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सुभाष चंद्रा पर ₹1,322 करोड़ के कथित लोन फ्रॉड में CBI FIR

Apurva Choudhary 2026-09-05 23:58:50
सुभाष चंद्रा पर ₹1,322 करोड़ के कथित लोन फ्रॉड में CBI FIR


LIC Housing Finance से जुड़े कथित ₹1,322 करोड़ के नुकसान मामले में CBI ने सुभाष चंद्रा और अन्य के खिलाफ FIR दर्ज की है। मामला 2018 में मंजूर दो लोन सुविधाओं से जुड़ा है, जिनकी कुल राशि ₹980 करोड़ थी। जांच में नेटवर्थ सर्टिफिकेट, व्यक्तिगत गारंटी, लोन उपयोग और डिफॉल्ट की पड़ताल होगी।


LOCATION: नई दिल्ली / मुंबई

DATE: 5 सितंबर 2026

BYLINE: Apurva Choudhary


केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी CBI ने एस्सेल ग्रुप के चेयरमैन और जी एंटरटेनमेंट के संस्थापक सुभाष चंद्रा के खिलाफ LIC Housing Finance Limited यानी LICHFL से जुड़े कथित लोन फ्रॉड मामले में FIR दर्ज की है। मामला करीब ₹1,322 करोड़ के कथित wrongful loss से जुड़ा है। FIR में चंद्रा के अलावा संबंधित कंपनियों और उनके निदेशकों के नाम भी शामिल हैं।

CBI की कार्रवाई LICHFL की शिकायत के आधार पर हुई है। Indian Express के मुताबिक, CBI की Banking Securities Fraud Branch ने 31 अगस्त को FIR दर्ज की थी। आरोपों का केंद्र 2018 में मंजूर की गई दो लोन सुविधाएं हैं, जिनकी कुल स्वीकृत राशि करीब ₹980 करोड़ थी।


दो लोन सुविधाओं से कैसे जुड़ा है मामला

LICHFL की शिकायत के अनुसार पहली लोन सुविधा ₹500 करोड़ की थी। यह Vasant Sagar Properties Pvt Ltd और Pan India Infra Projects Pvt Ltd से जुड़ी थी। दूसरी करीब ₹480 करोड़ की सुविधा Digital Subscriber Management and Consultancy Services Pvt Ltd और Spirit Infrapower and Multiventures Pvt Ltd को दी गई थी।

दोनों मामलों में सुभाष चंद्रा की ओर से continuing personal guarantees दिए जाने का आरोप है। FIR के मुताबिक पहली गारंटी मार्च 2018 और दूसरी अगस्त 2018 में दी गई थी। अब CBI यह जांच करेगी कि इन गारंटियों और लोन स्वीकृति के दौरान पेश किए गए दस्तावेजों की वास्तविक स्थिति क्या थी।


₹1,322 करोड़ का आंकड़ा कहां से आया?

यहां ₹980 करोड़ और ₹1,322 करोड़ के आंकड़ों के बीच अंतर समझना जरूरी है। करीब ₹980 करोड़ दोनों लोन सुविधाओं की स्वीकृत राशि थी, जबकि ₹1,322 करोड़ LICHFL द्वारा FIR में बताए गए कथित wrongful loss से जुड़ा आंकड़ा है, जिसमें ब्याज और अन्य चार्ज भी शामिल बताए गए हैं।

शिकायत के अनुसार दोनों लोन अकाउंट बाद में डिफॉल्ट हो गए। Vasant Sagar सुविधा में करीब ₹570.50 करोड़ और Digital Subscriber सुविधा में करीब ₹507.25 करोड़ की outstanding रकम का उल्लेख किया गया है। LICHFL ने कुल कथित नुकसान को ₹1,322 करोड़ से अधिक बताया है।

इसलिए ₹1,322 करोड़ को सीधे तौर पर “सिद्ध धोखाधड़ी” कहना अभी सही नहीं होगा। यह शिकायत में लगाया गया नुकसान का आरोप है, जिसकी वास्तविक परिस्थितियों और जिम्मेदारी की जांच CBI करेगी।


नेटवर्थ सर्टिफिकेट जांच के केंद्र में क्यों?

FIR का एक अहम पहलू 2018 में पेश किए गए सुभाष चंद्रा के कथित नेटवर्थ सर्टिफिकेट हैं। LICHFL की शिकायत के मुताबिक Vasant Sagar से जुड़े लोन के लिए मार्च 2018 के एक सर्टिफिकेट में 31 मार्च 2017 तक चंद्रा की नेटवर्थ करीब ₹59,113.21 करोड़ बताई गई थी।

दूसरी लोन सुविधा के मामले में जुलाई 2018 के एक अन्य सर्टिफिकेट में नेटवर्थ करीब ₹40,562 करोड़ बताई गई थी। शिकायत के मुताबिक बाद की व्यक्तिगत insolvency proceedings के दौरान चंद्रा ने इन सर्टिफिकेट में दर्शाई गई नेटवर्थ से अलग स्थिति बताई।

यही विरोधाभास CBI जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है। जांच एजेंसी यह देखेगी कि सर्टिफिकेट किस आधार पर तैयार किए गए थे, उनकी सत्यता क्या थी और लोन स्वीकृति के समय LICHFL के पास कौन-कौन से दस्तावेज और assurances मौजूद थे।


CBI किन पहलुओं की जांच करेगी?

जांच में सिर्फ नेटवर्थ सर्टिफिकेट तक सीमित रहने की संभावना नहीं है। लोन approval process, personal guarantees, borrowing companies की भूमिका, रकम के इस्तेमाल और बाद में हुए defaults से जुड़े दस्तावेजों की पड़ताल की जाएगी।

LICHFL की शिकायत में कथित तौर पर यह भी आरोप लगाया गया है कि लोन हासिल करने के बाद रकम का misappropriation या misapplication हुआ और recovery को प्रभावित करने के लिए personal guarantor की assets से संबंधित कदम उठाए गए। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी जांच का विषय है।

CBI FIR में criminal conspiracy, cheating और criminal breach of trust जैसे आरोपों के तहत कार्रवाई की गई है। इसका अर्थ यह नहीं है कि आरोप अदालत में सिद्ध हो चुके हैं। FIR जांच की शुरुआत होती है और आगे साक्ष्यों के आधार पर एजेंसी अपनी कार्रवाई तय करेगी।


FIR में कौन-कौन शामिल हैं?

सुभाष चंद्रा के अलावा FIR में Vasant Sagar Properties, उसके निदेशक Pankaj Suroliya, Pan India Infrastructure, Digital Subscriber Management and Consultancy Services, उसके निदेशक Amish Pandya, Spirit Infrapower and Multiventures तथा उसके निदेशक Rajeev Dholakia का उल्लेख है। कुछ अज्ञात सरकारी अधिकारियों और अन्य लोगों का भी जिक्र किया गया है।

इससे जांच का दायरा केवल borrower companies तक सीमित नहीं रहता। CBI को यह भी देखना होगा कि लोन approval और documentation की प्रक्रिया में किसी अन्य व्यक्ति या अधिकारी की भूमिका थी या नहीं।


मामला ऐसे समय क्यों महत्वपूर्ण है?

CBI की FIR ऐसे समय सामने आई है जब सुभाष चंद्रा से जुड़े personal guarantee और insolvency मामलों में भी वित्तीय विवाद चल रहे हैं। हाल में LICHFL का करीब ₹1,322.39 करोड़ का admitted claim उनके personal insolvency proceedings में सामने आया था।

इन proceedings में repayment plan को लेकर lenders और चंद्रा के बीच विवाद भी रहा है। सितंबर की शुरुआत में NCLT की पांच सदस्यीय बेंच ने पहले के repayment-plan order पर रोक लगाई और assets के alienation पर भी रोक का निर्देश दिया था।

हालांकि insolvency proceedings और नई CBI FIR को एक ही कानूनी प्रक्रिया मानना सही नहीं होगा। insolvency मामला recovery और personal-guarantee obligations से जुड़ा है, जबकि CBI की जांच कथित criminal conspiracy, cheating और financial misconduct के आरोपों पर केंद्रित है।


क्या सुभाष चंद्रा पर आरोप साबित हो गए हैं?

नहीं। अभी CBI ने FIR दर्ज करके जांच शुरू की है। FIR में दर्ज आरोपों को अदालत द्वारा दोषसिद्धि नहीं माना जा सकता।

CBI को दस्तावेज, financial records, guarantees, loan utilisation और संबंधित लोगों के बयान की जांच करनी होगी। इसके बाद जांच के निष्कर्षों के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई तय होगी।

यह अंतर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ₹1,322 करोड़ का आंकड़ा LICHFL की शिकायत में बताए गए कथित नुकसान से जुड़ा है। वास्तविक financial trail और किसी व्यक्ति की आपराधिक जिम्मेदारी जांच के दौरान ही स्थापित हो सकती है।


LICHFL के लिए इसका क्या मतलब है?

LICHFL के लिए यह मामला पुराने loan exposure और recovery से जुड़ा एक बड़ा वित्तीय विवाद है। कंपनी ने insolvency proceedings में भी अपने अधिकारों और secured assets पर security interest बनाए रखने की बात कही थी।

CBI की जांच आगे बढ़ने पर loan sanction documents, security arrangements, guarantees और funds के इस्तेमाल से जुड़े रिकॉर्ड नए सिरे से जांच के दायरे में आ सकते हैं।

साथ ही, अगर जांच में किसी गलत दस्तावेज या जानबूझकर दी गई गलत financial information की पुष्टि होती है, तो मामले में आगे criminal proceedings का आधार मजबूत हो सकता है। फिलहाल ऐसा निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।


आगे की जांच में क्या अहम होगा?

इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह होगा कि 2018 में LICHFL को दिए गए net worth certificates किस आधार पर तैयार किए गए थे और loan sanction करने वाले अधिकारियों के पास उस समय कौन-सी जानकारी उपलब्ध थी।

दूसरा सवाल loan proceeds के इस्तेमाल से जुड़ा है। CBI को यह स्थापित करना होगा कि स्वीकृत रकम का इस्तेमाल घोषित उद्देश्य के अनुरूप हुआ या नहीं और default की परिस्थितियां क्या थीं।

तीसरा पहलू recovery से जुड़ा है। यदि शिकायत में लगाए गए asset-related आरोपों की पुष्टि होती है, तो यह भी जांच का विषय होगा कि recovery process को प्रभावित करने की कोशिश हुई थी या नहीं।

फिलहाल CBI की FIR ने एक पुराने बड़े loan exposure को criminal investigation के दायरे में ला दिया है। लेकिन अंतिम जिम्मेदारी और किसी भी व्यक्ति की दोषसिद्धि का फैसला जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगा।

 

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Apurva Choudhary

Apurva Choudhary

Shah Times Reporter

शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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