2003 के एंटी-डकैती ऑपरेशन में बहादुरी दिखाने वाले पूर्व पुलिस अधिकारी विवेक सिंह चौहान को राष्ट्रपति ने प्रेसिडेंट्स मेडल फॉर गैलेंट्री देने की मंजूरी दी। मामला लंबे समय से अदालतों में लंबित था। केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को मंजूरी की जानकारी दी, जिसके बाद संबंधित कार्यवाही आगे बढ़ी और सम्मान का रास्ता साफ हुआ।
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नई दिल्ली | 21 अगस्त 2026 | Apurva Choudhary
पूर्व पुलिस अधिकारी गैलेंट्री मेडल मामले में बड़ा अपडेट
करीब 23 साल पुराने एक पुलिस ऑपरेशन से जुड़े सम्मान के मामले में अहम पेशरफ़्त हुई है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मध्य प्रदेश के पूर्व पुलिस अधिकारी विवेक सिंह चौहान को 24 जून 2003 की कार्रवाई के लिए प्रेसिडेंट्स मेडल फॉर गैलेंट्री देने की मंजूरी दे दी है। गृह मंत्रालय की 20 अगस्त 2026 की communication में मंजूरी की जानकारी दी गई और बताया गया कि पुरस्कार को भारत के राजपत्र में अधिसूचित किया जाएगा।
यह मामला इसलिए अहम है क्योंकि सम्मान की प्रक्रिया लंबे समय से अदालतों में चली आ रही थी। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के रिकॉर्ड के मुताबिक 2003 की कार्रवाई के बाद चौहान के लिए गैलेंट्री सम्मान की सिफारिश की गई थी, लेकिन पुरस्कार को लेकर केंद्र और अधिकारी के बीच कानूनी विवाद खड़ा हो गया। बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?
21 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ के सामने मामले की सुनवाई हुई। केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि राष्ट्रपति ने संबंधित प्रस्ताव की मंजूरी दे दी है।
अदालत के सामने रखी गई जानकारी के मुताबिक गृह मंत्रालय ने 20 अगस्त को इस संबंध में communication जारी किया था। इसमें कहा गया कि निर्धारित दिशा-निर्देशों के तहत प्रस्ताव की जांच के बाद राष्ट्रपति ने चौहान को 24 जून 2003 की कार्रवाई के लिए प्रेसिडेंट्स मेडल फॉर गैलेंट्री देने की मंजूरी दी है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस विकास को रिकॉर्ड पर लिया। चौहान की ओर से पेश वकील ने यह भी बताया कि मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में लंबित अवमानना कार्यवाही वापस ली जाएगी। इसके बाद शीर्ष अदालत ने माना कि मौजूदा आवेदन पर आगे किसी आदेश की आवश्यकता नहीं है।
2003 के ऑपरेशन में क्या हुआ था?
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार चौहान वर्ष 2003 में ग्वालियर जिले के घाटीगांव थाने में प्रभारी एसएचओ के तौर पर तैनात थे। 24 जून 2003 को डकैतों की मौजूदगी की सूचना मिलने के बाद वह पुलिस बल के साथ कार्रवाई के लिए पहुंचे थे।
अदालत के रिकॉर्ड के मुताबिक उस कार्रवाई में दो डकैत मारे गए थे और दो 12-बोर राइफल सहित कारतूस बरामद किए गए थे। कार्रवाई के दौरान चौहान भी घायल हुए थे।
मुठभेड़ के बाद मजिस्ट्रियल जांच हुई थी। हाईकोर्ट के रिकॉर्ड में दर्ज है कि जांच में चौहान को क्लीन चिट मिली थी। इसके बाद पुलिस अधिकारियों की ओर से उनके लिए आउट-ऑफ-टर्न प्रमोशन और प्रेसिडेंट्स पुलिस मेडल फॉर गैलेंट्री की सिफारिश की गई थी।
सम्मान की सिफारिश से विवाद तक कैसे पहुंचा मामला?
मामले में शुरुआती कानूनी लड़ाई कई साल पहले शुरू हुई थी। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने 2018 में राज्य सरकार को चौहान का मामला संबंधित केंद्रीय प्राधिकारी तक भेजने का निर्देश दिया था। इसके बाद राज्य सरकार ने 2019 में उनका नाम केंद्र को भेजा।
लेकिन अक्टूबर 2019 में गृह मंत्रालय के स्तर पर उनकी दावेदारी खारिज कर दी गई। इसके बाद चौहान ने फिर अदालत का रुख किया। दिसंबर 2024 में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने उनकी याचिका स्वीकार करते हुए केंद्र सरकार को गैलेंट्री अवॉर्ड देने की दिशा में कार्रवाई सुनिश्चित करने का निर्देश दिया।
हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद भी मामला पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। सम्मान के प्रकार को लेकर एक अहम कानूनी विवाद सामने आया, क्योंकि केंद्र की ओर से गैलेंट्री मेडल की मंजूरी की बात कही गई थी, जबकि चौहान का दावा प्रेसिडेंट्स मेडल फॉर गैलेंट्री को लेकर था।
गैलेंट्री मेडल और प्रेसिडेंट्स मेडल में क्या विवाद था?
फरवरी 2026 के मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के आदेश में इस अंतर को विस्तार से दर्ज किया गया था। अदालत ने कहा था कि सरकार की ओर से जिस गैलेंट्री मेडल की मंजूरी बताई गई थी, वह उस प्रेसिडेंट्स गैलेंट्री मेडल से अलग है, जिसकी मांग चौहान लगातार करते रहे थे।
हाईकोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि चौहान के पूरे मुकदमे का आधार प्रेसिडेंट्स मेडल फॉर गैलेंट्री था। इसलिए अदालत ने सामान्य गैलेंट्री मेडल की मंजूरी को अपने आदेश की पर्याप्त तामील नहीं माना।
यही विवाद आगे चलकर अवमानना कार्यवाही तक पहुंचा। हाईकोर्ट ने फरवरी 2026 में प्रथमदृष्टया माना था कि उसके निर्देश का पालन नहीं किया गया और संबंधित अधिकारी को अनुपालन का एक और मौका दिया था।
सुप्रीम कोर्ट तक मामला क्यों पहुंचा?
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की कार्यवाही के बाद केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड में गोविंद मोहन बनाम विवेक सिंह चौहान, एमए 2056/2026 इन एसएलपी (सी) नंबर 10821/2026 के रूप में यह मामला सूचीबद्ध रहा। 20 जुलाई और 7 अगस्त की सुप्रीम कोर्ट cause lists में भी यह मामला दर्ज था।
जुलाई में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र के रुख पर नाराज़गी जाहिर की थी। अदालत में सरकार की ओर से बताया गया था कि वह मामले का सकारात्मक समाधान निकालने की कोशिश कर रही है। 29 जुलाई की रिपोर्ट के अनुसार केंद्र ने 7 अगस्त तक समाधान की दिशा में आगे बढ़ने की बात कही थी।
इसके बाद मामला अगस्त में भी सुप्रीम कोर्ट की cause list में बना रहा। 18 अगस्त की सूची में भी गोविंद मोहन बनाम विवेक सिंह चौहान का मामला दर्ज था।
अब राष्ट्रपति की मंजूरी से क्या बदला?
सबसे अहम बदलाव यह है कि अब केंद्र ने अदालत को बताया है कि प्रेसिडेंट्स मेडल फॉर गैलेंट्री को राष्ट्रपति की मंजूरी मिल चुकी है। यानी पहले जिस सम्मान के स्वरूप को लेकर विवाद था, उसी सम्मान के लिए अब मंजूरी की जानकारी सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड में आ गई है।
अगला औपचारिक चरण भारत के राजपत्र में अधिसूचना जारी करना है। इसके बाद पुरस्कार की प्रशासनिक प्रक्रिया पूरी होने की दिशा में आगे बढ़ेगी।
हालांकि यह समझना जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं चौहान को पुरस्कार प्रदान नहीं किया। अदालत की भूमिका इस मामले में चल रही न्यायिक कार्यवाही के संदर्भ में केंद्र की अनुपालन स्थिति की निगरानी और रिकॉर्ड पर आई नई स्थिति को दर्ज करने तक रही।
23 साल पुराने मामले का कानूनी महत्व क्या है?
यह प्रकरण सिर्फ एक पुलिस अधिकारी के सम्मान से जुड़ा मामला नहीं है। इससे यह भी सामने आता है कि सरकारी पुरस्कारों और न्यायिक आदेशों के बीच यदि प्रशासनिक स्तर पर मतभेद या देरी होती है तो मामला लंबे समय तक अदालतों में चल सकता है।
इस मामले में 2003 की कार्रवाई के बाद सिफारिश हुई, 2018 में हाईकोर्ट ने आगे प्रक्रिया के निर्देश दिए, 2019 में राज्य की सिफारिश केंद्र तक पहुंची और दिसंबर 2024 में हाईकोर्ट ने फिर सम्मान सुनिश्चित करने का आदेश दिया। इसके बाद 2025-26 में अनुपालन और सम्मान के प्रकार को लेकर नई कानूनी पेचीदगी पैदा हुई।
इससे एक व्यापक प्रशासनिक सवाल भी उभरता है कि गैलेंट्री पुरस्कारों से जुड़े प्रस्तावों के निपटारे में स्पष्ट समयसीमा और पारदर्शी communication कितनी अहम है। खास तौर पर ऐसे मामलों में जहां संबंधित अधिकारी लंबे समय से सेवा या सेवानिवृत्ति के बाद भी निर्णय का इंतजार कर रहा हो।
क्या सुप्रीम कोर्ट ने बहादुरी के तथ्य पर नया फैसला दिया?
नहीं। उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर सुप्रीम कोर्ट की इस कार्यवाही का केंद्र पुरस्कार की मंजूरी और लंबित न्यायिक प्रक्रिया थी। 2003 की कार्रवाई, उसमें दो डकैतों की मौत और चौहान के घायल होने जैसे तथ्य पहले से मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के रिकॉर्ड में दर्ज हैं।
मजिस्ट्रियल जांच में चौहान को क्लीन चिट मिलने की बात भी हाईकोर्ट के रिकॉर्ड में दर्ज है। इसलिए इस खबर को किसी नई मुठभेड़ या नए पुलिस ऑपरेशन के रूप में पेश करना सही नहीं होगा।
क्या मामला अब पूरी तरह खत्म हो गया?
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष लंबित आवेदन के संदर्भ में अदालत ने कहा कि राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद आगे किसी आदेश की जरूरत नहीं है। चौहान की ओर से हाईकोर्ट में लंबित contempt proceedings वापस लेने की बात भी अदालत को बताई गई है।
हालांकि पुरस्कार को औपचारिक रूप से राजपत्र में अधिसूचित किया जाना अभी प्रशासनिक अगला कदम है। इसलिए इसे पूरी प्रक्रिया के प्रत्येक चरण के समाप्त होने के बजाय राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद अंतिम औपचारिक चरण में पहुंचा मामला कहना अधिक सटीक होगा।
अब आगे क्या होगा?
मंजूर पुरस्कार को भारत के राजपत्र में अधिसूचित किया जाना है। इसके बाद संबंधित प्रशासनिक औपचारिकताएं पूरी की जाएंगी।