मुर्मु ने गिनाए विकास और कल्याण के बड़े आंकड़े
गरीबी, राशन और डिजिटल भुगतान पर राष्ट्रपति का जोर
जन धन से डिजिटल इंडिया तक, राष्ट्रपति ने क्या कहा?
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने 80वें स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर समावेशी विकास, गरीबी में कमी, जन धन, मुफ्त राशन, स्वास्थ्य कवरेज और डिजिटल भुगतान की प्रगति रेखांकित की। सरकारी आंकड़े योजनाओं की पहुंच दिखाते हैं, जबकि मूल्यांकन के लिए रोजगार, लाभ की गुणवत्ता और असमानताओं पर निगरानी जरूरी है।
📍 नई दिल्ली
🗓️14 अगस्त 2026
✍️ Asif Khan
राष्ट्रपति मुर्मु का भाषण, कल्याणकारी योजनाओं और डिजिटल बदलाव का लेखा-जोखा
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने 80वें स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्र को संबोधित करते हुए देश के वंचित तबकों के उत्थान, वित्तीय समावेशन, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य कवरेज, कृषि सहायता और डिजिटल बुनियादी ढांचे को प्रमुखता दी। उनका भाषण सरकार की कल्याणकारी नीतियों और आर्थिक प्रगति को एक साथ देखने का अवसर देता है।
राष्ट्रपति ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में 25 करोड़ से अधिक लोग गरीबी से बाहर निकले हैं। इस दावे का सरकारी आंकड़ों से एक महत्वपूर्ण संदर्भ मिलता है। नीति आयोग के बहुआयामी गरीबी संबंधी अध्ययन के अनुसार 2013-14 से 2022-23 के बीच 24.82 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी से बाहर आए। इसलिए 25 करोड़ का आंकड़ा निकटतम पूर्णांक के रूप में समझा जाना चाहिए।
क्या हुआ?
राष्ट्रपति का संबोधन ऐसे समय आया है जब भारत अपनी आर्थिक वृद्धि, सामाजिक सुरक्षा और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर को विकास की प्रमुख धुरी के रूप में पेश कर रहा है। उन्होंने प्रधानमंत्री जन धन योजना के तहत करीब 59 करोड़ खाताधारकों के बैंकिंग व्यवस्था से जुड़ने और इनमें 32 करोड़ से अधिक महिलाओं की भागीदारी का उल्लेख किया।
वित्तीय सेवा विभाग के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 22 जुलाई 2026 तक जन धन खातों की कुल संख्या 58.84 करोड़ थी। इनमें महिला लाभार्थियों की संख्या 32.79 करोड़ दर्ज की गई। लिहाजा राष्ट्रपति द्वारा इस्तेमाल किए गए करीब 59 करोड़ और 32 करोड़ से अधिक के आंकड़े आधिकारिक डेटा से मेल खाते हैं।
राष्ट्रपति ने 80 करोड़ से अधिक लोगों को मुफ्त खाद्यान्न उपलब्ध कराने का भी उल्लेख किया। खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग के मुताबिक वर्तमान में 80.48 करोड़ लाभार्थी पीएमजीकेएवाई के तहत मुफ्त खाद्यान्न वितरण के लिए चिन्हित हैं, जबकि योजना का निर्धारित कवरेज 81.35 करोड़ है।
पूरा संदर्भ क्या है?
राष्ट्रपति के भाषण का केंद्रीय संदेश कल्याणकारी योजनाओं की पहुंच और आर्थिक विकास के बीच संबंध पर केंद्रित रहा। जन धन खाते वित्तीय समावेशन का आधार बने हैं। मुफ्त राशन खाद्य सुरक्षा का माध्यम है। आयुष्मान भारत स्वास्थ्य खर्च से आर्थिक जोखिम कम करने का प्रयास करता है। डिजिटल भुगतान राज्य और नागरिक के बीच आर्थिक लेनदेन को अधिक औपचारिक बनाने की दिशा में बढ़ा है।
इन उपलब्धियों को केवल लाभार्थियों की संख्या से देखना पर्याप्त नहीं है। असली नीति मूल्यांकन में यह भी देखना जरूरी है कि पात्र लोगों तक लाभ कितनी नियमितता से पहुंचता है, सेवाओं की गुणवत्ता कैसी है और रोजगार तथा आय में इसका कितना स्थायी असर पड़ता है।
पृष्ठभूमि और समयरेखा
प्रधानमंत्री जन धन योजना अगस्त 2014 में शुरू हुई थी और इसका उद्देश्य बैंकिंग सेवाओं से वंचित आबादी को औपचारिक वित्तीय व्यवस्था से जोड़ना था। जुलाई 2026 तक इसके खातों की संख्या 58.84 करोड़ तक पहुंच चुकी है।
खाद्य सुरक्षा के मोर्चे पर कोविड-19 दौर में शुरू हुई मुफ्त खाद्यान्न व्यवस्था को बाद में आगे बढ़ाया गया। केंद्र ने जनवरी 2024 से लगभग 81.35 करोड़ पात्र लाभार्थियों के लिए पांच वर्षों तक मुफ्त खाद्यान्न जारी रखने का फैसला किया था।
बहुआयामी गरीबी के संदर्भ में नीति आयोग ने 2013-14 से 2022-23 के बीच 24.82 करोड़ लोगों के गरीबी से बाहर आने का अनुमान प्रस्तुत किया है। यह आंकड़ा आय आधारित गरीबी के बजाय स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर से जुड़े कई संकेतकों पर आधारित है।
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प्रमुख पक्षकारों की स्थिति
राष्ट्रपति का संबोधन संवैधानिक पद से आया राष्ट्रीय संदेश है। इसमें सरकार की योजनाओं और राष्ट्रीय उपलब्धियों का उल्लेख हुआ। सरकार लंबे समय से वित्तीय समावेशन, सामाजिक सुरक्षा और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर को विकास मॉडल के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में प्रस्तुत करती रही है।
नीति आयोग का गरीबी संबंधी आंकड़ा भी इसी व्यापक नीति परिप्रेक्ष्य को मजबूत करता है, लेकिन वह बहुआयामी गरीबी की विशिष्ट परिभाषा और उपलब्ध सर्वेक्षण आंकड़ों पर आधारित है। इसलिए इसे सीधे आय आधारित गरीबी के बराबर मानना उचित नहीं होगा।
स्वतंत्र नीति मूल्यांकन की दृष्टि से विपक्ष और नागरिक समाज की ओर से उठने वाले सवाल रोजगार, वास्तविक आय, ग्रामीण मांग, महंगाई और कल्याणकारी योजनाओं के अंतिम छोर तक पहुंच से जुड़े रहते हैं। इन सवालों का जवाब केवल लाभार्थी संख्या से नहीं मिलता।
साक्ष्य क्या बताते हैं?
सबसे मजबूत साक्ष्य उन क्षेत्रों में दिखाई देते हैं जहां सरकारी पोर्टल नियमित आंकड़े प्रकाशित करते हैं। जन धन के मामले में 58.84 करोड़ खाते और 32.79 करोड़ महिला लाभार्थी दर्ज हैं। खाद्य सुरक्षा में 80.48 करोड़ चिन्हित लाभार्थियों का आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध है।
आयुष्मान भारत के मामले में राष्ट्रपति ने करीब 60 करोड़ लोगों के कवरेज का उल्लेख किया। हालांकि जून 2026 के स्वास्थ्य मंत्रालय के आधिकारिक अपडेट में 44.14 करोड़ आयुष्मान कार्ड, 12.03 करोड़ अस्पताल में भर्ती और 36,218 सूचीबद्ध अस्पतालों का आंकड़ा दिया गया है। इसलिए 60 करोड़ का आंकड़ा और कार्डों की संख्या एक ही मापदंड नहीं हैं। दोनों को एक-दूसरे का पर्याय नहीं माना जाना चाहिए।
डिजिटल भुगतान के संदर्भ में भी एक अहम तथ्य सामने आता है। सरकार के वित्तीय सेवा विभाग की 2025-26 वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार एसीआई वर्ल्डवाइड के 2024 अध्ययन में भारत की हिस्सेदारी वैश्विक रियल-टाइम भुगतान लेनदेन में लगभग 49 प्रतिशत थी। इसलिए इसे “आधे से अधिक” कहने के बजाय करीब 49 प्रतिशत कहना अधिक सटीक है।
संभावित प्रभाव क्या होगा?
इन योजनाओं का व्यापक प्रभाव वित्तीय और सामाजिक सुरक्षा के विस्तार में देखा जा सकता है। बैंक खाते सरकारी हस्तांतरण के लिए आधार तैयार करते हैं। खाद्य सुरक्षा घरेलू खर्च पर दबाव कम करती है। स्वास्थ्य बीमा गंभीर बीमारी के समय परिवारों के आर्थिक संकट को सीमित करने का लक्ष्य रखता है।
लेकिन इन योजनाओं की अगली चुनौती कवरेज से गुणवत्ता की तरफ बढ़ना है। बैंक खाता खुलना वित्तीय सशक्तिकरण का पहला चरण है। सक्रिय उपयोग, ऋण तक पहुंच और वित्तीय साक्षरता उसके अगले चरण हैं।
इसी तरह स्वास्थ्य कार्ड बनना और वास्तविक समय पर गुणवत्तापूर्ण उपचार मिलना दो अलग परिणाम हैं। खाद्य सुरक्षा में भी लाभार्थी पहचान, वितरण व्यवस्था और पोषण गुणवत्ता की निरंतर निगरानी अहम रहेगी।
राजनीतिक और नीतिगत असर
राष्ट्रपति के भाषण ने सरकार की कल्याणकारी नीति को राष्ट्रीय विकास की व्यापक कथा से जोड़ा है। गरीबी में कमी, बैंकिंग पहुंच और डिजिटल भुगतान को एक साथ रखना नीति की उस दिशा को दर्शाता है जिसमें सामाजिक सुरक्षा और तकनीकी ढांचे को समानांतर आगे बढ़ाया जा रहा है।
नीतिगत बहस का अगला चरण परिणामों पर केंद्रित होना चाहिए। कितने खाते सक्रिय हैं? कितने परिवार लगातार खाद्य सुरक्षा से लाभान्वित हो रहे हैं? स्वास्थ्य कवरेज के बावजूद जेब से होने वाला खर्च कितना घटा है? डिजिटल भुगतान की पहुंच के साथ साइबर सुरक्षा और डिजिटल साक्षरता कितनी मजबूत हुई है?
आर्थिक और सामाजिक असर
भारत की आर्थिक वृद्धि पर राष्ट्रपति ने वैश्विक अस्थिरता के बीच जोर दिया। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने जुलाई 2026 के अपडेट में भारत की 2026 कैलेंडर-वर्ष वृद्धि का अनुमान 6.4 प्रतिशत रखा और भारत को सबसे तेज बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल किया। आईएमएफ के अनुसार वैश्विक वृद्धि का अनुमान इससे काफी कम है।
इससे राष्ट्रपति के आर्थिक संदेश को अंतरराष्ट्रीय संस्थागत अनुमान का समर्थन मिलता है, लेकिन विकास की गति और विकास के वितरण को अलग-अलग देखना जरूरी है। उच्च जीडीपी वृद्धि अपने आप में पर्याप्त सामाजिक परिणाम का प्रमाण नहीं है।
कृषि क्षेत्र में पीएम-किसान के अप्रैल-जुलाई 2026-27 चरण में 9.44 करोड़ से अधिक किसानों को लाभ मिला। राष्ट्रपति द्वारा किसान सम्मान निधि और किसान क्रेडिट कार्ड का उल्लेख इसी व्यापक कृषि समर्थन नीति के संदर्भ में देखा जा सकता है।
अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय मायने
डिजिटल भुगतान भारत की अंतरराष्ट्रीय पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। एसीआई वर्ल्डवाइड के अनुसार 2023 में भारत में लगभग 129.3 अरब रियल-टाइम भुगतान हुए, जो वैश्विक मात्रा का करीब 49 प्रतिशत था।
यूपीआई के विस्तार ने भारत को डिजिटल भुगतान के वैश्विक विमर्श में अलग स्थान दिया है। अब चुनौती इसकी घरेलू पहुंच को बनाए रखने के साथ सुरक्षा, डेटा संरक्षण, उपभोक्ता संरक्षण और अंतरराष्ट्रीय इंटरऑपरेबिलिटी को मजबूत करने की है।
कौन से सवाल अभी बाकी हैं?
सबसे बड़ा सवाल गरीबी से बाहर आने वाले लोगों की आर्थिक स्थिरता का है। नीति आयोग का आंकड़ा बहुआयामी गरीबी में सुधार दर्शाता है, लेकिन रोजगार की गुणवत्ता, आय की स्थिरता और सामाजिक गतिशीलता पर अलग-अलग संकेतकों की जरूरत बनी रहती है।
दूसरा सवाल कल्याणकारी योजनाओं की अंतिम छोर तक पहुंच का है। तीसरा सवाल डिजिटल व्यवस्था में साइबर सुरक्षा और डिजिटल साक्षरता का है। चौथा सवाल यह है कि तेज आर्थिक वृद्धि का लाभ विभिन्न राज्यों, वर्गों और ग्रामीण-शहरी आबादी में किस हद तक समान रूप से पहुंचता है।
आगे क्या होगा?
आगे की नीति बहस में लाभार्थियों की संख्या के साथ परिणाम आधारित आंकड़ों को अधिक महत्व देना जरूरी होगा। वित्तीय समावेशन में सक्रिय बैंकिंग उपयोग, स्वास्थ्य क्षेत्र में वास्तविक उपचार और आउट-ऑफ-पॉकेट खर्च, खाद्य सुरक्षा में पोषण परिणाम तथा डिजिटल भुगतान में सुरक्षा और भरोसा महत्वपूर्ण संकेतक होंगे।
आर्थिक मोर्चे पर वैश्विक ऊर्जा बाजार, भू-राजनीतिक तनाव और बाहरी मांग जैसे कारक भारत की वृद्धि को प्रभावित करते रहेंगे। आईएमएफ ने भी भारत की वृद्धि को मजबूत बताते हुए वैश्विक परिस्थितियों से जुड़े जोखिमों को रेखांकित किया है।
संपादकीय सम्पादकीय दृष्टिकोण
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के स्वतंत्रता दिवस संबोधन में भारत की विकास यात्रा के तीन प्रमुख पहलू सामने आए, सामाजिक सुरक्षा, वित्तीय समावेशन और डिजिटल बदलाव। सरकारी आंकड़े जन धन, मुफ्त खाद्यान्न, बहुआयामी गरीबी में कमी और डिजिटल भुगतान के बड़े पैमाने की पुष्टि करते हैं।
साथ ही, आंकड़ों की सही परिभाषा और मापदंड समझना जरूरी है। 25 करोड़ का गरीबी आंकड़ा नीति आयोग के 24.82 करोड़ के अनुमान के करीब है, डिजिटल भुगतान में वैश्विक हिस्सेदारी लगभग 49 प्रतिशत है और आयुष्मान भारत के मामले में कार्ड, परिवार और व्यक्ति आधारित कवरेज अलग-अलग मापदंड हैं।
इसलिए राष्ट्रपति का भाषण उपलब्धियों का एक राष्ट्रीय खाका पेश करता है, जबकि अगली नीति बहस का केंद्र कवरेज से आगे बढ़कर गुणवत्ता, रोजगार, आय, समानता और अंतिम छोर तक प्रभाव पर होना चाहिए।