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ईरान टूटा नहीं, अमेरिका जीता नहीं, 6 महीने की जंग का असली सच क्या है?

Shah Times 2026-08-29 16:58:05
ईरान टूटा नहीं, अमेरिका जीता नहीं, 6 महीने की जंग का असली सच क्या है?

28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर सैन्य हमले शुरू किए थे। शुरुआत में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिया था कि अभियान 4 से 5 सप्ताह में खत्म हो सकता है। 6 महीने बाद तस्वीर अलग है। लड़ाई ने क्षेत्रीय सुरक्षा, ऊर्जा बाजार और दोनों देशों की रणनीतिक गणना को गहराई से प्रभावित किया है, लेकिन कोई पक्ष निर्णायक राजनीतिक जीत हासिल नहीं कर सका है। अमेरिका ने ईरान की एयर डिफेंस, नौसेना और परमाणु ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाने का दावा किया है। दूसरी ओर, तेहरान की सरकार अब भी सत्ता में है, ईरान मिसाइल और ड्रोन हमले करने की क्षमता बनाए हुए है और होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर उसका दबाव कायम है।

इसलिए 6 महीने बाद सबसे सटीक निष्कर्ष शायद यही है कि अमेरिका ने युद्ध के मैदान में बढ़त हासिल की, लेकिन युद्ध के राजनीतिक मकसद पूरे नहीं हुए। ईरान बुरी तरह कमजोर हुआ, लेकिन टूटा नहीं।


ईरान /अमेरिका | 29 अगस्त 2026 | शाह टाइम्स
By Mohd Haris


अमेरिका ने क्या हासिल किया

अमेरिका की सबसे बड़ी उपलब्धि ईरान की सैन्य क्षमता को नुकसान पहुंचाना रही है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड के तत्कालीन प्रमुख एडमिरल ब्रैड कूपर ने मई में कांग्रेस को बताया था कि अमेरिकी सेना ने 161 ईरानी नौसैनिक जहाज नष्ट किए और ईरान की 82% एयर डिफेंस क्षमता को निष्क्रिय किया। ईरान की एयर फोर्स की सक्रिय क्षमता पर भी गंभीर असर पड़ा। रॉयटर्स के मुताबिक अमेरिकी अधिकारियों का आकलन था कि ईरान की मिसाइल क्षमता का बड़ा हिस्सा नष्ट, क्षतिग्रस्त या भूमिगत ठिकानों में दब गया है। हालांकि पूरी मिसाइल क्षमता के नुकसान का स्वतंत्र और पूर्ण सत्यापन उपलब्ध नहीं है। परमाणु कार्यक्रम को भी बड़ा झटका लगा। ईरान के 3 प्रमुख एनरिचमेंट प्लांट और हथियार कार्यक्रम से जुड़े संदिग्ध ठिकानों को नुकसान पहुंचा। अमेरिकी खुफिया आकलन के मुताबिक ईरान के लिए परमाणु हथियार बनाने की संभावित ब्रेकआउट टाइमलाइन 6 महीने से बढ़कर करीब 1 साल हो गई है।

लेकिन अमेरिका की सबसे बड़ी समस्या क्या रही

सैन्य नुकसान पहुंचाना और राजनीतिक लक्ष्य हासिल करना 2 अलग चीजें हैं। यही अंतर इस युद्ध में अमेरिका की सबसे बड़ी चुनौती बन गया। वॉशिंगटन ईरान की परमाणु क्षमता को रोकना, उसकी मिसाइल क्षमता को कमजोर करना और होर्मुज़ जलडमरूमध्य को फिर से सामान्य बनाना चाहता था। लेकिन 6 महीने बाद इनमें से किसी भी लक्ष्य का पूर्ण समाधान नहीं हुआ है। ईरानी शासन भी कायम है। सत्ता परिवर्तन की उम्मीद पूरी नहीं हुई और तेहरान बातचीत में अमेरिकी शर्तें स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं दिख रहा। जून में पाकिस्तान की मध्यस्थता से बना 60 दिन का समझौता भी 17 अगस्त को समाप्त हो गया और उसके बाद कोई स्थायी समझौता नहीं हुआ।

अमेरिका को सैन्य कीमत भी चुकानी पड़ी

युद्ध ने अमेरिकी सैन्य संसाधनों पर भी दबाव डाला है। अब तक 18 अमेरिकी सैनिकों की मौत और 750 से ज्यादा के घायल होने की जानकारी सामने आई है। अमेरिकी सेना के दर्जनों विमान भी युद्ध के दौरान नष्ट या दुर्घटनाग्रस्त हुए। सबसे बड़ी चिंता मिसाइल और एयर डिफेंस इंटरसेप्टर के स्टॉक को लेकर है। रॉयटर्स के अनुसार जुलाई तक अमेरिका ने अपने पैट्रियट इंटरसेप्टर स्टॉक का करीब 65% इस्तेमाल कर लिया था। थाड इंटरसेप्टर का भंडार भी कम हुआ है। इसका असर केवल ईरान तक सीमित नहीं है। अमेरिका को यूरोप और एशिया-प्रशांत से भी सैन्य संसाधन मध्य पूर्व की तरफ भेजने पड़े हैं। इससे दूसरे क्षेत्रों में अमेरिकी सैन्य तैयारी को लेकर सवाल उठे हैं।

ईरान ने क्या खोया

ईरान के लिए युद्ध की कीमत कहीं ज्यादा भारी रही है। सैन्य ढांचे को व्यापक नुकसान पहुंचा। वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों और राजनीतिक नेतृत्व के कई प्रमुख चेहरों की मौत हुई। सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद उनके बेटे मोजतबा खामेनेई को नया सर्वोच्च नेता चुना गया। अर्थव्यवस्था पर भी युद्ध और अमेरिकी प्रतिबंधों का गहरा असर पड़ा है। रॉयटर्स के अनुसार जुलाई में ईरान की सालाना महंगाई 66% तक पहुंच गई थी, जबकि खाद्य महंगाई 128% रही। विदेशी व्यापार में भी भारी गिरावट दर्ज की गई है। ईरान की तेल अर्थव्यवस्था पर दबाव सबसे अहम है। अमेरिकी प्रतिबंध और नौसैनिक नाकेबंदी ने तेल निर्यात को प्रभावित किया है। इसका सीधा असर सरकारी आय और आम लोगों की खरीद क्षमता पर पड़ा है।

फिर ईरान ने क्या हासिल किया

ईरान की सबसे बड़ी रणनीतिक उपलब्धि उसका टिके रहना है। अमेरिका और इजरायल की शुरुआती रणनीति में सैन्य दबाव के साथ ईरानी नेतृत्व पर राजनीतिक दबाव बनाना शामिल था। लेकिन 6 महीने बाद ईरानी शासन कायम है और देश ने आत्मसमर्पण नहीं किया है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य ईरान के लिए महत्वपूर्ण रणनीतिक हथियार बन गया है। युद्ध से पहले दुनिया की करीब पांचवीं ऊर्जा आपूर्ति इस समुद्री मार्ग से गुजरती थी। युद्ध के बाद यहां जहाजों की आवाजाही बुरी तरह प्रभावित हुई और वैश्विक ऊर्जा बाजार पर दबाव बढ़ा। ईरान ने यह भी दिखाया कि भारी अमेरिकी सैन्य श्रेष्ठता के बावजूद वह मिसाइल, ड्रोन और समुद्री हमलों के जरिए क्षेत्रीय अमेरिकी ठिकानों और सहयोगी देशों पर दबाव बनाए रख सकता है।

ईरान के लिए जीत फिर भी महंगी है

इसे ईरान की साफ जीत कहना भी सही नहीं होगा। देश की अर्थव्यवस्था गंभीर दबाव में है। आम लोगों के लिए खाद्य पदार्थ, दवाएं और दूसरी आवश्यक वस्तुएं महंगी हुई हैं। मुद्रा कमजोर हुई है और बेरोजगारी का दबाव बढ़ा है। युद्ध ने ईरान के सैन्य ढांचे को भी कमजोर किया है। परमाणु कार्यक्रम की समयसीमा पीछे गई है और कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों के मारे जाने से कमांड स्ट्रक्चर प्रभावित हुआ है। साथ ही, सरकार ने आंतरिक असहमति पर दबाव बढ़ाया है। एपी के मुताबिक युद्ध के बाद ईरानी नेतृत्व और ज्यादा हार्डलाइन सैन्य और धार्मिक धड़े के इर्द-गिर्द केंद्रित हुआ है।

तेल और होर्मुज़ की असली कहानी

युद्ध का सबसे बड़ा वैश्विक असर ऊर्जा बाजार पर पड़ा है। 28 अगस्त तक ब्रेंट क्रूड युद्ध शुरू होने के मुकाबले करीब 22% महंगा था। 30 अप्रैल को कीमत 120.88 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी। फिर भी वैश्विक अर्थव्यवस्था उस स्तर तक नहीं टूटी, जिसकी शुरुआत में आशंका जताई जा रही थी। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने 2026 की वैश्विक आर्थिक वृद्धि का अनुमान 3% रखा है, जो युद्ध से पहले के 3.3% अनुमान से कम है, लेकिन 1970 के दशक जैसे तेल संकट की स्थिति नहीं बनी। युद्ध ने कंपनियों और सरकारों को होर्मुज़ के विकल्प तलाशने पर भी मजबूर किया है। पाइपलाइन और दूसरे ऊर्जा मार्गों में निवेश बढ़ रहा है, जिससे आने वाले वर्षों में वैश्विक तेल परिवहन का नक्शा बदल सकता है।

राजनीतिक मोर्चे पर ट्रंप को झटका

अमेरिका के भीतर भी युद्ध का असर बढ़ा है। रॉयटर्स-इप्सोस सर्वे के अनुसार ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग 33% तक गिर गई है। केवल 31% अमेरिकी युद्ध में अमेरिकी भागीदारी का समर्थन कर रहे थे। महंगे पेट्रोल और ऊर्जा कीमतें नवंबर के मिडटर्म चुनाव से पहले रिपब्लिकन पार्टी के लिए राजनीतिक चुनौती बन रही हैं। युद्ध ने रिपब्लिकन पार्टी के भीतर भी मतभेद बढ़ाए हैं। एक धड़ा सैन्य अभियान खत्म करने के पक्ष में है, जबकि दूसरा ईरान पर दबाव बनाए रखने की वकालत कर रहा है।

मध्य पूर्व में अमेरिका की स्थिति

इस युद्ध ने अमेरिका के पारंपरिक सहयोगियों को भी नई रणनीति पर सोचने के लिए मजबूर किया है। ईरानी मिसाइल और ड्रोन हमलों ने खाड़ी के कई अमेरिकी सहयोगी देशों को प्रभावित किया। इससे अमेरिकी सुरक्षा गारंटी की विश्वसनीयता पर सवाल उठे हैं। कुछ खाड़ी देश अब अमेरिका के साथ-साथ दूसरे सुरक्षा साझेदारों की तरफ भी देख रहे हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि अमेरिका ने मध्य पूर्व में अपना प्रभाव खो दिया है। लेकिन पहले जैसी निर्विवाद सैन्य बढ़त और राजनीतिक प्रभाव की तस्वीर जरूर कमजोर हुई है।

6 महीने बाद कौन आगे?

अगर केवल सैन्य नुकसान देखा जाए तो अमेरिका और इजरायल को बढ़त हासिल हुई है। ईरान की एयर डिफेंस, नौसेना और परमाणु ढांचे को गंभीर नुकसान हुआ है।

अगर राजनीतिक लक्ष्य देखें तो तस्वीर अलग है। ईरानी शासन कायम है, तेहरान ने आत्मसमर्पण नहीं किया और बातचीत में अमेरिकी मांगें स्वीकार नहीं हुईं। ईरान भी खुद को विजेता घोषित नहीं कर सकता। उसकी अर्थव्यवस्था संकट में है, सैन्य क्षमता को भारी नुकसान हुआ है और देश पर प्रतिबंधों का दबाव और बढ़ गया है। इसलिए 6 महीने बाद सबसे संतुलित निष्कर्ष यही है कि यह युद्ध निर्णायक जीत के बजाय महंगे गतिरोध में बदल चुका है। अमेरिका ने ईरान को कमजोर किया है, लेकिन उसे अपनी शर्तों पर झुकाया नहीं। ईरान ने अमेरिकी दबाव झेला है, लेकिन इसकी भारी आर्थिक और सैन्य कीमत चुकाई है। अब असली सवाल यह नहीं है कि किसने युद्ध जीता। सवाल यह है कि कौन इस गतिरोध से बेहतर शर्तों के साथ बाहर निकलता है। होर्मुज़, परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंध और भविष्य की बातचीत इसी अगले चरण का फैसला करेंगे।

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शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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