रूसी तेल पर 100% टैरिफ का खतरा, नवारो ने दिया बड़ा संकेत
भारत-अमेरिका टैरिफ तनाव के बीच मोदी-ट्रंप दोस्ती पर भरोसा
अमेरिकी अधिकारी पीटर नवारो ने कहा है कि डोनाल्ड ट्रंप और नरेंद्र मोदी के बीच अच्छे कामकाजी रिश्ते हैं और रूसी तेल खरीद से जुड़े टैरिफ विवाद का समाधान निकलेगा। यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिकी सीनेट से पारित विधेयक राष्ट्रपति को रूसी ऊर्जा के बड़े खरीदारों पर 100% तक टैरिफ लगाने का अधिकार दे सकता है।
नई दिल्ली / वॉशिंगटन||12 अगस्त 2026||शाह टाइम्स
भारत और अमेरिका के बीच रूसी तेल को लेकर बढ़ते टैरिफ तनाव के बीच वॉशिंगटन से नरमी का एक संकेत सामने आया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के वरिष्ठ व्यापार सलाहकार पीटर नवारो ने कहा है कि ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच “बहुत अच्छे कामकाजी रिश्ते” हैं और दोनों नेता रूसी तेल से जुड़े टैरिफ विवाद का रास्ता निकाल लेंगे।
नवारो का यह बयान इसलिए अहम है क्योंकि भारत के लिए अमेरिकी टैरिफ का मुद्दा अब केवल व्यापार नीति तक सीमित नहीं रहा। रूसी कच्चे तेल की खरीद, यूक्रेन युद्ध, भारत की ऊर्जा सुरक्षा और अमेरिका की रूस नीति एक ही जियोपॉलिटिकल विवाद में जुड़ चुके हैं।
हालांकि, यहां एक अहम तथ्य स्पष्ट रखना जरूरी है। भारत पर 100% अतिरिक्त अमेरिकी टैरिफ अभी लागू नहीं हुआ है। अमेरिकी सीनेट ने ऐसा विधेयक पारित किया है जो राष्ट्रपति को रूस के बड़े ऊर्जा खरीदारों पर 100% तक टैरिफ लगाने का अधिकार दे सकता है। इसे लागू करने के लिए आगे की विधायी और कार्यकारी प्रक्रिया बाकी है।
रूसी तेल विवाद की नई कड़ी अमेरिका के Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026 से जुड़ी है। संशोधित विधेयक में रूस की ऊर्जा के पांच बड़े खरीदारों पर 100% तक टैरिफ लगाने का प्रावधान है। भारत और चीन उन देशों में शामिल हैं जिन पर इस प्रावधान का असर पड़ सकता है।
अमेरिकी सीनेट ने इस विधेयक को अगस्त में पारित कर दिया। अब इसकी अगली परीक्षा अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में होगी। इसके बाद ही यह स्पष्ट होगा कि प्रस्तावित अधिकार कानून का रूप लेता है और राष्ट्रपति उसका इस्तेमाल किस तरह करते हैं।
इसलिए मौजूदा स्थिति को “भारत पर 100% टैरिफ लग गया” कहना गलत होगा। सही स्थिति यह है कि भारत पर 100% तक टैरिफ लगाने का संभावित कानूनी रास्ता अमेरिकी विधेयक के जरिए आगे बढ़ा है।
पीटर नवारो ने कहा कि ट्रंप और मोदी के बीच अच्छे कामकाजी रिश्ते हैं और दोनों इस मुद्दे को सुलझा लेंगे। उनका बयान यह संकेत देता है कि व्हाइट हाउस भारत के साथ टकराव को स्थायी स्थिति में बदलना नहीं चाहता।
यह बयान उस समय आया है जब भारत और अमेरिका के बीच रूस से जुड़े ऊर्जा कारोबार पर रणनीतिक मतभेद कायम हैं। नवारो पहले भी भारत की रूसी तेल खरीद की आलोचना कर चुके हैं, इसलिए उनका मौजूदा रुख अपेक्षाकृत नरम दिखाई देता है।
लेकिन नवारो के बयान को किसी औपचारिक समझौते के रूप में देखना जल्दबाज़ी होगी। अभी भारत और अमेरिका के बीच रूसी तेल खरीद को लेकर कोई नया सार्वजनिक समझौता सामने नहीं आया है।
यह इस खबर का सबसे महत्वपूर्ण फैक्ट-चेक है। जुलाई में अमेरिकी सीनेट में पेश संशोधित रूस प्रतिबंध विधेयक ने रूस की ऊर्जा के पांच सबसे बड़े खरीदारों पर अधिकतम 100% टैरिफ का प्रस्ताव रखा था। बाद में सीनेट ने इस विधेयक को पारित किया, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भारत पर स्वतः 100% टैरिफ लागू हो गया।
विधेयक राष्ट्रपति को कार्रवाई की शक्ति देने की दिशा में जाता है। इसलिए अंतिम प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि अमेरिकी प्रतिनिधि सभा क्या करती है, विधेयक कानून बनता है या नहीं और राष्ट्रपति उपलब्ध अधिकारों का इस्तेमाल किस तरह करते हैं।
यही वजह है कि मौजूदा स्थिति को “टैरिफ threat” कहना ज्यादा सटीक है, “100% tariff imposed” कहना नहीं।
रूसी तेल विवाद का एक पुराना अध्याय भी है। अगस्त 2025 में ट्रंप प्रशासन ने भारत से रूसी तेल खरीद को आधार बनाकर भारतीय आयात पर अतिरिक्त 25% टैरिफ लगाया था। यह कदम पहले से लागू अन्य शुल्कों के ऊपर लगाया गया था। व्हाइट हाउस ने उस समय इसे रूस के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति से जुड़ी कार्रवाई बताया था।
इसके बाद भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में तनाव बढ़ा। अमेरिकी प्रशासन ने रूस से तेल खरीद कम करने का दबाव बनाया, जबकि भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा और राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता दी।
भारत का तर्क रहा है कि रूसी तेल की खरीद बाजार परिस्थितियों और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ी है। भारत ने अमेरिकी दबाव के बावजूद अपने रणनीतिक विकल्प खुले रखने की नीति अपनाई।
इस विवाद में एक महत्वपूर्ण मोड़ फरवरी 2026 में आया। व्हाइट हाउस ने भारत से जुड़े अतिरिक्त 25% रूसी तेल टैरिफ को हटाने का फैसला किया था। राष्ट्रपति ट्रंप के आदेश के अनुसार यह अतिरिक्त शुल्क 7 फरवरी 2026 से प्रभावी रूप से समाप्त किया गया।
व्हाइट हाउस ने उस समय कहा था कि भारत ने रूसी तेल आयात रोकने की प्रतिबद्धता जताई थी, अमेरिकी ऊर्जा खरीद बढ़ाने की बात कही थी और अगले 10 वर्षों में रक्षा सहयोग बढ़ाने के लिए एक ढांचा स्वीकार किया था।
अमेरिका और भारत ने फरवरी में एक Interim Trade Agreement के लिए framework की भी घोषणा की थी। व्हाइट हाउस के मुताबिक दोनों देशों ने व्यापक Bilateral Trade Agreement पर बातचीत जारी रखने की प्रतिबद्धता जताई थी।
यानी मौजूदा टैरिफ विवाद एक बिल्कुल नए संकट से ज्यादा पुराने मतभेद के दोबारा उभरने जैसा है।
2026 में रूस से भारतीय तेल खरीद फिर अमेरिकी नीति के केंद्र में आ गई है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार जुलाई में भारत का रूसी कच्चे तेल का आयात रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचा। इससे वॉशिंगटन की उस चिंता को बल मिला है कि भारत रूस की ऊर्जा आय को बनाए रखने में अहम भूमिका निभा रहा है।
यहां भारत और अमेरिका की प्राथमिकताएं अलग हैं। अमेरिका रूस की ऊर्जा आय को कम करना चाहता है ताकि मॉस्को पर यूक्रेन युद्ध को लेकर आर्थिक दबाव बढ़े। भारत दूसरी ओर ऊर्जा की लागत, आपूर्ति की स्थिरता और रणनीतिक स्वायत्तता को ध्यान में रखता है।
यही अंतर टैरिफ को महज व्यापारिक उपकरण नहीं रहने देता। यह अमेरिका की रूस नीति और भारत की strategic autonomy के बीच टकराव का हिस्सा बन जाता है।
भारत दुनिया के बड़े crude oil importers में शामिल है। देश की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा होता है। ऐसे में रूस से मिलने वाला कच्चा तेल भारतीय refiners के लिए लंबे समय से महत्वपूर्ण supply source बन चुका है।
यूक्रेन युद्ध के बाद रूसी crude पर पश्चिमी price-cap व्यवस्था बनी। भारत ने discounted Russian crude का फायदा उठाया और अपनी refinery तथा domestic energy requirements के लिए बड़ी मात्रा में तेल खरीदा। Reuters की रिपोर्टिंग के अनुसार 2025 में रूस भारत के crude imports का बड़ा हिस्सा बन चुका था।
भारत के लिए रूसी तेल छोड़ना केवल विदेश नीति का फैसला नहीं है। इसका सीधा असर crude procurement cost, refining margins और घरेलू ऊर्जा कीमतों पर पड़ सकता है।
वॉशिंगटन का मूल तर्क यह है कि रूसी तेल की खरीद से मॉस्को को ऊर्जा राजस्व मिलता है और यह राजस्व यूक्रेन युद्ध को जारी रखने की रूस की क्षमता को मजबूत करता है।
अमेरिकी नीति इसी वजह से रूस के बड़े ऊर्जा खरीदारों पर secondary pressure बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रही है। नया अमेरिकी विधेयक इसी रणनीति का हिस्सा है।
लेकिन भारत इस मामले को अलग नजरिए से देखता है। नई दिल्ली के लिए ऊर्जा सुरक्षा, किफायती आयात और बहु-स्रोत procurement उसकी विदेश और आर्थिक नीति के महत्वपूर्ण हिस्से हैं।
नवारो का बयान बताता है कि दोनों नेताओं की व्यक्तिगत और राजनीतिक बातचीत अभी भी अमेरिकी नीति में महत्व रखती है। लेकिन इस विवाद की जड़ व्यक्तिगत रिश्तों से कहीं गहरी है।
एक तरफ अमेरिका रूस पर अधिकतम आर्थिक दबाव चाहता है। दूसरी तरफ भारत रूस के साथ लंबे समय से चले आ रहे ऊर्जा, रक्षा और रणनीतिक संबंधों को पूरी तरह खत्म करने के पक्ष में नहीं है।
इसलिए मोदी और ट्रंप के अच्छे संबंध बातचीत का रास्ता आसान कर सकते हैं, लेकिन वे अपने आप नीति मतभेद खत्म नहीं करते। अंतिम समाधान व्यापार, ऊर्जा, प्रतिबंध और जियोपॉलिटिक्स से जुड़े ठोस समझौतों पर निर्भर करेगा।
अगर 100% तक टैरिफ का विकल्प कानून और फिर नीति में बदलता है, तो भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों पर बड़ा दबाव पड़ सकता है। अमेरिकी बाजार भारतीय निर्यातकों के लिए महत्वपूर्ण है, इसलिए ऊंचे शुल्क से कई export-oriented sectors पर प्रतिस्पर्धात्मक दबाव बढ़ सकता है।
दूसरी तरफ अमेरिका के लिए भी भारत के साथ आर्थिक टकराव की कीमत है। दोनों देश चीन के बढ़ते प्रभाव, इंडो-पैसिफिक सिक्योरिटी और supply-chain diversification जैसे मुद्दों पर सहयोग करते हैं।
इसलिए वॉशिंगटन के लिए भारत को रूस से दूर करने की कोशिश और भारत को रणनीतिक साझेदार बनाए रखने की जरूरत, दोनों को साथ लेकर चलना चुनौती है।
भारत पर रूस के साथ संबंध कम करने का अमेरिकी दबाव ऐसे समय बढ़ रहा है जब चीन खुद रूसी ऊर्जा का बड़ा खरीदार है। इस स्थिति में भारत के सामने एक व्यापक जियोपॉलिटिकल सवाल भी है।
अगर अमेरिकी दबाव भारत को रूस से तेजी से दूरी बनाने के लिए मजबूर करता है, तो नई दिल्ली की रणनीतिक स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है। अगर भारत रूसी तेल खरीद जारी रखता है, तो अमेरिकी व्यापार और प्रतिबंध दबाव बढ़ सकता है।
यही संतुलन भारत की मौजूदा विदेश नीति की सबसे कठिन परीक्षा है।
सबसे पहले अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में रूस प्रतिबंध विधेयक की स्थिति स्पष्ट होगी। इसके बाद यह देखना होगा कि कानून बनने पर ट्रंप प्रशासन 100% तक टैरिफ की शक्ति का इस्तेमाल करता है या इसे बातचीत के दबाव के रूप में रखता है।
भारत के लिए समानांतर रास्ता व्यापार वार्ता को आगे बढ़ाना और ऊर्जा आपूर्ति के विकल्प खुले रखना होगा। अमेरिका के साथ किसी समझौते में रूसी तेल खरीद की मात्रा, ऊर्जा sourcing और संभावित tariff relief महत्वपूर्ण मुद्दे बन सकते हैं।
नवारो का बयान कम से कम यह संकेत देता है कि बातचीत का दरवाजा बंद नहीं हुआ है। लेकिन अभी किसी अंतिम समाधान की घोषणा नहीं हुई है।
ट्रंप और मोदी के अच्छे रिश्तों पर अमेरिकी अधिकारी पीटर नवारो का भरोसा भारत-अमेरिका संबंधों में तनाव के बीच एक सकारात्मक संकेत जरूर है। लेकिन रूसी तेल का विवाद केवल दो नेताओं की व्यक्तिगत दोस्ती से हल होने वाला मामला नहीं है।
100% टैरिफ अभी भारत पर लागू नहीं हुआ है। अमेरिकी सीनेट से पारित विधेयक राष्ट्रपति को संभावित रूप से ऐसी कार्रवाई का अधिकार देने की दिशा में बढ़ा है, जबकि आगे की विधायी प्रक्रिया बाकी है।
भारत के सामने ऊर्जा सुरक्षा और अमेरिकी बाजार तक पहुंच के बीच संतुलन की चुनौती है। अमेरिका के सामने रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने और भारत जैसे महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार के साथ संबंध बनाए रखने की दोहरी चुनौती है।
नवारो का बयान बातचीत की गुंजाइश दिखाता है। लेकिन असली परीक्षा तब होगी जब दोनों देश रूसी तेल, टैरिफ और व्यापक trade framework पर ठोस शर्तों के साथ बातचीत की मेज पर बैठेंगे।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।