मंत्री राजनाथ सिंह ने टेरिटोरियल आर्मी को “नागरिक-सैनिक” मॉडल बताया। उन्होंने कहा कि यह फोर्स देश की सुरक्षा, आपदा राहत और सपोर्ट ऑपरेशन्स में अहम भूमिका निभाती है। यह बयान डिफेंस स्ट्रैटेजी के व्यापक नजरिए को दर्शाता है।
📍 Location: India
📰 Date: 07 August 2026
✍️ By Mohd Haris
भारत की डिफेंस पॉलिसी में “टेरिटोरियल आर्मी” एक अहम लेकिन अक्सर कम चर्चा में रहने वाला स्तंभ है। हालिया बयान में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इसे “सिटिजन-सोल्जर” मॉडल का प्रतीक बताया है।
उन्होंने कहा कि टेरिटोरियल आर्मी सिर्फ एक सपोर्ट फोर्स नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा ढांचे का अहम हिस्सा है। उनका यह बयान उस समय आया है जब भारत अपनी सुरक्षा रणनीति को बहु-आयामी बना रहा है।
टेरिटोरियल आर्मी एक रिजर्व फोर्स है, जिसमें आम नागरिक शामिल होते हैं। ये लोग अपने नियमित पेशे के साथ-साथ सैन्य ट्रेनिंग लेते हैं और जरूरत पड़ने पर सेवा देते हैं।
यह मॉडल भारत में 1949 से लागू है। इसका उद्देश्य था कि नागरिकों को राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ जोड़कर एक अतिरिक्त रक्षा परत तैयार की जाए।
आज यह फोर्स विभिन्न ऑपरेशन्स में सक्रिय भूमिका निभा रही है, खासकर लॉजिस्टिक्स, सपोर्ट और आपदा राहत में।
राजनाथ सिंह ने कहा कि टेरिटोरियल आर्मी “नागरिक और सैनिक के बीच की दूरी को खत्म करती है”।
उनका कहना था कि यह मॉडल देशभक्ति और जिम्मेदारी की भावना को मजबूत करता है।
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि यह फोर्स नियमित सेना पर बोझ कम करती है और जरूरत के समय तेजी से तैनात हो सकती है।
पिछले कुछ वर्षों में भारत को कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा है।
इन हालात में टेरिटोरियल आर्मी की उपयोगिता बढ़ी है।
यह फोर्स खास तौर पर उन क्षेत्रों में काम करती है जहां नियमित सेना की तैनाती सीमित होती है या अतिरिक्त मदद की जरूरत होती है।
टेरिटोरियल आर्मी की भूमिका समय के साथ बदलती रही है।
शुरुआत में यह मुख्यतः सपोर्ट यूनिट थी, लेकिन अब इसे ऑपरेशनल जिम्मेदारियां भी दी जा रही हैं।
हाल के वर्षों में इसे इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोटेक्शन, एनवायरनमेंटल प्रोजेक्ट्स और डिजास्टर मैनेजमेंट में भी लगाया गया है।
यह बदलाव दिखाता है कि सरकार इस फोर्स को एक मल्टी-रोल यूनिट के रूप में देख रही है।
राजनाथ सिंह का यह बयान सिर्फ एक औपचारिक टिप्पणी नहीं है।
यह संकेत देता है कि सरकार “सिटिजन पार्टिसिपेशन” को सुरक्षा नीति में शामिल करना चाहती है।
इससे राष्ट्रीय सुरक्षा को एक व्यापक सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में पेश किया जा रहा है।
कुछ डिफेंस एक्सपर्ट्स मानते हैं कि टेरिटोरियल आर्मी एक किफायती और प्रभावी मॉडल है।
उनके अनुसार, यह फोर्स जरूरत के समय तेजी से संसाधन उपलब्ध कराती है।
वहीं कुछ विश्लेषकों का कहना है कि इसकी ट्रेनिंग और तैयारी को और मजबूत करने की जरूरत है, ताकि यह आधुनिक चुनौतियों का सामना कर सके।
हालांकि मॉडल मजबूत है, लेकिन कुछ सीमाएं भी हैं।
इन मुद्दों को हल किए बिना इसकी पूरी क्षमता का उपयोग करना मुश्किल हो सकता है।
ग्राउंड रिपोर्ट्स दिखाती हैं कि टेरिटोरियल आर्मी ने कई आपदा स्थितियों में अहम भूमिका निभाई है।
बाढ़, भूकंप और अन्य आपदाओं के दौरान इस फोर्स ने राहत और बचाव कार्यों में योगदान दिया है।
इसके अलावा, यह इंफ्रास्ट्रक्चर सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण में भी सक्रिय है।
यह बयान सरकार की डिफेंस स्ट्रैटेजी को दर्शाता है।
इससे यह संकेत मिलता है कि भारत “टोटल डिफेंस” अप्रोच की ओर बढ़ रहा है, जहां नागरिक भी सुरक्षा ढांचे का हिस्सा बनते हैं।
यह मॉडल अन्य देशों में भी अपनाया गया है, खासकर यूरोप में।
टेरिटोरियल आर्मी का मॉडल लागत के लिहाज से भी फायदेमंद माना जाता है।
यह फुल-टाइम सेना की तुलना में कम खर्चीला है, क्योंकि इसमें पार्ट-टाइम सेवा शामिल होती है।
इससे सरकार को संसाधनों का बेहतर उपयोग करने का मौका मिलता है।
कई देशों में “सिटिजन-सोल्जर” मॉडल पहले से लागू है।
इजराइल और स्विट्जरलैंड जैसे देशों में नागरिकों की सैन्य भागीदारी ज्यादा है।
भारत में टेरिटोरियल आर्मी इसी दिशा में एक संतुलित मॉडल प्रस्तुत करती है।
आने वाले समय में टेरिटोरियल आर्मी की भूमिका और बढ़ सकती है।
डिजिटल सिक्योरिटी, इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोटेक्शन और क्लाइमेट डिजास्टर जैसे क्षेत्रों में इसकी तैनाती संभव है।
इसके लिए ट्रेनिंग और टेक्नोलॉजी अपग्रेड जरूरी होगा।
टेरिटोरियल आर्मी का “सिटिजन-सोल्जर” मॉडल भारत की सुरक्षा सोच में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत है।
राजनाथ सिंह का बयान इस दिशा में नीति और समाज के बीच तालमेल को मजबूत करता है।
अब चुनौती यह है कि इस मॉडल को और प्रभावी और आधुनिक बनाया जाए।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।