न्यूयॉर्क में मोहन भागवत के कार्यक्रम को लेकर विवाद बढ़ा है। कुछ धार्मिक नेताओं ने कहा कि उन्हें आरएसएस और भागवत की मौजूदगी की पूरी जानकारी नहीं दी गई थी।
न्यूयॉर्क, अमेरिका
अमेरिका के न्यूयॉर्क में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत के कार्यक्रम को लेकर नया विवाद सामने आया है। मैडिसन स्क्वॉयर गार्डन में आयोजित कार्यक्रम में शामिल कुछ धार्मिक नेताओं ने आरोप लगाया है कि उन्हें कार्यक्रम की पूरी जानकारी नहीं दी गई थी और उन्हें एक अंतरधार्मिक आयोजन के तौर पर आमंत्रित किया गया था। बाद में उन्हें पता चला कि कार्यक्रम में भागवत और आरएसएस प्रमुख भूमिका में थे।
विवाद के बीच कुछ धार्मिक नेताओं ने अपनी भागीदारी पर अफसोस जताया है। उन्होंने कहा है कि अगर उन्हें पहले से कार्यक्रम की वास्तविक प्रकृति और भागवत की मौजूदगी की जानकारी होती, तो वे इसमें शामिल होने का फैसला अलग तरीके से लेते।
न्यूयॉर्क में २९ अगस्त को आयोजित कार्यक्रम से पहले कुछ धार्मिक नेताओं को नाश्ते और एक विशेष सामुदायिक सभा के लिए आमंत्रित किया गया था। उनके मुताबिक उन्हें बताया गया था कि आयोजन का मकसद अलग-अलग धार्मिक समुदायों के बीच एकता, शांति और सहयोग पर बातचीत करना है।
नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, न्यूयॉर्क टाइम्स ने कार्यक्रम के लिए भेजे गए करीब एक दर्जन ईमेल की समीक्षा का हवाला देते हुए कहा कि इन निमंत्रणों में आरएसएस या मोहन भागवत का स्पष्ट उल्लेख नहीं था।
इस मामले में रिवरसाइड चर्च की सीनियर मिनिस्टर एड्रिएन थॉर्न का नाम प्रमुखता से सामने आया है। वह मैडिसन स्क्वॉयर गार्डन के कार्यक्रम में मौजूद थीं। बाद में उन्होंने कहा कि उनकी मौजूदगी से यह गलत धारणा बनी कि वह भागवत, आरएसएस या उससे जुड़ी विचारधारा का समर्थन करती हैं।
थॉर्न ने आयोजकों से नाराजगी जताते हुए कहा कि उन्हें कार्यक्रम में आरएसएस की भूमिका के बारे में पहले जानकारी नहीं दी गई थी। उनके अनुसार, आमंत्रण में वक्ताओं की पूरी जानकारी नहीं होने की बात सुरक्षा कारणों से कही गई थी।
क्वींस स्थित जमैका मुस्लिम सेंटर के निदेशक इमाम शमसी अली भी इस आयोजन से जुड़े थे। उन्होंने बाद में अपनी भागीदारी को लेकर अफसोस जाहिर किया।
अली के मुताबिक उन्हें भी कार्यक्रम में मोहन भागवत की केंद्रीय भूमिका की पहले जानकारी नहीं थी। उन्होंने अपनी मौजूदगी को गलत फैसला बताया और कहा कि अगर उन्हें आयोजन की वास्तविक प्रकृति के बारे में पहले जानकारी होती, तो वह इसमें शामिल नहीं होते।
अली ने आगे कहा कि वह अपने नाम को इस आयोजन से जोड़ने को स्वीकार नहीं करते। उन्होंने अंतरधार्मिक संवाद में पारदर्शिता और भरोसे को अहम बताया।
उनका बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आयोजन को अंतरधार्मिक संवाद और विभिन्न समुदायों के बीच संपर्क के मंच के तौर पर पेश किया गया था। ऐसे में आमंत्रित लोगों को कार्यक्रम के मुख्य वक्ता और आयोजक संस्थाओं की पर्याप्त जानकारी दिए जाने का सवाल उठता है।
न्यूयॉर्क स्थित कैथेड्रल ऑफ सेंट जॉन द डिवाइन की डीन विन्वी वर्गीज ने भी कार्यक्रम को लेकर अफसोस जताया। उनके मुताबिक उनके कुछ सहयोगियों को भी भागवत की मौजूदगी की जानकारी दिए बिना कार्यक्रम में आमंत्रित किया गया था।
वर्गीज ने आरएसएस की विचारधारा और भारत में अल्पसंख्यकों से जुड़े विवादों का भी उल्लेख किया। हालांकि इन आरोपों को धार्मिक नेताओं के बयानों के रूप में देखना जरूरी है। इन्हें स्वतंत्र रूप से स्थापित तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए।
यही इस पूरे विवाद का अहम पहलू है। मामला केवल किसी एक कार्यक्रम में भाग लेने का नहीं है। यह सवाल भी उठ रहा है कि अंतरधार्मिक कार्यक्रमों में आमंत्रित लोगों को आयोजक संस्था, मुख्य वक्ता और आयोजन के उद्देश्य के बारे में किस स्तर की जानकारी दी जानी चाहिए।
वर्ल्ड काउंसिल ऑफ रिलीजियस लीडर्स के महासचिव बावा जैन ने धार्मिक नेताओं के असंतोष पर अफसोस जताया है। हालांकि उन्होंने भागवत को सम्मानित किए जाने के फैसले पर खेद नहीं जताया।
जैन के मुताबिक उनका उद्देश्य दुनिया को मोहन भागवत की बात सीधे सुनने का अवसर देना था। उन्होंने धार्मिक नेताओं के खुद को गुमराह महसूस करने पर अफसोस जताया, लेकिन भागवत की मौजूदगी को लेकर अपने फैसले का बचाव किया।
यानी विवाद में दोनों पक्षों के नजरिए अलग हैं। धार्मिक नेता पारदर्शिता की कमी का आरोप लगा रहे हैं, जबकि आयोजक भागवत को मंच देने के फैसले को लेकर पीछे हटते नहीं दिख रहे।
२९ अगस्त को मोहन भागवत ने न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वॉयर गार्डन में एक बड़े कार्यक्रम को संबोधित किया था। उनके भाषण में विविधता, एकता और मानव गरिमा जैसे मुद्दे प्रमुख रहे।
भागवत ने भारत की विविधता को उसकी पहचान का हिस्सा बताया। उन्होंने धार्मिक और सामाजिक विविधता के बीच एकता की जरूरत पर जोर दिया। अन्य रिपोर्टों के मुताबिक उन्होंने अमेरिका में भी हिंदू विचारधारा और आरएसएस को लेकर बनी धारणाओं पर बात की।
एक अलग रिपोर्ट के अनुसार, भागवत ने कहा था कि अगर कोई हिंदू भारत में मुसलमानों के लिए जगह नहीं मानता, तो वह हिंदू नहीं रह जाता। उन्होंने अलग-अलग धार्मिक रास्तों के बावजूद मानवता और सत्य की एकता की बात कही।
यह बयान इसलिए अहम है क्योंकि अमेरिका में उनके कार्यक्रम को लेकर आरएसएस की विचारधारा और भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति पर बहस भी हुई।
भागवत के कार्यक्रम के दौरान मैडिसन स्क्वॉयर गार्डन के बाहर विरोध प्रदर्शन भी हुआ। नवभारत टाइम्स के अनुसार, १०० से अधिक प्रदर्शनकारी आयोजन स्थल के बाहर जमा हुए थे। इनमें अलग-अलग धार्मिक और राजनीतिक समूहों के लोग शामिल थे।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि प्रदर्शन के दौरान खालिस्तान समर्थक समूह के कुछ लोगों ने भारतीय तिरंगे के साथ आपत्तिजनक व्यवहार किया। इस घटना का उल्लेख करते समय यह स्पष्ट रखना जरूरी है कि इसे पूरे किसी समुदाय या धार्मिक समूह की सामूहिक कार्रवाई के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।
मोहन भागवत का अमेरिका दौरा आरएसएस की वैश्विक पहुंच से जुड़ा व्यापक अभियान भी माना जा रहा है। उनकी यात्रा अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन तक बताई गई है और इसे संगठन के शताब्दी वर्ष से जुड़े कार्यक्रमों के संदर्भ में आयोजित किया गया है।
विदेशों में भारतीय मूल के समुदायों के बीच आरएसएस और उससे जुड़े संगठनों की गतिविधियां लंबे समय से मौजूद हैं। ऐसे आयोजनों में भारतीय मूल के लोगों के अलावा स्थानीय धार्मिक और सामाजिक नेताओं को भी शामिल किया जाता है।
यही वजह है कि न्यूयॉर्क के कार्यक्रम में धार्मिक नेताओं की भागीदारी को लेकर उठे सवाल का दायरा बड़ा हो गया है। यह विवाद अमेरिका में भारतीय राजनीतिक और वैचारिक संगठनों की सार्वजनिक छवि, अंतरधार्मिक संवाद और आयोजनों में पारदर्शिता से भी जुड़ता है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या आमंत्रित धार्मिक नेताओं को कार्यक्रम के मुख्य वक्ता और आयोजन की वास्तविक प्रकृति के बारे में पर्याप्त जानकारी दी गई थी।
धार्मिक नेताओं का कहना है कि उन्हें यह जानकारी नहीं दी गई थी। आयोजक पक्ष ने इस पर अफसोस तो जताया है, लेकिन भागवत को कार्यक्रम में सम्मानित करने के फैसले को सही ठहराया है। उपलब्ध रिपोर्टों में दोनों पक्षों के बयान दर्ज हैं।
इसलिए फिलहाल यह कहना उचित नहीं होगा कि आयोजकों ने जानबूझकर सभी धार्मिक नेताओं को धोखा दिया। उपलब्ध जानकारी मुख्य तौर पर संबंधित नेताओं के आरोप, उनके सार्वजनिक बयान और रिपोर्टों में उद्धृत दस्तावेजों पर आधारित है।
इस विवाद का असर भविष्य में अंतरधार्मिक कार्यक्रमों के आयोजन पर पड़ सकता है। खासकर ऐसे आयोजनों में जहां अलग-अलग धार्मिक परंपराओं के प्रतिनिधियों को शामिल किया जाता है, वहां आमंत्रण प्रक्रिया और कार्यक्रम की जानकारी को लेकर अधिक पारदर्शिता की मांग उठ सकती है।
आरएसएस के लिए भी यह विवाद अंतरराष्ट्रीय मंच पर उसकी छवि से जुड़ा मुद्दा है। भागवत जहां अपने भाषणों में मानव एकता, विविधता और धार्मिक सम्मान का संदेश दे रहे हैं, वहीं कुछ अमेरिकी धार्मिक नेता संगठन की विचारधारा और भारत में अल्पसंख्यकों से जुड़े विवादों को लेकर सवाल उठा रहे हैं।
दूसरी तरफ, आयोजक पक्ष का तर्क है कि भागवत की बात को सीधे अंतरराष्ट्रीय श्रोताओं तक पहुंचाना इस आयोजन का अहम उद्देश्य था। इसलिए आने वाले दिनों में बहस इस बात पर केंद्रित रह सकती है कि क्या कार्यक्रम की प्रस्तुति और आमंत्रण प्रक्रिया में पर्याप्त पारदर्शिता बरती गई थी।
मोहन भागवत के न्यूयॉर्क कार्यक्रम का विवाद अब केवल एक आयोजन में धार्मिक नेताओं की मौजूदगी तक सीमित नहीं है। यह अंतरधार्मिक संवाद, सार्वजनिक पारदर्शिता और राजनीतिक विचारधाराओं की अंतरराष्ट्रीय प्रस्तुति से जुड़ा मामला बन गया है।
कुछ धार्मिक नेताओं ने अपनी भागीदारी पर अफसोस जताया है और कहा है कि उन्हें पूरी जानकारी नहीं दी गई थी। आयोजक ने इस असंतोष पर खेद जताया, लेकिन भागवत को मंच देने के फैसले का बचाव किया है। फिलहाल उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर यही स्पष्ट है कि दोनों पक्षों के बीच कार्यक्रम की जानकारी और आमंत्रण प्रक्रिया को लेकर गंभीर मतभेद हैं
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।