RSS प्रमुखभागवत बोले: मुसलमानों को भारत से बाहर चाहने वाला हिंदू नहीं
Asif Khan
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2026-08-30 09:21:33
न्यूयॉर्क में मोहन भागवत ने कहा कि जो हिंदू भारत में मुसलमानों के नहीं होने की सोच रखता है, वह हिंदू नहीं रह सकता। उन्होंने धर्म, विविधता और मानव एकता पर जोर दिया।
📍Newyork 🗓️ 30 August 2026✍️ Asif Khan
न्यूयॉर्क में भागवत का बड़ा बयान
न्यूयॉर्क में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने भारत में धार्मिक सह-अस्तित्व और मानव एकता को लेकर अहम बयान दिया। उन्होंने कहा कि यदि कोई हिंदू यह सोचता है कि भारत में मुसलमान नहीं होने चाहिए, तो वह हिंदू नहीं रह सकता।
भागवत ने यह बात न्यूयॉर्क में आयोजित एक अंतरधार्मिक सम्मेलन में कही, जहां विभिन्न धर्मों से जुड़े प्रतिनिधि मौजूद थे। अपने संबोधन में उन्होंने धर्मों के अलग-अलग रास्तों के बावजूद मानवता की एकता और हर इंसान की गरिमा को महत्वपूर्ण बताया।
सभी रास्ते एक सत्य की ओर
भागवत ने कहा कि हिंदू परंपरा में अलग-अलग धार्मिक मार्गों को एक ही परम सत्य की ओर जाने वाला माना जाता है। उनके मुताबिक इंसानों के बीच मूलभूत भेद नहीं है और प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा समान है।
उन्होंने धर्मों की विविधता को मानव समाज की वास्तविकता बताते हुए कहा कि विविधता को सुरक्षित रखना जरूरी है। उनके अनुसार विविधता और एकता को एक-दूसरे के विरोध में नहीं देखा जाना चाहिए।
2018 के सवाल का किया जिक्र
भागवत ने अपने 2018 के व्याख्यानों के दौरान मुस्लिम समुदाय के लोगों के साथ हुई बातचीत का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि उस समय उनसे पूछा गया था कि हिंदू राष्ट्र की अवधारणा का क्या अर्थ है और क्या इसका मतलब भारत से मुसलमानों को बाहर करना है।
भागवत के अनुसार उन्होंने तब भी कहा था कि भारत में मुसलमानों को नहीं रखने की सोच हिंदुत्व की भावना के अनुरूप नहीं है। उन्होंने संवाद और सामाजिक संपर्क को इस दिशा में महत्वपूर्ण बताया।
संवाद और सेवा पर जोर
आरएसएस प्रमुख ने मुस्लिम और ईसाई समुदायों के साथ संवाद का जिक्र करते हुए कहा कि बातचीत पहला कदम है और सेवा भी समान रूप से महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि दोनों प्रयास साथ-साथ होने चाहिए और सेवा करते समय किसी के साथ भेदभाव नहीं होना चाहिए।
भागवत ने सामाजिक स्तर पर काम करने को राजनीतिक बदलाव से पहले की जरूरत बताया। उनका कहना था कि लोकतंत्र में जनमत की अहम भूमिका होती है और सामाजिक शक्ति के जरिए नीतियों और राजनीति को प्रभावित किया जा सकता है।
विविधता और एकता को लेकर संदेश
अपने संबोधन में भागवत ने कहा कि भारत की परंपरा में अलग-अलग समुदायों के साथ रहने और विभिन्न धार्मिक परंपराओं को जगह देने की बात रही है। उन्होंने यह भी कहा कि इतिहास से जुड़ी धारणाओं और अनुभवों का असर आज के सामाजिक संबंधों पर दिखाई देता है।
उन्होंने धार्मिक नेताओं से समाज में संवाद और आपसी समझ को आगे बढ़ाने की अपील की। उनके मुताबिक यह लंबी प्रक्रिया है, लेकिन मानव समाज को विभाजन और टकराव से बचाने के लिए इसे जारी रखना जरूरी है।
क्या है व्यापक संदर्भ
भागवत का यह बयान ऐसे समय आया है जब न्यूयॉर्क में उनके कार्यक्रम को लेकर समर्थन और विरोध, दोनों देखने को मिले। विभिन्न समूहों ने आरएसएस की विचारधारा और भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों से जुड़े मुद्दों को लेकर आपत्तियां भी जताई हैं। दूसरी ओर, कार्यक्रम के आयोजकों ने इसे अंतरधार्मिक संवाद और एकता से जुड़ा आयोजन बताया।
निचोड़: मोहन भागवत के न्यूयॉर्क संबोधन का केंद्रीय संदेश धार्मिक पहचान से आगे मानव एकता, आपसी सम्मान और सामाजिक संवाद पर केंद्रित रहा। हालांकि उनके बयान को भारत में आरएसएस की व्यापक विचारधारा और उससे जुड़े राजनीतिक विमर्श के संदर्भ में भी देखा जा रहा है।
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Asif Khan
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक,
अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।