अभिनेता सुरेश ओबेरॉय ने अपने पुराने BJP जुड़ाव और राजनीतिक अनुभव पर खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि राजनीति में कई लोग पैसा बनाने में लगे थे। साथ ही उन्होंने RSS प्रमुख मोहन भागवत की तारीफ की और नरेंद्र मोदी, अमित शाह तथा योगी आदित्यनाथ के प्रति सकारात्मक रुख जताया।
बॉलीवुड के वरिष्ठ अभिनेता सुरेश ओबेरॉय एक बार फिर अपने पुराने राजनीतिक सफर को लेकर चर्चा में हैं। एक हालिया इंटरव्यू में उन्होंने 2004 में भारतीय जनता पार्टी से जुड़े अपने अनुभवों को याद किया और राजनीति को लेकर अपनी निराशा साझा की।
ओबेरॉय ने आरोप लगाया कि उनके राजनीतिक दौर में कई लोग सार्वजनिक सेवा के बजाय पैसा बनाने में ज्यादा दिलचस्पी रखते थे। यह उनका व्यक्तिगत अनुभव और आकलन है, इसलिए इसे BJP के सभी नेताओं या कार्यकर्ताओं पर लागू तथ्य के तौर पर पेश करना उचित नहीं होगा।
अभिनेता ने इसी बातचीत में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके प्रमुख मोहन भागवत के प्रति सम्मान जताया। उन्होंने खुद को मोहन भागवत का प्रशंसक बताया।
सुरेश ओबेरॉय का राजनीति से जुड़ाव नया नहीं है। उन्होंने 2004 के आसपास BJP के साथ अपने राजनीतिक अनुभव का जिक्र किया है। उस दौर में उनकी मुलाकात पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से भी हुई थी। राष्ट्रीय रिपोर्ट के मुताबिक ओबेरॉय ने लालकृष्ण आडवाणी और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेताओं के साथ अपने संपर्क का उल्लेख किया। उनके मुताबिक राजनीति में आने के पीछे उनकी शुरुआती सोच देशसेवा से जुड़ी थी।
लेकिन समय के साथ उनका राजनीतिक अनुभव उनकी शुरुआती उम्मीदों से अलग रहा। उन्होंने कहा कि कई लोग राजनीति को पैसा बनाने के अवसर के तौर पर देख रहे थे। यही अनुभव उनके राजनीति से दूर होने की वजहों में शामिल रहा।
सुरेश ओबेरॉय ने RSS और मोहन भागवत को लेकर सकारात्मक रुख रखा। उन्होंने खुद को भागवत का फैन बताया। यह बयान इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि अभिनेता ने एक ही बातचीत में राजनीतिक माहौल से निराशा और RSS नेतृत्व के प्रति सम्मान, दोनों बातें रखीं। इससे उनकी स्थिति को सीधे BJP विरोधी या समर्थक खांचे में रखना सही नहीं होगा। ओबेरॉय ने मौजूदा राजनीतिक नेतृत्व को लेकर भी पूरी तरह नकारात्मक रुख नहीं अपनाया।
ओबेरॉय की सबसे ज्यादा चर्चा जिस टिप्पणी को लेकर हो रही है, वह राजनीति में पैसे के इस्तेमाल से जुड़ी है। उन्होंने अपने अनुभव के आधार पर कहा कि उस दौर में कई लोग पैसा बनाने में लगे हुए थे। यह टिप्पणी उनके निजी अनुभव के तौर पर सामने आई है। उपलब्ध रिपोर्ट में उन्होंने इस दावे के समर्थन में कोई आंकड़ा या किसी विशिष्ट व्यक्ति के खिलाफ भ्रष्टाचार का आरोप पेश नहीं किया है। इसलिए इस बयान को किसी व्यापक भ्रष्टाचार के तथ्य के रूप में पेश करना सही नहीं होगा। यह एक अभिनेता और पूर्व राजनीतिक कार्यकर्ता का व्यक्तिगत आकलन है।
ओबेरॉय के बयान का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू उनकी राजनीति में आने की वजह है। उन्होंने बताया कि राजनीति को उन्होंने देशसेवा के एक माध्यम के रूप में देखा था। उनके मुताबिक इसी सोच के कारण उन्होंने राजनीतिक गतिविधियों में रुचि ली और BJP से जुड़े।
लेकिन उनका अनुभव वैसा नहीं रहा जैसा उन्होंने शुरुआत में सोचा था। राजनीति में कथित आर्थिक हितों को लेकर उनकी निराशा ने उनके दृष्टिकोण को प्रभावित किया। यहां यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि ओबेरॉय लंबे समय से फिल्म इंडस्ट्री में सक्रिय रहे हैं और उनका सार्वजनिक जीवन मुख्य रूप से अभिनय से जुड़ा रहा है। इसलिए उनके राजनीतिक अनुभव का दायरा उनके व्यक्तिगत जुड़ाव तक सीमित समझना ज्यादा सटीक है।
ओबेरॉय ने मौजूदा BJP नेतृत्व पर एकतरफा हमला नहीं किया। उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने नरेंद्र मोदी, अमित शाह और योगी आदित्यनाथ के प्रति सकारात्मक टिप्पणी की। इससे उनके बयान की तस्वीर थोड़ी जटिल हो जाती है। एक तरफ वह राजनीति के कुछ पहलुओं से निराशा जताते हैं, दूसरी तरफ BJP और RSS के कुछ शीर्ष नेताओं के प्रति सम्मान व्यक्त करते हैं।
इसी इंटरव्यू में ओबेरॉय ने विरोध प्रदर्शनों और एक्टिविज्म को लेकर भी अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक हस्तियों को किसी आंदोलन या राजनीतिक मुद्दे का समर्थन करने से पहले उसके तथ्यों को समझना चाहिए। उन्होंने पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक का उदाहरण भी दिया। ओबेरॉय का जोर इस बात पर था कि किसी मुद्दे पर सार्वजनिक टिप्पणी करने से पहले पूरी जानकारी हासिल करनी चाहिए।
यह टिप्पणी खास तौर पर बॉलीवुड हस्तियों की राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर सार्वजनिक सक्रियता की पुरानी बहस से जुड़ती है।
फिल्मी सितारों की राजनीतिक टिप्पणियों का असर अक्सर उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता से आगे जाता है। उनके बयान सोशल मीडिया पर तेजी से प्रसारित होते हैं और कई बार राजनीतिक बहस का हिस्सा बन जाते हैं। लेकिन पत्रकारिता के लिहाज से सेलिब्रिटी की राय और प्रमाणित राजनीतिक तथ्य के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है। ओबेरॉय का बयान एक व्यक्तिगत राजनीतिक अनुभव है, किसी सरकारी रिपोर्ट या जांच एजेंसी का निष्कर्ष नहीं। इसलिए उनके आरोपों को संदर्भ के साथ रिपोर्ट करना जरूरी है।
उनके हालिया बयान से यह संकेत मिलता है कि उनका मुख्य फोकस अब अभिनय और फिल्मी करियर पर है। उन्होंने अपनी राजनीतिक भूमिका को लेकर कोई नई सक्रियता घोषित नहीं की है। उनका मौजूदा रुख एक ऐसे व्यक्ति का है जिसने अतीत में राजनीति से जुड़ने की कोशिश की और बाद में अपने अनुभवों को लेकर सार्वजनिक तौर पर बात की। उपलब्ध रिपोर्टों में किसी नए राजनीतिक पद या संगठनात्मक भूमिका की घोषणा नहीं है।
ओबेरॉय की टिप्पणी को तीन स्तरों पर देखा जा सकता है। पहला, यह उनके 2004 के राजनीतिक अनुभव का व्यक्तिगत बयान है। दूसरा, उन्होंने BJP और RSS से जुड़े कुछ वरिष्ठ नेताओं के प्रति सम्मान जताया है। तीसरा, उन्होंने राजनीति में आर्थिक हितों को लेकर अपनी निराशा व्यक्त की है।
इसलिए उनके बयान को सीधे BJP के खिलाफ या BJP के पक्ष में खड़ा करना उचित नहीं होगा। उनकी टिप्पणी का मूल संदेश राजनीति में सार्वजनिक सेवा और निजी आर्थिक हितों के बीच अंतर को लेकर है। यह बहस भारतीय राजनीति में लंबे समय से मौजूद है, लेकिन ओबेरॉय ने इसे अपने व्यक्तिगत अनुभव के संदर्भ में उठाया है।
सुरेश ओबेरॉय का हालिया बयान इसलिए सुर्खियों में है क्योंकि इसमें बॉलीवुड, BJP, RSS और उनके व्यक्तिगत राजनीतिक अनुभव चारों एक साथ सामने आते हैं। उन्होंने अपने पुराने राजनीतिक दौर को याद करते हुए कहा कि कई लोग पैसा बनाने में लगे हुए थे। साथ ही उन्होंने मोहन भागवत की तारीफ की और नरेंद्र मोदी, अमित शाह तथा योगी आदित्यनाथ को लेकर सकारात्मक रुख जाहिर किया। इस बयान को किसी पार्टी के खिलाफ निर्णायक राजनीतिक फैसला मानना जल्दबाजी होगी। उपलब्ध जानकारी के आधार पर इसे सुरेश ओबेरॉय के निजी अनुभव और राजनीतिक दृष्टिकोण के रूप में देखना ज्यादा सटीक है। उनकी टिप्पणी एक व्यापक सवाल जरूर उठाती है। राजनीति में आने वाले सार्वजनिक चेहरे जब अपने अनुभवों पर बोलते हैं, तो क्या उनकी निराशा किसी व्यक्तिगत अनुभव तक सीमित रहती है या वह राजनीतिक व्यवस्था को लेकर बड़े विमर्श का हिस्सा बनती है? इसका जवाब अलग-अलग राजनीतिक दृष्टिकोण पर निर्भर करेगा।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।