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भारत का एआई दांव: चिप डिजाइन से स्वदेशी मॉडल तक

Asif Khan 2026-08-14 12:18:11
भारत का एआई दांव: चिप डिजाइन से स्वदेशी मॉडल तक
भारत एआई मिशन में चिप से मॉडल तक बड़ी तैयारी

चिप डिजाइन से एआई मॉडल तक, भारत की नई टेक रणनीति

स्वदेशी एआई की ओर भारत, चिप और कंप्यूट पर बड़ा फोकस


भारत एआई क्षमता को केवल सॉफ्टवेयर तक सीमित रखने के बजाय चिप डिजाइन, कंप्यूट, डेटा और फाउंडेशन मॉडल तक विस्तार दे रहा है। सरकार ने हजारों जीपीयू, स्वदेशी मॉडल और सेमीकंडक्टर परियोजनाओं पर जोर दिया है। चुनौती अब इन पहलों को वैश्विक स्तर की तकनीकी गुणवत्ता, व्यावसायिक उपयोग और बड़े पैमाने पर उत्पादन में बदलने की है।

LOCATION | DATE | BYLINE

नई दिल्ली | 14 अगस्त 2026/ Mohd Naved

भारत एआई रणनीति में बड़ा बदलाव

भारत एआई को अब केवल एप्लिकेशन और सॉफ्टवेयर के स्तर पर नहीं देख रहा है। चिप डिजाइन, सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग, कंप्यूट इंफ्रास्ट्रक्चर, डेटा और स्वदेशी फाउंडेशन मॉडल को एक व्यापक टेक्नोलॉजी स्टैक के तौर पर विकसित करने की कोशिश हो रही है। यही बदलाव भारत की डिजिटल आत्मनिर्भरता की अगली बड़ी दिशा तय कर सकता है।

भारत सरकार की मौजूदा नीति में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सेमीकंडक्टर को अलग-अलग सेक्टर के बजाय एक-दूसरे से जुड़े रणनीतिक क्षेत्र के रूप में देखा जा रहा है। इसकी वजह साफ है। बड़े एआई मॉडल के लिए भारी कंप्यूट क्षमता चाहिए और कंप्यूट इंफ्रास्ट्रक्चर की बुनियाद हाई-परफॉर्मेंस चिप्स पर टिकी है।

चिप डिजाइन से शुरू हो रही नई रणनीति

भारत की सेमीकंडक्टर रणनीति में चिप डिजाइन को अहम जगह मिली है। सरकार के चिप्स टू स्टार्टअप कार्यक्रम के तहत एक लाख से अधिक लोगों ने चिप डिजाइन ट्रेनिंग के लिए पंजीकरण कराया और करीब 67 हजार लोगों को प्रशिक्षण दिए जाने की जानकारी दी गई है। इस कार्यक्रम के तहत छात्र और संस्थान वास्तविक चिप डिजाइन, प्रोटोटाइपिंग और फैब्रिकेशन प्रक्रिया से जुड़ रहे हैं।

सेमीकंडक्टर क्षेत्र में भारत की चुनौती केवल फैब स्थापित करना नहीं है। डिजाइन, इलेक्ट्रॉनिक डिजाइन ऑटोमेशन टूल्स, आईपी कोर, पैकेजिंग, टेस्टिंग, सामग्री और कुशल मानव संसाधन की पूरी वैल्यू चेन विकसित करना जरूरी है।

नीति आयोग की 2035 की सेमीकंडक्टर रणनीति इसी व्यापक दृष्टिकोण पर आधारित है। रिपोर्ट में भारत के लिए स्थानीय मांग का एक हिस्सा घरेलू चिप उत्पादन से पूरा करने, एडवांस पैकेजिंग में क्षमता बनाने और एआई, क्वांटम तथा हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग के लिए उन्नत चिप डिजाइन विकसित करने जैसे लक्ष्य रखे गए हैं।

एआई के लिए कंप्यूट सबसे बड़ा आधार

भारत एआई मिशन की सबसे अहम उपलब्धियों में साझा कंप्यूट इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार है। सरकार के मुताबिक 38 हजार से अधिक जीपीयू को साझा एआई कंप्यूट सुविधा के लिए उपलब्ध कराया गया है। यह संसाधन स्टार्टअप, शोध संस्थानों, अकादमिक संस्थानों और सरकारी संगठनों को अपेक्षाकृत कम लागत पर उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई है।

मार्च 2024 में मंजूर इंडिया एआई मिशन के लिए 10,371.92 करोड़ रुपये का बजट निर्धारित किया गया था। शुरुआती लक्ष्य 10 हजार जीपीयू का था, जिसे बाद में बढ़ाकर 38 हजार से अधिक किया गया। सरकार ने अतिरिक्त 20 हजार जीपीयू जोड़ने की प्रक्रिया की भी जानकारी दी है।

यह विस्तार इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि एआई मॉडल तैयार करने की सबसे बड़ी लागतों में कंप्यूट शामिल है। अगर कंप्यूट केवल बड़ी टेक कंपनियों के पास रहे, तो घरेलू स्टार्टअप और विश्वविद्यालयों के लिए फाउंडेशन मॉडल विकसित करना कठिन रहेगा।

स्वदेशी मॉडल की दिशा में अगला कदम

भारत एआई मिशन के तहत 12 टीमों को स्वदेशी फाउंडेशन मॉडल और लार्ज लैंग्वेज मॉडल विकसित करने के लिए चुना गया। सरवम एआई, भारतजेन, ज्ञानी और सोकेट जैसे मॉडल भारतीय भाषाओं और स्थानीय उपयोग के मामलों पर केंद्रित प्रयासों का हिस्सा हैं।

इस पहल का मकसद केवल विदेशी मॉडल का भारतीय संस्करण तैयार करना नहीं है। असल सवाल डेटा, भाषा, कंप्यूट, मॉडल आर्किटेक्चर और एप्लिकेशन पर घरेलू नियंत्रण का है।

भारत में सैकड़ों भाषाओं और बोलियों का सामाजिक इस्तेमाल होता है। इसलिए भारतीय भाषाओं के लिए बेहतर स्पीच, ट्रांसलेशन, डॉक्यूमेंट अंडरस्टैंडिंग और मल्टीलिंगुअल एआई तैयार करना एक बड़ा तकनीकी और सार्वजनिक नीति का मुआमला है।

सरकारी दस्तावेजों के अनुसार भारतजेन जैसे प्रोजेक्ट भारतीय डेटा और भाषाओं के अनुरूप फाउंडेशन और मल्टीमॉडल मॉडल विकसित कर रहे हैं। इंडिया एआई मिशन में सब्सिडाइज्ड कंप्यूट और डेटा संसाधनों का इस्तेमाल घरेलू मॉडल डेवलपमेंट की लागत और प्रवेश बाधा कम करने के लिए किया जा रहा है।

असली सवाल, क्या स्वदेशी मॉडल वैश्विक स्तर पर टिकेंगे?

यहां भारत के सामने सबसे बड़ा संपादकीय और तकनीकी सवाल खड़ा होता है। किसी मॉडल को स्वदेशी कह देना उसकी वैश्विक प्रतिस्पर्धा साबित नहीं करता।

मॉडल की गुणवत्ता का जायजा स्वतंत्र बेंचमार्क, वास्तविक उपयोग, लागत, ऊर्जा खपत, सुरक्षा, विश्वसनीयता और अलग-अलग भाषाओं में प्रदर्शन से लेना होगा। अगस्त 2026 में प्रकाशित एक स्वतंत्र अकादमिक अध्ययन ने भी भारतीय फाउंडेशन मॉडल के मूल्यांकन में बेंचमार्क कवरेज और स्वतंत्र सत्यापन की असमानता को एक अहम चुनौती बताया है।

इसका अर्थ यह नहीं है कि भारतीय मॉडल कमजोर हैं। इसका अर्थ यह है कि उनके प्रदर्शन का निष्पक्ष और तुलनात्मक आकलन अभी और मजबूत होना चाहिए।

भारत के लिए सबसे व्यावहारिक रास्ता हर क्षेत्र में दुनिया के सबसे बड़े मॉडल से मुकाबला करना नहीं है। छोटे और मध्यम आकार के मॉडल, भारतीय भाषाओं के मॉडल, सरकारी सेवाओं के लिए विशेष मॉडल और कम लागत वाले एआई सिस्टम ज्यादा उपयोगी साबित हो सकते हैं।

सेमीकंडक्टर और एआई को जोड़ना क्यों जरूरी है

एआई और चिप इंडस्ट्री के बीच सीधा रिश्ता है। बड़े मॉडल के प्रशिक्षण और संचालन में हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूट की जरूरत होती है। इसलिए लंबे समय में एआई आत्मनिर्भरता केवल मॉडल बनाने से हासिल नहीं होगी।

भारत के सामने अभी विदेशी चिप आपूर्ति पर निर्भरता बनी हुई है। घरेलू डिजाइन क्षमता बढ़ने के बावजूद अत्याधुनिक सेमीकंडक्टर निर्माण, एडवांस पैकेजिंग और बड़े पैमाने की उत्पादन क्षमता विकसित करने में समय लगेगा।

इसीलिए भारत की सेमीकंडक्टर नीति अब डिजाइन से आगे बढ़कर मैन्युफैक्चरिंग, पैकेजिंग और सप्लाई चेन तक पहुंच रही है। नीति आयोग की रिपोर्ट ने 2035 तक भारत के सेमीकंडक्टर सेक्टर को 120 से 150 अरब डॉलर की इंडस्ट्री बनाने का लक्ष्य सामने रखा है।

भारत की मौजूदा बढ़त कहां है

भारत की सबसे बड़ी ताकत उसका टेक्निकल टैलेंट और बड़ा घरेलू बाजार है। चिप डिजाइन, सॉफ्टवेयर, डेटा इंजीनियरिंग और एआई रिसर्च में पहले से मौजूद मानव संसाधन घरेलू क्षमता निर्माण के लिए आधार प्रदान करता है।

सरकार ने सेमीकंडक्टर डिजाइन शिक्षा के लिए ईचिपहब जैसी पहल भी आगे बढ़ाई है। जुलाई 2026 में एनआईईएलआईटी और सेमीकंडक्टर लेबोरेटरी, मोहाली ने स्वदेशी 1.2 माइक्रोन प्रोसेस डिजाइन किट को ईचिपहब के जरिए उपलब्ध कराने की घोषणा की। इसका मकसद छात्रों, शोधकर्ताओं, स्टार्टअप और उद्योग को चिप डिजाइन तथा प्रोटोटाइपिंग तक पहुंच देना है।

यह पहल देखने में छोटी लग सकती है, लेकिन सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम में डिजाइन टूल और प्रयोगशाला तक पहुंच लंबे समय में प्रतिभा निर्माण की बुनियाद तैयार करती है।

सबसे बड़ी चुनौती, हार्डवेयर से व्यावसायिक उत्पाद तक

भारत के लिए अब अगला चरण केवल घोषणाओं का नहीं है। असली परीक्षा इस बात की होगी कि कितने स्वदेशी डिजाइन बाजार में पहुंचते हैं, कितने एआई मॉडल वास्तविक ग्राहकों और सरकारी सेवाओं में इस्तेमाल होते हैं और कितनी घरेलू कंपनियां वैश्विक सप्लाई चेन में जगह बनाती हैं।

एआई मॉडल बनाना और उसे बड़े पैमाने पर चलाना दो अलग-अलग चुनौतियां हैं। इसके लिए डेटा सेंटर, बिजली, नेटवर्क, साइबर सिक्योरिटी, क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर और प्रशिक्षित इंजीनियरों की जरूरत होती है।

भारत सरकार के अनुसार देश में 38 हजार से अधिक जीपीयू के साथ 1,050 टीपीयू भी उपलब्ध कराए गए हैं। नेशनल सुपरकंप्यूटिंग मिशन के तहत 40 पेटाफ्लॉप से अधिक क्षमता तैनात होने की जानकारी भी दी गई है।

इन आंकड़ों से इंफ्रास्ट्रक्चर की दिशा में प्रगति दिखती है, लेकिन वैश्विक प्रतिस्पर्धा में सफलता का पैमाना सिर्फ कंप्यूट की संख्या नहीं होगा। उसकी उपयोगिता, उपलब्धता, लागत और मॉडल के आउटपुट की गुणवत्ता भी उतनी ही अहम होगी।

डेटा और भाषा पर नियंत्रण का सवाल

स्वदेशी एआई का एक और महत्वपूर्ण पहलू डेटा है। भारत एआई मिशन के तहत एआईकोश जैसे प्लेटफॉर्म के जरिए भारतीय संदर्भ वाले डेटा और मॉडल संसाधनों को एक साझा ढांचे में लाने की कोशिश की गई है।

डेटा की मात्रा से ज्यादा उसकी गुणवत्ता, वैधता, प्रतिनिधित्व और प्राइवेसी महत्वपूर्ण है। भारतीय भाषाओं के लिए मॉडल तैयार करते समय कम संसाधन वाली भाषाओं और क्षेत्रीय बोलियों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व देना एक गंभीर चुनौती बनी रहेगी।

इसके साथ डेटा प्रोटेक्शन और एआई से जुड़े जवाबदेही के नियम भी महत्वपूर्ण होंगे। अगर भारत तकनीकी आत्मनिर्भरता के साथ भरोसेमंद एआई व्यवस्था बनाना चाहता है, तो मॉडल की पारदर्शिता और सुरक्षा पर भी बराबर ध्यान देना होगा।

क्या भारत अमेरिका और चीन के बीच अलग रास्ता बना रहा है?

भारत का एआई नज़रिया पूरी तरह किसी एक वैश्विक टेक मॉडल की नकल नहीं करता। नीति का जोर एक ऐसे इकोसिस्टम पर है जिसमें एप्लिकेशन, मॉडल, कंप्यूट, चिप और ऊर्जा जैसे कई स्तरों पर घरेलू क्षमता बने।

यही वजह है कि एआई को सेमीकंडक्टर नीति से जोड़ा जा रहा है। दोनों क्षेत्रों की जरूरतें एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं। सस्ती और ऊर्जा-कुशल चिपें एआई की लागत घटा सकती हैं, जबकि एआई की बढ़ती मांग घरेलू चिप डिजाइन के लिए नया बाजार तैयार कर सकती है।

फिर भी भारत को यह दावा सावधानी से करना होगा कि वह पूरी तरह तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर हो चुका है। उपलब्ध आंकड़े क्षमता निर्माण की मजबूत शुरुआत दिखाते हैं, पूर्ण आत्मनिर्भरता नहीं।

आगे की राह में क्या बदलेगा

अगले कुछ वर्षों में भारत की टेक नीति का फोकस क्षमता निर्माण से व्यावसायिक पैमाने की ओर बढ़ने की संभावना है। सेमीकंडक्टर परियोजनाओं को उत्पादन, सप्लाई चेन और निर्यात से जोड़ना होगा। एआई मॉडल को वास्तविक उद्योगों, सरकारी सेवाओं और भारतीय भाषाओं के बड़े उपयोगकर्ता आधार तक पहुंचाना होगा।

भारत के लिए सबसे व्यावहारिक रणनीति उन क्षेत्रों में बढ़त बनाना है जहां उसका घरेलू बाजार, तकनीकी प्रतिभा और भाषाई विविधता उसे विशिष्ट लाभ देती है। हेल्थकेयर, कृषि, शिक्षा, सरकारी सेवाएं, भाषाई कंप्यूटिंग और एंटरप्राइज एआई ऐसे क्षेत्र हैं जहां स्थानीय मॉडल की उपयोगिता अधिक हो सकती है।

साथ ही चिप डिजाइन और एडवांस पैकेजिंग में निवेश बढ़ाना होगा। केवल असेंबली या आयातित तकनीक पर निर्भर मॉडल भारत को दीर्घकालिक रणनीतिक स्वतंत्रता नहीं देगा।

, चिप से मॉडल तक लंबी दौड़

भारत एआई की कहानी अब केवल चैटबॉट या जनरेटिव एआई तक सीमित नहीं रही। चिप डिजाइन, सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग, जीपीयू कंप्यूट, डेटा और स्वदेशी फाउंडेशन मॉडल को एक साथ विकसित करने की कोशिश शुरू हो चुकी है।

भारत एआई क्षमता निर्माण में वास्तविक प्रगति दिखा रहा है। 38 हजार से अधिक जीपीयू, 12 स्वदेशी मॉडल परियोजनाएं, सेमीकंडक्टर मिशन और चिप डिजाइन प्रशिक्षण इसके ठोस उदाहरण हैं।

लेकिन अंतिम फैसला अभी बाकी है। तकनीकी आत्मनिर्भरता की असली कसौटी तब होगी जब भारतीय चिप डिजाइन वैश्विक बाजार में पहुंचे, घरेलू एआई मॉडल बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हों और यह पूरा इकोसिस्टम विदेशी सप्लाई चेन पर निर्भरता को वास्तविक रूप से कम करे।

भारत ने दिशा तय कर दी है। अब उसकी साख क्रियान्वयन, गुणवत्ता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में प्रदर्शन से तय होगी।


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Asif Khan

Asif Khan

Shah Times Reporter

शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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