अमेरिका में भारतीय मूल के लोगों के खिलाफ नस्ली टिप्पणियों और भेदभाव को लेकर चिंता बढ़ी है। नए आंकड़े और सर्वेक्षण आप्रवासन, एच-1बी और पहचान की राजनीति से जुड़े तनाव दिखाते हैं।
अमेरिका | 5 सितंबर 2026 | शाह टाइम्स
By Mohd Haris
अमेरिका में भारतीयों को लेकर बढ़ता तनाव
अमेरिका में भारतीय मूल के लोगों की आर्थिक और राजनीतिक मौजूदगी बढ़ने के साथ उनके खिलाफ नस्ली टिप्पणियों और भेदभाव को लेकर चिंता भी सामने आ रही है। हालिया रिपोर्टों में
ऑनलाइन नफरत, नस्ली गालियों और भारतीय-अमेरिकी समुदाय को निशाना बनाने वाली गतिविधियों में बढ़ोतरी का दावा किया गया है।
यह तस्वीर पूरे अमेरिकी समाज की नहीं है। इसे मुख्य रूप से कुछ दक्षिणपंथी और अतिदक्षिणपंथी समूहों के बीच बढ़ती आप्रवासन-विरोधी राजनीति और भारतीय समुदाय को लेकर चल रही
बहस के संदर्भ में समझना जरूरी है।
एच-1बी वीजा बना राजनीतिक विवाद का केंद्र
भारतीय पेशेवर लंबे समय से अमेरिकी तकनीकी और अन्य उच्च-कौशल वाले क्षेत्रों में बड़ी संख्या में काम करते रहे हैं। एच-1बी वीजा इसी वजह से भारतीय समुदाय और अमेरिकी आप्रवासन
नीति के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी बन गया है।
इस व्यवस्था को लेकर कुछ अमेरिकी समूहों का आरोप है कि विदेशी कामगार अमेरिकी नागरिकों के रोजगार अवसरों पर दबाव डालते हैं। दूसरी ओर, भारतीय-अमेरिकी समुदाय और वीजा
समर्थक पक्ष का तर्क है कि उच्च-कौशल वाले विदेशी पेशेवर अमेरिकी अर्थव्यवस्था और तकनीकी क्षेत्र में अहम भूमिका निभाते हैं।
यही विवाद कई बार आर्थिक बहस से निकलकर नस्ली टिप्पणियों और पहचान की राजनीति तक पहुंच जाता है।
आंकड़ों में क्या तस्वीर सामने आती है
रिपोर्ट में Stop AAPI Hate के हवाले से बताया गया है कि जनवरी 2023 से दिसंबर 2025 के बीच ऑनलाइन दक्षिण एशियाई लोगों के खिलाफ नस्ली गालियों के इस्तेमाल में 109
प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। रिपोर्ट के मुताबिक 2025 में 48 प्रतिशत दक्षिण एशियाई वयस्कों ने अपनी नस्ल, जातीयता या राष्ट्रीयता के कारण किसी तरह की घृणा-आधारित घटना का अनुभव
करने की बात कही।
इसी रिपोर्ट के मुताबिक ऑनलाइन एशियाई विरोधी गालियों में दक्षिण एशियाई लोगों के खिलाफ इस्तेमाल की गई गालियों की हिस्सेदारी भी बड़ी रही।
इन आंकड़ों को समझते समय एक महत्वपूर्ण सावधानी जरूरी है। ऑनलाइन गाली या घृणास्पद टिप्पणी हर बार कानूनी अपराध नहीं होती। अमेरिकी कानून में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की
व्यापक सुरक्षा है। इसलिए ऑनलाइन नस्ली भाषा और दर्ज आपराधिक घटनाओं के आंकड़े एक-दूसरे के समान नहीं हैं।
भारतीय-अमेरिकी समुदाय में भेदभाव की चिंता
कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस के 2026 सर्वेक्षण में भी भारतीय-अमेरिकी समुदाय के बीच भेदभाव को लेकर चिंता सामने आई। सर्वेक्षण में शामिल भारतीय-अमेरिकी वयस्कों में आधे ने
2025 की शुरुआत से व्यक्तिगत भेदभाव का अनुभव होने की बात कही।
यह आंकड़ा इसलिए अहम है क्योंकि भारतीय-अमेरिकी समुदाय को लंबे समय से अमेरिका में उच्च शिक्षा, तकनीक, चिकित्सा और कारोबार में अपेक्षाकृत सफल प्रवासी समूह के तौर पर देखा
जाता रहा है।
लेकिन आर्थिक सफलता अपने आप सामाजिक सुरक्षा की गारंटी नहीं देती। पहचान, धर्म, नस्ल और आप्रवासन से जुड़े राजनीतिक विवादों का असर सफल प्रवासी समुदायों पर भी पड़ सकता
है।
फ्रिस्को विवाद ने बहस को राष्ट्रीय मुद्दा बनाया
टेक्सस के फ्रिस्को शहर में भारतीय आबादी और आप्रवासन को लेकर विवाद इस बदलते माहौल का एक प्रमुख उदाहरण बनकर सामने आया।
स्थानीय राजनीतिक बहस में कुछ प्रदर्शनकारियों ने शहर में भारतीय प्रवासियों की बढ़ती संख्या को लेकर “Indian takeover” जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया। इस विवाद ने स्थानीय प्रशासन से
निकलकर अमेरिकी आप्रवासन और नस्ली राजनीति की राष्ट्रीय बहस का रूप ले लिया।
टेक्सस ट्रिब्यून के मुताबिक इसी इलाके में रिपब्लिकन पार्टी की भारतीय-अमेरिकी मतदाताओं तक पहुंच बनाने की कोशिश और कुछ रूढ़िवादी समूहों के आप्रवासन-विरोधी एजेंडे के बीच
टकराव भी दिखाई दिया।
उषा वेंस और भारतीय पहचान
अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की पत्नी उषा वेंस भी भारतीय मूल और हिंदू पहचान के कारण राजनीतिक और नस्ली हमलों का निशाना बनी हैं। एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार
अतिदक्षिणपंथी कार्यकर्ता निक फ्यूएंटेस ने उषा और उनके परिवार के खिलाफ नस्ली टिप्पणियां की हैं।
यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उषा वेंस अमेरिकी सत्ता के सबसे ऊंचे राजनीतिक स्तरों में मौजूद भारतीय मूल की प्रमुख हस्तियों में शामिल हैं।
उनके खिलाफ हमलों से यह बहस सामने आती है कि भारतीय मूल के व्यक्ति की अमेरिकी राजनीतिक व्यवस्था में ऊंची स्थिति भी उसे नस्ली राजनीति से पूरी तरह सुरक्षित नहीं करती।
विवेक रामास्वामी और अन्य भारतीय-अमेरिकी चेहरे
भारतीय मूल के पूर्व राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार विवेक रामास्वामी भी नस्ली और आप्रवासन संबंधी ऑनलाइन हमलों का सामना करते रहे हैं। एनडीटीवी की रिपोर्ट में उनके खिलाफ भारत लौटने
की मांग और नस्ली टिप्पणियों का उल्लेख किया गया है।
न्यूयॉर्क के मेयर ज़ोहरान ममदानी और नागरिक अधिकार मामलों की सहायक अटॉर्नी जनरल हरमीत ढिल्लों जैसे अन्य भारतीय मूल के सार्वजनिक चेहरे भी अलग-अलग तरह की पहचान
आधारित राजनीतिक आलोचना और हमलों के केंद्र में रहे हैं।
इन मामलों में नस्ल, धर्म, आप्रवासन और पार्टी राजनीति कई बार एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं।
क्या भारतीयों की सफलता ही वजह है?
यह सबसे विवादित सवाल है।
मूल Opinion लेख में तर्क दिया गया है कि भारतीय-अमेरिकियों की आर्थिक उपलब्धियां, उच्च शिक्षा, तकनीकी क्षेत्र में मौजूदगी और राजनीति में बढ़ता प्रभाव कुछ समूहों में असंतोष पैदा कर
रहा है।
लेकिन इसे एक स्थापित तथ्य के रूप में पेश करना उचित नहीं होगा। अमेरिका में भारतीयों के खिलाफ नफरत के पीछे कई कारक बताए जाते हैं। इनमें आप्रवासन-विरोध, एच-1बी वीजा पर
असंतोष, आर्थिक असुरक्षा, नस्ली पूर्वाग्रह और राजनीतिक ध्रुवीकरण शामिल हैं।
इसलिए “सफलता से ईर्ष्या” को एक संभावित व्याख्या के रूप में देखना चाहिए, अंतिम कारण के रूप में नहीं।
राजनीति ने मुद्दे को और संवेदनशील बनाया
अमेरिकी राजनीति में आप्रवासन लंबे समय से सबसे विवादित मुद्दों में शामिल है। डोनाल्ड ट्रंप की राजनीतिक वापसी के बाद एच-1बी वीजा, सीमा सुरक्षा और प्रवासियों को लेकर बहस और
तीखी हुई है।
भारतीय नागरिक एच-1बी व्यवस्था में बड़ी हिस्सेदारी रखते हैं। इसलिए अमेरिकी आप्रवासन नीति में बदलाव का असर भारतीय पेशेवरों और उनके परिवारों पर असमान रूप से पड़ सकता है।
हालिया नीतिगत प्रस्तावों में एच-4 वीजा धारकों के रोजगार अधिकार और एच-1बी कर्मचारियों की नौकरी बदलने की समयसीमा जैसे मुद्दे भी शामिल हैं।
नफरत और राजनीतिक बहस में फर्क जरूरी
भारतीय समुदाय के खिलाफ हर आलोचना को नस्लवाद कहना भी सही नहीं होगा।
एच-1बी व्यवस्था की आलोचना, विदेशी श्रमिकों की संख्या पर बहस या अमेरिकी नागरिकों के रोजगार अधिकारों पर सवाल लोकतांत्रिक राजनीतिक विमर्श का हिस्सा हो सकते हैं।
समस्या तब पैदा होती है जब नीति पर बहस किसी पूरी राष्ट्रीयता, धर्म या नस्ली समूह को निशाना बनाने लगे। यही वह बिंदु है जहां आप्रवासन की वैध बहस नस्ली पूर्वाग्रह में बदल सकती है।
भारतीय-अमेरिकी समुदाय के सामने चुनौती
भारतीय-अमेरिकी समुदाय अब अमेरिकी समाज और राजनीति में पहले की तुलना में ज्यादा दिखाई देता है। कारोबार, तकनीक, चिकित्सा, शिक्षा और राजनीति में उनकी मौजूदगी बढ़ी है।
इसी बढ़ती दृश्यता के साथ राजनीतिक ध्रुवीकरण का जोखिम भी बढ़ता है। कार्नेगी के 2026 सर्वेक्षण में भारतीय-अमेरिकियों के बीच भेदभाव और राजनीतिक माहौल को लेकर बढ़ती चिंता दर्ज
हुई है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि भारतीय समुदाय अमेरिकी समाज से अलग-थलग हो रहा है। बल्कि यह दिखाता है कि अमेरिकी बहुसांस्कृतिक समाज में पहचान और आप्रवासन को लेकर बहस
अधिक संवेदनशील होती जा रही है।
आगे की तस्वीर
अमेरिका में भारतीय समुदाय की संख्या और प्रभाव आने वाले वर्षों में भी महत्वपूर्ण राजनीतिक मुद्दा बने रहने की संभावना है। एच-1बी नीति, रोजगार, आप्रवासन सुधार और चुनावी राजनीति
इस बहस के प्रमुख केंद्र बने रहेंगे।
सबसे अहम सवाल यह होगा कि अमेरिकी राजनीतिक व्यवस्था आप्रवासन पर कठोर बहस और नस्ली घृणा के बीच सीमा को कैसे बनाए रखती है।
भारतीय-अमेरिकियों के खिलाफ बढ़ती नस्ली भाषा को लेकर सामने आ रहे आंकड़े चिंता का संकेत जरूर देते हैं। लेकिन पूरे अमेरिकी समाज को इसके लिए जिम्मेदार ठहराना तथ्यात्मक रूप
से सही नहीं होगा। उपलब्ध साक्ष्य मुख्य रूप से कुछ राजनीतिक और अतिदक्षिणपंथी समूहों तथा ऑनलाइन नेटवर्क में बढ़ते शत्रुतापूर्ण व्यवहार की ओर इशारा करते हैं।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।