डोनाल्ड ट्रंप की नई वोटर जांच से भारतवंशियों पर क्या असर पड़ेगा?
Asif Khan
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2026-09-07 13:02:42
ट्रंप प्रशासन अमेरिकी मतदाता सूचियों की नागरिकता जांच बढ़ा रहा है। करीब २६ लाख योग्य भारतवंशी मतदाताओं पर रिकॉर्ड सत्यापन का असर पड़ सकता है, लेकिन बड़े पैमाने पर नाम कटने का. दावा पुष्ट नहीं है।
📍 Washington -DC 🗓️ 7 Sept 2026 ✍️ Asif Khan
Trump की voter list जांच में Indian Americans क्यों चर्चा में?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने संघीय चुनावों में नागरिकता सत्यापन और मतदाता रिकॉर्ड की जांच को मजबूत करने की दिशा में कदम तेज किए हैं। इस प्रक्रिया का असर अमेरिका में रहने वाले भारतीय मूल के मतदाताओं पर भी पड़ सकता है, हालांकि फिलहाल ऐसा कोई विश्वसनीय प्रमाण नहीं है कि इस अभियान के कारण दस लाख भारतवंशियों के नाम मतदाता सूची से हटने वाले हैं।
कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस के २०२४ के आकलन के मुताबिक अमेरिका में करीब ५२ लाख भारतीय मूल के लोग रहते हैं और लगभग २६ लाख भारतवंशी मतदाता मतदान के योग्य माने जाते हैं। यही वजह है कि अमेरिकी चुनावी नीतियों में बदलाव का इस समुदाय पर संभावित प्रभाव महत्वपूर्ण माना जाता है।
नागरिकता सत्यापन पर ट्रंप प्रशासन का जोर
३१ मार्च २०२६ को राष्ट्रपति ट्रंप ने एक कार्यकारी आदेश जारी किया, जिसमें संघीय चुनावों के लिए नागरिकता सत्यापन की व्यवस्था मजबूत करने का निर्देश दिया गया। आदेश में गृह सुरक्षा विभाग और सामाजिक सुरक्षा प्रशासन के रिकॉर्ड के इस्तेमाल से राज्यों के लिए नागरिकता संबंधी सूचियां तैयार करने की व्यवस्था का उल्लेख है।
आदेश के मुताबिक इन सूचियों को नियमित रूप से अपडेट किया जाना है और राज्यों तथा संबंधित व्यक्तियों को रिकॉर्ड में सुधार का अवसर देने की बात भी कही गई है। इसका अर्थ यह है कि किसी मतदाता के रिकॉर्ड में गलती या विसंगति मिलने पर सत्यापन की प्रक्रिया महत्वपूर्ण हो सकती है।
भारतवंशियों के लिए जोखिम कहां है?
भारतवंशी समुदाय में बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो अमेरिका में जन्मे नागरिक हैं या प्राकृतिकीकृत नागरिक बन चुके हैं। इसलिए केवल भारतीय मूल का होना अपने आप में किसी मतदाता को जांच के लिए अयोग्य नहीं बनाता।
संभावित समस्या तब पैदा हो सकती है जब अलग-अलग सरकारी रिकॉर्ड में नाम, जन्मतिथि, पता या नागरिकता संबंधी जानकारी में अंतर हो। विशेषज्ञों ने संघीय डेटाबेस के इस्तेमाल को लेकर यह चिंता भी जताई है कि गलत या पुराने रिकॉर्ड के कारण पात्र मतदाताओं की पहचान में त्रुटियां हो सकती हैं।
आईसीई का राष्ट्रीय मतदाता डेटाबेस प्रस्ताव
इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एनफोर्समेंट यानी आईसीई ने राष्ट्रीय स्तर पर मतदाता पंजीकरण और मतदान इतिहास के रिकॉर्ड एकत्र करने के लिए एक परियोजना की योजना बनाई है। सितंबर २०२६ में सामने आई जानकारी के अनुसार प्रस्तावित अनुबंध की अधिकतम कीमत ५० लाख डॉलर तक हो सकती है। इसका उद्देश्य सार्वजनिक रूप से उपलब्ध मतदाता पंजीकरण और मतदान इतिहास के रिकॉर्ड को सुरक्षित रूप से एकत्र करना और जांच के लिए उपलब्ध कराना बताया गया है।
रिपोर्टों के अनुसार परियोजना में सभी राज्यों से रिकॉर्ड हासिल करने की क्षमता रखने की बात है। कुछ परिस्थितियों में राजनीतिक दल से जुड़ी जानकारी भी शामिल हो सकती है, लेकिन इसके लिए अलग अनुमति की जरूरत बताई गई है। इसलिए इसे सीधे तौर पर प्रत्येक भारतवंशी के व्यक्तिगत मतदान व्यवहार की निगरानी के बराबर मानना उचित नहीं होगा।
अदालतों में भी पहुंचा मामला
मतदाता रिकॉर्ड और संघीय नागरिकता डेटाबेस के इस्तेमाल को लेकर कानूनी विवाद भी सामने आए हैं। हाल में संघीय अपील अदालत ने ट्रंप प्रशासन को एसएवीई डेटाबेस के जरिए मतदाता सूचियों में नागरिकता सत्यापन करने से रोकने वाले निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखा। अदालत में यह चिंता उठी कि गलत डेटाबेस मिलान से पात्र मतदाताओं को गलत तरीके से हटाए जाने या अतिरिक्त नागरिकता प्रमाण देने के लिए मजबूर किए जाने का खतरा हो सकता है।
प्रवासी अधिकार संगठनों ने भी संघीय डेटाबेस के इस्तेमाल पर आपत्ति जताई है। एक मुकदमे में आरोप लगाया गया है कि पुराने या त्रुटिपूर्ण रिकॉर्ड के आधार पर प्राकृतिकीकृत नागरिकों को गलत तरीके से निशाना बनाया जा सकता है। प्रशासन इन प्रयासों को चुनावी अखंडता और गैर-नागरिक मतदान की रोकथाम से जोड़ता है।
सेव अमेरिका एक्ट में क्या है?
ट्रंप प्रशासन जिस सेव अमेरिका एक्ट की वकालत कर रहा है, उसमें संघीय चुनावों में मतदाता पंजीकरण के लिए अमेरिकी नागरिकता का दस्तावेजी प्रमाण और मतदान के समय फोटो पहचान पत्र की आवश्यकता का प्रस्ताव है। इसका एक संस्करण फरवरी २०२६ में प्रतिनिधि सभा से २१८–२१३ मतों से पारित हुआ था।
हालांकि यह कहना अभी सही नहीं होगा कि ये नियम पूरे अमेरिका में कानून बन चुके हैं। अगस्त २०२६ तक सीनेट में इस कानून को पारित कराने की कोशिश सफल नहीं हुई थी और सीनेट सितंबर में फिर से काम शुरू करने वाली थी।
राज्यों की भूमिका भी अहम
अमेरिकी चुनाव व्यवस्था में राज्यों की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसलिए संघीय स्तर पर नागरिकता सत्यापन के प्रयासों का वास्तविक असर राज्यवार नियमों, मतदाता पंजीकरण व्यवस्था और अदालतों के फैसलों पर निर्भर करेगा।
न्यूयॉर्क, न्यू जर्सी, कैलिफोर्निया और टेक्सास जैसे राज्यों में भारतवंशी समुदाय की बड़ी मौजूदगी है। लेकिन केवल समुदाय की संख्या के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि इन राज्यों में बड़ी संख्या में भारतवंशियों के नाम हटाए जाएंगे।
भारतवंशी मतदाताओं को क्या समझना चाहिए?
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारतीय मूल का होना और अमेरिकी नागरिक होना दो अलग बातें हैं। संघीय चुनावों में मतदान का अधिकार अमेरिकी नागरिकों के लिए है और मौजूदा संघीय कानून पहले से ही गैर-नागरिकों के मतदान पर रोक लगाता है।
भारतवंशी अमेरिकी नागरिकों के लिए अपने मतदाता पंजीकरण रिकॉर्ड, नाम, पता और नागरिकता संबंधी दस्तावेजों की जानकारी सही रखना महत्वपूर्ण हो सकता है। हालांकि किसी व्यक्ति का नाम केवल किसी डेटाबेस में विसंगति मिलने से स्वतः अवैध मतदाता घोषित हो जाता है—ऐसा सामान्य निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है।
आगे क्या होगा?
अभी सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि संघीय सरकार, राज्यों और अदालतों के बीच मतदाता डेटा तथा नागरिकता सत्यापन को लेकर अधिकारों की सीमा कहां तय होती है। सेव अमेरिका एक्ट का भविष्य, अदालतों के फैसले और प्रस्तावित राष्ट्रीय मतदाता डेटाबेस की वास्तविक कार्यप्रणाली आने वाले महीनों में तस्वीर को और स्पष्ट करेंगे।
भारतवंशी समुदाय के संदर्भ में फिलहाल उपलब्ध प्रमाण यह दिखाते हैं कि जांच और सत्यापन की प्रक्रिया महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन दस लाख नाम काटे जाने का दावा पुष्ट तथ्य नहीं है। इसलिए इस मुद्दे पर आंकड़ों और आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर ही निष्कर्ष निकालना जरूरी है।
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Asif Khan
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक,
अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।