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रुपये में एक्सपोर्ट पेमेंट के नियम आसान, अब ट्रेड बेनिफिट्स मिलेंगे

Apurva Choudhary 2026-08-20 20:36:11
रुपये में एक्सपोर्ट पेमेंट के नियम आसान, अब ट्रेड बेनिफिट्स मिलेंगे
डीजीएफटी ने रुपये में मिलने वाली पात्र निर्यात रकम को विदेशी मुद्रा आय के बराबर ट्रेड पॉलिसी लाभों के लिए मान्यता दी है। इससे निर्यातकों को रुपये में भुगतान स्वीकार करने में सुविधा मिलेगी। पात्र रुपये प्राप्तियां निर्यात दायित्व पूरा करने में भी गिनी जा सकेंगी। कदम का लक्ष्य रुपये का अंतरराष्ट्रीय इस्तेमाल बढ़ाना है।
METADATA
Location: नई दिल्ली, भारत
Date: 20 अगस्त 2026
By: Apurva Choudhary 

रुपये में एक्सपोर्ट पेमेंट के नियम आसान, अब ट्रेड बेनिफिट्स मिलेंगे
भारत ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार में रुपये के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की दिशा में एक अहम नीतिगत कदम उठाया है। डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ फॉरेन ट्रेड यानी डीजीएफटी ने रुपये में मिलने वाली पात्र एक्सपोर्ट रकम को विदेशी मुद्रा में मिली एक्सपोर्ट आय के बराबर ट्रेड पॉलिसी ट्रीटमेंट देने का फैसला किया है। इसका मकसद निर्यातकों के लिए भारतीय रुपये में अंतरराष्ट्रीय भुगतान को ज्यादा व्यावहारिक बनाना और रुपये के ग्लोबल इस्तेमाल को बढ़ावा देना है। 
यह बदलाव तत्काल प्रभाव से लागू किया गया है। इसके तहत पात्र रुपये में प्राप्त एक्सपोर्ट रकम पर विदेशी मुद्रा में प्राप्त एक्सपोर्ट आय की तरह संबंधित फॉरेन ट्रेड पॉलिसी लाभ मिल सकेंगे। इससे उन भारतीय निर्यातकों के लिए व्यवस्था आसान हो सकती है जो ऐसे विदेशी व्यापारिक साझेदारों के साथ काम करते हैं जहां रुपये में सेटलमेंट संभव है।

क्या बदला है?
नए प्रावधान का सबसे अहम पहलू यह है कि पात्र रुपये में प्राप्त एक्सपोर्ट रकम को अब केवल भुगतान की मुद्रा के आधार पर विदेशी मुद्रा प्राप्तियों से कमतर नहीं माना जाएगा। इससे संबंधित ट्रेड पॉलिसी बेनिफिट्स हासिल करने में रुपये में प्राप्त भुगतान को मान्यता मिलने का रास्ता और स्पष्ट होता है। 
आरबीआई पहले ही भारतीय रुपये में अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए एक वैकल्पिक सेटलमेंट व्यवस्था बना चुका है। जुलाई 2022 में आरबीआई ने एक्सपोर्ट और इम्पोर्ट की इनवॉयसिंग, भुगतान और सेटलमेंट रुपये में करने के लिए अतिरिक्त व्यवस्था शुरू की थी। इसके तहत स्पेशल रुपी वोस्ट्रो अकाउंट के जरिए सीमा-पार व्यापारिक लेनदेन का निपटारा किया जा सकता है। 
डीजीएफटी का मौजूदा कदम इसी व्यापक व्यवस्था को ट्रेड पॉलिसी के स्तर पर और उपयोगी बनाने की दिशा में देखा जा सकता है।

एक्सपोर्टर्स को क्या फायदा होगा?
रुपये में पात्र एक्सपोर्ट पेमेंट स्वीकार करने वाले भारतीय निर्यातकों के लिए सबसे बड़ा फायदा ट्रेड पॉलिसी लाभों की पात्रता से जुड़ा है।
विदेशी मुद्रा में भुगतान मिलने की बाध्यता कुछ मामलों में रुपये के इस्तेमाल को सीमित कर सकती थी। अब पात्र रुपये में प्राप्त एक्सपोर्ट रकम को ट्रेड पॉलिसी के तहत विदेशी मुद्रा आय के समान मान्यता मिलने से निर्यातकों के लिए भुगतान की मुद्रा को लेकर ज्यादा लचीलापन पैदा होगा। 
इसका महत्व खास तौर पर उन बाजारों में हो सकता है जहां भारतीय रुपये में व्यापारिक सेटलमेंट के लिए व्यवस्था मौजूद है। आरबीआई की व्यवस्था के अनुसार भारतीय निर्यातकों को पात्र लेनदेन में विदेशी पार्टनर बैंक के स्पेशल रुपी वोस्ट्रो अकाउंट में उपलब्ध रकम से रुपये में एक्सपोर्ट भुगतान प्राप्त हो सकता है। 

एक्सपोर्ट ऑब्लिगेशन में भी गिनती
इस बदलाव का एक महत्वपूर्ण पहलू एक्सपोर्ट ऑब्लिगेशन से जुड़ा है। फॉरेन ट्रेड पॉलिसी के तहत कुछ योजनाओं में निर्यातकों को निर्धारित एक्सपोर्ट ऑब्लिगेशन पूरा करना होता है।
मौजूदा नीति ढांचे में रुपये में प्राप्त पात्र एक्सपोर्ट आय को एक्सपोर्ट ऑब्लिगेशन की पूर्ति से जोड़ने का प्रावधान पहले से विकसित किया जा चुका है। डीजीएफटी की प्रक्रिया में भी भारतीय रुपये में एक्सपोर्ट रियलाइजेशन और एक्सपोर्ट ऑब्लिगेशन के बीच संबंध का उल्लेख मिलता है। 
इसलिए नया बदलाव सिर्फ भुगतान की मुद्रा बदलने तक सीमित नहीं है। इसका असर निर्यातकों की ट्रेड पॉलिसी अनुपालना और संबंधित लाभों की पात्रता पर भी पड़ सकता है।

भारत रुपये का इस्तेमाल क्यों बढ़ाना चाहता है?
भारत पिछले कुछ वर्षों से अंतरराष्ट्रीय व्यापार में रुपये की भूमिका बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। जुलाई 2022 में आरबीआई ने कहा था कि रुपये में अंतरराष्ट्रीय व्यापार सेटलमेंट की अतिरिक्त व्यवस्था का उद्देश्य भारत के एक्सपोर्ट को बढ़ावा देना और वैश्विक व्यापार समुदाय की रुपये में बढ़ती दिलचस्पी को समर्थन देना है। 
इस व्यवस्था में भारतीय बैंक विदेशी साझेदार बैंकों के साथ स्पेशल रुपी वोस्ट्रो अकाउंट रख सकते हैं। इन अकाउंट्स के जरिए भारत से एक्सपोर्ट और भारत में इम्पोर्ट से जुड़े रुपये के लेनदेन का सेटलमेंट किया जा सकता है। 
आरबीआई की मौजूदा जानकारी भी स्पष्ट करती है कि रुपये में इंटरनेशनल ट्रेड सेटलमेंट मौजूदा फ्रीली कन्वर्टिबल करेंसी व्यवस्था का विकल्प है, न कि उसका तत्काल पूर्ण प्रतिस्थापन। 

क्या इससे डॉलर की भूमिका खत्म होगी?
नहीं। इस फैसले को डॉलर आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यापार से भारत के पूरी तरह बाहर निकलने के तौर पर देखना सही नहीं होगा।
आरबीआई ने अपनी व्यवस्था को मौजूदा अंतरराष्ट्रीय व्यापार सेटलमेंट सिस्टम के साथ एक अतिरिक्त व्यवस्था के रूप में पेश किया है। यानी व्यापारिक साझेदार परिस्थितियों और उपलब्ध बैंकिंग व्यवस्था के अनुसार रुपये या अन्य स्वीकार्य मुद्राओं में लेनदेन कर सकते हैं। 
डीजीएफटी का नया बदलाव इसी वैकल्पिक व्यवस्था को निर्यातकों के लिए अधिक आकर्षक बनाने की कोशिश है। इससे रुपये में भुगतान लेने पर ट्रेड पॉलिसी लाभों के संदर्भ में मुद्रा संबंधी नुकसान की आशंका कम हो सकती है।

पृष्ठभूमि और घटनाक्रम
रुपये के अंतरराष्ट्रीय इस्तेमाल को बढ़ावा देने की नीति 2022 में आरबीआई की विशेष सेटलमेंट व्यवस्था से तेज हुई। इसके तहत एक्सपोर्ट और इम्पोर्ट की इनवॉयसिंग रुपये में करने तथा रुपये में भुगतान और सेटलमेंट की सुविधा दी गई। 
बाद में फॉरेन ट्रेड पॉलिसी के प्रावधानों में भी रुपये में प्राप्त एक्सपोर्ट रकम को लेकर व्यवस्था विकसित हुई। डीजीएफटी के मौजूदा प्रक्रिया दस्तावेजों में एक्सपोर्ट ऑब्लिगेशन के लिए भारतीय रुपये और फ्रीली कन्वर्टिबल करेंसी दोनों में प्रावधानों का उल्लेख है। 
अब ताजा बदलाव का फोकस पात्र रुपये में मिली एक्सपोर्ट रकम को ट्रेड पॉलिसी लाभों के लिए विदेशी मुद्रा आय के बराबर ट्रीटमेंट देने पर है। Reuters ने भी इस कदम को रुपये में एक्सपोर्ट पेमेंट के नियम आसान करने और ग्लोबल ट्रेड सेटलमेंट में रुपये का इस्तेमाल बढ़ाने की दिशा में बताया है।

प्रमुख पक्षकारों का रुख
सरकार और नियामकीय संस्थाओं की नीति का व्यापक उद्देश्य रुपये को अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए अधिक उपयोगी बनाना है। आरबीआई ने 2022 में अपनी व्यवस्था शुरू करते समय ग्लोबल ट्रेड और भारतीय एक्सपोर्ट को बढ़ावा देने की बात कही थी। 
डीजीएफटी का ताजा कदम इसी नीति को एक्सपोर्ट पॉलिसी के लाभों से जोड़ता है। इसका सीधा फायदा उन निर्यातकों को मिल सकता है जिनके विदेशी खरीदार रुपये में भुगतान करने के लिए तैयार हैं और जिनके लेनदेन निर्धारित बैंकिंग चैनल तथा लागू नियमों के अनुरूप हैं।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि हर रुपये में हुआ अंतरराष्ट्रीय भुगतान अपने आप हर ट्रेड पॉलिसी लाभ के लिए पात्र नहीं हो जाता। पात्रता संबंधित योजना, लेनदेन की प्रकृति और लागू नियामकीय शर्तों पर निर्भर करेगी।
उपलब्ध साक्ष्य क्या बताते हैं?
आरबीआई की आधिकारिक व्यवस्था पुष्टि करती है कि भारत में अंतरराष्ट्रीय व्यापार का रुपये में इनवॉयसिंग और सेटलमेंट संभव है। इसके लिए स्पेशल रुपी वोस्ट्रो अकाउंट जैसी बैंकिंग व्यवस्था का इस्तेमाल किया जाता है। 
डीजीएफटी के प्रक्रिया दस्तावेज भी रुपये में एक्सपोर्ट रियलाइजेशन को ट्रेड पॉलिसी के तहत मान्यता देने वाले प्रावधानों की मौजूदगी दिखाते हैं।
Reuters के मुताबिक ताजा बदलाव रुपये में प्राप्त एक्सपोर्ट आय को ट्रेड पॉलिसी बेनिफिट्स के लिए विदेशी मुद्रा आय के बराबर रखने की दिशा में है। 
इन तथ्यों से इतना स्पष्ट है कि भारत रुपये के अंतरराष्ट्रीय इस्तेमाल को केवल बैंकिंग सुविधा के स्तर पर नहीं, बल्कि ट्रेड पॉलिसी के प्रोत्साहनों से भी जोड़ रहा है।

संभावित आर्थिक प्रभाव
नियमों में यह बदलाव भारतीय निर्यातकों के लिए भुगतान विकल्प बढ़ा सकता है। अगर विदेशी खरीदार रुपये में भुगतान करने में सक्षम और इच्छुक हैं तो निर्यातक को हर लेनदेन में डॉलर या किसी अन्य फ्रीली कन्वर्टिबल करेंसी पर निर्भर रहने की जरूरत कम हो सकती है।
इससे कुछ बाजारों में मुद्रा रूपांतरण से जुड़ी लागत और प्रक्रियात्मक जटिलता कम होने की संभावना बन सकती है। हालांकि वास्तविक लाभ व्यापारिक साझेदार, बैंकिंग चैनल, विनिमय दर और संबंधित ट्रेड पॉलिसी योजना की शर्तों पर निर्भर करेगा।
व्यापक स्तर पर रुपये में व्यापार बढ़ने से भारतीय मुद्रा की अंतरराष्ट्रीय उपयोगिता बढ़ सकती है। लेकिन इसका प्रभाव तभी टिकाऊ होगा जब विदेशी कंपनियां, बैंक और वित्तीय संस्थान रुपये को पर्याप्त मात्रा में स्वीकार और इस्तेमाल करने के लिए तैयार हों।

चुनौतियां क्या हैं?
रुपये के अंतरराष्ट्रीयकरण की सबसे बड़ी चुनौती केवल भारतीय नियम नहीं, बल्कि विदेशी बाजार में रुपये की स्वीकार्यता है।
किसी विदेशी आयातक के लिए रुपये में भुगतान करना तभी आकर्षक होगा जब उसके पास रुपये रखने, उनका इस्तेमाल करने या उन्हें अन्य वित्तीय जरूरतों में बदलने की पर्याप्त सुविधा हो। इसके लिए बैंकिंग नेटवर्क, वोस्ट्रो अकाउंट, तरलता और विदेशी मुद्रा बाजार की गहराई महत्वपूर्ण होगी।
Reuters ने भी संकेत दिया है कि विदेशी कंपनियों और बैंकों के लिए रुपये को हासिल करना, इस्तेमाल करना और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रखना इस नीति की व्यापक सफलता के लिए महत्वपूर्ण रहेगा। 
इसलिए केवल डीजीएफटी का नियम बदलना पर्याप्त नहीं होगा। व्यापारिक साझेदारों और वैश्विक बैंकिंग सिस्टम की भागीदारी भी उतनी ही अहम होगी।

अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय प्रभाव
रुपये में व्यापारिक सेटलमेंट बढ़ने से भारत के कुछ द्विपक्षीय व्यापारिक संबंधों में स्थानीय मुद्रा के इस्तेमाल की गुंजाइश बढ़ सकती है। यह विशेष रूप से उन बाजारों के लिए उपयोगी हो सकता है जहां रुपये में सेटलमेंट के लिए बैंकिंग व्यवस्था पहले से बनाई गई है।
हालांकि इसे डॉलर व्यवस्था के समानांतर एक विकल्प के रूप में देखना ज्यादा उचित है। आरबीआई के अनुसार INR सेटलमेंट व्यवस्था मौजूदा फ्रीली कन्वर्टिबल करेंसी आधारित सिस्टम की पूरक व्यवस्था है। 
इसलिए निकट अवधि में इसका असर वैश्विक मुद्रा व्यवस्था में बड़े बदलाव से ज्यादा भारतीय निर्यातकों के लिए भुगतान विकल्प बढ़ने के रूप में दिखाई दे सकता है।

कौन से सवाल अभी अनुत्तरित हैं?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि कितने विदेशी खरीदार वास्तव में रुपये में भुगतान करने को तैयार होंगे।
दूसरा सवाल यह है कि रुपये में व्यापार बढ़ने के साथ विदेशी बैंकों और कंपनियों के पास जमा होने वाले रुपये का इस्तेमाल कैसे होगा। अगर पर्याप्त व्यापारिक या वित्तीय विकल्प उपलब्ध नहीं हुए तो रुपये में भुगतान स्वीकार करने की विदेशी पक्ष की रुचि सीमित रह सकती है।
तीसरा सवाल यह है कि इस बदलाव से भारतीय एक्सपोर्ट्स की वास्तविक लागत कितनी घटेगी और ट्रेड पॉलिसी बेनिफिट्स की पात्रता में इसका व्यावहारिक असर कितना बड़ा होगा।
इन सवालों का जवाब आने वाले समय में रुपये में होने वाले वास्तविक व्यापारिक लेनदेन और विदेशी साझेदारों की भागीदारी से मिलेगा।

आगे क्या होगा?
अब ध्यान इस बात पर रहेगा कि भारतीय एक्सपोर्टर्स और उनके विदेशी ट्रेड पार्टनर्स इस सुविधा का कितना इस्तेमाल करते हैं। बैंकिंग चैनलों में रुपये से जुड़े अंतरराष्ट्रीय लेनदेन बढ़ने पर इस नीति की उपयोगिता और स्पष्ट होगी।
सरकार और आरबीआई के लिए अगला चरण विदेशी बैंकों और व्यापारिक साझेदारों के बीच रुपये की स्वीकार्यता बढ़ाने, सेटलमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने और नियमों को व्यावहारिक बनाने से जुड़ा हो सकता है।
हालांकि अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि रुपये में एक्सपोर्ट सेटलमेंट कितने बड़े पैमाने पर बढ़ेगा। इसके लिए विदेशी मांग और बैंकिंग सिस्टम की प्रतिक्रिया निर्णायक होगी।
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Apurva Choudhary

Apurva Choudhary

Shah Times Reporter

शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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