राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर जाति जनगणना की प्रश्नावली पर आपत्ति जताई। कांग्रेस ने ओपन-एंडेड जाति प्रविष्टि हटाने, ड्रॉप-डाउन सूची अपनाने और नई प्रश्नावली पर सर्वदलीय व विशेषज्ञ विमर्श की मांग की। विवाद का केंद्र ओबीसी की गणना और आंकड़ों की विश्वसनीयता है।
Location: नई दिल्ली
Date: 25 अगस्त 2026
By: Mohd Naved
जाति जनगणना को लेकर केंद्र सरकार और कांग्रेस के बीच सियासी बहस अब प्रश्नावली की पद्धति तक पहुंच गई है। कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे तथा लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को संयुक्त पत्र लिखकर मौजूदा प्रश्नावली को रद्द करने और नई प्रश्नावली तैयार करने की मांग की है।
कांग्रेस नेताओं की आपत्ति खास तौर पर जाति दर्ज करने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे ओपन-एंडेड सवालों से है। उनका तर्क है कि अलग-अलग इलाकों में एक ही जाति के अलग नाम, उपजातियां और स्थानीय नाम इस्तेमाल होते हैं। ऐसे नाम अलग-अलग दर्ज हुए तो बाद में आंकड़ों को एक समान श्रेणी में रखना मुश्किल होगा।
25 अगस्त 2026 को सामने आए पत्र में राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री मोदी से मौजूदा जाति जनगणना प्रश्नावली वापस लेने की मांग की। कांग्रेस नेताओं ने कहा कि नई प्रश्नावली तैयार करने से पहले राजनीतिक दलों, विशेषज्ञों और आम जनता से मशविरा होना चाहिए।
पत्र में तेलंगाना और बिहार में हुए जाति सर्वेक्षणों को एक संदर्भ के तौर पर पेश किया गया है। कांग्रेस नेताओं ने इन सर्वेक्षणों में इस्तेमाल हुई जाति सूचियों की प्रतियां भी प्रधानमंत्री को भेजने की बात कही है।
यह मुद्दा केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं है। जातिगत आंकड़ों की विश्वसनीयता सामाजिक न्याय, आरक्षण, शिक्षा, रोजगार और कल्याणकारी योजनाओं से जुड़े नीतिगत फैसलों पर असर डाल सकती है। कांग्रेस इसी आधार पर मौजूदा प्रक्रिया में बदलाव की मांग कर रही है।
केंद्र सरकार ने अप्रैल 2025 में आगामी जनगणना में जातिवार गणना शामिल करने को मंजूरी दी थी। प्रधानमंत्री कार्यालय के आधिकारिक बयान के मुताबिक, आजादी के बाद हुई जनगणनाओं में जाति को व्यापक रूप से शामिल नहीं किया गया था। सरकार ने मुख्य जनगणना के भीतर जातिवार गणना कराने का फैसला लिया।
सरकार का आधिकारिक रुख यह रहा है कि अलग-अलग राज्यों के सर्वेक्षणों की जगह मुख्य जनगणना में जातिवार जानकारी शामिल करने से एक समान राष्ट्रीय प्रक्रिया तैयार होगी। प्रधानमंत्री कार्यालय ने यह भी कहा था कि जनगणना संघ का विषय है।
अब विवाद इस बात पर है कि जाति की जानकारी दर्ज करने का तरीका कितना मानकीकृत होना चाहिए। कांग्रेस का कहना है कि केवल व्यक्ति द्वारा बताए गए जाति-नाम को दर्ज करना पर्याप्त नहीं होगा।
जातिवार आंकड़ों की मांग भारत की राजनीति में लंबे समय से मौजूद रही है। 2010 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने लोकसभा में जातिवार जनगणना के मुद्दे पर विचार का आश्वासन दिया था। इसके बाद सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना यानी एसईसीसी का रास्ता अपनाया गया था।
अप्रैल 2025 में केंद्र सरकार ने आगामी जनगणना में जातिवार गणना को शामिल करने का फैसला किया। इसके बाद जाति आंकड़ों की पद्धति, उपयोगिता और राजनीतिक असर को लेकर बहस तेज होती गई।
25 अगस्त 2026 को कांग्रेस ने मौजूदा प्रश्नावली को लेकर अपनी आपत्ति औपचारिक तौर पर प्रधानमंत्री तक पहुंचाई। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने भी आरोप लगाया कि सरकार की मौजूदा कवायद पर्याप्त नहीं है। यह कांग्रेस नेतृत्व की ओर से प्रधानमंत्री को इस मुद्दे पर भेजे गए पत्रों की श्रृंखला में तीसरा पत्र होने का दावा भी सामने आया है।
राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे का मुख्य तर्क है कि सटीक जातिगत आंकड़े के बिना सामाजिक न्याय की नीतियों का प्रभावी आकलन कठिन होगा। उनका कहना है कि एक ही जाति अलग-अलग नामों से दर्ज हुई तो वास्तविक संख्या बिखर सकती है।
कांग्रेस ने खास तौर पर ओबीसी की गणना को लेकर सवाल उठाया है। नेताओं के मुताबिक मौजूदा प्रक्रिया में पिछड़े वर्ग के लिए स्पष्ट श्रेणीकरण नहीं होने से देश में ओबीसी आबादी का सही आकलन मुश्किल हो सकता है।
कांग्रेस का प्रस्ताव है कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की गणना की तरह जातियों के लिए ड्रॉप-डाउन सूची तैयार की जाए। उसके मुताबिक सरकारी सूचियों और उपलब्ध संस्थागत स्रोतों के आधार पर ऐसी सूची तैयार की जा सकती है।
दूसरी ओर, केंद्र सरकार का आधिकारिक फैसला जातिवार गणना को मुख्य जनगणना में शामिल करने पर केंद्रित है। प्रधानमंत्री कार्यालय के उपलब्ध आधिकारिक बयान में जातिवार गणना को मंजूरी देने की बात स्पष्ट है, लेकिन 25 अगस्त को कांग्रेस की इस मांग पर प्रधानमंत्री कार्यालय की कोई प्रतिक्रिया उपलब्ध स्रोतों में नहीं मिली है। इसलिए सरकार के मौजूदा प्रश्नावली पर जवाब को लेकर कोई निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
भारत की आधिकारिक जनगणना वेबसाइट पर उपलब्ध प्रश्नावली में कई सामाजिक और जनसांख्यिकीय सूचनाओं के लिए निर्धारित प्रश्न मौजूद हैं। वेबसाइट पर 17 अगस्त 2026 को प्रश्नावली संबंधी सामग्री का अपडेट दर्ज है।
कांग्रेस की आपत्ति का आधार यह है कि जाति-नाम के लिए ओपन-एंडेड तरीका अपनाने पर एक ही सामाजिक समूह अलग-अलग नामों में दर्ज हो सकता है। यह चिंता केवल नामों की वर्तनी तक सीमित नहीं है। क्षेत्रीय नाम, उपजातियां और स्थानीय पहचान भी डेटा के वर्गीकरण को जटिल बना सकती हैं।
हालांकि, यह अलग सवाल है कि ऐसी विविध प्रविष्टियों को बाद में प्रशासनिक स्तर पर किसी मानकीकृत डेटाबेस में जोड़ा जा सकता है या नहीं। उपलब्ध स्रोत इस तकनीकी प्रक्रिया का पूरा विवरण नहीं देते। इसलिए यह कहना कि मौजूदा व्यवस्था से आंकड़े निश्चित रूप से पूरी तरह अनुपयोगी हो जाएंगे, कांग्रेस के तर्क के रूप में ही रिपोर्ट किया जाना चाहिए, स्थापित तथ्य के रूप में नहीं।
अगर जातिगत आंकड़ों में वर्गीकरण की समस्या रहती है, तो सामाजिक समूहों की वास्तविक आबादी का विश्लेषण कठिन हो सकता है। इससे आरक्षण, कल्याणकारी योजनाओं, शिक्षा और रोजगार से जुड़ी नीतियों के लिए इस्तेमाल होने वाले आंकड़ों की व्याख्या प्रभावित होने की आशंका कांग्रेस ने जताई है।
ओबीसी के संदर्भ में यह बहस और अहम हो जाती है। कांग्रेस का कहना है कि स्पष्ट श्रेणीकरण के बिना ओबीसी आबादी का राष्ट्रीय स्तर पर सटीक आकलन नहीं हो पाएगा। दूसरी तरफ, सरकार की ओर से मौजूदा प्रक्रिया के तकनीकी बचाव पर इस समय उपलब्ध आधिकारिक सामग्री सीमित है।
जाति जनगणना का मुद्दा भारतीय राजनीति में सामाजिक प्रतिनिधित्व और कल्याणकारी नीतियों से जुड़ा संवेदनशील विषय है। इसलिए प्रश्नावली की तकनीकी संरचना भी राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गई है।
कांग्रेस के लिए यह मुद्दा सामाजिक न्याय के अपने राजनीतिक नैरेटिव को आगे बढ़ाने का अहम माध्यम है। सरकार के लिए चुनौती यह है कि जातिवार डेटा एकत्र करने की प्रक्रिया पारदर्शी, विश्वसनीय और प्रशासनिक रूप से उपयोगी दिखाई दे।
इस विवाद का अगला चरण संभवतः डेटा-कलेक्शन की पद्धति, जातियों के मानकीकरण और अलग-अलग सरकारी सूचियों के समन्वय पर केंद्रित होगा।
जातिगत आंकड़ों का इस्तेमाल सीधे आर्थिक उत्पादन मापने के लिए नहीं होता, लेकिन सामाजिक और आर्थिक असमानताओं को समझने में इनका नीतिगत महत्व हो सकता है। शिक्षा, रोजगार, सरकारी योजनाओं और सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों में लक्षित हस्तक्षेप के लिए आबादी की संरचना का सटीक आकलन महत्वपूर्ण रहता है।
यदि अलग-अलग नामों के कारण एक ही समुदाय कई श्रेणियों में दर्ज होता है, तो डेटा विश्लेषण की जटिलता बढ़ सकती है। यही कांग्रेस की मुख्य आपत्ति है। हालांकि इस प्रभाव की वास्तविक सीमा जनगणना पूरी होने और डेटा प्रोसेसिंग की प्रक्रिया सामने आने के बाद ही स्पष्ट होगी।
जातिगत जनगणना मुख्य रूप से भारत का घरेलू नीतिगत मामला है। इसका प्रत्यक्ष अंतरराष्ट्रीय असर सीमित है। लेकिन भारत जैसे बड़े लोकतंत्र में सामाजिक संरचना से जुड़े व्यापक आंकड़े शोध संस्थानों, नीति निर्माताओं और अंतरराष्ट्रीय अकादमिक समुदाय के लिए उपयोगी हो सकते हैं।
क्षेत्रीय स्तर पर बिहार और तेलंगाना के जाति सर्वेक्षणों को कांग्रेस ने अपने प्रस्ताव के उदाहरण के तौर पर सामने रखा है। इससे केंद्र की राष्ट्रीय जनगणना और राज्यों के पिछले अनुभवों के बीच तुलना की गुंजाइश बनती है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि केंद्र सरकार कांग्रेस की आपत्ति पर क्या रुख अपनाती है। दूसरा सवाल प्रश्नावली में जाति-नामों के मानकीकरण की वास्तविक तकनीकी व्यवस्था से जुड़ा है।
यह भी स्पष्ट होना बाकी है कि ओबीसी और अन्य पिछड़े समूहों के लिए अंतिम डेटा-क्लासिफिकेशन किस तरह किया जाएगा। इसी तरह यह भी देखना होगा कि राज्यों की अलग-अलग जाति सूचियों और केंद्रीय स्तर की सूची के बीच समन्वय किस रूप में होगा।
कांग्रेस ने मौजूदा प्रश्नावली को रद्द करके राजनीतिक दलों, विशेषज्ञों और जनता से विचार-विमर्श के बाद नई प्रश्नावली बनाने का सुझाव दिया है। पार्टी ने तेलंगाना और बिहार की जाति सर्वेक्षण सूचियों को भी संदर्भ के रूप में सामने रखा है।
अब गेंद केंद्र सरकार के पाले में है। यदि सरकार प्रश्नावली में संशोधन पर विचार करती है तो जातियों की सूची, वर्गीकरण और डेटा-कॉडिंग की प्रक्रिया पर विस्तृत सार्वजनिक बहस हो सकती है। यदि सरकार मौजूदा पद्धति पर कायम रहती है तो कांग्रेस इस मुद्दे को राजनीतिक और नीतिगत बहस में आगे भी उठा सकती है।
जाति जनगणना का असल सवाल केवल संख्या गिनने का नहीं, बल्कि उन संख्याओं को विश्वसनीय और नीतिगत रूप से उपयोगी बनाने का है। राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे ने इसी बिंदु पर मौजूदा प्रश्नावली को चुनौती दी है और ड्रॉप-डाउन जाति सूची का सुझाव दिया है।
केंद्र सरकार पहले ही मुख्य जनगणना में जातिवार गणना को मंजूरी दे चुकी है। अब महत्वपूर्ण यह होगा कि जाति की पहचान, वर्गीकरण और डेटा प्रोसेसिंग के लिए कौन-सी अंतिम पद्धति अपनाई जाती है। इस बहस का परिणाम आने वाले वर्षों में सामाजिक न्याय से जुड़ी नीतियों के लिए महत्वपूर्ण डेटा आधार तैयार कर सकता है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।