भारत का आधिकारिक रुख लंबे समय से बातचीत और कूटनीति के जरिए रूस-यूक्रेन संघर्ष के समाधान का रहा है। हालांकि, रूसी तेल खरीद का युद्ध की अवधि या रूस की सैन्य क्षमता पर सीधा प्रभाव कितना है, यह एक जटिल आर्थिक और भू-राजनीतिक सवाल है और इसे स्थापित तथ्य के रूप में पेश नहीं किया जाना चाहिए।
कीव | 4 सितंबर 2026 | शाह टाइम्स
By Mohd Haris
कीव से भारत का दो टूक संदेश
रूस से कच्चे तेल की खरीद को लेकर पश्चिमी देशों और यूक्रेन की आलोचनाओं के बीच भारत ने अपने व्यापारिक और ऊर्जा हितों का बचाव किया है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कीव में स्पष्ट किया कि रूस से तेल, खनिज, धातु या अन्य वस्तुएं खरीदने अथवा न खरीदने से रूस-यूक्रेन युद्ध अपने आप खत्म नहीं होगा।
जयशंकर ने कहा कि लगभग पांच साल से जारी इस संघर्ष का समाधान बातचीत, कूटनीति और मोल-भाव के जरिए ही निकल सकता है। उन्होंने साथ ही कहा कि भारत यूक्रेन की चिंताओं को समझता है, लेकिन भारत की अपनी ऊर्जा जरूरतों और राष्ट्रीय हितों को भी दूसरे देशों को समझना चाहिए।
यह बयान ऐसे समय आया है जब भारत पर रूस से तेल खरीद कम करने का अंतरराष्ट्रीय दबाव बना हुआ है। जयशंकर की कीव यात्रा के दौरान रूसी तेल का मुद्दा इसलिए भी अहम रहा क्योंकि भारत एक तरफ यूक्रेन के साथ शांति और कूटनीति की बात कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ रूस के साथ अपने रणनीतिक और आर्थिक रिश्तों को बनाए हुए है।
विदेश मंत्री ने भारत की स्थिति समझाते हुए देश की विशाल ऊर्जा जरूरतों का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि करीब 140 करोड़ लोगों की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करना भारत के लिए एक वास्तविक चुनौती है, खासकर ऐसे दौर में जब वैश्विक ऊर्जा बाजार खुद कई दबावों से गुजर रहा है।
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत, आपूर्ति की स्थिरता और रिफाइनिंग अर्थशास्त्र भारत की ऊर्जा नीति के अहम हिस्से हैं।
2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने और पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद रूसी कच्चे तेल पर छूट उपलब्ध हुई। भारतीय रिफाइनरों ने इस अवसर का इस्तेमाल किया और रूस से तेल खरीद में तेज बढ़ोतरी हुई। इससे भारत को अपेक्षाकृत प्रतिस्पर्धी कीमतों पर कच्चा तेल हासिल करने और आयात बिल पर दबाव नियंत्रित करने में मदद मिली।
जयशंकर ने अपने बयान में केवल कच्चे तेल का जिक्र नहीं किया। उन्होंने तेल के साथ एल्यूमिना, खनिज, धातु और उर्वरक जैसी वस्तुओं का भी उल्लेख किया।
उनका तर्क यह था कि किसी एक देश के साथ व्यापार को युद्ध समाप्ति का निर्णायक पैमाना मानना सही नहीं होगा। भारत के मुताबिक युद्ध समाप्त करने के लिए सीधे राजनीतिक और कूटनीतिक समाधान की जरूरत है।
यह भारत की उस विदेश नीति के अनुरूप है जिसमें नई दिल्ली रूस और पश्चिमी देशों के बीच अपने संबंधों को किसी एक खेमे में सीमित करने के बजाय रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने की कोशिश करता रहा है।
जयशंकर ने यूक्रेन के पक्ष को खारिज नहीं किया। उन्होंने कहा कि यूक्रेन का अपना दृष्टिकोण है और भारत उसका सम्मान करता है। लेकिन इसी के साथ उन्होंने यह भी कहा कि भारत के दृष्टिकोण और उसकी ऊर्जा जरूरतों का सम्मान किया जाना चाहिए।
यही बिंदु भारत की मौजूदा कूटनीति को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। नई दिल्ली रूस के साथ आर्थिक संबंध बनाए रखते हुए यूक्रेन की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता से जुड़े सवालों पर संवाद और शांति की वकालत कर रहा है।
विदेश मंत्री ने कीव में यह भी दोहराया कि भारत युद्ध को खत्म करने के लिए किसी भी तरह की मदद करने को तैयार है, यदि संबंधित पक्ष इसके लिए तैयार हों। उन्होंने कहा कि युद्ध का समाधान युद्ध के मैदान से नहीं निकल सकता।
जयशंकर का यह बयान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की हालिया मुलाकात के कुछ ही दिन बाद आया है।
31 अगस्त 2026 को बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन शिखर सम्मेलन के दौरान मोदी ने पुतिन से मुलाकात की थी। रॉयटर्स के मुताबिक मोदी ने युद्ध को मानवता के हित में खत्म करने की जरूरत पर जोर दिया और भारत की शांति संबंधी कोशिशों को दोहराया।
इससे भारत का मौजूदा डिप्लोमैटिक नैरेटिव काफी स्पष्ट दिखाई देता है। रूस के साथ संवाद जारी रखना और साथ ही युद्ध समाप्त करने की अपील करना, दोनों नीतियां समानांतर चल रही हैं।
रूस और भारत के बीच आर्थिक संबंधों में ऊर्जा क्षेत्र की भूमिका पिछले कुछ वर्षों में काफी बढ़ी है। रूसी तेल भारत के लिए महत्वपूर्ण सप्लाई स्रोत बन चुका है।
हालिया रिपोर्टों के मुताबिक दोनों देशों के बीच भुगतान व्यवस्था भी मजबूत हुई है। रॉयटर्स ने 2 सितंबर 2026 को रिपोर्ट किया कि रूबल और रुपये के जरिए होने वाली भुगतान व्यवस्था ने द्विपक्षीय व्यापार के बड़े हिस्से को सुगम बनाया है। रिपोर्ट में कहा गया कि 2024 में दोनों देशों का व्यापार
लगभग 70 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचा था, जिसमें रूसी तेल आयात की बड़ी भूमिका रही।
इसका अर्थ यह है कि भारत-रूस संबंध केवल तेल खरीद तक सीमित नहीं हैं। ऊर्जा के साथ रक्षा, उर्वरक, औद्योगिक सहयोग, भुगतान व्यवस्था और रणनीतिक साझेदारी भी इस रिश्ते के महत्वपूर्ण हिस्से हैं।
रूसी तेल की खरीद भारत और पश्चिमी देशों के बीच लगातार चर्चा का विषय रही है। अमेरिका और उसके सहयोगियों की दलील रही है कि रूस से ऊर्जा खरीद उसकी अर्थव्यवस्था को राजस्व देती है, जबकि भारत का कहना है कि ऊर्जा सुरक्षा और राष्ट्रीय हित को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
भारत ने इस बहस में लगातार यह रुख अपनाया है कि वह अपनी ऊर्जा जरूरतों को बाजार की परिस्थितियों के अनुसार पूरा करेगा।
विदेश मंत्री का ताजा बयान इसी नीति की पुनर्पुष्टि करता है। इसमें भारत ने न तो रूस से अपने व्यापारिक संबंधों को खत्म करने का संकेत दिया और न ही युद्ध के सवाल पर रूस के सैन्य रुख का समर्थन किया।
जयशंकर का बयान एक राजनीतिक और कूटनीतिक स्थिति को व्यक्त करता है। इसे यह प्रमाण नहीं माना जा सकता कि रूसी तेल की खरीद का युद्ध पर कोई आर्थिक प्रभाव ही नहीं पड़ता।
रूस की ऊर्जा आय उसकी अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है और तेल व्यापार पर लगाए गए प्रतिबंधों का उद्देश्य भी रूस की राजस्व क्षमता को प्रभावित करना रहा है। दूसरी ओर, भारत जैसे बड़े आयातक के लिए सस्ता और स्थिर ऊर्जा स्रोत घरेलू अर्थव्यवस्था, महंगाई और औद्योगिक लागत से जुड़ा हुआ है।
यही वजह है कि यह विवाद केवल विदेश नीति का मुद्दा नहीं है। इसके केंद्र में ऊर्जा सुरक्षा, वैश्विक तेल बाजार, प्रतिबंध नीति और राष्ट्रीय आर्थिक हित सभी शामिल हैं।
भारत के सामने चुनौती दोहरी है। एक तरफ रूस के साथ पुराने और रणनीतिक संबंध हैं। दूसरी तरफ अमेरिका और यूरोप भारत के प्रमुख आर्थिक और तकनीकी साझेदार हैं।
ऐसे में नई दिल्ली के लिए किसी एक पक्ष के साथ पूरी तरह खड़े होने की बजाय बहुपक्षीय कूटनीति को आगे बढ़ाना अधिक व्यावहारिक दिखाई देता है।
जयशंकर ने कीव में इसी संतुलन को रेखांकित किया। उन्होंने यूक्रेन की चिंताओं को स्वीकार किया, रूस के साथ व्यापार को सही ठहराया और साथ ही युद्ध खत्म करने के लिए बातचीत तथा कूटनीति को प्राथमिक रास्ता बताया।
भारत की यूक्रेन नीति में अब केवल युद्ध समाप्ति की अपील नहीं है। दोनों देशों के बीच व्यापार, शिक्षा, फार्मास्यूटिकल्स, कृषि, तकनीक और समुद्री सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग भी चर्चा का हिस्सा है।
कीव में जयशंकर और यूक्रेनी विदेश मंत्री आंद्री सिबिहा के बीच बातचीत में काला सागर में वाणिज्यिक जहाजों की सुरक्षा का मुद्दा भी उठा। भारत के लिए यह विषय महत्वपूर्ण है क्योंकि क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा से जुड़े घटनाक्रम भारतीय नाविकों और व्यापारिक हितों को प्रभावित कर सकते हैं।
रूस-यूक्रेन युद्ध अब पांचवें साल में प्रवेश कर चुका है। इस दौरान भारत ने पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद रूस से ऊर्जा आयात जारी रखा, लेकिन साथ ही लगातार युद्ध रोकने और बातचीत की अपील भी की।
भारत की नीति का केंद्रीय तर्क यही रहा है कि संघर्ष का अंतिम समाधान संबंधित पक्षों के बीच बातचीत से ही निकल सकता है।
जयशंकर ने कीव में इसी संदेश को दोहराया। उन्होंने कहा कि संघर्ष का हर अतिरिक्त दिन मौत और तबाही बढ़ाता है और रास्ता खोजने की जिम्मेदारी युद्ध में शामिल पक्षों की है। भारत अपनी तरफ से मदद करने के लिए तैयार है।
जयशंकर के बयान से संकेत मिलता है कि भारत फिलहाल रूस से ऊर्जा व्यापार को युद्ध समाप्ति की शर्त से जोड़ने के पक्ष में नहीं है। नई दिल्ली अपनी ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए रूस, यूक्रेन, अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ अलग-अलग स्तर पर संवाद बनाए रखना चाहता है।
आने वाले समय में असली चुनौती यही होगी कि भारत रूस के साथ आर्थिक संबंधों को बनाए रखते हुए पश्चिमी देशों और यूक्रेन के साथ अपने रिश्तों को किस तरह संतुलित करता है।
रूसी तेल पर बहस जारी रहेगी, लेकिन भारत का ताजा संदेश साफ है। नई दिल्ली के नजरिए में युद्ध का समाधान किसी एक देश की तेल खरीद रोकने से नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति, बातचीत और कूटनीतिक समझौते से निकलेगा।
निष्कर्ष
कीव में जयशंकर का बयान भारत की रणनीतिक स्वायत्तता का स्पष्ट संकेत है। भारत यूक्रेन की चिंताओं को सुनने के लिए तैयार है, लेकिन अपनी ऊर्जा सुरक्षा और रूस के साथ व्यापारिक रिश्तों को छोड़ने के लिए तैयार दिखाई नहीं देता। साथ ही नई दिल्ली युद्ध को खत्म करने के लिए संवाद और कूटनीति को ही स्थायी रास्ता मान रही है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।