही का है। फेदोरोव का कहना है कि युद्ध लोकतांत्रिक प्रक्रिया को अनिश्चित समय तक स्थगित करने का आधार नहीं बनना चाहिए। उनके नजरिए से संस्थागत जवाबदेही युद्धकाल में भी जरूरी है। विरोध में सबसे बड़ा तर्क सुरक्षा और निष्पक्षता का है। यदि कुछ क्षेत्रों में नागरिक सुरक्षित तरीके से मतदान नहीं कर सकते, सैनिकों की भागीदारी सीमित रहती है और विस्थापित नागरिकों को समान अवसर नहीं मिलता, तो चुनाव की वैधता पर गंभीर सवाल उठ सकते हैं। इसके अलावा रूस के कब्जे वाले क्षेत्रों में मतदान कराना लगभग असंभव होगा। ऐसी परिस्थिति में चुनाव कराने की जल्दबाजी राजनीतिक विभाजन और सुरक्षा जोखिम दोनों बढ़ा सकती है।

आगे क्या हो सकता है

तत्काल तौर पर फेदोरोव की मांग से चुनाव की तारीख तय नहीं होती। मौजूदा मार्शल लॉ 31 अक्टूबर 2026 तक बढ़ाया गया है और संसद के कार्य समूह ने मार्शल लॉ के दौरान चुनाव कराने की मौजूदा व्यवस्था को असंभव माना है। आगे तीन स्तरों पर घटनाक्रम महत्वपूर्ण रहेगा। पहला, युद्ध और सुरक्षा स्थिति में बदलाव। दूसरा, मार्शल लॉ और चुनाव कानून में संभावित कानूनी बदलाव। तीसरा, जेलेंस्की सरकार और विपक्ष के बीच चुनावी प्रक्रिया पर राजनीतिक सहमति। यदि युद्धविराम और सुरक्षा गारंटी की दिशा में ठोस पेशरफ़्त होती है, तो चुनाव का सवाल ज्यादा व्यावहारिक रूप ले सकता है। इसके उलट यदि युद्ध और सुरक्षा संकट जारी रहता है, तो चुनाव टालने का सरकारी रुख मजबूत बना रह सकता है।

निष्कर्ष

यूक्रेन में पूर्व रक्षा मंत्री मिखाइलो फेदोरोव की राष्ट्रपति चुनाव की मांग फिलहाल चुनाव की घोषणा नहीं है। यह युद्धकालीन लोकतंत्र, शासन व्यवस्था और राजनीतिक जवाबदेही पर एक महत्वपूर्ण सियासी चुनौती जरूर है। यूक्रेन में राष्ट्रपति चुनाव कराने के रास्ते में अभी कानूनी और सुरक्षा संबंधी बड़ी अड़चनें मौजूद हैं। साथ ही फेदोरोव की राजनीतिक भूमिका और उनके बयान के पीछे संभावित सियासी हितों को भी निष्पक्ष नजरिए से देखना होगा। आगे की दिशा युद्ध की स्थिति, कानूनी बदलाव और यूक्रेन की राजनीतिक सहमति पर निर्भर करेगी।

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शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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