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ईरान युद्ध लाइव: अराघची की होर्मुज पर अमेरिका को चेतावनी

Shah Times 2026-08-13 15:22:36
ईरान युद्ध लाइव: अराघची की होर्मुज पर अमेरिका को चेतावनी
  1. ईरान युद्ध लाइव: अराघची की होर्मुज पर अमेरिका को चेतावनी
  2. होर्मुज पर अमेरिका-ईरान आमने-सामने, अराघची का कड़ा संदेश
  3. होर्मुज पर ट्रंप के दावे के बाद ईरान ने दिया सख़्त जवाब


ईरान और अमेरिका के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर टकराव तेज़ है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जलडमरूमध्य पर “टोटल कंट्रोल” का दावा किया, जबकि ईरान ने इसे खारिज कर अपने नियंत्रण की बात दोहराई। विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अमेरिकी रुख को गलत आकलन बताया। युद्ध खत्म करने की बातचीत भी ठप है।


तेहरान, ईरान | 13 अगस्त 2026 | शाह टाइम्स

By Mohd Haris


होर्मुज पर बढ़ा ईरान-अमेरिका टकराव

ईरान युद्ध के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर तेहरान और वॉशिंगटन के बीच बयानबाज़ी और सामरिक टकराव तेज़ हो गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि अमेरिका के पास रणनीतिक जलमार्ग पर “टोटल कंट्रोल” है। इसके जवाब में ईरान ने कहा है कि होर्मुज इस्लामिक रिपब्लिक के नियंत्रण और प्रबंधन में है।

ईरानी पक्ष का कहना है कि अमेरिका को होर्मुज की स्थिति को लेकर “बड़ी गलतफहमी” है। विदेश मंत्री अब्बास अराघची के रुख के मुताबिक, जलडमरूमध्य को खोलना किसी एकतरफा अमेरिकी मांग का विषय नहीं है। इसके लिए ईरान की शर्तों और सुरक्षा चिंताओं को संबोधित करना होगा।

यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब जून में हुआ अंतरिम समझौता टूट चुका है और ईरान-अमेरिका के बीच स्थायी युद्धविराम की कोशिशें फिलहाल आगे नहीं बढ़ रही हैं।

अमेरिका का ‘टोटल कंट्रोल’ दावा

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 12 अगस्त को कहा कि अमेरिका के पास होर्मुज जलडमरूमध्य पर “टोटल कंट्रोल” है। यह बयान उस समय आया जब ईरान के साथ युद्ध समाप्त करने की कूटनीतिक कोशिशें पहले से गतिरोध में हैं।

तेहरान ने इस दावे को स्वीकार नहीं किया। ईरान की बासीज़ पैरामिलिटरी के प्रमुख हुसैन ताएब ने 13 अगस्त को कहा कि होर्मुज “इस्लामिक रिपब्लिक के नियंत्रण और प्रबंधन” में है। उन्होंने अमेरिकी दबाव और संभावित संघर्ष को लेकर वॉशिंगटन की रणनीति की आलोचना की।

इस तरह दोनों पक्ष एक ही जलमार्ग पर बिल्कुल विपरीत नैरेटिव पेश कर रहे हैं। अमेरिका अपने सैन्य प्रभाव और समुद्री क्षमता को रेखांकित कर रहा है, जबकि ईरान यह संदेश दे रहा है कि युद्ध के बावजूद वह जलडमरूमध्य को नियंत्रित करने की क्षमता रखता है।

अराघची की चेतावनी का मतलब

ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची का संदेश केवल बयानबाज़ी तक सीमित नहीं है। तेहरान लगातार यह संकेत दे रहा है कि होर्मुज को दोबारा खोलने का फैसला व्यापक युद्धविराम और अमेरिकी सैन्य नीति से जुड़ा होगा।

ईरान ने पहले ही कई शर्तें सामने रखी हैं। इनमें अमेरिकी सैन्य मौजूदगी में कमी, प्रतिबंधों को हटाना, ईरानी संपत्तियों को मुक्त करना और युद्ध से हुए नुकसान की भरपाई जैसे मुद्दे शामिल हैं।

इसका मतलब यह है कि होर्मुज अब केवल समुद्री यातायात का मुद्दा नहीं रह गया है। यह ईरान और अमेरिका के बीच संभावित समझौते में एक केंद्रीय सौदेबाज़ी का मुद्दा बन चुका है।

होर्मुज इतना महत्वपूर्ण क्यों है

होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच स्थित एक संकरा समुद्री रास्ता है। युद्ध से पहले दुनिया के तेल और एलएनजी कारोबार का लगभग पांचवां हिस्सा इस रास्ते से गुजरता था।

इसी वजह से होर्मुज पर लंबे समय तक व्यवधान का सीधा असर वैश्विक ऊर्जा बाज़ार पर पड़ता है। तेल की कीमतों में तेज़ उतार-चढ़ाव, शिपिंग बीमा की लागत और ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा पहले ही इस संकट से प्रभावित हो चुके हैं।

रॉयटर्स के मुताबिक, युद्ध शुरू होने के बाद ब्रेंट क्रूड की कीमत एक समय 126 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी। बाद में कीमतों में कमी आई, लेकिन होर्मुज को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।

ईरान ने बातचीत में क्या रुख अपनाया

ईरान और अमेरिका के बीच जून में एक अंतरिम समझौता हुआ था। इसका उद्देश्य सभी मोर्चों पर सैन्य अभियानों को रोकना और आगे स्थायी समझौते की दिशा में बढ़ना था।

लेकिन यह व्यवस्था जल्द ही टूट गई। ट्रंप ने 7 जुलाई को समझौते को समाप्त घोषित किया और ईरान ने इसके बाद इसे निलंबित बताया।

अब मध्यस्थों के जरिए समझौते को दोबारा सक्रिय करने की कोशिश हुई है, लेकिन एक वरिष्ठ ईरानी सूत्र ने रॉयटर्स को बताया कि इस दिशा में “बिल्कुल कोई प्रगति” नहीं हुई है। ईरान का कहना है कि अमेरिका ने अंतरिम समझौते की अपनी प्रतिबद्धताएं पूरी नहीं कीं।

होर्मुज खोलने को लेकर शर्तें

तेहरान का रुख साफ है कि केवल समुद्री मार्ग खोलने की अमेरिकी मांग स्वीकार नहीं की जाएगी।

ईरान ने युद्ध समाप्त करने, अमेरिकी सैन्य मौजूदगी हटाने, बंदरगाहों की नाकाबंदी समाप्त करने, प्रतिबंध हटाने और जमे हुए ईरानी assets जारी करने जैसी मांगें रखी हैं। साथ ही युद्ध से हुए नुकसान की भरपाई भी ईरानी मांगों में शामिल है।

ईरान और ओमान के बीच जहाजों के आवागमन से जुड़ी एक अस्थायी व्यवस्था पर भी बातचीत हुई है। लेकिन तेहरान ने साफ किया है कि किसी तकनीकी या समुद्री व्यवस्था का मतलब अपने आप होर्मुज को पूरी तरह खोलना नहीं होगा।

ईरान युद्ध लंबा खिंचने की तैयारी में

रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान अब युद्ध को लंबा खिंचने की संभावना को ध्यान में रखते हुए अपनी सैन्य रणनीति को बदल रहा है। कूटनीतिक कोशिशों में गतिरोध और होर्मुज को लेकर टकराव ने तेहरान की उम्मीदों को कम किया है कि जल्द कोई व्यापक समाधान निकल आएगा।

फाइनेंशियल टाइम्स से बातचीत में मध्य पूर्व मामलों के विशेषज्ञ वाली नस्र ने भी आकलन दिया कि ईरानी नेतृत्व मौजूदा संघर्ष को लंबे दौर के टकराव के रूप में देख रहा है। उनके अनुसार, तेहरान होर्मुज के सवाल को व्यापक रणनीतिक लाभ हासिल करने के साधन के रूप में देख रहा है।

यह विशेषज्ञ आकलन है, आधिकारिक ईरानी नीति दस्तावेज नहीं। इसलिए इसे तेहरान के संभावित रणनीतिक नज़रिए के तौर पर समझना उचित होगा।

क्या अमेरिका सचमुच होर्मुज को नियंत्रित कर रहा है?

यहां सबसे अहम फर्क “सैन्य क्षमता” और “स्थायी प्रशासनिक नियंत्रण” के बीच है।

अमेरिका के पास खाड़ी क्षेत्र में बड़ी सैन्य और नौसैनिक क्षमता है। लेकिन ईरान का दावा है कि वह स्थानीय समुद्री भूगोल, तटीय मिसाइलों, ड्रोन और अन्य क्षमताओं के जरिए जलडमरूमध्य में आवागमन को प्रभावित कर सकता है।

इसलिए ट्रंप का “टोटल कंट्रोल” दावा और ईरान का “कंट्रोल एंड मैनेजमेंट” दावा एक ही चीज़ नहीं है। दोनों पक्ष अपनी-अपनी सैन्य और राजनीतिक स्थिति को मजबूत करने वाला नैरेटिव पेश कर रहे हैं। उपलब्ध रिपोर्टों से यह स्थापित नहीं होता कि किसी एक पक्ष ने पूरे जलमार्ग पर निर्विवाद और स्थायी नियंत्रण हासिल कर लिया है।

वैश्विक तेल बाज़ार पर असर

होर्मुज संकट का सबसे बड़ा आर्थिक असर ऊर्जा बाज़ार पर पड़ता है। दुनिया के बड़े तेल और गैस उत्पादक देशों के निर्यात के लिए यह समुद्री मार्ग बेहद अहम है।

युद्ध के दौरान आपूर्ति बाधित होने की आशंका ने तेल कीमतों को ऊपर धकेला। हालांकि बाजार ने बाद में कुछ राहत दिखाई, लेकिन हर नई सैन्य घटना और कूटनीतिक विफलता कीमतों में फिर उतार-चढ़ाव पैदा कर सकती है।

भारत, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और यूरोप जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देशों के लिए यह संकट खास महत्व रखता है। लंबे समय तक व्यवधान रहने पर ऊर्जा आयात लागत, परिवहन खर्च और महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है।

शिपिंग पर नया दबाव

होर्मुज के अलावा लाल सागर और बाब-अल-मंदेब भी संघर्ष के असर में हैं। 11 अगस्त को अलग-अलग घटनाओं में एक छोटे मालवाहक जहाज पर संदिग्ध हूती हमला हुआ, जिसमें चार चालक दल के सदस्यों की मौत की रिपोर्ट आई। उसी दिन अमेरिकी सैन्य बलों ने पनामा-ध्वज वाले एक मालवाहक जहाज की steering gear को निष्क्रिय करने के लिए दो Hellfire मिसाइल दागने की जानकारी दी।

इन घटनाओं से यह स्पष्ट होता है कि मौजूदा संकट केवल ईरान और अमेरिका तक सीमित समुद्री विवाद नहीं है। फारस की खाड़ी से लेकर लाल सागर तक commercial shipping के लिए जोखिम बढ़ा हुआ है।

ईरान का रणनीतिक दांव

ईरान के लिए होर्मुज एक महत्वपूर्ण bargaining chip बन गया है। तेहरान के पास इसे युद्धविराम और प्रतिबंधों पर बातचीत में इस्तेमाल करने का अवसर है।

फाइनेंशियल टाइम्स के विश्लेषण के मुताबिक, ईरान युद्ध के बाद क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था में अमेरिकी भूमिका को चुनौती देने और आर्थिक राहत हासिल करने की कोशिश कर सकता है। इसमें तेल बिक्री, प्रतिबंध हटाने और होर्मुज से जुड़े आर्थिक लाभ जैसे मुद्दे शामिल हो सकते हैं।

लेकिन इस रणनीति में जोखिम भी बड़ा है। लंबे समय तक जलमार्ग बाधित रहने से ईरान पर भी आर्थिक दबाव बढ़ सकता है और खाड़ी के दूसरे देशों के साथ तनाव गहरा सकता है।

अमेरिका के सामने चुनौती

वॉशिंगटन के सामने अब दो लक्ष्य एक साथ हैं। पहला, होर्मुज में commercial shipping की सुरक्षा बहाल करना। दूसरा, ईरान के साथ ऐसा समझौता करना जिससे युद्ध फिर शुरू होने की संभावना कम हो।

समस्या यह है कि दोनों पक्षों की शुरुआती शर्तें एक-दूसरे से काफी दूर हैं। अमेरिका जलमार्ग को खोलने पर जोर दे रहा है, जबकि ईरान पहले व्यापक सुरक्षा और आर्थिक रियायतों की मांग कर रहा है।

इसी वजह से मौजूदा संकट में सैन्य दबाव और डिप्लोमैटिक bargaining साथ-साथ चल रही है।

क्या बातचीत फिर शुरू हो सकती है?

फिलहाल स्थिति गतिरोध की है। मध्यस्थों के जरिए संदेशों का आदान-प्रदान जारी है, लेकिन ईरान का कहना है कि इसे औपचारिक बातचीत नहीं माना जा सकता।

ओमान इस प्रक्रिया में अहम भूमिका निभा रहा है। होर्मुज के समुद्री यातायात को लेकर ईरान और ओमान के बीच संभावित अस्थायी व्यवस्था भी इसी कूटनीतिक चैनल का हिस्सा है।

अगर इस चैनल से पहले shipping व्यवस्था और फिर व्यापक युद्धविराम पर सहमति बनती है, तो तनाव कम होने की राह खुल सकती है। लेकिन मौजूदा स्थिति में ऐसा समझौता निश्चित नहीं है।

ग्राउंड रियलिटी

होर्मुज को लेकर दोनों पक्षों के बयानों के बीच सबसे जरूरी बात यह है कि दावों और स्वतंत्र रूप से सत्यापित स्थिति को अलग रखा जाए।

ईरान अपने नियंत्रण का दावा कर रहा है। अमेरिका अपने “टोटल कंट्रोल” का दावा कर रहा है। इन दोनों दावों के बीच समुद्री यातायात, सैन्य तैनाती और जहाजों की वास्तविक आवाजाही की स्थिति लगातार बदल सकती है।

इसलिए किसी एक बयान को पूरे संकट की अंतिम तस्वीर मानना जल्दबाजी होगी।

आगे क्या होगा

आने वाले दिनों में तीन मुद्दे निर्णायक रहेंगे। पहला, क्या होर्मुज से commercial shipping के लिए कोई व्यावहारिक व्यवस्था बनती है। दूसरा, क्या अमेरिका और ईरान जून के अंतरिम समझौते की ओर लौटने का रास्ता निकालते हैं। तीसरा, क्या युद्ध का दायरा खाड़ी और लाल सागर के दूसरे हिस्सों में और फैलता है।

अभी उपलब्ध संकेतों से तत्काल स्थायी युद्धविराम की पुष्टि नहीं होती। उलटे, ईरान की सैन्य तैयारी और अमेरिकी दबाव दोनों जारी हैं।

निष्कर्ष

होर्मुज जलडमरूमध्य अब ईरान युद्ध का सबसे अहम रणनीतिक मोर्चा बन चुका है। अमेरिका इसे अपनी सैन्य क्षमता के जरिए सुरक्षित करने का दावा कर रहा है, जबकि ईरान अपने नियंत्रण और प्रबंधन की बात कर रहा है। इसी विरोधी नैरेटिव के बीच अराघची की चेतावनी सामने आई है।

मौजूदा स्थिति में सबसे बड़ी बाधा भरोसे की कमी है। ईरान अमेरिका से सैन्य और आर्थिक रियायतें चाहता है, जबकि वॉशिंगटन पहले समुद्री मार्ग खोलने और ईरान पर दबाव बनाए रखने पर जोर दे रहा है।

होर्मुज पर कोई भी लंबा व्यवधान वैश्विक ऊर्जा और शिपिंग बाज़ार को प्रभावित करेगा। इसलिए इस संकट का अगला चरण केवल तेहरान और वॉशिंगटन के लिए नहीं, बल्कि पूरी वैश्विक इकोनॉमी के लिए महत्वपूर्ण है।

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शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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