NSE और SEBI के बीच को-लोकेशन व डार्क-फाइबर मामलों से जुड़ी कानूनी लड़ाई सुप्रीम कोर्ट में सेटलमेंट के बाद खत्म हो गई। NSE ने कुल ₹1,491.21 करोड़ का भुगतान पूरा किया है। 4 सितंबर को SEBI ने NSE के IPO पर observations जारी कीं, जिससे करीब ₹30,000 करोड़ के प्रस्तावित इश्यू की प्रक्रिया आगे बढ़ी।:
Location नई दिल्ली / मुंबई
Date: 4 सितंबर 2026
Byline: Apurva Choudhary
सुप्रीम कोर्ट में NSE-SEBI विवाद का निपटारा
नेशनल स्टॉक एक्सचेंज यानी NSE को शुक्रवार, 4 सितंबर 2026 को लंबे समय से चले आ रहे को-लोकेशन और डार्क-फाइबर मामलों में बड़ी कानूनी राहत मिली। सुप्रीम कोर्ट ने SEBI की संबंधित याचिकाओं का निपटारा कर दिया। यह कार्रवाई SEBI और NSE के बीच ₹1,491.21 करोड़ के सेटलमेंट के बाद हुई।
रॉयटर्स के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट का फैसला उस लंबे नियामकीय विवाद पर आया जिसमें NSE के सिस्टम तक कुछ ब्रोकरों को कथित तौर पर अनुचित या तेज पहुंच मिलने के आरोपों से जुड़े मामले शामिल थे। अदालत के कदम से NSE के प्रस्तावित IPO के सामने मौजूद एक महत्वपूर्ण कानूनी अड़चन भी दूर हुई है।
₹1,491.21 करोड़ का सेटलमेंट कैसे पूरा हुआ
इस विवाद को खत्म करने के लिए NSE ने SEBI के साथ संशोधित सेटलमेंट प्रस्ताव के तहत कुल ₹1,491.21 करोड़ का भुगतान किया। NSE के अपने रिकॉर्ड के मुताबिक, कंपनी ने मार्च 2026 में दोनों मामलों के लिए कुल सेटलमेंट राशि को बढ़ाकर ₹1,491.21 करोड़ किया था।
जुलाई 2026 में NSE ने करीब ₹714.74 करोड़ की अतिरिक्त राशि जमा की। इससे पहले लगभग ₹776.47 करोड़ जमा किए जा चुके थे। दोनों भुगतानों को मिलाकर सेटलमेंट की कुल राशि ₹1,491.21 करोड़ पूरी हुई।
यह समझना जरूरी है कि यह रकम किसी नए आरोप पर लगाया गया सामान्य जुर्माना नहीं, बल्कि लंबे समय से चल रहे नियामकीय मामलों को सेटलमेंट के जरिए समाप्त करने की प्रक्रिया का हिस्सा है।
को-लोकेशन मामले में क्या आरोप थे
को-लोकेशन विवाद की शुरुआत करीब एक दशक पहले हुई थी। मामले में यह आरोप सामने आया था कि NSE के को-लोकेशन सिस्टम के जरिए कुछ ब्रोकरों को ट्रेडिंग सिस्टम तक दूसरों की तुलना में तेज या preferential access मिला, जिससे बाजार में समान अवसर को लेकर सवाल उठे।
SEBI ने 2019 में इस मामले में NSE के खिलाफ कार्रवाई की थी। बाद में NSE ने संबंधित आदेशों को Securities Appellate Tribunal यानी SAT में चुनौती दी। SAT के फैसलों के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और वर्षों तक कानूनी प्रक्रिया जारी रही।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि मौजूदा सुप्रीम कोर्ट कार्रवाई को इस तरह पेश नहीं किया जाना चाहिए कि अदालत ने मूल आरोपों पर NSE को दोषमुक्त घोषित कर दिया। अदालत के सामने मौजूदा घटनाक्रम सेटलमेंट के आधार पर SEBI की याचिकाओं के निपटारे से संबंधित है।
डार्क-फाइबर विवाद भी सेटलमेंट में शामिल
₹1,491.21 करोड़ का संशोधित सेटलमेंट केवल को-लोकेशन मामले तक सीमित नहीं था। इसमें NSE से जुड़े डार्क-फाइबर मामलों को भी शामिल किया गया था।
NSE के रिकॉर्ड के मुताबिक, SEBI ने 2019 में डार्क-फाइबर मामले में भी कार्रवाई की थी। बाद में संबंधित आदेशों के खिलाफ अपील हुई और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। संशोधित सेटलमेंट ने इन लंबित नियामकीय विवादों को एक व्यापक समाधान के तहत समेटने का रास्ता दिया।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का NSE पर क्या असर
इस घटनाक्रम का सबसे बड़ा असर NSE की लंबे समय से अटकी IPO प्रक्रिया पर पड़ता है। को-लोकेशन और डार्क-फाइबर विवाद NSE के प्रस्तावित सार्वजनिक निर्गम के लिए प्रमुख regulatory overhang बने हुए थे।
सुप्रीम कोर्ट में सेटलमेंट के बाद इन मामलों से जुड़ी कानूनी अनिश्चितता काफी हद तक समाप्त हो गई है। इसका अर्थ यह है कि NSE अब IPO की अंतिम प्रक्रिया की तरफ ज्यादा स्पष्ट regulatory स्थिति के साथ आगे बढ़ सकता है।
4 सितंबर को SEBI ने NSE IPO पर observations जारी कीं
इसी दिन NSE के IPO को लेकर एक और महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया। SEBI ने NSE के Draft Red Herring Prospectus यानी DRHP पर अपनी observations जारी कर दीं।
यह IPO प्रक्रिया में एक अहम regulatory milestone है। हालांकि इसे सीधे तौर पर यह कहना कि IPO की हर अंतिम औपचारिकता पूरी हो गई है, सही नहीं होगा। SEBI की observations के बाद NSE को आगे की IPO प्रक्रिया पूरी करनी होगी।
NSE ने जून 2026 में अपना DRHP दाखिल किया था। प्रस्तावित इश्यू पूरी तरह Offer for Sale यानी OFS है, जिसमें मौजूदा शेयरधारक अपने शेयर बेचेंगे। NSE को स्वयं इस बिक्री से नई पूंजी नहीं मिलेगी।
₹30,000 करोड़ का IPO कितना बड़ा हो सकता है
बाजार रिपोर्टों के मुताबिक NSE का प्रस्तावित IPO करीब ₹30,000 करोड़ का हो सकता है। यदि यह अनुमानित आकार बरकरार रहता है, तो यह भारतीय शेयर बाजार के सबसे बड़े IPO में शामिल होगा और 2024 में Hyundai Motor India के करीब ₹27,870 करोड़ के IPO के रिकॉर्ड को पार कर सकता है।
हालांकि अंतिम इश्यू साइज, valuation और price band अभी तय होने बाकी हैं। इसलिए ₹30,000 करोड़ को फिलहाल अनुमानित या संभावित IPO size के रूप में ही देखना चाहिए, अंतिम राशि के तौर पर नहीं।
NSE IPO में कितने शेयर ऑफर किए जाएंगे
NSE के दाखिल DRHP के अनुसार प्रस्तावित IPO में करीब 14.89 करोड़ इक्विटी शेयरों की Offer for Sale शामिल है। यह NSE की paid-up equity का लगभग 6 प्रतिशत हिस्सा है।
इस OFS में SBI समेत कई मौजूदा शेयरधारक अपनी हिस्सेदारी बेचेंगे। चूंकि यह पूरी तरह OFS है, इसलिए IPO से मिलने वाली रकम NSE के बजाय शेयर बेचने वाले मौजूदा shareholders को जाएगी।
क्या NSE सितंबर में ही शेयर बाजार में लिस्ट होगा?
मौजूदा रिपोर्टिंग के मुताबिक NSE सितंबर 2026 में IPO की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। रॉयटर्स ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि NSE 21 सितंबर वाले सप्ताह में IPO प्रक्रिया और listing की तरफ बढ़ने की योजना बना रहा है। Price band और book-building की तारीखें भी तय प्रक्रिया के तहत सामने आने की उम्मीद है।
हालांकि ये तारीखें बाजार सूत्रों से मिली जानकारी पर आधारित हैं। NSE की ओर से अंतिम issue dates और listing date की औपचारिक घोषणा होने तक इन्हें tentative ही माना जाना चाहिए।
क्या सुप्रीम कोर्ट के फैसले से NSE के पुराने आरोप खत्म हो गए?
यहां कानूनी स्थिति को सही तरीके से समझना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने सेटलमेंट के बाद SEBI की याचिकाओं का निपटारा किया है। इसका अर्थ यह नहीं है कि अदालत ने को-लोकेशन या डार्क-फाइबर से जुड़े मूल आरोपों पर कोई नया merits-based फैसला देकर NSE को क्लीन चिट दी है।
सेटलमेंट एक नियामकीय और कानूनी विवाद को समाप्त करने का रास्ता है। इसलिए खबर को “NSE को सभी आरोपों से क्लीन चिट” के रूप में पेश करना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा।
NSE के लिए अब अगली चुनौती क्या होगी
कानूनी विवाद का यह अध्याय बंद होने के बाद NSE के सामने अब IPO execution की चुनौती है। DRHP पर SEBI observations मिल चुकी हैं, लेकिन final issue documents, price band, subscription window और listing से पहले कई procedural steps पूरे करने होंगे।
इसके अलावा NSE को निवेशकों के सामने अपने regulatory history, governance framework, technology infrastructure और risk-management व्यवस्था की पूरी जानकारी देनी होगी। IPO के दौरान निवेशकों का ध्यान केवल NSE की बाजार हिस्सेदारी पर नहीं, बल्कि valuation और governance risk पर भी रहेगा।
IPO से NSE और भारतीय बाजार को क्या संकेत
NSE का IPO भारतीय capital market के लिए केवल एक बड़ा public issue नहीं है। NSE खुद देश के सबसे महत्वपूर्ण market infrastructure institutions में से एक है और Nifty 50 जैसे प्रमुख benchmark index का संचालन करता है।
इसलिए NSE की listing से exchange के valuation, ownership structure और market infrastructure companies की सार्वजनिक बाजार में pricing को लेकर भी नई मिसाल बन सकती है। साथ ही BSE के पहले से listed होने के कारण दोनों प्रमुख भारतीय exchanges की public-market तुलना भी अधिक स्पष्ट हो सकती है।
निवेशकों के लिए क्या समझना जरूरी है
NSE IPO की खबर में ₹30,000 करोड़ का आंकड़ा आकर्षक जरूर है, लेकिन निवेशकों को इसे सिर्फ issue size के आधार पर नहीं देखना चाहिए। अंतिम valuation, price band, OFS structure, selling shareholders, regulatory disclosures और कंपनी की future earnings prospects IPO की वास्तविक attractiveness तय करेंगे।
इसी तरह सुप्रीम कोर्ट का सेटलमेंट NSE के लिए regulatory uncertainty कम करता है, लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि कंपनी से जुड़े सभी operational या governance risks समाप्त हो गए हैं। IPO दस्तावेजों में उपलब्ध disclosures को पढ़कर ही निवेश संबंधी फैसला करना अधिक उचित होगा।
NSE के लिए 4 सितंबर 2026 का दिन दो बड़े regulatory developments लेकर आया। सुप्रीम कोर्ट ने ₹1,491.21 करोड़ के सेटलमेंट के बाद को-लोकेशन और डार्क-फाइबर मामलों में SEBI की याचिकाओं का निपटारा कर दिया, जिससे करीब एक दशक से चल रही कानूनी अनिश्चितता का महत्वपूर्ण अध्याय समाप्त हुआ।
इसी दिन SEBI ने NSE के IPO DRHP पर observations जारी कीं। करीब ₹30,000 करोड़ के संभावित OFS IPO के लिए यह बड़ा regulatory milestone है, लेकिन final issue size और listing timeline अभी औपचारिक प्रक्रियाओं पर निर्भर है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।