नेपाल में 26 अगस्त की विनाशकारी बाढ़ के बाद प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह और सभी मंत्रियों ने एक महीने का वेतन राहत कोष में देने का फैसला किया। सरकार प्रभावित लोगों के लिए राहत और पुनर्वास पैकेज भी तैयार करेगी।
📍 काठमांडू, नेपाल
🗓️ 28 अगस्त 2026
✍️ Mohd Naved
नेपाल बाढ़ के बीच सरकार का बड़ा फैसला
नेपाल में विनाशकारी बाढ़ के बाद सरकार ने राहत और पुनर्वास अभियान के लिए अपने स्तर पर वित्तीय योगदान का फैसला किया है। प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह और मंत्रिपरिषद के सभी सदस्यों का एक महीने का वेतन और पारिश्रमिक प्रधानमंत्री दैवी प्रकोप उद्धार कोष में जमा किया जाएगा। यह फैसला 28 अगस्त को हुई मंत्रिपरिषद की बैठक में लिया गया।
सरकार के इस फैसले के साथ प्रभावित इलाकों के लिए अलग राहत और पुनर्वास पैकेज तैयार करने की प्रक्रिया भी शुरू की गई है। वित्त मंत्रालय को नेपाल-चीन सीमा, रसुवागढ़ी, भोटेकोशी नदी और इसके निचले इलाकों में बाढ़ से प्रभावित लोगों तथा कारोबारों के लिए पैकेज तैयार करने का निर्देश दिया गया है।
26 अगस्त की बाढ़ ने मचाई भारी तबाही
26 अगस्त को नेपाल के रसुवा जिले और नेपाल-चीन सीमा के आसपास अचानक आई बाढ़ ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई। भोटेकोशी और आसपास की नदी प्रणालियों में तेज़ बहाव के साथ मलबा आया, जिससे सड़कें, पुल, घर, जलविद्युत परियोजनाएं और सीमा से जुड़ा बुनियादी ढांचा प्रभावित हुआ।
आपदा के शुरुआती आकलनों में बड़ी संख्या में लोगों के मारे जाने और लापता होने की जानकारी सामने आई है। अलग-अलग समय पर जारी आंकड़ों में बदलाव हुआ है क्योंकि दुर्गम इलाकों में तलाश और पहचान का काम जारी है। 28 अगस्त की रिपोर्टों में नेपाल और चीन दोनों तरफ मृतकों की संख्या कई सौ तक पहुंचने की बात सामने आई है।
आपदा की भयावहता का एक बड़ा कारण इसका अचानक आना रहा। रिपोर्टों के मुताबिक हिमालयी क्षेत्र में बर्फ और चट्टान के बड़े पैमाने पर खिसकने से मलबे का बहाव पैदा हुआ, जिसने नदी तंत्र को प्रभावित किया और नीचे बसे इलाकों में तेज़ बाढ़ पहुंची।
प्रधानमंत्री और मंत्रियों का एक महीने का वेतन कोष में
मंत्रिपरिषद ने प्रधानमंत्री समेत सभी मंत्रियों का एक महीने का वेतन और पारिश्रमिक प्रधानमंत्री दैवी प्रकोप उद्धार कोष में जमा करने का फैसला किया है। सरकार की ओर से जारी जानकारी के मुताबिक यह रकम बाढ़ प्रभावित इलाकों में राहत और बचाव कार्यों के लिए इस्तेमाल होने वाले कोष में जाएगी।
प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह मार्च 2026 में नेपाल के प्रधानमंत्री बने थे। उनके नेतृत्व में बनी सरकार में कई मंत्रालयों की जिम्मेदारी अलग-अलग मंत्रियों को दी गई है। जून 2026 में मंत्रिपरिषद में फेरबदल के बाद भी शाह सरकार ने प्रशासनिक सुधार और मितव्ययिता को अपने एजेंडे का हिस्सा बताया है।
सरकारी कर्मचारियों से भी आर्थिक योगदान
प्रधानमंत्री और मंत्रियों के फैसले से पहले नेपाल सरकार ने सरकारी कर्मचारियों के वेतन से भी निर्धारित राशि आपदा राहत कोष में जमा करने का फैसला किया था।
27 अगस्त के सचिव-स्तरीय फैसले के अनुसार अलग-अलग श्रेणी के कर्मचारियों से 2 दिन से लेकर 10 दिन तक के वेतन के बराबर राशि ली जाएगी। निचली श्रेणी के कर्मचारियों के लिए 2 दिन, राजपत्र अनंकित या समकक्ष कर्मचारियों के लिए 5 दिन, राजपत्रांकित तृतीय और द्वितीय श्रेणी के लिए 7 दिन तथा प्रथम और विशिष्ट श्रेणी के अधिकारियों के लिए 10 दिन के वेतन के बराबर योगदान तय किया गया है।
रेडियो नेपाल के मुताबिक संघीय सरकार के कर्मचारियों से इस व्यवस्था के जरिए करीब 360 मिलियन नेपाली रुपये जुटने का अनुमान है। प्रदेश और स्थानीय सरकारों तथा सार्वजनिक निकायों के कर्मचारियों से भी इसी तरह योगदान करने की अपील की गई है।
राहत और पुनर्वास पैकेज पर काम शुरू
कैबिनेट ने वित्त मंत्रालय को बाढ़ प्रभावित लोगों और कारोबारी संस्थाओं के लिए राहत तथा पुनर्वास पैकेज तैयार करने का निर्देश दिया है। पैकेज में प्रभावित इलाकों की जरूरतों के आधार पर राहत, पुनर्वास और आर्थिक सहायता से जुड़े प्रावधान शामिल किए जाने की तैयारी है।
सरकार का यह कदम इसलिए अहम है क्योंकि बाढ़ से केवल जान-माल का नुकसान नहीं हुआ है, बल्कि परिवहन, बिजली, संचार और स्थानीय कारोबार पर भी असर पड़ा है। कई इलाकों में पहुंच मुश्किल बनी हुई है और बचाव दलों को दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है।
बचाव अभियान के सामने बड़ी चुनौतियां
नेपाल में राहत और बचाव अभियान अभी जारी है। सेना और दूसरे सुरक्षा बल प्रभावित इलाकों तक पहुंचने, लोगों को निकालने और लापता लोगों की तलाश में जुटे हैं।
दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र, क्षतिग्रस्त सड़कें और पुल तथा नदी के बढ़ते जलस्तर ने अभियान को मुश्किल बनाया है। इसके अलावा मलबे से बने अस्थायी जलाशयों में पानी बढ़ने से कुछ इलाकों में दोबारा बाढ़ का खतरा भी पैदा हुआ है। 28 अगस्त को नेपाल-चीन सीमा के पास ऐसे ही एक झीलनुमा जलाशय के पानी के बढ़ने से अतिरिक्त खतरे की चेतावनी सामने आई।
नेपाल ने अंतरराष्ट्रीय मदद पर भी स्थिति स्पष्ट की
आपदा के बाद कई देशों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने नेपाल के लिए मदद की पेशकश की है। भारत, चीन, अमेरिका, ब्रिटेन, दक्षिण कोरिया और यूरोपीय देशों समेत कई पक्षों ने राहत सामग्री, आर्थिक सहायता या बचाव सहयोग की पेशकश की है।
नेपाल सरकार ने विदेशी खोज और बचाव टीमों को लेकर कहा है कि फिलहाल उसके अपने सरकारी तंत्र के जरिए अभियान चलाया जा रहा है और अतिरिक्त विदेशी बचाव सहायता की जरूरत नहीं है। दक्षिण कोरिया समेत कुछ देशों ने इस मुद्दे पर आगे बातचीत जारी रखी है।
नेपाल के स्थायी मिशन ने 27 अगस्त को अंतरराष्ट्रीय समुदाय से प्रधानमंत्री दैवी प्रकोप उद्धार कोष में आर्थिक सहयोग की अपील भी की थी। इससे साफ है कि सरकार राहत अभियान के लिए घरेलू संसाधनों के साथ बाहरी वित्तीय सहायता जुटाने की दिशा में भी काम कर रही है।
भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है स्थिति
नेपाल की बाढ़ का असर केवल नेपाल तक सीमित नहीं है। हिमालयी नदी प्रणालियां भारत के कई हिस्सों से जुड़ी हैं। बाढ़ के बाद भारत के बिहार और उत्तर प्रदेश को भी सतर्क किया गया है और संभावित स्थिति से निपटने के लिए राष्ट्रीय आपदा मोचन बल की अतिरिक्त तैयारी की गई है।
नेपाल और भारत के बीच नदियों, सीमावर्ती आबादी और व्यापारिक संपर्कों के कारण ऐसी आपदाओं में समय पर सूचना साझा करना महत्वपूर्ण हो जाता है। खासकर मानसून के दौरान नदी के जलस्तर और पहाड़ी इलाकों में भूस्खलन की निगरानी दोनों देशों के लिए अहम है।
सरकारी योगदान का असर कितना होगा
प्रधानमंत्री और मंत्रियों का एक महीने का वेतन राहत कोष में जमा करने का फैसला प्रतीकात्मक और प्रशासनिक, दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण है। इसके जरिए सरकार ने यह संदेश दिया है कि राजनीतिक नेतृत्व भी राहत प्रयास में प्रत्यक्ष आर्थिक योगदान कर रहा है।
हालांकि बाढ़ से हुए व्यापक नुकसान के मुकाबले केवल वेतन योगदान पर्याप्त वित्तीय संसाधन नहीं होगा। प्रभावित इलाकों में बुनियादी ढांचे की बहाली, विस्थापित परिवारों का पुनर्वास, स्वास्थ्य सेवाओं की व्यवस्था और कारोबार की बहाली के लिए बड़े स्तर पर सार्वजनिक खर्च की जरूरत होगी।
इसी वजह से कैबिनेट का राहत और पुनर्वास पैकेज तैयार करने का निर्देश अधिक व्यापक नीति कदम है। इसकी वास्तविक अहमियत पैकेज की राशि, पात्र लाभार्थियों, वितरण व्यवस्था और जमीन पर अमल से तय होगी।
अब आगे क्या होगा
आने वाले दिनों में सरकार के सामने तीन बड़ी प्राथमिकताएं रहेंगी। पहली प्राथमिकता लापता लोगों की तलाश और प्रभावित परिवारों तक राहत पहुंचाना होगी। दूसरी प्राथमिकता सड़क, पुल, बिजली, संचार और पेयजल जैसी जरूरी सेवाओं की बहाली होगी। तीसरी प्राथमिकता विस्थापित लोगों के पुनर्वास और प्रभावित कारोबारों को आर्थिक सहारा देने की होगी।
सरकार को साथ ही नदी और ग्लेशियर से जुड़ी आपदा की निगरानी व्यवस्था की भी समीक्षा करनी होगी। विशेषज्ञों ने हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर अस्थिरता और बढ़ते तापमान को गंभीर जोखिम बताया है।
नेपाल की मौजूदा त्रासदी ने एक बार फिर दिखाया है कि ऊंचाई वाले हिमालयी इलाकों में अचानक आने वाली आपदाओं से निपटने के लिए शुरुआती चेतावनी, तेज़ संचार और मजबूत स्थानीय बुनियादी ढांचे की जरूरत कितनी अहम है।
राहत से आगे पुनर्वास की चुनौती
प्रधानमंत्री और मंत्रियों का एक महीने का वेतन राहत कोष में देना संकट के वक्त सरकार की जवाबदेही का एक संकेत है। लेकिन प्रभावित परिवारों के लिए असली चुनौती राहत सामग्री मिलने के बाद शुरू होगी।
घर, सड़क, पुल, बिजली व्यवस्था और रोज़गार के साधनों को दोबारा खड़ा करने में समय और पर्याप्त वित्तीय संसाधन लगेंगे। इसलिए नेपाल सरकार के सामने अब तत्काल राहत के साथ दीर्घकालिक पुनर्वास की स्पष्ट रणनीति तैयार करने की चुनौती है।
बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में सरकारी पैकेज कब घोषित होता है, उसमें कितनी आर्थिक सहायता तय होती है और उसका वितरण किस तंत्र के जरिए होता है, आने वाले दिनों में यही सबसे अहम सवाल होंगे। इस बीच राहत और बचाव अभियान जारी है तथा प्रभावित इलाकों में हालात पर लगातार निगरानी रखी जा रही है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।