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कच्चे तेल की महंगाई से शेयर बाजार में गिरावट, सेंसेक्स 400 अंक से ज्यादा टूटा

Shah Times 2026-08-11 12:37:51
कच्चे तेल की महंगाई से शेयर बाजार में गिरावट, सेंसेक्स 400 अंक से ज्यादा टूटा

कच्चा तेल महंगा, सेंसेक्स-निफ्टी में गिरावट

सेंसेक्स 400 अंक से ज्यादा टूटा, निफ्टी 24,500 के नीचे

मिडिल ईस्ट तनाव का असर, शेयर बाजार में बिकवाली


भारतीय शेयर बाजार में मंगलवार, 11 अगस्त 2026 को शुरुआती कारोबार में गिरावट दर्ज हुई। सेंसेक्स 400 अंक से ज्यादा नीचे गया और निफ्टी 24,500 के स्तर से नीचे फिसला। कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल, मिडिल ईस्ट तनाव और अमेरिकी-ईरान बातचीत की कमजोर होती उम्मीदों ने निवेशकों की धारणा प्रभावित की। बैंकिंग और फाइनेंशियल शेयरों में खास दबाव दिखा, जबकि आईटी शेयरों ने कुछ सहारा दिया।


मुंबई | 11 अगस्त 2026 | शाह टाइम्स 

By Mohd Haris


कच्चे तेल की कीमतों ने बाजार का मूड बिगाड़ा

भारतीय शेयर बाजार में मंगलवार को शुरुआती कारोबार में दबाव देखने को मिला। कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल और मिडिल ईस्ट में जारी अनिश्चितता ने निवेशकों के सेंटीमेंट को कमजोर किया। सेंसेक्स और निफ्टी दोनों लाल निशान में कारोबार करते दिखे।

रॉयटर्स के मुताबिक शुरुआती कारोबार में निफ्टी 0.43 फीसदी गिरकर 24,477.95 पर और बीएसई सेंसेक्स 0.48 फीसदी टूटकर 78,167.55 पर आ गया। बाजार में गिरावट का सबसे बड़ा दबाव बैंकिंग और निजी वित्तीय कंपनियों के शेयरों पर रहा।

इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार शुरुआती सत्र में सेंसेक्स 400 अंक से ज्यादा नीचे गया और निफ्टी 24,500 के स्तर से नीचे चला गया। इससे बाजार में शॉर्ट-टर्म रिस्क को लेकर चिंता बढ़ी।

कच्चा तेल 88 डॉलर के करीब क्यों पहुंचा

कच्चे तेल की कीमतों में उछाल का सीधा संबंध मिडिल ईस्ट में जारी तनाव और अमेरिका-ईरान बातचीत को लेकर घटती उम्मीदों से जोड़ा जा रहा है।

रॉयटर्स के मुताबिक ब्रेंट क्रूड करीब 5 फीसदी की तेजी के बाद 88 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया। तेल बाजार में यह तेजी निवेशकों के लिए खास चिंता का विषय है क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर कच्चे तेल का आयात करता है।

एसोसिएटेड प्रेस के मुताबिक सोमवार को ब्रेंट क्रूड में करीब 5 फीसदी की तेजी आई थी। इसके पीछे होर्मुज़ स्ट्रेट को दोबारा खोलने को लेकर बनी अनिश्चितता प्रमुख कारणों में रही। मंगलवार को ब्रेंट करीब 87.72 डॉलर प्रति बैरल पर बना रहा।

तेल की कीमतों में ऐसी तेजी भारत जैसे बड़े आयातक देश के लिए महंगी साबित हो सकती है। इससे आयात बिल बढ़ता है, रुपये पर दबाव बढ़ सकता है और कंपनियों की लागत प्रभावित हो सकती है।

बाजार के लिए महंगा तेल इतना बड़ा खतरा क्यों

भारतीय अर्थव्यवस्था में कच्चे तेल की कीमतों का असर कई स्तरों पर पड़ता है। सबसे पहले आयात बिल बढ़ता है। इसके बाद रुपये पर दबाव आ सकता है और पेट्रोलियम से जुड़ी लागत अर्थव्यवस्था के दूसरे हिस्सों तक पहुंच सकती है।

अगर तेल लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर रहता है, तो महंगाई का दबाव बढ़ने का जोखिम रहता है। कंपनियों के लिए कच्चे माल और परिवहन की लागत भी बढ़ सकती है।

रॉयटर्स ने बाजार की कमजोरी को इसी व्यापक चिंता से जोड़ा है। निवेशकों को आशंका है कि महंगा तेल महंगाई बढ़ाकर कंपनियों के मार्जिन पर दबाव डाल सकता है।

यानी बाजार की मौजूदा गिरावट केवल शेयरों की खरीद-बिक्री का मामला नहीं है। इसके पीछे कमोडिटी कीमतों, मुद्रा बाजार, महंगाई और ब्याज दरों से जुड़ा व्यापक आर्थिक रिस्क मौजूद है।

बैंकिंग शेयरों में ज्यादा दबाव

मंगलवार की शुरुआती गिरावट में बैंकिंग और फाइनेंशियल शेयर प्रमुख दबाव में रहे। रॉयटर्स के अनुसार बैंकिंग और निजी वित्तीय कंपनियों के इंडेक्स करीब 0.9 फीसदी नीचे थे।

बैंकिंग शेयरों पर दबाव का सीधा कारण केवल कच्चा तेल नहीं है। व्यापक रिस्क-ऑफ सेंटीमेंट में निवेशक अक्सर वित्तीय शेयरों में मुनाफावसूली करते हैं। इसके अलावा महंगाई और ब्याज दरों को लेकर अनिश्चितता भी बैंकिंग क्षेत्र के वैल्यूएशन पर असर डाल सकती है।

बाजार की दिशा में अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि तेल की कीमतें आने वाले सत्रों में 85 से 90 डॉलर के दायरे में रहती हैं या तनाव बढ़ने पर इससे ऊपर जाती हैं।

आईटी शेयरों ने दिया कुछ सहारा

जहां बैंकिंग और फाइनेंशियल शेयरों में बिकवाली रही, वहीं आईटी सेक्टर ने बाजार को कुछ सहारा दिया। रॉयटर्स के अनुसार आईटी शेयर शुरुआती कारोबार में करीब 0.3 फीसदी ऊपर रहे।

आईटी सेक्टर को अमेरिकी ब्याज दरों को लेकर बदलती उम्मीदों से फायदा मिला। बाजार में अमेरिकी फेडरल रिजर्व की भविष्य की नीति को लेकर धारणा में कुछ बदलाव आया है।

रॉयटर्स के अनुसार आईटी इंडेक्स तीन कारोबारी सत्रों में करीब 2 फीसदी ऊपर रहा था। इससे संकेत मिलता है कि बाजार में पूरी तरह व्यापक बिकवाली नहीं थी। निवेशक सेक्टर के हिसाब से जोखिम और अवसर का आकलन कर रहे थे।

रुपये पर भी कच्चे तेल का दबाव

शेयर बाजार की कमजोरी के साथ भारतीय रुपया भी दबाव में रहा। मंगलवार को रुपया 8 पैसे कमजोर होकर करीब 95.38 प्रति डॉलर पर खुला। बढ़ते कच्चे तेल और मिडिल ईस्ट संकट ने मुद्रा पर दबाव बढ़ाया।

रॉयटर्स के अनुसार रुपया करीब 95.40 प्रति डॉलर तक कमजोर हुआ। बाजार में यह भी रिपोर्ट किया गया कि सरकारी बैंक संभवतः रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की ओर से विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप कर रहे थे, जिससे रुपये की गिरावट को सीमित किया जा सके।

महंगे तेल और कमजोर रुपये का मेल भारत के लिए चुनौतीपूर्ण है। तेल डॉलर में खरीदा जाता है, इसलिए रुपये की कमजोरी आयात लागत को और बढ़ा सकती है।

विदेशी निवेशकों का रुख बदला

घरेलू बाजार में गिरावट के बावजूद विदेशी निवेशकों के रुख में कुछ सुधार के संकेत भी मिले हैं। रॉयटर्स के मुताबिक अगस्त में विदेशी निवेशकों ने अब तक करीब 1.5 अरब डॉलर की शुद्ध खरीदारी की है। जुलाई में भी उन्होंने करीब 2.1 अरब डॉलर की खरीदारी की थी।

हालांकि साल की कुल तस्वीर अभी अलग है। विदेशी निवेशक वर्ष के दौरान अब भी करीब 25.7 अरब डॉलर के शुद्ध विक्रेता बने हुए हैं।

इसका अर्थ है कि बाजार में विदेशी पूंजी की वापसी के संकेत जरूर हैं, लेकिन वैश्विक जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।

मिडिल ईस्ट तनाव बाजार के लिए क्यों अहम है

मौजूदा बाजार दबाव को केवल भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था से जोड़ना अधूरा होगा। असली जोखिम वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति से जुड़ा है।

होर्मुज़ स्ट्रेट दुनिया के महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में शामिल है। इसके संचालन को लेकर किसी भी तरह की अनिश्चितता तेल बाजार में जोखिम प्रीमियम बढ़ा सकती है।

एसोसिएटेड प्रेस के मुताबिक सोमवार की तेल तेजी के पीछे होर्मुज़ स्ट्रेट को फिर से खोलने को लेकर अनिश्चितता एक अहम वजह थी।

भारत के लिए यह मसला इसलिए ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योंकि तेल आयात पर उसकी निर्भरता काफी अधिक है। इसलिए वैश्विक तेल कीमतों में लगातार उछाल भारतीय शेयर बाजार, रुपये और महंगाई के लिए एक साथ दबाव पैदा कर सकता है।

अमेरिका-ईरान बातचीत पर बाजार की नजर

तेल बाजार और शेयर बाजार दोनों अब अमेरिका-ईरान बातचीत के अगले संकेतों पर नजर रख रहे हैं।

रॉयटर्स के अनुसार अमेरिकी-ईरान शांति वार्ता की उम्मीद कमजोर पड़ने से तेल की कीमतों में तेजी आई। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नई मांगों ने बातचीत की प्रक्रिया को और जटिल बनाया है।

यदि दोनों देशों के बीच तनाव घटता है और होर्मुज़ स्ट्रेट से तेल परिवहन सामान्य होता है, तो तेल कीमतों में राहत आ सकती है। इसके उलट तनाव बढ़ने पर क्रूड में और तेजी बाजार के लिए बड़ा जोखिम बन सकती है।

यही कारण है कि भारतीय शेयर बाजार इस समय केवल कॉरपोरेट नतीजों पर निर्भर नहीं है। ग्लोबल जियोपॉलिटिक्स भी बाजार की दिशा तय कर रही है।

महंगाई और ब्याज दरों पर असर

महंगे कच्चे तेल का सबसे बड़ा मैक्रोइकोनॉमिक असर महंगाई पर पड़ सकता है। अगर पेट्रोलियम और परिवहन लागत लंबे समय तक ऊंची रहती है, तो इसका असर दूसरे सामान और सेवाओं तक पहुंच सकता है।

रॉयटर्स के मुताबिक बाजार जुलाई की भारतीय महंगाई के आंकड़ों पर भी नजर रख रहा है। अनुमान है कि जुलाई में कंज्यूमर इंफ्लेशन 4.50 फीसदी तक पहुंच सकता है, जबकि जून में यह 4.38 फीसदी था।

महंगाई में तेज बढ़ोतरी रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति के लिए भी चुनौती बन सकती है। निवेशक यह आकलन करेंगे कि ऊंचे तेल और महंगाई के बीच ब्याज दरों में राहत की गुंजाइश कितनी बचती है।

कंपनियों के मुनाफे पर दबाव

महंगा तेल हर कंपनी को समान तरीके से प्रभावित नहीं करता। ऑयल मार्केटिंग कंपनियों, एविएशन, केमिकल, टायर, पेंट और कई मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के लिए कच्चे तेल की कीमत अहम इनपुट कॉस्ट है।

यदि कंपनियां बढ़ी हुई लागत ग्राहकों तक पहुंचाती हैं, तो मांग पर असर पड़ सकता है। यदि वे कीमतें नहीं बढ़ातीं, तो मार्जिन दबाव में आ सकता है।

यही वजह है कि शेयर बाजार तेल की कीमतों को केवल एक कमोडिटी संकेतक के रूप में नहीं देखता। यह कॉरपोरेट अर्निंग्स के अगले दौर के लिए भी एक महत्वपूर्ण इनपुट है।

बाजार में गिरावट कितनी गंभीर है

मंगलवार की शुरुआती गिरावट को फिलहाल बाजार क्रैश कहना सही नहीं होगा। शुरुआती कारोबार में सेंसेक्स करीब 0.48 फीसदी और निफ्टी करीब 0.43 फीसदी नीचे था।

हालांकि दिन के शुरुआती हिस्से में सेंसेक्स 400 अंक से ज्यादा नीचे जाने और निफ्टी के 24,500 से नीचे फिसलने से बाजार में सतर्कता जरूर बढ़ी।

असली दिशा इस बात से तय होगी कि बाजार दिन के अंत में कहां बंद होता है और अगले कुछ सत्रों में तेल की कीमतों का रुख क्या रहता है।

निवेशकों के लिए अब सबसे अहम संकेत

निवेशकों के लिए इस समय पांच संकेत महत्वपूर्ण हैं।

पहला, ब्रेंट क्रूड का स्तर और उसकी दिशा।

दूसरा, होर्मुज़ स्ट्रेट से जुड़ी खबरें और अमेरिका-ईरान बातचीत।

तीसरा, रुपये का डॉलर के मुकाबले प्रदर्शन।

चौथा, जुलाई की भारतीय महंगाई के आंकड़े और रिजर्व बैंक की नीति संबंधी धारणा।

पांचवां, कंपनियों के तिमाही नतीजे और उनके मार्जिन पर बढ़ती लागत का असर।

इन सभी कारकों को एक साथ देखकर ही बाजार की अगली दिशा का बेहतर आकलन किया जा सकता है।

क्या बाजार में रिकवरी संभव है

यदि तेल की कीमतों में स्थिरता आती है और मिडिल ईस्ट तनाव कम होता है, तो भारतीय बाजार में राहत की गुंजाइश है। विदेशी निवेशकों की अगस्त में हुई खरीदारी भी बाजार के लिए सकारात्मक संकेत है।

इसके अलावा आईटी सेक्टर जैसे कुछ हिस्सों में मजबूती बताती है कि निवेशक पूरी तरह बाजार से बाहर नहीं निकल रहे हैं।

लेकिन अगर ब्रेंट क्रूड लगातार 90 डॉलर के ऊपर जाता है और रुपये पर दबाव बढ़ता है, तो इक्विटी वैल्यूएशन और कॉरपोरेट मार्जिन पर जोखिम बढ़ सकता है।

इसलिए आने वाले सत्रों में बाजार का मूड मुख्य रूप से तेल और जियोपॉलिटिकल खबरों से प्रभावित रहने की संभावना है।

निष्कर्ष

भारतीय शेयर बाजार में मंगलवार की गिरावट के पीछे घरेलू कॉरपोरेट कमजोरी से ज्यादा वैश्विक ऊर्जा और जियोपॉलिटिकल जोखिम दिखाई दे रहा है। कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल ने निवेशकों को महंगाई, रुपये और कंपनियों के मार्जिन को लेकर सतर्क किया है।

सेंसेक्स शुरुआती कारोबार में 400 अंक से ज्यादा नीचे गया, जबकि निफ्टी 24,500 के स्तर से नीचे फिसला। बैंकिंग और फाइनेंशियल शेयरों में दबाव रहा, जबकि आईटी शेयरों ने कुछ सहारा दिया।

अब बाजार की निगाह अमेरिका-ईरान बातचीत, होर्मुज़ स्ट्रेट, ब्रेंट क्रूड और रुपये पर रहेगी। अगर तेल की तेजी लंबी चलती है, तो इसका असर केवल शेयर बाजार तक सीमित नहीं रहेगा। महंगाई, आयात बिल, मुद्रा और कॉरपोरेट कमाई पर भी इसका दबाव बढ़ सकता है।

फिलहाल बाजार का संदेश साफ है। महंगा तेल भारतीय इक्विटी के लिए बड़ा रिस्क फैक्टर बन गया है और आने वाले दिनों में जियोपॉलिटिक्स ही बाजार के सेंटीमेंट का प्रमुख निर्धारक रह सकता है।

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शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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