गिलोय का इस्तेमाल आयुर्वेद में किया जाता है, लेकिन बिना चिकित्सकीय सलाह के इसका सेवन सभी के लिए उचित नहीं माना जा सकता। ऑटोइम्यून और लिवर रोगियों को विशेष सावधानी रखनी चाहिए।
गिलोय को लेकर क्यों जरूरी है सावधानी?
गिलोय, जिसे संस्कृत में गुडूची और वैज्ञानिक नाम से टिनोस्पोरा कॉर्डिफोलिया कहा जाता है, आयुर्वेदिक चिकित्सा में इस्तेमाल होने वाली एक प्रमुख वनस्पति है। इसे अलग-अलग पारंपरिक उपयोगों के लिए प्रयोग किया जाता रहा है। हालांकि, किसी भी औषधीय पौधे को केवल प्राकृतिक या हर्बल होने के आधार पर पूरी तरह जोखिम-मुक्त मानना उचित नहीं है।गिलोय की सुरक्षा को लेकर वैज्ञानिक साहित्य में मतभेद भी देखने को मिलते हैं। भारत सरकार के आयुष मंत्रालय ने एक सलाह में कहा है कि चिकित्सीय उपयोग के लिए टिनोस्पोरा कॉर्डिफोलिया यानी वास्तविक गुडूची का ही इस्तेमाल होना चाहिए और इसके जैसी दिखने वाली दूसरी प्रजाति टिनोस्पोरा क्रिस्पा नुकसानदायक हो सकती है। वहीं, कुछ चिकित्सकीय अध्ययनों में गिलोय के सेवन और लिवर की चोट के बीच संबंध की रिपोर्ट सामने आई है। इसलिए बिना विशेषज्ञ सलाह के लंबे समय तक या स्वयं से गिलोय का सेवन करना उचित नहीं माना जाना चाहिए।
१. ऑटोइम्यून बीमारी वाले लोग रहें सावधान
जिन लोगों को पहले से कोई ऑटोइम्यून बीमारी है, उन्हें गिलोय का सेवन शुरू करने से पहले चिकित्सक या योग्य आयुर्वेद विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए। इसकी वजह यह है कि गिलोय में प्रतिरक्षा प्रणाली को प्रभावित करने वाले गुणों की चर्चा वैज्ञानिक साहित्य में हुई है। कुछ मामलों में गिलोय के सेवन के बाद ऑटोइम्यून विशेषताओं वाली लिवर की चोट की रिपोर्ट भी प्रकाशित हुई है। इसका अर्थ यह नहीं है कि ऑटोइम्यून बीमारी वाले हर व्यक्ति को गिलोय से नुकसान होगा। उपलब्ध शोध में इसके जोखिम को लेकर बहस भी मौजूद है। लेकिन इस वर्ग के लोगों के लिए बिना चिकित्सकीय निगरानी के सेवन से बचना अधिक सावधानीपूर्ण तरीका है।
२. लिवर की बीमारी से जूझ रहे लोगों को खुद से न लें
हेपेटाइटिस, सिरोसिस या दूसरी पुरानी लिवर संबंधी बीमारी वाले व्यक्ति किसी भी हर्बल उत्पाद का इस्तेमाल डॉक्टर से पूछे बिना न करें।एक बहु-केंद्रित भारतीय अध्ययन में गिलोय के सेवन के बाद लिवर की चोट के मामलों का विश्लेषण किया गया था। अध्ययन में कुछ मरीजों में तीव्र हेपेटाइटिस, पहले से मौजूद लिवर बीमारी के बिगड़ने और गंभीर लिवर समस्या जैसी स्थितियां देखी गईं। हालांकि अध्ययन के कारण-परिणाम संबंध और गिलोय की वास्तविक भूमिका को लेकर वैज्ञानिक बहस भी हुई है। इसलिए लिवर रोगियों के लिए स्वयं से गिलोय का काढ़ा, रस या किसी सप्लीमेंट का इस्तेमाल करना उचित नहीं है।
३. गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाएं
गर्भावस्था और स्तनपान के दौरान किसी भी औषधीय जड़ी-बूटी या हर्बल सप्लीमेंट का सेवन करने से पहले चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।गिलोय के संबंध में गर्भावस्था और स्तनपान के दौरान पर्याप्त उच्च गुणवत्ता वाले मानव अध्ययनों की कमी को देखते हुए इसे स्वयं से शुरू करना उचित नहीं है। इस अवधि में महिला को अपने स्त्री रोग विशेषज्ञ या योग्य चिकित्सक से सलाह लेकर ही कोई हर्बल उत्पाद लेना चाहिए।
४. बच्चों को बिना सलाह गिलोय न दें
बच्चों के लिए भी गिलोय को अपनी ओर से शुरू कर देना सही तरीका नहीं है। बच्चों में उम्र, वजन, बीमारी और दूसरी दवाओं के आधार पर किसी भी औषधीय उत्पाद की उपयुक्तता अलग हो सकती है।खासकर छोटे बच्चों को गिलोय का काढ़ा या किसी केंद्रित अर्क की मात्रा अपने स्तर पर तय करके नहीं देनी चाहिए।
५. कई दवाएं लेने वाले लोगों को भी सावधानी
यदि कोई व्यक्ति पहले से नियमित रूप से डॉक्टर की लिखी दवाएं ले रहा है, तो गिलोय शुरू करने से पहले चिकित्सक को इसकी जानकारी देना जरूरी है।हर्बल उत्पादों में सक्रिय रासायनिक घटक हो सकते हैं और कुछ परिस्थितियों में वे दूसरी दवाओं के साथ समस्या पैदा कर सकते हैं। इसलिए नियमित दवाओं को जारी रखते हुए अपनी ओर से गिलोय जोड़ना उचित नहीं है।
६. बाजार से कोई भी गिलोय खरीदकर इस्तेमाल न करें
गिलोय के मामले में एक महत्वपूर्ण मुद्दा पौधे की सही पहचान है। आयुष मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि टिनोस्पोरा कॉर्डिफोलिया और उससे मिलती-जुलती अन्य प्रजातियों के बीच अंतर करना जरूरी है। मंत्रालय की सलाह के मुताबिक टिनोस्पोरा क्रिस्पा जैसी समान दिखने वाली प्रजातियां प्रतिकूल प्रभाव पैदा कर सकती हैं। इसलिए सड़क किनारे या अज्ञात स्रोत से लाई गई बेल को गिलोय मानकर उसका काढ़ा बनाना जोखिमपूर्ण हो सकता है।
क्या गिलोय हर व्यक्ति के लिए नुकसानदायक है?
इस सवाल का जवाब सीधे तौर पर हां या नहीं में देना सही नहीं होगा। आयुष मंत्रालय ने टिनोस्पोरा कॉर्डिफोलिया को चिकित्सीय उपयोग में सुरक्षित बताया है और गलत प्रजाति की पहचान को लेकर विशेष सावधानी की सलाह दी है। दूसरी ओर, कुछ प्रकाशित चिकित्सकीय अध्ययनों और लिवर संबंधी शोधों में गिलोय के सेवन के बाद लिवर की चोट की घटनाएं दर्ज हुई हैं। राष्ट्रीय स्तर के एक अध्ययन में ४३ मरीजों के मामलों का विश्लेषण किया गया और शोधकर्ताओं ने गिलोय के सेवन के साथ लिवर की चोट का संबंध बताया। हालांकि, इस अध्ययन के निष्कर्षों पर बाद में अन्य शोधकर्ताओं ने पद्धति और कारण-निर्धारण से संबंधित आपत्तियां भी उठाईं। इसलिए पत्रकारिता की दृष्टि से सही निष्कर्ष यह है कि गिलोय को न तो सभी के लिए खतरनाक बताना उचित है और न ही इसे बिना किसी सावधानी के पूरी तरह सुरक्षित मानना।
गिलोय लेने के बाद इन लक्षणों को नजरअंदाज न करें
यदि कोई व्यक्ति गिलोय का सेवन शुरू करने के बाद असामान्य थकान, भूख में कमी, मतली, उल्टी, पेट में परेशानी, गहरे रंग का पेशाब या त्वचा और आंखों में पीलापन महसूस करे, तो गिलोय का सेवन जारी रखने के बजाय चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है। ऐसे लक्षण कई अलग-अलग बीमारियों में हो सकते हैं, इसलिए केवल लक्षण देखकर यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि इसकी वजह गिलोय ही है।
गिलोय लेने से पहले किन बातों का रखें ध्यान?
निष्कर्ष
गिलोय आयुर्वेद में इस्तेमाल होने वाली महत्वपूर्ण वनस्पति है, लेकिन हर व्यक्ति के लिए इसे बिना सलाह के लेना उचित नहीं माना जाना चाहिए। खासकर ऑटोइम्यून बीमारी, लिवर की समस्या, गर्भावस्था, स्तनपान या नियमित दवाओं के इस्तेमाल की स्थिति में विशेषज्ञ की सलाह जरूरी है। साथ ही, गिलोय की सही प्रजाति और उत्पाद की गुणवत्ता भी महत्वपूर्ण है। किसी भी हर्बल औषधि को केवल इसलिए पूरी तरह सुरक्षित नहीं मानना चाहिए क्योंकि वह प्राकृतिक है। सही जानकारी, उचित मात्रा और योग्य चिकित्सक की सलाह के साथ ही इसका इस्तेमाल करना अधिक जिम्मेदार तरीका है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।