ममदानी ने 10 हजार डॉलर बोनस रोकने के लिए किया मुकदमा
न्यूयॉर्क में 10 हजार डॉलर बोनस पर ममदानी से टकराया काउंसिल
टीचिंग असिस्टेंट बोनस पर ममदानी ने क्यों लिया कानूनी रुख?
न्यूयॉर्क, अमेरिका | 21 अगस्त 2026 | शाह टाइम्स
By Mohd Haris
न्यूयॉर्क के मेयर ज़ोहरान ममदानी ने शहर के करीब 25 हजार स्कूल पैराप्रोफेशनल्स को 10 हजार डॉलर तक का भुगतान देने वाले कानून को रोकने के लिए मुकदमा दायर किया है। मामला मैनहट्टन की स्टेट सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा है और इससे मेयर तथा न्यूयॉर्क सिटी काउंसिल के बीच टकराव खुलकर सामने आ गया है। यह विवाद केवल एक बोनस तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में यह कानूनी सवाल है कि शहर के निर्वाचित प्रतिनिधि किसी यूनियन के कर्मचारियों के वेतन और भुगतान की शर्तें सीधे कानून बनाकर तय कर सकते हैं या इसके लिए कलेक्टिव बार्गेनिंग प्रक्रिया का पालन जरूरी है। ममदानी प्रशासन का कहना है कि वेतन और कार्यस्थल की शर्तें बातचीत की मेज पर तय होनी चाहिए।
सिटी काउंसिल ने जुलाई में इस भुगतान योजना को सर्वसम्मति से मंजूरी दी थी। कानून के तहत पात्र स्कूल पैराप्रोफेशनल्स को 2026-27 स्कूल वर्ष के काम के लिए अधिकतम 10 हजार डॉलर का वर्कफोर्स स्टेबिलाइजेशन पेमेंट मिलना था। भुगतान चार अलग-अलग किस्तों में किया जाना है और वास्तविक कार्य अवधि के आधार पर रकम में बदलाव हो सकता है। पैराप्रोफेशनल्स न्यूयॉर्क के पब्लिक स्कूलों में शिक्षकों के साथ काम करते हैं। इनमें ऐसे कर्मचारी भी शामिल हैं जो दिव्यांग छात्रों को व्यक्तिगत शैक्षणिक और रोजमर्रा की सहायता देते हैं। रिपोर्टों के मुताबिक ये शहर के पब्लिक स्कूल सिस्टम में अपेक्षाकृत कम वेतन पाने वाले कर्मचारियों में शामिल हैं। योजना की अनुमानित लागत शहर के लिए करीब 324 मिलियन डॉलर बताई गई है। भुगतान का मकसद स्टाफ की कमी और कर्मचारियों को बनाए रखने की समस्या से निपटना भी बताया गया है।
ममदानी प्रशासन का मुख्य तर्क कलेक्टिव बार्गेनिंग से जुड़ा है। प्रशासन के मुताबिक सिटी काउंसिल ने कर्मचारियों के मुआवजे में हस्तक्षेप करके उस प्रक्रिया को दरकिनार किया है, जिसके तहत शहर और यूनियन कर्मचारियों के वेतन और सेवा शर्तों पर बातचीत करते हैं।
मेयर कार्यालय के प्रवक्ता मैट रॉशेनबैक ने कहा कि राजनीतिक प्रक्रिया को कलेक्टिव बार्गेनिंग टेबल की जगह नहीं लेनी चाहिए। प्रशासन का कहना है कि मामला किसी कर्मचारी को अधिक वेतन देने के सिद्धांत के खिलाफ नहीं है, बल्कि यह तय करने की प्रक्रिया से जुड़ा है कि वेतन कैसे तय किया जाए। यही इस मुकदमे का सबसे अहम पहलू है। ममदानी प्रशासन इसे लेबर राइट्स और यूनियन नेगोशिएशन की रक्षा का मामला बता रहा है, जबकि विरोधी इसे कर्मचारियों को मिलने वाले भुगतान को रोकने की कोशिश के तौर पर देखते हैं।
इस मामले में ममदानी की राजनीतिक स्थिति भी चर्चा में है। मेयर पद के चुनाव अभियान के दौरान उन्होंने पैराप्रोफेशनल्स के वेतन बढ़ाने का समर्थन किया था। लेकिन मेयर बनने के बाद उन्होंने इस कानून का विरोध शुरू कर दिया और अब उसे अदालत में चुनौती दे रहे हैं।
एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि ममदानी ने कानून पर वीटो नहीं लगाया। सिटी काउंसिल में इसे पारित कराने के लिए पर्याप्त समर्थन था और मेयर की आपत्ति के बावजूद इसे कानून का रूप मिलने की संभावना बनी हुई थी। 19 अगस्त को कानून प्रभावी होने के बाद प्रशासन ने अदालत का रुख किया। इसलिए मौजूदा मुकदमा ममदानी और काउंसिल के बीच अधिकार क्षेत्र की लड़ाई भी बन गया है।
काउंसिल की तरफ से इस भुगतान का बचाव किया गया है। योजना के समर्थकों का तर्क है कि पैराप्रोफेशनल्स को बेहतर भुगतान देना स्टाफ को बनाए रखने और विशेष शिक्षा सेवाओं को स्थिर रखने में मदद करेगा। काउंसिल स्पीकर जूली मेनिन इस पहल की प्रमुख समर्थक रही हैं। उनके पक्ष में दिया गया तर्क यह है कि कम वेतन वाले कर्मचारियों को बनाए रखने में असफल रहने की कीमत शहर को दूसरी तरह से चुकानी पड़ सकती है, खासकर विशेष जरूरत वाले छात्रों के लिए आवश्यक सेवाओं में। इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो 10 हजार डॉलर का भुगतान केवल कर्मचारियों के लिए आर्थिक राहत नहीं, बल्कि स्कूल सिस्टम में स्टाफ रिटेंशन की रणनीति भी है।
यूनाइटेड फेडरेशन ऑफ टीचर्स यानी यूएफटी ने भुगतान योजना का समर्थन किया है। यूनियन के अध्यक्ष माइक मुलग्रू ने इसे पैराप्रोफेशनल्स के लिए महत्वपूर्ण आर्थिक कदम बताया है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक भुगतान जनवरी 2027 से चार 2,500 डॉलर की किस्तों में शुरू करने की योजना है।
यूएफटी की अपनी जानकारी के मुताबिक भुगतान अलग-अलग अवधि में किए जाने हैं और सब्स्टिट्यूट पैराप्रोफेशनल्स को उनके काम किए गए दिनों के आधार पर भुगतान मिलेगा। यूनियन ने पहले भी मेयर से इस कानून को मंजूरी देने की अपील की थी। यहां विवाद का एक अहम पहलू सामने आता है। ममदानी खुद मजदूरों और यूनियन अधिकारों की राजनीति से जुड़े नेता के रूप में सामने आए हैं, लेकिन इस मामले में उनका रुख उस यूनियन से अलग है जो भुगतान की मांग कर रही है।
नहीं। कानून की मौजूदा संरचना इसे स्थायी बेस सैलरी बढ़ोतरी के बजाय वर्कफोर्स स्टेबिलाइजेशन पेमेंट के रूप में परिभाषित करती है। यह भुगतान पेंशन लाभों में शामिल नहीं होगा और एक नई कलेक्टिव बार्गेनिंग डील में नियमित वेतन कम से कम 10 हजार डॉलर बढ़ने के बाद इसकी व्यवस्था समाप्त हो सकती है। यह अंतर महत्वपूर्ण है। स्थायी वेतन वृद्धि कर्मचारी की भविष्य की कमाई और पेंशन गणना पर अलग असर डालती है, जबकि इस कानून में प्रस्तावित रकम एक अलग भुगतान व्यवस्था के तहत दी जानी है। इसी वजह से इस विवाद को केवल “10 हजार डॉलर की तनख्वाह बढ़ोतरी” कहना पूरी तरह सटीक नहीं होगा।
उपलब्ध रिपोर्टों में इस योजना की लागत करीब 324 मिलियन डॉलर आंकी गई है। करीब 25 हजार पात्र कर्मचारियों को भुगतान मिलने की स्थिति में शहर के बजट पर इसका सीधा वित्तीय असर पड़ेगा। ममदानी प्रशासन ने वित्तीय असर के साथ भविष्य की मिसाल का सवाल भी उठाया है। अगर सिटी काउंसिल कानून बनाकर अलग-अलग यूनियन कर्मचारियों के मुआवजे में बदलाव करती है, तो भविष्य में दूसरे कर्मचारी समूह भी इसी तरह के विधायी भुगतान की मांग कर सकते हैं। यही तर्क प्रशासन के मुकदमे को केवल मौजूदा बोनस से आगे ले जाता है।
ममदानी प्रशासन का कानूनी तर्क न्यूयॉर्क के टेलर लॉ में मौजूद कलेक्टिव बार्गेनिंग व्यवस्था से जुड़ा है। प्रशासन का कहना है कि कर्मचारियों के वेतन और सेवा शर्तों को राजनीतिक कानून के जरिए बदलने के बजाय संबंधित यूनियन और शहर के बीच बातचीत के माध्यम से तय किया जाना चाहिए।
अदालत को अब यह देखना होगा कि सिटी काउंसिल द्वारा पारित भुगतान कानून इस कलेक्टिव बार्गेनिंग व्यवस्था के साथ किस हद तक टकराता है। जब तक अदालत कोई फैसला नहीं देती, यह स्पष्ट नहीं है कि भुगतान योजना लागू होगी या रोक दी जाएगी। इसलिए मौजूदा स्थिति में 10 हजार डॉलर का भुगतान कर्मचारियों के लिए घोषित नीति जरूर है, लेकिन उसका अंतिम क्रियान्वयन अदालत की कार्रवाई से प्रभावित हो सकता है।
ममदानी के लिए यह मामला कई स्तरों पर संवेदनशील है। एक तरफ वह खुद को मजदूरों और कम आय वाले कर्मचारियों के हितों का समर्थक बताते रहे हैं। दूसरी तरफ इस मुकदमे में उनका प्रशासन उसी भुगतान योजना का विरोध कर रहा है, जिसे शिक्षक यूनियन और सिटी काउंसिल समर्थन दे रहे हैं। यह विरोधाभास उनके प्रशासन के लिए राजनीतिक सवाल पैदा करता है। हालांकि ममदानी का पक्ष यह है कि वे भुगतान के खिलाफ नहीं, बल्कि उसे लागू करने के तरीके के खिलाफ हैं।इस अंतर को समझना जरूरी है। अगर अदालत प्रशासन के पक्ष में फैसला देती है तो इसका अर्थ यह नहीं होगा कि पैराप्रोफेशनल्स को अधिक वेतन देने की नीति खारिज हो गई। इसका अर्थ होगा कि ऐसी व्यवस्था किस प्रक्रिया से तय की जानी चाहिए, इस सवाल पर अदालत ने प्रशासन के तर्क को स्वीकार किया।
अब इस मामले का अगला अहम पड़ाव मैनहट्टन स्टेट सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही है। अदालत को कानून की वैधता और कलेक्टिव बार्गेनिंग से इसके संबंध पर विचार करना होगा। अगर ममदानी प्रशासन की चुनौती सफल होती है, तो 10 हजार डॉलर भुगतान योजना रुक सकती है या उसके स्वरूप में बदलाव हो सकता है। अगर अदालत काउंसिल के पक्ष में जाती है, तो प्रशासन को भुगतान व्यवस्था लागू करने की दिशा में आगे बढ़ना पड़ सकता है। इस बीच यूनियन और शहर प्रशासन के बीच व्यापक श्रम संबंधों पर भी इसका असर पड़ सकता है। यह मामला न्यूयॉर्क में इस बात के लिए मिसाल बन सकता है कि नगर परिषद और मेयर कार्यालय सार्वजनिक कर्मचारियों के वेतन से जुड़े मामलों में किस सीमा तक अलग-अलग भूमिका निभा सकते हैं।
न्यूयॉर्क का 10 हजार डॉलर पैराप्रोफेशनल बोनस विवाद अब अदालत तक पहुंच चुका है। करीब 25 हजार स्कूल कर्मचारियों के लिए प्रस्तावित भुगतान का मकसद स्टाफ रिटेंशन और कम वेतन की समस्या से निपटना है, जबकि ममदानी प्रशासन इसे कलेक्टिव बार्गेनिंग प्रक्रिया से जुड़े कानूनी सवाल के रूप में देख रहा है। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि ममदानी ने चुनाव अभियान में पैराप्रोफेशनल्स की वेतन वृद्धि का समर्थन किया था, लेकिन मेयर बनने के बाद इस कानून को चुनौती दी। अब अंतिम फैसला अदालत पर निर्भर है। विवाद का नतीजा केवल 10 हजार डॉलर भुगतान का भविष्य तय नहीं करेगा, बल्कि न्यूयॉर्क में सिटी काउंसिल, मेयर प्रशासन और पब्लिक सेक्टर यूनियनों के बीच अधिकारों की सीमा पर भी असर डाल सकता है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।