स्पेन के बुन्योल में ला टोमाटीना के दौरान 22,000 लोगों ने 150,000 किलो टमाटर से जश्न मनाया। ये टमाटर खास आयोजन के लिए उगाए गए थे और खाने योग्य नहीं थे।
बुन्योल, वालेंसिया, स्पेन | 27 अगस्त 2026 | शाह टाइम्स
By Mohd Haris
स्पेन के बुन्योल शहर की सड़कें 26 अगस्त को लाल रंग में बदल गईं। यहां ला टोमाटीना के 79वें संस्करण में करीब 22,000 लोगों ने हिस्सा लिया और लगभग 150,000 किलो टमाटर एक-दूसरे पर फेंके। आयोजन की तस्वीरें दुनिया भर में वायरल हुईं और भारत में टमाटर की कीमतों से इसकी तुलना शुरू हो गई। लेकिन इस कहानी का एक अहम तथ्य सोशल मीडिया की चर्चाओं से अलग है। बुन्योल में इस्तेमाल किए गए टमाटर सामान्य बाजार में बिकने वाले खाने योग्य टमाटर नहीं थे। इन्हें खास तौर पर ला टोमाटीना के लिए उगाया गया था और आयोजन से पहले इनके इस्तेमाल की तैयारी की गई थी।
ला टोमाटीना में क्या हुआ
बुन्योल में हर साल अगस्त के आखिरी बुधवार को ला टोमाटीना आयोजित होती है। यह आयोजन दुनिया के सबसे चर्चित टमाटर उत्सवों में शामिल है। 2026 में कार्यक्रम के लिए 22,000 प्रतिभागियों की सीमा रखी गई थी और आयोजन के दौरान सात ट्रकों से टमाटर पहुंचाए गए। सुबह से ही बुन्योल की सड़कों पर स्थानीय लोगों और विदेशी पर्यटकों की भीड़ जुटने लगी। दोपहर से पहले पारंपरिक संकेत के साथ टमाटर फेंकने का आयोजन शुरू हुआ। करीब 1 घंटे तक शहर की गलियां टमाटर के गूदे से भरती रहीं। 2026 में इस्तेमाल हुई मात्रा पिछले संस्करण से 30,000 किलो ज्यादा बताई गई है। यानी इस बार करीब 150,000 किलो टमाटर इस्तेमाल हुए।
ये टमाटर खाने के लिए क्यों नहीं थे
इस खबर का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है। ला टोमाटीना में इस्तेमाल होने वाले टमाटर सामान्य खाद्य बाजार के लिए तैयार नहीं किए जाते।
स्पेन की सरकारी प्रसारण संस्था आरटीवीई के मुताबिक इस साल इस्तेमाल हुए टमाटर खास तौर पर आयोजन के लिए उगाए गए थे और मानव उपभोग के लिए उपयुक्त नहीं थे। आयोजन के लिए ऐसे टमाटर चुने जाते हैं जिन्हें हाथ से आसानी से कुचला जा सके, ताकि फेंकने के दौरान चोट का जोखिम कम रहे।
फिर भी सवाल क्यों उठ रहा है
इसके बावजूद खाद्य बर्बादी और कृषि संसाधनों को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। खेती के लिए जमीन, पानी, श्रम और ऊर्जा की जरूरत होती है। किसी फसल को गैर-खाद्य उद्देश्य के लिए उगाने में भी इन संसाधनों का इस्तेमाल होता है। यही वजह है कि ला टोमाटीना की तस्वीरें हर साल एक बहस पैदा करती हैं। एक पक्ष इसे स्थानीय संस्कृति और पर्यटन से जुड़ा उत्सव मानता है। दूसरा पक्ष सवाल करता है कि कृषि उत्पादों के इस्तेमाल का पर्यावरणीय और नैतिक पहलू क्या है। इस बहस में दोनों पहलुओं को अलग रखना जरूरी है। उपलब्ध तथ्य यह नहीं बताते कि आयोजन में बाजार के लिए तैयार खाने योग्य टमाटर इस्तेमाल किए गए थे। लेकिन यह भी सही है कि 150 टन कृषि उपज को एक उत्सव में इस्तेमाल किया गया।
भारत में टमाटर की तस्वीर क्या है
भारत में टमाटर की कीमत पूरे देश में एक जैसी नहीं होती। मंडी, शहर, आवक, गुणवत्ता, मौसम और परिवहन के आधार पर भाव बदलते हैं।
हालिया बाजार आंकड़ों में इसका साफ अंतर दिखाई देता है। 24 अगस्त को अलग-अलग शहरों में टमाटर के दाम अलग रहे। उपलब्ध आंकड़ों में नागपुर और नासिक में करीब 45 रुपये किलो, बेंगलुरु में 48 रुपये, मुंबई में 45 रुपये, पुणे में 45 रुपये और त्रिवेंद्रम में 50 रुपये किलो का भाव दर्ज था। वहीं दिल्ली में 20 रुपये और चेन्नई में 30 रुपये किलो का भाव बताया गया। चेन्नई के कोयम्बेडु थोक बाजार में 24 अगस्त को टमाटर 20 रुपये किलो था, जो 21 अगस्त के मुकाबले 5 रुपये कम था। इससे साफ है कि “भारत में टमाटर 50 रुपये किलो” कहना पूरे देश की मौजूदा कीमत का प्रतिनिधित्व नहीं करता। सरकारी कीमत निगरानी प्रणाली देशभर के 555 बाजार केंद्रों से रोजाना आवश्यक वस्तुओं के दाम जुटाती है। इसमें टमाटर भी शामिल है। अलग-अलग केंद्रों पर गुणवत्ता और किस्म में अंतर होने के कारण स्थानीय कीमतों में भी फर्क रहता है।
किसान और उपभोक्ता दोनों पर असर
टमाटर जल्दी खराब होने वाली फसल है। इसलिए इसकी कीमत में उतार-चढ़ाव तेज रहता है। किसी क्षेत्र में उत्पादन बढ़ने और मंडी में आवक ज्यादा होने पर किसान को कम दाम मिल सकते हैं। दूसरी तरफ बारिश, बाढ़, गर्मी या परिवहन बाधित होने पर आपूर्ति घटती है और उपभोक्ता कीमत बढ़ सकती है। यही कारण है कि भारत में एक ही समय पर अलग-अलग शहरों में टमाटर के भाव में बड़ा अंतर दिखाई देता है।
मंडी में थोक भाव कम होने का अर्थ यह भी नहीं है कि उपभोक्ता को वही कीमत बाजार में मिलेगी। परिवहन, छंटाई, खराब होने का नुकसान और खुदरा मार्जिन अंतिम कीमत को प्रभावित करते हैं।
ला टोमाटीना का इतिहास
ला टोमाटीना की शुरुआत 1945 में हुई एक स्थानीय घटना से जुड़ी बताई जाती है। बाद में टमाटर फेंकने की यह परंपरा हर साल आयोजित होने वाले उत्सव में बदल गई। समय के साथ बुन्योल का यह आयोजन स्थानीय परंपरा से अंतरराष्ट्रीय पर्यटन आकर्षण बन गया। 2002 में इसे आधिकारिक तौर पर अंतरराष्ट्रीय पर्यटक रुचि वाले उत्सव के रूप में मान्यता दी गई। भारतीय पर्यटकों के बीच भी इसकी पहचान मजबूत है। 2011 की फिल्म जिंदगी ना मिलेगी दोबारा में ला टोमाटीना का दृश्य दिखाए जाने के बाद भारत में इस उत्सव को लेकर दिलचस्पी और बढ़ी। 2026 में भी भारतीय प्रतिभागियों की मौजूदगी दर्ज की गई।
उत्सव से बुन्योल को क्या मिलता है
ला टोमाटीना केवल टमाटर फेंकने का कार्यक्रम नहीं है। यह बुन्योल के लिए पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था का बड़ा आकर्षण है।
22,000 प्रतिभागियों का एक छोटे शहर में पहुंचना होटल, परिवहन, रेस्तरां, स्थानीय दुकानों और दूसरे कारोबारों के लिए आर्थिक गतिविधि पैदा करता है। 2026 के आयोजन के लिए स्थानीय प्रशासन ने 22,000 लोगों की क्षमता तय की थी। इस आयोजन की अंतरराष्ट्रीय मीडिया कवरेज भी बुन्योल को वैश्विक पहचान देती है। इस वर्ष 45 राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों ने कवरेज के लिए मान्यता ली और 400 से अधिक पत्रकार, कैमरा कर्मी, फोटोग्राफर तथा कंटेंट क्रिएटर कार्यक्रम से जुड़े।
सफाई का इंतजाम भी बड़ा
टमाटर फेंकने के बाद शहर की गलियों में भारी मात्रा में गूदा और रस फैल जाता है। आयोजन के तुरंत बाद बड़े पैमाने पर सफाई अभियान चलाया जाता है। यह व्यवस्था भी इस उत्सव का अहम हिस्सा है। कार्यक्रम खत्म होने के बाद प्रतिभागी और स्थानीय प्रशासन मिलकर शहर को सामान्य स्थिति में लाते हैं। इस बार भीड़ और सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया गया। आयोजकों ने प्रतिभागियों की संख्या 22,000 तक सीमित रखी थी। आयोजन के दौरान सुरक्षा और प्रवेश नियंत्रण के लिए कड़े इंतजाम किए गए।
क्या इसे खाद्य बर्बादी कहना सही है
आरटीवीई के मुताबिक आयोजन में इस्तेमाल होने वाली उपज खाने के लिए उपयुक्त नहीं थी और विशेष रूप से इस उत्सव के लिए उगाई गई थी। इसलिए इसे सामान्य बाजार में उपलब्ध खाद्य टमाटर की बर्बादी के बराबर रखना सही नहीं होगा।
हालांकि पर्यावरणीय बहस अलग है। अगर कोई कृषि उपज खाने के बजाय किसी अन्य उद्देश्य के लिए पैदा की जाती है, तो पानी, जमीन और कृषि संसाधनों के इस्तेमाल का सवाल उठता है।
सोशल मीडिया की वायरल तुलना
“यहां 50 रुपये किलो और वहां लाखों टन बर्बाद” जैसी तुलना सोशल मीडिया पर तेजी से ध्यान खींचती है। लेकिन इसमें दो अलग-अलग वास्तविकताओं को एक ही फ्रेम में रख दिया जाता है।
पहला तथ्य यह है कि भारत में टमाटर की कीमतें शहर और मंडी के हिसाब से अलग हैं। दूसरा तथ्य यह है कि बुन्योल में 150,000 किलो टमाटर इस्तेमाल हुए। तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि आयोजन में इस्तेमाल होने वाली फसल खास तौर पर उसी उद्देश्य के लिए तैयार की गई थी।
इसलिए सही सवाल यह है कि क्या किसी कृषि उत्पाद का गैर-खाद्य इस्तेमाल संसाधनों के लिहाज से उचित है, और क्या ऐसे आयोजन के आर्थिक तथा सांस्कृतिक लाभ उसकी लागत को संतुलित करते हैं।
आगे की तस्वीर
ला टोमाटीना 2026 ने एक बार फिर स्पेन के बुन्योल को दुनिया की सुर्खियों में ला दिया है। 22,000 लोगों की भीड़ और 150 टन टमाटर की वजह से यह आयोजन दृश्य रूप से आकर्षक जरूर रहा, लेकिन इसके पीछे पर्यटन, स्थानीय अर्थव्यवस्था, कृषि संसाधन और पर्यावरण से जुड़े सवाल भी हैं।
भारत में टमाटर की कीमतों को लेकर तुलना करते समय स्थानीय बाजार की वास्तविक दरों को देखना ज्यादा जरूरी है। 24 अगस्त के उपलब्ध आंकड़ों में कुछ शहरों में भाव 50 रुपये किलो के आसपास थे, जबकि दिल्ली और चेन्नई जैसे बाजारों में इससे कम कीमत दर्ज हुई।
इसलिए इस कहानी का सही निष्कर्ष “भारत में महंगा टमाटर और स्पेन में बर्बादी” भर नहीं है। असल कहानी कृषि उपज की कीमत, उपयोग, संसाधनों और सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था के बीच मौजूद जटिल रिश्ते की है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।