कांग्रेस ने निजी कंपनियों में भर्ती गिरावट को जॉब मार्केट संकट बताया। सरकार पर रोजगार नीति विफल होने का आरोप लगा। मुद्दा अब सियासी बहस का केंद्र बन रहा है।
📍 नई दिल्ली
📰 04 अगस्त 2026
✍️ By Asif Khan
नई दिल्ली में जॉब मार्केट संकट को लेकर सियासी बहस तेज हो गई है। कांग्रेस ने निजी क्षेत्र में नई भर्तियों में गिरावट का हवाला देकर केंद्र सरकार की आर्थिक पॉलिसी पर सवाल उठाए हैं। पार्टी का कहना है कि रोजगार का मसला अब सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह युवाओं के भविष्य से जुड़ा सीधा संकट बन चुका है।
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि देश का युवा अब “हेडलाइन मैनेजमेंट” से संतुष्ट नहीं होगा। उनके मुताबिक युवाओं की प्राथमिकता साफ है, उन्हें स्थायी रोजगार चाहिए, न कि प्रचार आधारित नैरेटिव।
कांग्रेस ने जिस रिपोर्ट का हवाला दिया, उसमें कहा गया है कि देश की शीर्ष 11 निजी कंपनियों में से 9 में नई भर्तियों में करीब 27 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई है। यह आंकड़ा पिछले एक वर्ष की अवधि को कवर करता है।
यह दावा अभी स्वतंत्र रूप से सभी स्रोतों से पुष्टि के दायरे में है। हालांकि इंडस्ट्री के कुछ सेक्टर, खासकर आईटी और स्टार्टअप स्पेस, पहले से ही धीमी भर्ती ट्रेंड का संकेत देते रहे हैं।
भारत में रोजगार आंकड़ों को लेकर लंबे समय से बहस चल रही है। सरकार आधिकारिक सर्वे और स्कीम आधारित रोजगार सृजन के आंकड़े पेश करती है। वहीं विपक्ष अक्सर प्राइवेट सेक्टर, शहरी बेरोजगारी और युवाओं की जॉब क्वालिटी पर सवाल उठाता है।
बीते वर्षों में
• स्टार्टअप सेक्टर में फंडिंग में उतार-चढ़ाव
• आईटी सेक्टर में हायरिंग फ्रीज
• मैन्युफैक्चरिंग में सीमित जॉब ग्रोथ
इन सबने रोजगार के माहौल को प्रभावित किया है।
ग्लोबल स्लोडाउन का असर भारतीय आईटी सेक्टर पर दिखा।
कई बड़ी कंपनियों ने भर्ती धीमी की या रोक दी।
रिपोर्ट्स में टॉप कंपनियों में नई जॉब्स कम होने के संकेत।
राजनीतिक स्तर पर जॉब मार्केट संकट मुख्य मुद्दा बन रहा है।
सरकार लगातार यह दावा करती रही है कि
• इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश बढ़ा है
• स्टार्टअप इकोसिस्टम मजबूत हुआ है
• स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम्स से रोजगार सृजन हो रहा है
सरकार का फोकस “एम्प्लॉयबिलिटी” पर है, यानी युवाओं को जॉब के लिए तैयार करना। लेकिन विपक्ष का कहना है कि तैयारी के बाद भी नौकरियां उपलब्ध नहीं हैं।
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का कहना है कि
• रोजगार डेटा पारदर्शी नहीं है
• निजी सेक्टर में अवसर घट रहे हैं
• युवा अस्थायी और गिग जॉब्स की ओर धकेले जा रहे हैं
जयराम रमेश ने अपने बयान में कहा कि “रील और प्रचार से पेट नहीं भरता, रोजगार ही असली जरूरत है।”
यहां फैक्ट-चेक जरूरी है।
• कुछ सेक्टर में भर्ती घटी है, यह इंडस्ट्री रिपोर्ट्स से संकेत मिलता है
• लेकिन सभी सेक्टर में समान गिरावट नहीं है
• सरकारी डेटा और निजी रिपोर्ट्स में अंतर बना हुआ है
इसलिए 27 प्रतिशत गिरावट का आंकड़ा व्यापक राष्ट्रीय ट्रेंड को पूरी तरह रिप्रेजेंट करता है या नहीं, इस पर अभी स्पष्टता जरूरी है।
जमीनी स्तर पर युवाओं में तीन प्रमुख चिंताएं दिखती हैं
• जॉब उपलब्धता कम
• सैलरी ग्रोथ धीमी
• कॉन्ट्रैक्ट और गिग जॉब्स बढ़ना
कई युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में सालों लगा रहे हैं। वहीं प्राइवेट सेक्टर में स्थिर नौकरी मिलना कठिन होता जा रहा है।
जॉब मार्केट संकट का सीधा असर इकोनॉमी पर पड़ता है
• कंजम्पशन घट सकता है
• मिडिल क्लास खर्च कम करता है
• निवेश पर असर पड़ता है
अगर रोजगार नहीं बढ़ता, तो ग्रोथ का फायदा सीमित वर्ग तक रह सकता है।
रोजगार हमेशा चुनावी मुद्दा रहा है।
• युवा वोट बैंक निर्णायक होता है
• बेरोजगारी पर नैरेटिव तेजी से बदलता है
• विपक्ष इसे सरकार की विफलता के रूप में पेश करता है
आने वाले चुनावों में यह मुद्दा और तेज हो सकता है।
ग्लोबल स्तर पर भी रोजगार बाजार दबाव में है।
• टेक कंपनियों में लेऑफ
• ऑटोमेशन का असर
• एआई आधारित जॉब शिफ्ट
भारत भी इस ट्रेंड से अलग नहीं है। लेकिन यहां आबादी का आकार इस चुनौती को और बड़ा बनाता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक समाधान के लिए
• मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में तेजी
• स्किल आधारित रोजगार
• एमएसएमई को सपोर्ट
• डेटा पारदर्शिता जरूरी है
नीतिगत स्तर पर स्पष्ट रोडमैप की जरूरत है।
जॉब मार्केट संकट अब केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का मुद्दा नहीं रहा। यह आर्थिक स्थिरता और सामाजिक संतुलन से जुड़ा मसला बन चुका है।
सरकार और विपक्ष दोनों के दावों के बीच सच्चाई का संतुलित आकलन जरूरी है। असली चुनौती रोजगार के ठोस अवसर पैदा करना है, क्योंकि युवा अब वादों से ज्यादा परिणाम देखना चाहता है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।