भारतीय शेयर बाजार ने सात सत्रों की गिरावट के बाद 20 अगस्त को मजबूत वापसी की। सेंसेक्स और निफ्टी में तेजी की वजह अमेरिकी तथा एशियाई बाजारों के सकारात्मक संकेत, घटती बॉन्ड यील्ड और संस्थागत खरीद रही। हालांकि महंगा कच्चा तेल और भू-राजनीतिक तनाव बाजार के लिए अब भी अहम जोखिम बने हुए हैं।
लोकेशन: मुंबई
डेट: 20 अगस्त 2026
बाय: Mohd Naved
सात कारोबारी सत्रों की लगातार गिरावट के बाद भारतीय शेयर बाजार ने 20 अगस्त को राहत की सांस ली। सेंसेक्स करीब 500 अंक की तेजी के साथ 77,400 के ऊपर पहुंचा, जबकि निफ्टी 24,200 के करीब कारोबार करता रहा। दिन के अंत में रॉयटर्स के मुताबिक सेंसेक्स 77,431.57 और निफ्टी 24,197.48 पर बंद हुआ।
इस तेजी के पीछे घरेलू संकेतों से ज्यादा ग्लोबल मार्केट का असर दिखाई दिया। अमेरिकी बाजारों में सुधार, एशियाई शेयर बाजारों की मजबूती और अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में नरमी ने निवेशकों के सेंटीमेंट को सहारा दिया। हालांकि कच्चे तेल की कीमत करीब 92 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहने और पश्चिम एशिया में जारी तनाव ने बाजार की तेजी पर एक सीमा भी लगाई।
20 अगस्त की ट्रेडिंग में भारतीय बाजार ने हाल की कमजोरी से पलटने का संकेत दिया। निफ्टी ने सात कारोबारी सत्रों की गिरावट का सिलसिला तोड़ा। इससे पहले 19 अगस्त को निफ्टी 24,078.30 पर बंद हुआ था और लगातार सात सत्रों में करीब 2.1 प्रतिशत फिसल चुका था। इसी अवधि में सेंसेक्स में भी लगभग 2.1 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई थी।
गुरुवार को आई तेजी में आईटी और वित्तीय शेयरों की अहम भूमिका रही। रॉयटर्स के मुताबिक आईटी इंडेक्स करीब 1.4 प्रतिशत और वित्तीय क्षेत्र करीब 0.7 प्रतिशत ऊपर रहा। कुल 16 प्रमुख सेक्टरों में से 13 में बढ़त दर्ज की गई।
बाजार की मौजूदा चाल को केवल एक दिन की तेजी के तौर पर देखना अधूरा होगा। पिछले कई सत्रों से भारतीय इक्विटी पर वैश्विक बॉन्ड यील्ड, महंगे कच्चे तेल और पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक तनाव का दबाव था।
19 अगस्त को निफ्टी लगातार सातवें सत्र में गिरा था। उस समय ब्रेंट क्रूड करीब 92 डॉलर प्रति बैरल के आसपास था। ऊंची तेल कीमतें भारत जैसे बड़े आयातक देश के लिए महंगाई, व्यापार घाटे और कॉरपोरेट लागत को लेकर चिंता बढ़ाती हैं।
20 अगस्त को तस्वीर कुछ बदली। अमेरिकी ट्रेजरी ने लंबी अवधि के सरकारी कर्ज की बायबैक मात्रा बढ़ाने का फैसला किया। इसके बाद अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में नरमी आई और वैश्विक जोखिम वाली परिसंपत्तियों के प्रति निवेशकों की दिलचस्पी बढ़ी।
बुधवार तक भारतीय बाजार दबाव में था। निफ्टी 24,078.30 और सेंसेक्स 76,909.68 पर बंद हुए थे। विदेशी बाजारों में भी कमजोरी थी और बढ़ती यील्ड के कारण निवेशक सुरक्षित परिसंपत्तियों की तरफ झुक रहे थे।
इसके बाद अमेरिकी बाजारों में सुधार आया। डॉव जोन्स और एसएंडपी 500 में करीब 0.2 प्रतिशत की बढ़त रही, जबकि नैस्डैक करीब 0.16 प्रतिशत ऊपर रहा। अमेरिकी 10 वर्षीय ट्रेजरी यील्ड करीब पांच आधार अंक घटकर 4.65 प्रतिशत और 30 वर्षीय यील्ड नौ आधार अंक गिरकर 5.19 प्रतिशत हुई।
एशियाई बाजारों ने भी इस रुख को आगे बढ़ाया। इसी ग्लोबल माहौल में गिफ्ट निफ्टी ने भारतीय बाजार के लिए मजबूत शुरुआत का संकेत दिया। मनीकंट्रोल के मुताबिक शुरुआती कारोबार में गिफ्ट निफ्टी करीब 24,222 के स्तर पर था।
बाजार विशेषज्ञों की मौजूदा चिंता दो हिस्सों में बंटी हुई है। एक तरफ कॉरपोरेट कमाई, घरेलू मांग और संस्थागत खरीद बाजार के लिए सहारा दे रही है। दूसरी तरफ कच्चे तेल की ऊंची कीमत, वैश्विक यील्ड और भू-राजनीतिक जोखिम तेजी की स्थिरता पर सवाल खड़े करते हैं।
19 अगस्त तक विदेशी संस्थागत निवेशकों ने लगातार दूसरी खरीदारी की थी। उस दिन एफआईआई ने करीब 407 करोड़ रुपये की खरीद की, जबकि घरेलू संस्थागत निवेशकों ने करीब 3,973 करोड़ रुपये का निवेश किया।
यह आंकड़ा महत्वपूर्ण है क्योंकि घरेलू संस्थागत निवेशक पिछले कुछ समय से बाजार को स्थिर रखने में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। फिर भी विदेशी पूंजी का रुख भारतीय बाजार की मध्यम अवधि की दिशा के लिए अहम बना हुआ है।
उपलब्ध बाजार आंकड़े बताते हैं कि 20 अगस्त की तेजी केवल एक-दो शेयरों तक सीमित नहीं थी। रॉयटर्स के अनुसार आईटी और वित्तीय क्षेत्रों के साथ छोटे और मझोले शेयरों में भी बढ़त रही। इससे संकेत मिलता है कि बाजार में जोखिम लेने की क्षमता कुछ हद तक लौटी।
लेकिन इसे अभी पूर्ण ट्रेंड रिवर्सल मानना जल्दबाजी होगी। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय बाजार इससे पहले लगातार सात सत्रों तक गिर चुका था। इसके अलावा महंगा तेल और वैश्विक यील्ड अब भी बाजार के लिए वास्तविक जोखिम हैं।
अगर अमेरिकी यील्ड में नरमी बनी रहती है और वैश्विक शेयर बाजार स्थिर रहते हैं, तो भारतीय इक्विटी को आगे भी राहत मिल सकती है। आईटी, बैंकिंग और वित्तीय शेयरों में जोखिम लेने की क्षमता लौटने की गुंजाइश बढ़ेगी।
इसके उलट अगर कच्चे तेल की कीमत लगातार ऊंची रहती है, तो भारत के लिए आयात बिल और मुद्रास्फीति का दबाव बढ़ सकता है। इससे बाजार में तेजी टिकाऊ रहने की चुनौती बढ़ेगी।
बाजार की इस तेजी का सीधा राजनीतिक अर्थ निकालना उचित नहीं होगा। मौजूदा उतार-चढ़ाव का प्राथमिक संबंध वैश्विक वित्तीय परिस्थितियों, संस्थागत पूंजी, कच्चे तेल और बॉन्ड यील्ड से है।
फिर भी नियामकीय स्तर पर विदेशी निवेश और बाजार संरचना से जुड़े सुधार महत्वपूर्ण हैं। रॉयटर्स के अनुसार भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड विदेशी पूंजी के प्रवाह को बेहतर बनाने के लिए ट्रेडिंग और मार्केट इंफ्रास्ट्रक्चर में कई सुधारों पर काम कर रहा है।
शेयर बाजार की तेजी का असर सीधे हर परिवार की आय पर नहीं पड़ता, लेकिन इसका व्यापक आर्थिक मनोविज्ञान पर असर होता है। बैंकिंग, वित्त, आईटी और पूंजी बाजार से जुड़ी कंपनियों के शेयरों में सुधार निवेशकों के भरोसे को मजबूत करता है।
दूसरी तरफ महंगा तेल भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए ज्यादा व्यापक जोखिम रखता है। परिवहन से लेकर विनिर्माण तक कई क्षेत्रों की लागत पर इसका असर पड़ता है। इसलिए शेयर बाजार की तेजी के साथ तेल बाजार की दिशा पर भी नजर रखना जरूरी है।
20 अगस्त की भारतीय तेजी का बड़ा हिस्सा वैश्विक संकेतों से जुड़ा रहा। अमेरिकी बॉन्ड बाजार में नरमी ने एशियाई शेयर बाजारों को सहारा दिया और इसके बाद भारतीय बाजार में भी जोखिम लेने की प्रवृत्ति मजबूत हुई।
भारत के लिए पश्चिम एशिया का घटनाक्रम विशेष महत्व रखता है क्योंकि कच्चे तेल की कीमत भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए संवेदनशील कारक है। इसलिए वैश्विक इक्विटी में तेजी के बावजूद भारतीय बाजार के लिए भू-राजनीतिक जोखिम खत्म नहीं हुआ है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि 20 अगस्त की तेजी एक स्थायी सुधार की शुरुआत है या सात सत्रों की गिरावट के बाद हुई तकनीकी वापसी।
दूसरा सवाल कच्चे तेल का है। अगर ब्रेंट लगातार 90 डॉलर से ऊपर बना रहता है, तो भारतीय बाजार में लागत और मुद्रास्फीति की चिंता वापस आ सकती है।
तीसरा सवाल विदेशी निवेश का है। घरेलू संस्थागत खरीद मजबूत है, लेकिन विदेशी पूंजी की स्थिर वापसी बाजार के लिए ज्यादा निर्णायक होगी।
आने वाले सत्रों में निवेशकों की निगाह अमेरिकी बॉन्ड यील्ड, कच्चे तेल, रुपये की चाल और विदेशी संस्थागत निवेश पर रहेगी। इसके साथ ही भारतीय कंपनियों के तिमाही नतीजे और घरेलू आर्थिक आंकड़े भी बाजार की दिशा तय करेंगे।
बाजार के लिए फिलहाल सबसे अहम बात यह है कि वैश्विक दबाव कुछ कम हुआ है, लेकिन जोखिम खत्म नहीं हुए हैं। इसलिए एक दिन की तेजी को लंबी अवधि की रैली मानने से पहले अगले कुछ सत्रों की दिशा देखना जरूरी होगा।
20 अगस्त की तेजी ने भारतीय शेयर बाजार को सात सत्रों की लगातार गिरावट से राहत दी है। सेंसेक्स और निफ्टी में मजबूती के पीछे अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में नरमी, एशियाई बाजारों की तेजी और संस्थागत खरीद जैसे स्पष्ट कारक मौजूद हैं।
लेकिन बाजार की तस्वीर अभी पूरी तरह साफ नहीं है। महंगा कच्चा तेल, पश्चिम एशिया का तनाव और विदेशी पूंजी का रुख आगे भी निर्णायक रहेंगे। इसलिए मौजूदा तेजी को राहत का संकेत जरूर माना जा सकता है, लेकिन इसे टिकाऊ तेजी की पुष्टि मानने से पहले आगे के बाजार संकेतों का इंतजार करना ज्यादा मुनासिब होगा।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।