अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने ईरान को प्रतिबंधों से बचाने वाले देशों पर कार्रवाई की चेतावनी दी। यह बयान मोदी-पेज़ेश्कियन मुलाकात के बाद आया।
बिश्केक | 3 सितंबर 2026 | शाह टाइम्स
By Mohd Haris
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियन की बिश्केक में मुलाकात के कुछ दिनों बाद अमेरिका ने ईरान को लेकर अपना रुख फिर सख्त किया है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा है कि कोई भी देश ईरान को अमेरिकी प्रतिबंधों से बचने में मदद करता है या ऐसी व्यवस्था तैयार करता है जिससे तेहरान को राजस्व हासिल हो, तो अमेरिका उस देश पर भी प्रतिबंध लगा सकता है।
रुबियो की टिप्पणी ऐसे समय आई है जब भारत और ईरान के बीच उच्चस्तरीय कूटनीतिक संपर्क जारी है और पश्चिम एशिया में अमेरिका तथा ईरान के बीच तनाव बना हुआ है।
भारत सरकार के प्रेस सूचना ब्यूरो के मुताबिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 31 अगस्त 2026 को किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन यानी एससीओ शिखर सम्मेलन से इतर ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियन से द्विपक्षीय मुलाकात की थी।
दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय रिश्तों और पश्चिम एशिया में हालिया घटनाक्रम पर चर्चा की। प्रधानमंत्री मोदी ने क्षेत्र में बढ़ते तनाव पर चिंता जताते हुए भारत के उस रुख को दोहराया कि विवादों का समाधान बातचीत और कूटनीति के जरिए होना चाहिए।
मोदी ने नौवहन और वाणिज्य की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने की जरूरत पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि आम नागरिकों, नागरिक बुनियादी ढांचे,
वाणिज्यिक जहाजों और समुद्री कर्मियों को किसी भी परिस्थिति में नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए।
मोदी-पेज़ेश्कियन बैठक के बाद अमेरिकी विदेश मंत्री से भारत और ईरान के बीच संभावित व्यापार समझौते को लेकर सवाल किया गया।
रुबियो ने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि भारत और ईरान के बीच कोई ट्रेड डील हो रही है। उन्होंने साथ ही यह भी माना कि दुनिया के अलग-अलग देशों को अपनी विदेश नीति तय करने और ईरान की सरकार से बातचीत करने का अधिकार है।
लेकिन इसके बाद उन्होंने अमेरिका की सीमा स्पष्ट कर दी।
रुबियो के मुताबिक राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने साफ कर दिया है कि किसी भी देश को ईरान को अमेरिकी प्रतिबंधों से बचाने में मदद नहीं करनी चाहिए।
उन्होंने ऐसे वित्तीय या कारोबारी तंत्र बनाने में सहायता से भी बचने को कहा जिससे ईरान राजस्व जुटा सके।
रुबियो ने अमेरिकी नीति को ईरान के परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय गतिविधियों से जोड़ा। उनका तर्क है कि ईरान को मिलने वाले अतिरिक्त वित्तीय संसाधनों का इस्तेमाल आतंकवाद को समर्थन देने और परमाणु हथियार हासिल करने की कोशिशों में हो सकता है। यह अमेरिकी प्रशासन का आरोप और नीति-आधारित तर्क है, इसे स्वतंत्र रूप से स्थापित तथ्य के रूप में नहीं पेश किया जाना चाहिए।
अमेरिकी प्रशासन फिलहाल ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की रणनीति अपना रहा है। इसी अभियान के तहत वॉशिंगटन उन देशों और कारोबारी संस्थाओं को भी चेतावनी दे रहा है जो अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद तेहरान के साथ आर्थिक संपर्क बनाए रखते हैं।
भारत के सामने स्थिति जटिल है। नई दिल्ली ईरान के साथ अपने रणनीतिक और आर्थिक संबंध बनाए रखना चाहती है, जबकि अमेरिका ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।
भारत सरकार के आधिकारिक बयान में मोदी और पेज़ेश्कियन की बातचीत को द्विपक्षीय रिश्तों, क्षेत्रीय स्थिति, शांति, कूटनीति और नौवहन की स्वतंत्रता के संदर्भ में रखा गया है। बयान में किसी नए ट्रेड डील की घोषणा नहीं की गई।
यही अंतर इस पूरे घटनाक्रम को महत्वपूर्ण बनाता है। कूटनीतिक संपर्क अपने आप में अमेरिकी प्रतिबंधों से बचने की कोशिश का प्रमाण नहीं है।
रुबियो की चेतावनी भी सीधे तौर पर भारत पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा नहीं थी। उनका बयान एक व्यापक अमेरिकी नीति-संदेश था, जिसके दायरे में वे देश आते हैं जो ईरान को प्रतिबंधों से बचाने या उसके लिए राजस्व पैदा करने की व्यवस्था में मदद करते हैं।
यह विवाद उस समय सामने आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य तथा आर्थिक तनाव लगातार बना हुआ है। Reuters के अनुसार ईरान पर
अमेरिकी दबाव बढ़ रहा है और उसकी तेल आय तथा अंतरराष्ट्रीय आर्थिक गतिविधियों पर प्रतिबंधों का असर पड़ रहा है।
इसी बीच रूस, चीन और भारत जैसे देशों की ईरान के साथ कूटनीतिक सक्रियता वॉशिंगटन के लिए अलग रणनीतिक चुनौती पैदा करती है। भारत का रुख हालांकि सैन्य समर्थन के बजाय संवाद, कूटनीति, क्षेत्रीय स्थिरता और नौवहन की स्वतंत्रता पर केंद्रित दिखाई देता है।
मौजूदा उपलब्ध बयानों के आधार पर भारत पर किसी नए अमेरिकी प्रतिबंध की घोषणा नहीं हुई है।
रुबियो ने संभावित कार्रवाई की नीति स्पष्ट की है, लेकिन उन्होंने भारत के खिलाफ कोई विशिष्ट प्रतिबंध घोषित नहीं किया। उन्होंने भारत-ईरान ट्रेड डील के अस्तित्व पर भी संदेह जताया है।
इसलिए इस घटनाक्रम को फिलहाल अमेरिका की चेतावनी और रणनीतिक दबाव के रूप में देखना अधिक सटीक है, न कि भारत पर लगाए गए नए प्रतिबंध के रूप में।
नई दिल्ली के लिए चुनौती यह है कि वह ईरान के साथ अपने द्विपक्षीय हितों को आगे बढ़ाते हुए अमेरिकी प्रतिबंधों की सीमा का भी आकलन करे।
मोदी और पेज़ेश्कियन की बातचीत में भारत ने संवाद और कूटनीति को समाधान का रास्ता बताया। भारत ने क्षेत्रीय तनाव कम करने, नागरिकों की सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय वाणिज्य तथा नौवहन की स्वतंत्रता पर भी जोर दिया।
इससे भारत का कूटनीतिक नज़रिया फिलहाल स्पष्ट दिखाई देता है। नई दिल्ली ईरान के साथ संवाद बनाए रखना चाहती है, लेकिन पश्चिम एशिया में सैन्य तनाव बढ़ाने वाली गतिविधियों से दूरी और बातचीत पर जोर देती है।
आने वाले दिनों में तीन चीजें अहम रहेंगी।
पहला, भारत और ईरान के बीच वास्तविक आर्थिक और व्यापारिक बातचीत किस स्तर तक पहुंचती है।
दूसरा, अमेरिका ईरान से जुड़े कारोबार पर अपनी सेकेंडरी सैंक्शंस नीति को किस तरह लागू करता है।
तीसरा, पश्चिम एशिया में सैन्य तनाव और नौवहन की स्थिति किस दिशा में जाती है।
फिलहाल उपलब्ध आधिकारिक रिकॉर्ड यह दिखाता है कि मोदी और पेज़ेश्कियन की बैठक हुई, दोनों ने क्षेत्रीय तनाव और द्विपक्षीय रिश्तों पर बातचीत की और भारत ने संवाद तथा कूटनीति पर जोर दिया। इसके बाद रुबियो ने ईरान को अमेरिकी प्रतिबंधों से बचाने वाली किसी भी व्यवस्था में शामिल देशों को संभावित अमेरिकी कार्रवाई की चेतावनी दी।
मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि अमेरिका की चेतावनी और भारत-ईरान की कूटनीतिक बातचीत फिलहाल समानांतर चल रही हैं। किसी नए भारत-ईरान ट्रेड डील या भारत पर अमेरिकी प्रतिबंध की पुष्टि उपलब्ध स्रोतों से नहीं होती।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।