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ग्रेटर नोएडा में उल्लू के झपट्टों से दहशत, 5 से 6 लोगों पर हमले की शिकायत, आखिर शहर में कहां से आए?

Mohammad Naved • 2026-09-12 12:05:03
ग्रेटर नोएडा में उल्लू के झपट्टों से दहशत, 5 से 6 लोगों पर हमले की शिकायत, आखिर शहर में कहां से आए?

ग्रेटर नोएडा वेस्ट की ला रेजिडेंशिया सोसाइटी में उल्लू के झपट्टा मारने की घटनाओं से दहशत है। निवासियों ने वन विभाग से जांच और सुरक्षित रेस्क्यू की मांग की है।

📍 ग्रेटर नोएडा, उत्तर प्रदेश
🗓️ 12 सितंबर 2026
✍️ Mohd Naved

ग्रेटर नोएडा में नया खौफ, उल्लू के झपट्टों से लोग परेशान

ग्रेटर नोएडा वेस्ट की ला रेजिडेंशिया सोसाइटी में इन दिनों रात के समय लोगों की आवाजाही को लेकर चिंता बढ़ गई है। निवासियों के मुताबिक, एक जोड़ा उल्लू अचानक ऊपर से झपट्टा मारकर लोगों के सिर और शरीर पर हमला कर रहा है। अलग-अलग रिपोर्टों में अब तक 5 से 6 लोगों के प्रभावित होने की बात सामने आई है।

घटनाओं के बाद कई निवासी रात में अकेले परिसर में निकलने से बच रहे हैं। बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा को लेकर भी परिवारों में फिक्र बढ़ी है। हालांकि, उल्लुओं के व्यवहार को लेकर अंतिम स्थिति अभी वन विभाग की जांच के बाद ही स्पष्ट होगी।

घटना कहां हुई

मामला ग्रेटर नोएडा वेस्ट की ला रेजिडेंशिया सोसाइटी का है। निवासियों का कहना है कि उल्लू सोसाइटी के पेड़ों, सड़कों और स्ट्रीट लाइट के आसपास दिखाई दे रहे हैं।

लोगों के अनुसार, रात में पैदल गुजरते समय अचानक ऊपर से उल्लू नीचे की ओर आता है और सिर या शरीर के आसपास झपट्टा मारकर उड़ जाता है। कुछ निवासियों ने सिर और शरीर पर खरोंच आने की शिकायत की है।

एक हालिया घटना में एक निवासी पार्किंग से लॉबी की तरफ जा रहा था। इसी दौरान उसके सिर पर उल्लू के चोंच मारने की शिकायत सामने आई। घायल व्यक्ति ने अस्पताल जाकर प्राथमिक उपचार कराया।

कितने लोगों पर हमला हुआ

स्थानीय निवासियों की शिकायत के मुताबिक, एक सप्ताह के दौरान 5 से 6 लोग उल्लू के झपट्टे से प्रभावित हुए हैं। अलग-अलग रिपोर्टों में संख्या में मामूली अंतर है, इसलिए इस आंकड़े को स्थानीय दावे के तौर पर देखना जरूरी है।

अभी तक ऐसा कोई आधिकारिक आंकड़ा सामने नहीं आया है, जिससे यह निश्चित रूप से कहा जा सके कि कितने लोगों पर हमला हुआ। वन विभाग की जांच के बाद घटना और प्रभावित लोगों की संख्या को लेकर अधिक स्पष्ट तस्वीर सामने आ सकती है।

वन विभाग ने क्या कहा

जिला वन अधिकारी रजनीकांत मित्तल के हवाले से सामने आई रिपोर्ट के अनुसार, उन्हें सोसाइटी में लोगों पर उल्लू के हमले की जानकारी नहीं थी। उन्होंने कहा कि सामान्य तौर पर उल्लू इंसानों पर हमला नहीं करता।

वन विभाग की टीम को मौके पर भेजकर स्थिति देखने की बात कही गई है। इसका मतलब है कि फिलहाल उल्लुओं के आक्रामक व्यवहार की वजह को लेकर कोई आधिकारिक निष्कर्ष सामने नहीं आया है।

लोगों ने वन विभाग से क्या मांग की

सोसाइटी के निवासियों ने वन विभाग और संबंधित प्रशासन से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। उनकी अपील है कि विशेषज्ञ टीम मौके पर पहुंचकर उल्लुओं की मौजूदगी, उनके संभावित ठिकाने और व्यवहार का जायजा ले।

निवासियों की मांग उल्लुओं को नुकसान पहुंचाने की नहीं है। वे सुरक्षित रेस्क्यू और पक्षियों को उपयुक्त प्राकृतिक वातावरण में स्थानांतरित करने की मांग कर रहे हैं।

यह रुख इसलिए भी अहम है क्योंकि जंगली पक्षियों से जुड़ी ऐसी परिस्थितियों में खुद पकड़ने, भगाने या चोट पहुंचाने की कोशिश स्थिति को और बिगाड़ सकती है।

आखिर उल्लू शहर में आए कहां से

इस सवाल का जवाब थोड़ा अलग है। उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि उल्लू अभी हाल में किसी जंगल से ग्रेटर नोएडा की सोसाइटी में आए हैं।

ग्रेटर नोएडा और आसपास के इलाके में उल्लुओं की मौजूदगी पहले से दर्ज होती रही है। स्थानीय जैव-विविधता रिकॉर्ड में ग्रेटर नोएडा क्षेत्र में स्पॉटेड आउलेट और ईस्टर्न बार्न आउल जैसी प्रजातियों के अवलोकन दर्ज हैं।

इसलिए मौजूदा मामला शहर में उल्लुओं के पहली बार आने का नहीं, बल्कि मानव बस्ती और वन्यजीव के बीच बढ़ते संपर्क का मामला अधिक दिखाई देता है।

शहरीकरण से बदल रहा वन्यजीवों का ठिकाना

ग्रेटर नोएडा बीते वर्षों में तेजी से विकसित हुआ है। आवासीय सोसाइटियां, सड़कें, स्ट्रीट लाइट, निर्माण क्षेत्र और सीमित हरित क्षेत्र एक ऐसा शहरी वातावरण बनाते हैं जहां कई पक्षी और छोटे वन्यजीव मानव आबादी के करीब रहने लगते हैं।

कुछ उल्लू प्रजातियां पेड़ों की खोखल, इमारतों के शांत हिस्सों और दूसरे सुरक्षित स्थानों का इस्तेमाल घोंसले के लिए करती हैं। वन्यजीव संरक्षण से जुड़े स्रोतों के अनुसार, शहरी विस्तार और प्राकृतिक आवास में बदलाव के कारण कुछ उल्लू मानव बस्तियों के आसपास भी रहने लगे हैं।

इसलिए किसी सोसाइटी में उल्लू दिखाई देना अपने आप में असामान्य घटना नहीं है। असामान्य बात तब बनती है जब उनका व्यवहार लोगों के लिए सुरक्षा जोखिम पैदा करने लगे।

हमले की असली वजह अभी साफ नहीं

उल्लू के इंसानों पर झपट्टा मारने के पीछे कई संभावित कारण हो सकते हैं। इनमें घोंसले या बच्चों के आसपास मानवीय गतिविधि, पक्षी का रक्षात्मक व्यवहार और उसके रहने के स्थान में लगातार व्यवधान जैसी स्थितियां शामिल हो सकती हैं।

लेकिन ग्रेटर नोएडा की मौजूदा घटना में इनमें से किसी एक कारण को आधिकारिक तौर पर जिम्मेदार नहीं ठहराया गया है। इसलिए बिना जांच के यह दावा करना सही नहीं होगा कि उल्लू अपने बच्चों की रक्षा के लिए ही हमला कर रहे हैं।

वैज्ञानिक अध्ययनों में शहरी शिकारी पक्षियों के बारे में यह जरूर सामने आया है कि घोंसले के आसपास इंसानों की मौजूदगी बढ़ने पर उनका रक्षात्मक व्यवहार तीव्र हो सकता है। उल्लुओं को लेकर भी ऐसी परिस्थितियों की जांच जरूरी है, लेकिन स्थानीय मामले में निष्कर्ष वन विभाग और विशेषज्ञों के निरीक्षण के बाद ही निकाला जाना चाहिए।

रात में क्यों बढ़ती है परेशानी

उल्लू मुख्य रूप से रात्रिचर पक्षी हैं। इसलिए उनकी गतिविधि रात के समय अधिक दिखाई देती है। सोसाइटी में स्ट्रीट लाइट और खुले रास्तों के कारण लोग और पक्षी एक ही क्षेत्र में सक्रिय रहते हैं।

यदि किसी स्थान पर उल्लू का ठिकाना मौजूद है और उसी रास्ते से लगातार लोगों की आवाजाही होती है, तो मानव और पक्षी के बीच टकराव की संभावना बढ़ सकती है।

फिलहाल यही वजह है कि निवासियों ने रात के समय पेड़ों और स्ट्रीट लाइट के आसपास अतिरिक्त सावधानी बरतने की बात कही है।

क्या उल्लू इंसानों को शिकार समझकर हमला कर रहे हैं?

उपलब्ध रिपोर्टों के आधार पर ऐसा निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। उल्लू के झपट्टे को शिकार करने वाली सामान्य प्रक्रिया बताने के बजाय इसे फिलहाल स्थानीय निवासियों द्वारा बताई गई घटना के रूप में देखना चाहिए।

वन्यजीव विशेषज्ञों के लिए सबसे अहम सवाल यह होगा कि उल्लू किस स्थान से उड़कर आ रहे हैं, क्या वहां घोंसला मौजूद है और क्या इंसानी गतिविधि उनके लिए खतरे की तरह काम कर रही है।

इन सवालों का जवाब मौके की जांच से ही मिल सकता है।

लोगों को क्या सावधानी बरतनी चाहिए

जब तक वन विभाग की टीम स्थिति स्पष्ट नहीं करती, लोगों को उल्लू के करीब जाने से बचना चाहिए। उन्हें पक्षी को पत्थर मारने, पकड़ने या डराने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।

रात में पेड़ों और स्ट्रीट लाइट के नीचे से गुजरते समय सतर्क रहना बेहतर है। बच्चों को ऐसे स्थानों पर अकेले भेजने से बचना चाहिए जहां उल्लू बार-बार दिखाई दे रहे हैं।

अगर कोई घायल हो जाता है तो चोट की स्थिति के अनुसार चिकित्सकीय सहायता लेना जरूरी है। साथ ही घटना की सूचना सोसाइटी प्रबंधन और संबंधित वन विभाग को दी जानी चाहिए।

कुत्ते और बंदर के बाद उल्लू क्यों बना चिंता का विषय

ग्रेटर नोएडा के कई इलाकों में आवारा कुत्तों और बंदरों को लेकर पहले भी शिकायतें सामने आती रही हैं। इन मामलों में समस्या अक्सर सीधे मानव बस्ती में रहने वाले या भोजन की तलाश में घूमने वाले जानवरों से जुड़ी होती है।

उल्लू का मामला अलग है। यह एक जंगली पक्षी है और इसका प्राकृतिक व्यवहार रात में सक्रिय रहना है। इसलिए समाधान भी सामान्य पशु नियंत्रण की तरह नहीं हो सकता।

यहां चुनौती दोहरी है। एक तरफ लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी है। दूसरी तरफ वन्यजीव को नुकसान से बचाना है।

शहर में वन्यजीव और इंसान का रिश्ता

ग्रेटर नोएडा जैसे तेजी से विकसित हो रहे शहरी क्षेत्रों में मानव और वन्यजीव के बीच दूरी लगातार घट रही है। पुराने पेड़, खाली भूखंड, जलक्षेत्र और हरित पट्टियां कई पक्षियों और छोटे जीवों के लिए आश्रय का काम करते हैं।

जब इन इलाकों के आसपास बड़े पैमाने पर निर्माण होता है तो वन्यजीवों की गतिविधियां आवासीय क्षेत्रों के करीब आ सकती हैं।

इसलिए हर ऐसी घटना को केवल आतंक या खतरे के नजरिये से देखने के बजाय उसके पर्यावरणीय संदर्भ को समझना भी जरूरी है।

आगे क्या होगा

अब निगाह वन विभाग की जांच पर है। टीम को यह देखना होगा कि सोसाइटी में कितने उल्लू मौजूद हैं, उनका संभावित ठिकाना कहां है और लोगों पर झपट्टा मारने की घटनाओं का पैटर्न क्या है।

यदि पक्षियों का रेस्क्यू जरूरी पाया जाता है तो कार्रवाई विशेषज्ञ तरीके से होनी चाहिए। पक्षियों को नुकसान पहुंचाए बिना सुरक्षित स्थान पर ले जाना ही प्राथमिकता होनी चाहिए।

फिलहाल निवासियों के लिए सबसे अहम बात सतर्कता है। उल्लू को उकसाने या खुद पकड़ने के बजाय वन विभाग और विशेषज्ञों को सूचना देना सुरक्षित रास्ता है।


ग्रेटर नोएडा में उल्लू के झपट्टे की शिकायत ने एक बार फिर शहर और वन्यजीव के बीच बढ़ते टकराव को सामने ला दिया है। फिलहाल 5 से 6 लोगों के प्रभावित होने की शिकायत है, लेकिन इस संख्या और घटना के कारणों की आधिकारिक पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी।

उल्लुओं के शहर में आने को अचानक हुई घटना बताना भी सही नहीं होगा। ग्रेटर नोएडा क्षेत्र में इन पक्षियों की मौजूदगी पहले से दर्ज है। असली सवाल यह है कि उनका ठिकाना इंसानी बस्ती के इतना करीब क्यों है और वहां से लोगों पर झपट्टा मारने की घटनाएं क्यों हो रही हैं।

इसका जवाब वन विभाग की जांच से मिलेगा। समाधान ऐसा होना चाहिए जिसमें निवासियों की सुरक्षा भी कायम रहे और वन्यजीव को अनावश्यक नुकसान भी न पहुंचे।

वीडियो देखें

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Mohammad Naved

Mohammad Naved

Shah Times Reporter

शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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