मुफ्त कोचिंग फीस का बोझ कम करती है, लेकिन सफलता के लिए मजबूत बुनियाद, नियमित अभ्यास, डाउट-क्लियरिंग, मेंटरशिप, डिजिटल पहुंच और प्रभावी मॉनिटरिंग भी जरूरी हैं।
नई दिल्ली | 3 सितंबर 2026 | शाह टाइम्स
By Mohd Haris
“मुफ्त कोचिंग” सुनते ही सबसे पहले एक बड़ी राहत का एहसास होता है। महंगी कोचिंग फीस नहीं देनी पड़ेगी। अच्छे शिक्षकों के लेक्चर मिलेंगे। टेस्ट और स्टडी मटेरियल मिलेगा। गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चों के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं का रास्ता कुछ आसान होगा।
लेकिन यहीं एक बुनियादी सवाल खड़ा होता है।
क्या मुफ्त कोचिंग मिल जाना, सफलता की गारंटी भी है?
जवाब है, नहीं।
हालिया सरकारी आंकड़े और संसदीय समीक्षा बताते हैं कि मुफ्त कोचिंग की सबसे बड़ी समस्या हमेशा कंटेंट की कमी नहीं होती। कई बार समस्या यह होती है कि जिस छात्र को सुविधा मिलनी चाहिए, वह सिस्टम तक पहुंच ही नहीं पाता। और जो पहुंच जाता है, उसे लगातार मार्गदर्शन, अभ्यास और व्यक्तिगत फीडबैक नहीं मिल पाता।
केंद्र की फ्री कोचिंग स्कीम का मकसद आर्थिक रूप से कमजोर एससी और ओबीसी छात्रों को प्रतियोगी परीक्षाओं तथा उच्च शिक्षा में प्रवेश की तैयारी के लिए सहायता देना है।
लेकिन संसदीय समिति के सामने रखे आंकड़े बताते हैं कि योजना अपने निर्धारित लक्ष्य से काफी पीछे रही।
2023-24 में 3,500 छात्रों को कवर करने का लक्ष्य था, लेकिन सिर्फ 223 छात्रों को कोचिंग मिली। यानी करीब 6.4 प्रतिशत लक्ष्य ही पूरा हुआ।
2024-25 में स्थिति कुछ बेहतर हुई और 2,136 छात्र कवर हुए। यह लक्ष्य का करीब 61 प्रतिशत था।
लेकिन 2025-26 में संख्या फिर गिरकर 431 रह गई, जो 3,500 के लक्ष्य का लगभग 12.3 प्रतिशत है।
यह आंकड़ा अपने आप में यह साबित नहीं करता कि मुफ्त कोचिंग की अवधारणा विफल है। लेकिन यह जरूर दिखाता है कि योजना का क्रियान्वयन और कवरेज गंभीर चुनौती है।
प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी सिर्फ वीडियो लेक्चर देखने का नाम नहीं है।
एक छात्र को यह भी पता होना चाहिए कि उसकी तैयारी किस स्तर पर है। कौन सा विषय कमजोर है। किस टॉपिक पर कितना समय देना है। कितने
सवाल रोज हल करने हैं। टेस्ट में गलतियां क्यों हो रही हैं और रणनीति कहां बदलनी है।
यही वह जगह है जहां पर्सनलाइज्ड मेंटरशिप महत्वपूर्ण हो जाती है।
बड़े पैमाने पर चलने वाले मुफ्त ऑनलाइन कार्यक्रम में एक ही कंटेंट हजारों या लाखों छात्रों को दिया जा सकता है। लेकिन हर छात्र की जरूरत अलग होती है।
किसी को गणित की बुनियाद मजबूत करनी है। किसी को अंग्रेजी में दिक्कत है। किसी को टेस्ट देने में समस्या है। किसी छात्र को सिर्फ अनुशासन और नियमित फॉलो-अप की जरूरत है।
एक जैसा लेक्चर इन सभी समस्याओं का समाधान नहीं कर सकता।
मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग कागज पर बेहद लोकतांत्रिक दिखाई देती है।
लेकिन ऑनलाइन सुविधा का फायदा तभी मिलेगा जब छात्र के पास स्मार्टफोन, स्थिर इंटरनेट, पर्याप्त डेटा और पढ़ने की शांत जगह हो।
विशेषज्ञों ने भी इस बात की ओर ध्यान दिलाया है कि डिवाइस, कनेक्टिविटी, भाषा, शैक्षणिक बुनियाद और पढ़ाई के लिए उपलब्ध समय में अंतर होने के कारण एक ही ऑनलाइन कोर्स से सभी छात्रों को समान फायदा नहीं मिलता।
यानी मुफ्त कंटेंट सबको समान रूप से उपलब्ध हो सकता है, लेकिन उससे मिलने वाला फायदा समान नहीं होता।
यही “समान अवसर” और “समान परिणाम” के बीच का अंतर है।
यह सबसे महत्वपूर्ण लेकिन अक्सर नजरअंदाज किया जाने वाला पहलू है।
अगर किसी छात्र की स्कूली शिक्षा के दौरान बुनियादी अवधारणाएं मजबूत नहीं हुई हैं, तो प्रतियोगी परीक्षा की तेज रफ्तार कोचिंग उसके लिए मुश्किल हो सकती है।
ऐसे छात्र को पहले बेसिक कॉन्सेप्ट समझने होंगे। इसके बाद परीक्षा के स्तर के सवालों पर जाना होगा।
लेकिन कई कोचिंग कार्यक्रम सीधे परीक्षा-केंद्रित तैयारी शुरू कर देते हैं।
नतीजा यह होता है कि मजबूत अकादमिक पृष्ठभूमि वाला छात्र तेजी से आगे निकलता है, जबकि कमजोर बुनियाद वाला छात्र उसी क्लास में बैठकर भी पीछे रह जाता है।
एक छात्र के लिए सबसे मुश्किल क्षण वह होता है जब उसे सवाल समझ नहीं आता।
रिकॉर्डेड वीडियो इस समस्या को हमेशा हल नहीं कर सकता।
अगर डाउट तुरंत दूर नहीं हुआ, तो अगला अध्याय भी अधूरा समझ आएगा। धीरे-धीरे छोटे-छोटे गैप पूरे विषय में बड़ा अंतर पैदा कर देते हैं।
इसीलिए प्रभावी मुफ्त कोचिंग में लाइव डाउट-क्लियरिंग, मेंटर सपोर्ट और समय पर फीडबैक बेहद महत्वपूर्ण हैं।
एसएटीएचईई जैसे प्लेटफॉर्म इस समस्या को ध्यान में रखते हुए लाइव क्लास, टेस्ट, डाउट-क्लियरिंग और अन्य सुविधाएं उपलब्ध करा रहे हैं।
मुफ्त सुविधा उपलब्ध होने और उसका इस्तेमाल करने में फर्क है।
कई छात्र शुरुआत में उत्साह से रजिस्टर करते हैं। कुछ वीडियो देखते हैं। फिर नियमितता टूट जाती है।
प्रतियोगी परीक्षाओं में छह महीने या एक साल की तैयारी में रोजाना अनुशासन बहुत मायने रखता है।
इसलिए सिर्फ यह गिनना कि कितने छात्रों ने रजिस्ट्रेशन किया, पर्याप्त नहीं है।
यह देखना ज्यादा जरूरी है कि कितने छात्र नियमित रूप से पढ़ रहे हैं, कितने टेस्ट दे रहे हैं, उनकी स्कोर प्रगति कैसी है और कितने आखिर में परीक्षा तक टिके रहते हैं।
यहीं हालिया संसदीय रिपोर्ट सबसे महत्वपूर्ण संकेत देती है।
संसदीय समिति ने मुफ्त कोचिंग योजना में कम भागीदारी, लक्ष्य से कम उपलब्धि और बजट के पर्याप्त इस्तेमाल न होने पर सवाल उठाए हैं।
2023-24 में योजना के लिए 47 करोड़ रुपये का बजट अनुमान था, जबकि खर्च करीब 7.76 करोड़ रुपये रहा।
2024-25 में 35 करोड़ रुपये के मुकाबले करीब 17.68 करोड़ रुपये खर्च हुए।
2025-26 में 20 करोड़ रुपये के बजट अनुमान के मुकाबले उपलब्ध रिपोर्टिंग में खर्च करीब 7.11 करोड़ रुपये बताया गया है। कुछ रिपोर्टों में बाद के
आंकड़ों के आधार पर अलग खर्च संख्या भी दी गई है, इसलिए इस हिस्से में अंतिम वित्तीय आंकड़े प्रकाशित करने से पहले आधिकारिक लेखा रिकॉर्ड से दोबारा पुष्टि जरूरी है।
संसदीय समिति ने केंद्रीय विश्वविद्यालयों की सीमित भागीदारी और प्रस्तावों में देरी जैसी वजहों पर विभाग की सफाई से संतोष नहीं जताया।
मुफ्त कोचिंग योजना का उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों को मदद देना है।
लेकिन संसदीय समिति ने परिवार की 8 लाख रुपये सालाना आय सीमा की भी समीक्षा की जरूरत बताई है। रिपोर्ट में इसे पात्र छात्रों के योजना से बाहर रहने की संभावित वजहों में शामिल किया गया।
यहां नीति का एक जटिल सवाल सामने आता है।
अगर आय सीमा बहुत कम रखी जाए तो जरूरतमंद परिवार छूट सकते हैं। अगर बहुत ज्यादा रखी जाए तो सीमित सरकारी संसाधनों का वितरण मुश्किल हो सकता है।
इसलिए केवल “मुफ्त” शब्द पर्याप्त नहीं। पात्रता का ढांचा भी जमीन की वास्तविक आर्थिक स्थिति के मुताबिक होना चाहिए।
बिल्कुल नहीं।
यह निष्कर्ष भी उतना ही गलत होगा जितना यह कहना कि मुफ्त कोचिंग अपने आप सफलता दिला देती है।
सरकार के पास एसएटीएचईई जैसे प्लेटफॉर्म इसका उदाहरण हैं। शिक्षा मंत्रालय और आईआईटी कानपुर की साझेदारी से शुरू हुए इस पोर्टल का उद्देश्य जेईई, नीट, एसएससी जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए मुफ्त कंटेंट और मार्गदर्शन उपलब्ध कराना है।
एसएटीएचईई में टेस्ट, सवालों का बड़ा बैंक, एनसीईआरटी आधारित सामग्री, लाइव क्लास और एआई आधारित तैयारी टूल जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं।
इससे एक अहम बात सामने आती है।
मुफ्त कोचिंग की असली क्षमता “फ्री” होने में नहीं, बल्कि सिस्टम के मजबूत होने में है।
सबसे पहले कंटेंट के साथ डायग्नोस्टिक टेस्ट होना चाहिए।
छात्र को शुरुआत में ही पता चलना चाहिए कि उसकी कमजोरी कहां है।
इसके बाद उसे व्यक्तिगत स्टडी प्लान मिलना चाहिए। नियमित मॉक टेस्ट होने चाहिए। हर टेस्ट के बाद गलतियों का विश्लेषण होना चाहिए।
डाउट-क्लियरिंग केवल एक चैटबॉट तक सीमित नहीं होनी चाहिए। जरूरत पड़ने पर मानव मेंटर से बात करने की व्यवस्था भी होनी चाहिए।
भाषा भी अहम है। भारत में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाला हर छात्र अंग्रेजी माध्यम से सहज नहीं है। इसलिए क्षेत्रीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण
सामग्री और परीक्षा-उन्मुख मार्गदर्शन जरूरी है।
सरकार को यह पूछने से आगे जाना होगा कि “कितने छात्रों को कोचिंग दी गई?”
असली सवाल होना चाहिए:
कितने छात्रों ने कोर्स पूरा किया?
कितने छात्रों ने नियमित टेस्ट दिए?
कितने छात्रों का स्कोर सुधरा?
कितने छात्रों ने वास्तविक परीक्षा दी?
कितने सफल हुए?
और असफल छात्रों ने कहां समस्या बताई?
यानी आउटपुट नहीं, आउटकम मापना होगा।
यह भी एक आसान निष्कर्ष नहीं है।
भारत में निजी कोचिंग उद्योग की फीस, विज्ञापन, प्रतिस्पर्धात्मक दबाव और छात्रों पर मानसिक दबाव को लेकर लगातार बहस होती रही है।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि सरकार को निजी कोचिंग की हूबहू नकल करनी चाहिए।
सरकार की ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका एक ऐसा मजबूत सार्वजनिक शिक्षा इकोसिस्टम बनाने में हो सकती है जिसमें अच्छी स्कूली शिक्षा, मुफ्त डिजिटल
संसाधन, लाइब्रेरी, टेस्टिंग, मेंटरशिप और करियर गाइडेंस एक साथ उपलब्ध हों।
प्रतियोगी परीक्षा में एक छात्र घर पर शांत कमरे में आठ घंटे पढ़ सकता है।
दूसरा छात्र छोटे कमरे में कई लोगों के साथ रहकर पढ़ता है।
एक के पास तेज इंटरनेट, लैपटॉप और टेस्ट सीरीज है।
दूसरे के पास सिर्फ मोबाइल फोन है।
एक की स्कूली बुनियाद मजबूत है।
दूसरे को पहले दो साल पुराने कॉन्सेप्ट समझने पड़ रहे हैं।
दोनों को एक ही मुफ्त वीडियो दे देना तकनीकी तौर पर बराबरी हो सकती है, लेकिन परिणामों की बराबरी नहीं।
यही मुफ्त कोचिंग की सबसे बड़ी सीमा है।
मुफ्त कोचिंग की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता। महंगी निजी कोचिंग उन परिवारों के लिए बड़ी आर्थिक बाधा है जो प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराना चाहते हैं।
लेकिन “फ्री” को “इफेक्टिव” समझ लेना नीति की सबसे बड़ी भूल होगी।
एक प्रभावी मॉडल में गुणवत्तापूर्ण कंटेंट के साथ मजबूत स्कूली बुनियाद, नियमित टेस्ट, डाउट-क्लियरिंग, व्यक्तिगत मेंटरशिप, डिजिटल पहुंच, सही भाषा, अनुशासन और लगातार मॉनिटरिंग जरूरी है।
सरकारी आंकड़े यह संकेत देते हैं कि समस्या केवल पैसे की नहीं है। सिस्टम तक पहुंच और सिस्टम के भीतर टिके रहने की क्षमता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि “कोचिंग मुफ्त है या नहीं?”
सही सवाल है, “क्या छात्र को सफलता तक पहुंचने के लिए पूरा सपोर्ट सिस्टम मिल रहा है?”
यही वह कसौटी है जिस पर भविष्य की मुफ्त कोचिंग योजनाओं को परखा जाना चाहिए।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।