एक दशक पहले भारत में डिजिटल भुगतान मौजूद था, लेकिन रोजमर्रा की खरीदारी में नकद का दबदबा कायम था। बैंक ट्रांसफर, कार्ड और डिजिटल वॉलेट के अलग-अलग सिस्टम के बीच आम ग्राहक के लिए भुगतान प्रक्रिया हमेशा आसान नहीं थी। अगस्त 2016 में यूपीआई के सार्वजनिक इस्तेमाल की शुरुआत ने इस तस्वीर को बदलने की दिशा में बड़ा कदम रखा। आज चाय की दुकान से लेकर बड़े कारोबारी प्रतिष्ठान तक क्यूआर कोड के जरिए भुगतान आम बात है। पैसे भेजने के लिए बैंक खाता नंबर और आईएफएससी जैसी लंबी जानकारी याद रखने की जरूरत भी काफी हद तक खत्म हो गई है। यूपीआई की सबसे बड़ी ताकत इसकी इंटरऑपरेबिलिटी रही। अलग-अलग बैंकों और पेमेंट ऐप के बीच एक साझा ढांचा तैयार हुआ, जिससे ग्राहक और कारोबारी एक-दूसरे को अलग बैंक या ऐप इस्तेमाल करने के बावजूद भुगतान कर सके।
नई दिल्ली, भारत|29 अगस्त 2026|शाह टाइम्स
By Mohd Haris
यूपीआई की शुरुआत अप्रैल 2016 में पायलट आधार पर 21 सदस्य बैंकों के साथ हुई थी। अगस्त 2016 में इसे आम लोगों के लिए उपलब्ध कराया गया। दिसंबर 2016 में भीम ऐप के लॉन्च ने सीधे बैंक-टू-बैंक भुगतान को आम उपयोगकर्ताओं तक पहुंचाने में मदद की। एक दशक बाद जुलाई 2026 तक यूपीआई से जुड़े लाइव बैंकों की संख्या 741 हो चुकी थी। जून 2026 तक प्लेटफॉर्म पर 55.49 करोड़ उपयोगकर्ता ऑनबोर्ड हो चुके थे। यह विस्तार केवल तकनीकी बदलाव नहीं था। इसने बैंकिंग और भुगतान की बुनियादी संरचना को आम बाजार, छोटे कारोबार और व्यक्तिगत लेन-देन के साथ जोड़ दिया।
वित्त वर्ष 2016-17 में यूपीआई पर साल भर में 1.78 करोड़ लेन-देन हुए थे। वित्त वर्ष 2025-26 में यह आंकड़ा बढ़कर 24,162 करोड़ से अधिक हो गया। यानी एक दशक में लेन-देन की संख्या करीब 13,000 गुना बढ़ी। लेन-देन की रकम में भी जबरदस्त विस्तार हुआ। 2016-17 में यूपीआई के जरिए करीब ₹0.07 लाख करोड़ की रकम ट्रांसफर हुई थी। 2025-26 में यह आंकड़ा करीब ₹314 लाख करोड़ पहुंच गया। जुलाई 2026 में ही यूपीआई पर 2,365.8 करोड़ लेन-देन हुए और इनकी कुल वैल्यू ₹29.87 लाख करोड़ रही। यह उस दशक का अब तक का सबसे ऊंचा मासिक ट्रांजैक्शन वॉल्यूम था।
यूपीआई की सफलता में क्यूआर भुगतान की भूमिका अहम रही। 2017 में डायनेमिक क्यूआर की शुरुआत हुई। इससे कारोबारी भुगतान की प्रक्रिया आसान हुई और ग्राहक को रकम तथा प्राप्तकर्ता की जानकारी मैन्युअली दर्ज करने की जरूरत कम हुई। इसका असर छोटे कारोबार पर भी पड़ा। किराना दुकान, रेहड़ी, कैफे, टैक्सी और दूसरे छोटे कारोबारी डिजिटल भुगतान स्वीकार करने लगे। यूपीआई ने भुगतान स्वीकार करने के लिए महंगे कार्ड टर्मिनल की जरूरत को भी कई छोटे कारोबारियों के लिए कम किया। एक प्रिंटेड क्यूआर कोड के जरिए भुगतान स्वीकार करना अधिक सरल हो गया।
समय के साथ यूपीआई में कई नई सुविधाएं जोड़ी गईं। 2018 में यूपीआई 2.0 के साथ इनवॉयस, साइन किए गए इंटेंट और क्यूआर, रिकरिंग पेमेंट मैंडेट तथा ओवरड्राफ्ट अकाउंट लिंकिंग जैसी सुविधाएं आईं। 2019 में यूपीआई ने एक और बड़ा मुकाम हासिल किया। अक्टूबर 2019 में एक महीने में 1 अरब से अधिक लेन-देन हुए। इसी दौरान शेयर बाजार में आईपीओ आवेदन के लिए भी यूपीआई को भुगतान विकल्प बनाया गया। इसके बाद यूपीआई ऑटोपे ने सब्सक्रिप्शन, बीमा प्रीमियम, एसआईपी और ईएमआई जैसे नियमित भुगतान को आसान बनाया।
भारत में डिजिटल भुगतान की एक बड़ी चुनौती उन लोगों तक पहुंचना थी, जिनके पास स्मार्टफोन या तेज इंटरनेट सुविधा नहीं थी। इसी जरूरत को देखते हुए यूपीआई 123पे शुरू किया गया। इसके जरिए फीचर फोन इस्तेमाल करने वाले लोग आईवीआर, मिस्ड कॉल और दूसरी सुविधाओं के जरिए भुगतान कर सकते हैं। यूपीआई लाइट ने छोटे मूल्य के भुगतान को अधिक सरल बनाया। 2024 में यूपीआई सर्किल की शुरुआत हुई। इसमें प्राथमिक उपयोगकर्ता अपने बैंक खाते से तय सीमा के भीतर दूसरे उपयोगकर्ता को भुगतान की अनुमति दे सकता है। इससे परिवार और भरोसेमंद समूहों में डिजिटल भुगतान के नए रास्ते खुले।
यूपीआई का विकास केवल जमा खाते से भुगतान तक सीमित नहीं रहा। 2023 में क्रेडिट लाइन ऑन यूपीआई की शुरुआत हुई, जिसके जरिए पात्र उपयोगकर्ता प्री-अप्रूव्ड बैंक क्रेडिट लाइन को भुगतान के स्रोत के तौर पर इस्तेमाल कर सकते हैं। क्रेडिट कार्ड को भी यूपीआई से जोड़ा गया। इससे भुगतान इकोसिस्टम का दायरा बढ़ा और यूपीआई धीरे-धीरे एक व्यापक वित्तीय प्लेटफॉर्म की दिशा में आगे बढ़ा।
यूपीआई की कहानी अब केवल भारत की घरेलू भुगतान व्यवस्था तक सीमित नहीं है। जुलाई 2026 तक यह 11 विदेशी देशों में स्वीकृति या क्रॉस-बॉर्डर रेमिटेंस के लिए लाइव था। इनमें भूटान, नेपाल, सिंगापुर, संयुक्त अरब अमीरात, फ्रांस, श्रीलंका, मॉरीशस, कतर, कंबोडिया, ग्रीस और मालदीव शामिल हैं। जून 2026 में कंबोडिया में यूपीआई स्वीकार किए जाने की शुरुआत हुई। इसी महीने भारत और ग्रीस के बीच यूपीआई आधारित क्रॉस-बॉर्डर रेमिटेंस शुरू हुआ। 30 जुलाई को भारत और मालदीव के बीच यूपीआई और मालदीव के इंस्टेंट पेमेंट सिस्टम के बीच रेमिटेंस सुविधा शुरू हुई। इस विस्तार का असर भारत आने वाले पर्यटकों, विदेश में रहने वाले भारतीयों और सीमा पार भुगतान करने वाले कारोबारियों पर पड़ सकता है।
यूपीआई की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक उसका अंतरराष्ट्रीय पैमाना है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2025 में वैश्विक रियल-टाइम पेमेंट वॉल्यूम में यूपीआई की हिस्सेदारी करीब 49% थी। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भी इसे दुनिया की सबसे बड़ी रियल-टाइम पेमेंट प्रणाली के रूप में रेखांकित किया है। यह स्थिति भारत को डिजिटल पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में एक अहम स्थान देती है। खास बात यह है कि यूपीआई का मॉडल सार्वजनिक डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और निजी कंपनियों के ऐप्स के संयुक्त इकोसिस्टम पर आधारित है।
यूपीआई की अगली चुनौती केवल ट्रांजैक्शन की संख्या बढ़ाना नहीं है। साइबर फ्रॉड, फर्जी क्यूआर कोड, सोशल इंजीनियरिंग, अकाउंट टेकओवर और डिजिटल ठगी के मामले सुरक्षा व्यवस्था के सामने लगातार चुनौती रखते हैं। इसके अलावा यूपीआई इकोसिस्टम की आर्थिक स्थिरता पर भी बहस बढ़ी है। अगस्त 2026 में सरकार ने पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट में बदलाव के जरिए डिजिटल पेमेंट पर शुल्क लगाने की कानूनी बाधा हटाई है। हालांकि शुल्क की दर और उसका दायरा अलग अधिसूचना के जरिए तय होना है। रिपोर्टों में बड़े व्यापारियों और ₹2,000 से ऊपर के लेन-देन पर संभावित मर्चेंट डिस्काउंट रेट की चर्चा हुई है। यह बदलाव यूपीआई के उस पुराने मॉडल के लिए महत्वपूर्ण होगा, जिसमें ग्राहकों और व्यापारियों के लिए भुगतान काफी हद तक शुल्क-मुक्त रहा है।
यूपीआई का खुला ढांचा कई कंपनियों को एक ही भुगतान नेटवर्क पर प्रतिस्पर्धा करने की सुविधा देता है। लेकिन ऐप स्तर पर बाजार हिस्सेदारी का असंतुलन भी चर्चा का विषय रहा है। जुलाई 2026 में डिजिटल मर्चेंट पेमेंट्स में यूपीआई की हिस्सेदारी रिकॉर्ड 77.3% तक पहुंच गई। इसी दौरान कार्ड आधारित भुगतान की हिस्सेदारी पर दबाव देखा गया। इसका मतलब है कि यूपीआई ने केवल नकद भुगतान को चुनौती नहीं दी। उसने कार्ड और दूसरे डिजिटल पेमेंट माध्यमों की भूमिका को भी बदल दिया है।
यूपीआई का पहला दशक मुख्य तौर पर पहुंच, पैमाने और स्वीकार्यता बनाने का दौर रहा। अगला दशक सुरक्षा, वित्तीय स्थिरता, अंतरराष्ट्रीय विस्तार और नई वित्तीय सेवाओं के साथ एकीकरण की परीक्षा लेगा। ग्रामीण और छोटे कारोबार क्षेत्र में डिजिटल भुगतान का विस्तार अभी भी एक महत्वपूर्ण एजेंडा है। साथ ही सिस्टम की विश्वसनीयता बनाए रखना जरूरी होगा, क्योंकि करोड़ों लोग अब रोजमर्रा की जरूरतों के लिए इसी नेटवर्क पर निर्भर हैं। यूपीआई के 10 साल का सबसे बड़ा असर इसकी तकनीकी क्षमता से ज्यादा रोजमर्रा के व्यवहार में दिखाई देता है। भुगतान के लिए नकद गिनने, छुट्टे तलाशने या बैंक विवरण साझा करने की जरूरत कई स्थितियों में खत्म हुई है। एक दशक में 1.78 करोड़ सालाना लेन-देन से 24,162 करोड़ से ज्यादा सालाना लेन-देन तक पहुंचना इसी बदलाव का पैमाना बताता है। भारत की डिजिटल भुगतान यात्रा का अगला अध्याय अब इस बात पर निर्भर करेगा कि यूपीआई अपनी मौजूदा रफ्तार के साथ सुरक्षा, टिकाऊ कारोबार मॉडल और वैश्विक विस्तार के बीच कितना संतुलन बना पाता है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।